Tuesday, January 13, 2026

नव-चेतना का महापर्व : मकर संक्रांति


तिल-गुड़ की खुशबू महक उठी, नभ में उल्लास का डेरा है,
मिटा कुहासा जड़ता का, अब हुआ नया सवेरा है।
मकर राशि में सूर्य पधारे, किरणों ने ली अंगड़ाई,
अंधकार की हार हुई, और प्रकाश की जोत सवाई।

जैसे गरजे थे विवेकानंद, बन ज्ञान का दिव्य प्रकाश,
वैसे ही तपन बढ़ाकर सूर्य, भेद रहे अब नील आकाश।
उत्तरायण की यह पावन बेला, पुरुषार्थ का संदेश सुनाती,
कायरता को त्याग वीर, अब विजय-पथ पर कदम बढ़ाती।

तिल-गुड़ मिल जैसे एकाकार हुए हैं,
वैसे ही जन-जन के मन में, प्रेम-भाव संचार हुए हैं।
पतंगों सी ऊँची उड़ान हो, लक्ष्यों का संधान रहे,
धरा से जुड़े हों पाँव हमारे, पर छूना आसमान रहे।

काँप उठे सब शत्रु-भाव, जब सौहार्द की गंगा बहती,
दान-पुण्य और सेवा की यह, रीत सनातन हमसे कहती।
उठो युवा! तुम बनो सूर्य-सम, तपकर जग को राह दिखाओ,
भारत माँ के गौरव को तुम, फिर से शिखर पर पहुँचाओ।


           © खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
     मुंगेली, छत्तीसगढ़,8120032834

शुभ मकर संक्रांति! यह पर्व आपके जीवन में सूर्य जैसी प्रखरता और तिल जैसी मिठास लेकर आए।

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