Monday, June 22, 2026

।। भारतवर्ष महात्म्य स्तोत्रम ।।

॥ भारतवर्ष महात्म्य स्तोत्रम् ॥

हिमालयोत्तमा यस्य शिरोदेशे विराजते।
सागरो यत्पदाम्भोजौ प्रक्षालयति नित्यशः ॥ १ ॥

पुण्यभूमिः सुविस्तारा भारतं नाम विश्रुतम्।
सर्वधर्मसमन्विता वसुधा रत्नगर्भिणी ॥ २ ॥

गङ्गा यमुना सिन्धुश्च पावनाः सरितो यतः।
पवित्रयन्ति च महीं स्वजलैः पुण्यदायिभिः ॥ ३ ॥

ऋषिभिर्ज्ञानिभिः पूर्णं तपोभूमिर्मनोहरा।
यत्र वेदोच्चरैर्दिव्यं वातावरणं वर्धते ॥ ४ ॥

पुण्यक्षेत्राणि यत्रैव काशी काञ्ची च पुष्करम्।
हरिद्वारं प्रयागं च मुक्तिं यच्छन्ति भूरिशः ॥ ५ ॥

ज्ञानस्य दीपका यत्र वेदान्तेषु प्रतिष्ठिताः।
सत्यं शिवं सुन्दरं च यत्र धर्मः प्रवर्तते ॥ ६ ॥

अहिंसा परमो धर्म इति यस्य च शासनम्।
वसुधैव कुटुम्बकमिदं राष्ट्रं वदत्यलम् ॥ ७ ॥

वीराः प्रसूयन्ते यत्र त्यागीनां भूमिरीदृशी।
देशभक्त्या समायुक्ताः प्राणान् त्यक्तुं च सन्नद्धः ॥ ८ ॥

प्राचीनसंस्कृतेर्धारा अविरलप्रवाहिनी।
परम्पराऽनुसारेण यत्र सदा प्रवर्धते ॥ ९ ॥

शौर्यं धैर्यं च शौचं च यत्र नित्यं विराजते।
विद्याविनयसम्पन्नाः सन्तो यत्र वसन्ति च ॥ १० ॥

ऋतूनां च समाहारः प्राकृतिकसौन्दर्यभूषितम्।
निखिलैर्गुणसम्पन्नं भारतं मे प्रियं सदा ॥ ११ ॥

रामस्य चरितं यत्र कृष्णस्य योगदर्शनम्।
बुद्धस्य करुणा यत्र महावीरस्य संयमः ॥ १२ ॥

अनेकताऽपि यत्रैव एकतायाः प्रकीर्तनम्।
विविधैः सम्प्रदायैस्तु संयतं देशगौरवम् ॥ १३ ॥

वेदपुराणशास्त्राणां उत्पत्तिस्थानमुत्तमम्।
सभ्यतायाश्च केन्द्रं वै भारतं विश्वमङ्गलम् ॥ १४ ॥

यत्र सन्ति गिरि श्रेष्ठाः काननानि च कुत्रचित्।
यत्र नद्यः प्रवहन्ति नन्दनं भारतं ततः ॥ १५ ॥

पुण्यं यशः च कीर्तिं च यदवाप्य नरा जनाः।
स्वर्गं विहाय इच्छन्ति भारतं भुवि मङ्गलम् ॥ १६ ॥

सर्वे भवन्तु सुखिनः प्रार्थना यत्र गीयते।
सर्वकल्याणकारिण्यां भुवि श्रेष्ठं च भारतम् ॥ १७ ॥

इतिहासस्य साक्षी वै सनातनी च संस्कृतिः।
यत्रैव जीवति सदा यस्याः कोऽपि न वारकः ॥ १८ ॥

अभिवाद्य महात्मानं भारतं मातृरूपिणम्।
प्रणमामि मुदा नित्यं धन्योऽहं भारतोद्भवः ॥ १९ ॥

इति भारतमाहात्म्यं पठतां भक्तिपूर्वकम्।
देशप्रेमं च वर्धेत सुखं चैव च वर्धते ॥ २० ॥

॥ इति श्री खेमेश्वर पुरी गोस्वामी विरचित भारतवर्महात्म्य स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
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॥ भारतवर्ष महात्म्य स्तोत्र: भावार्थ ॥

१. जिसके सिर (उत्तर) पर हिमालय पर्वत विराजमान है और जिसके चरणों को सागर नित्य धोता है, ऐसा यह भारतवर्ष है।

२. यह पुण्यभूमि भारत के नाम से विख्यात है, जो अत्यंत विस्तृत, सभी धर्मों को समाहित करने वाली और रत्नों की खान है।

३. जहाँ गंगा, यमुना और सिंधु जैसी पावन नदियाँ अपने पवित्र जल से इस धरती को सदा पुनीत करती हैं।

४. यह ऋषियों और ज्ञानियों से पूर्ण तपोभूमि है, जहाँ वेदों के उच्चार से दिव्य वातावरण सदैव बना रहता है।

५. जहाँ काशी, कांची, पुष्कर, हरिद्वार और प्रयाग जैसे पवित्र क्षेत्र हैं, जो मोक्ष प्रदान करने वाले हैं।

६. जहाँ वेदांतों में प्रतिष्ठित ज्ञान के दीपक जलते हैं और जहाँ 'सत्यं शिवं सुन्दरं' का धर्म मार्ग प्रशस्त है।

७. 'अहिंसा ही परम धर्म है'—यह जिसका शासन (नियम) है, और जो पूरे विश्व को ही 'वसुधैव कुटुम्बकम्' (एक परिवार) मानता है।

८. जहाँ वीर उत्पन्न होते हैं, यह त्यागियों की भूमि है, जहाँ के निवासी देशभक्ति के लिए प्राण देने को सदा तत्पर रहते हैं।

९. यहाँ की प्राचीन संस्कृति की धारा अविरल प्रवाहित है, जो परंपरा के अनुसार निरंतर आगे बढ़ रही है।

१०. जहाँ शौर्य, धैर्य और पवित्रता नित्य विराजते हैं, और जहाँ विद्या और विनय से युक्त संत निवास करते हैं।

११. जहाँ सभी ऋतुओं का संगम है, जो प्राकृतिक सौंदर्य से सुसज्जित है, ऐसा गुणों से संपन्न भारत मुझे सदैव प्रिय है।

१२. जहाँ राम का चरित्र है, कृष्ण का योग दर्शन है, बुद्ध की करुणा है और महावीर का संयम है।

१३. जहाँ अनेकता में भी एकता का गान होता है, और विभिन्न संप्रदायों के होते हुए भी देश का गौरव संयमित (जुड़ा हुआ) है।

१४. यह वेद, पुराण और शास्त्रों का उत्तम उत्पत्ति स्थान है, सभ्यता का केंद्र और विश्व का कल्याण करने वाला भारत है।

१५. जहाँ कहीं ऊंचे पर्वत हैं तो कहीं घने वन, और जहाँ नदियाँ बहती हैं; इसलिए यह भारत धरती का नंदनवन (स्वर्ग) है।

१६. यहाँ के पुण्य, यश और कीर्ति को प्राप्त करके मनुष्य स्वर्ग को छोड़कर इस मंगलकारी भारत में रहना चाहते हैं।

१७. जहाँ 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' (सभी सुखी हों) की प्रार्थना गाई जाती है, ऐसे सबका कल्याण करने वाले संसार में भारत श्रेष्ठ है।

१८. यह इतिहास का साक्षी है और इसकी सनातनी संस्कृति सदैव जीवित रहती है, जिसे कोई रोक नहीं सकता।

१९. माता के स्वरूप वाले इस महान भारत को प्रणाम करके, मैं सदा आनंदपूर्वक नमन करता हूँ। मैं धन्य हूँ कि मेरा जन्म भारत में हुआ है।

२०. इस भारत महात्म्य को जो भक्तिपूर्वक पढ़ते हैं, उनका देशप्रेम बढ़ता है और जीवन में सुख की वृद्धि होती है।

।।श्री खेमेश्वर पुरी गोस्वामी कृत भारतवर्ष महात्म्य स्तोत्र सम्पूर्ण हुआ।।

मैं बनूँगा शिवाजी, मैं बनूँगा राणा सा

मैं बनूँगा शिवाजी, मैं बनूँगा राणा सा,

मैं बनूँगा शिवाजी, मैं बनूँगा राणा सा,
चंद्र बोस और भगत, बनूँ मैं बाबा सा।
सीने में हो आग तिरंगे की शान की,
सुनता रहूँ सदा गाथाएँ हिंदुस्तान की।

झाँसी वाली रानी बनूँ, मैं लडूंगी रण में,
मातृभूमि की सेवा हो, हर एक मेरे कण में।
सरोजिनी की वाणी जैसी शक्ति मैं पाऊँगी,
भारत माँ के गौरव को दुनिया को बताऊँगी।

महाराणा की तलवार बनूँ, मैं वीर अडिग रहूँ,
देश की रक्षा के खातिर, हर मुश्किल को सहूँ।
अशफ़ाक और बिस्मिल जैसा, बलिदान मैं कर जाऊँ,
स्वतंत्रता के इस दीप को, सदा जलाती जाऊँ।

आजाद की आज़ादी का, मैं मान बढ़ाऊँगा,
कलाम जैसा ऊँचा सपना, सच कर दिखाऊँगा।
वीरों की इस मिट्टी का, मैं कर्ज चुकाऊँगा,
भारत के इस गौरव को, विश्व में फैलाऊँगा।

तात्या की रण-नीति,मन में आज बसाएँगे,
मंगल की ललकार से,सोया देश जगाएँगे।
सुभाष 'आजाद हिंद', गौरव गान करेंगे हम,
भारत की हर ज़मीन का, मान बढ़ाएंगे हम।

पन्ना का त्याग महान, सदा याद रखेंगे,
वीरांगना अवंतीबाई सा,साहस साथ रखेंगे।
लाला के प्राणों की, आहुति याद दिलाती है,
हर भारतीय दिल में, एक क्रांति जगाती है।

मातृभूमि के चरणों में, हम शीश झुकाएंगे,
वीर सपूतों के पद-चिन्हों पर, आगे बढ़ जाएंगे।


सर्वाधिकार सुरक्षित : खेमेश्वर पुरी गोस्वामी 
मुंगेली, छत्तीसगढ़,८१२००३२८३४

Friday, June 19, 2026

योग का प्रकाश

​योग का प्रकाश

​तन-मन को जो करे स्वस्थ, योग वही वरदान है,
सच्ची शांति और खुशी का, यही सही विधान है।

बीमारी को दूर भगाए, नई शक्ति का संचार करे,
जीवन की हर बाधा को, यह सहज ही पार करे।

साँसों की लय में सिमटी, ब्रह्मांड की ये शक्ति है,
स्वयं को खुद से जोड़ने की, अनमोल यह भक्ति है।

आओ सब मिलकर अपनाएं, योग का यह पावन मार्ग,
योग ही तो है स्वस्थ जीवन का, सबसे सुंदर स्वर्ग।
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तन को दे नव स्फूर्ति,मन को दे शांति अपार।
योग ही है जीवन का,सच्चा सुखी आधार।

रोग मिटाए योग हमारा,शक्ति नई जगाता है।
स्वस्थ सुखी जीवन जीने का,राह यही दिखाता है।

सर्वाधिकार सुरक्षित : खेमेश्वर पुरी गोस्वामी 
मुंगेली, छत्तीसगढ़,८१२००३२८३४

Monday, June 15, 2026

॥ श्री हनुमत महात्म्य स्तुति ॥

     ॥ श्री हनुमत महात्म्य स्तुति ॥

अंजना-सुत विख्यातं, वायुपुत्रं महाबलम्।
रामभक्ति-रतं वीरं, नौमि संकट-भंजनम् ॥१॥

बालरूपेण गगनं, सूर्यमिन्दुं च मेनिरे।
फलमद्य विधायाशु, मुनि-शापं दधौ मुदा ॥२॥

वानराणां प्रवीणं तं, सुग्रीव-सचिवं शुभम्।
राम-लक्ष्मण-भक्तं तं, प्रणमामि मुहुर्मुहुः ॥३॥

सागरं लङ्घितं येन, विभीषण-विशारदम्।
लंका-दाहं कृतं येन, सीता-संदेश-हारकम् ॥४॥

संजीवन-धरं धीरं, द्रोण-पर्वत-धारिणम्।
लक्ष्मण-प्राण-दातारं, कालनेमि-विनाशनम् ॥५॥

राम-कार्य-रताकारं, स्वर्ण-कायोपमं प्रभुम्।
रावणस्य भयं येन, कृतं तं वीरमर्चये ॥६॥

सीता-रामाज्ञया नित्यं, राम-नाम-परायणम्।
ब्रह्मचारी महातेजा, सर्व-पाप-विनाशनम् ॥७॥

विश्वरूपं महावीर्यं, रामदूतं मनोहरम्।
सदा भक्ताभयकरं, हनुमन्तं नमाम्यहम् ॥८॥

॥ इति -खेमेश्वर-पुरी-गोस्वामी-विरचिता श्री हनुमत महात्म्य स्तुतिः संपूर्णा ॥

सर्वाधिकार सुरक्षित : खेमेश्वर पुरी गोस्वामी 
मुंगेली, छत्तीसगढ़,८१२००३२८३४

Sunday, June 14, 2026

॥ श्री राम संक्षेप रामायण स्तुति ॥

॥ श्री राम संक्षेप रामायण स्तुति ॥

अयोध्ययां सुजातोऽयं, पुत्रो दशरथस्य च।
विश्वामित्रमुनीन्द्रेण, रक्षितो हि महामखः॥ १॥

सीतास्वयंवरं दृष्ट्वा, भक्त्वा चापं महेश्वरम्।
विवाहं च विधायैव, गतो हि मिथिलां मुदा॥ २॥

कैकेय्या वरयाचेऽथ, वनवासो हि तस्य वै।
लक्ष्मणस्तेन सार्धं तु, जगाम च वनं तदा॥ ३॥

मायामृगवधार्थं तु, सीतापहरणं तदा।
हनुमन्तं समासाद्य, सुग्रीवेण सखा कृतः॥ ४॥

सेतुबन्धनं कृत्वा, लङ्कायां च प्रधर्षितम्।
रावणं सानुजं हत्वा, प्राप राज्यं सुखावहम्॥ ५॥

तमेवं रामचन्द्रं तं, भजामि सुगुणाकरम्।
प्रसन्नो भव मे देव, पाहि मां च जगत्पते॥ ६॥

॥ इति -खेमेश्वर-पुरी-गोस्वामी-विरचिता श्री राम स्तुतिः संपूर्णा ॥



अनुवाद:
अयोध्या में दशरथ के पुत्र के रूप में आपका जन्म हुआ और विश्वामित्र मुनि के यज्ञ की आपने रक्षा की।

आपने शिवजी का धनुष तोड़कर सीताजी से विवाह किया और मिथिला से प्रसन्नतापूर्वक लौटे।

कैकेयी के वरदान के कारण आपको वनवास मिला और लक्ष्मण के साथ आप वन को गए।

मायावी मृग के कारण सीता का अपहरण हुआ, फिर आपने हनुमान जी को प्राप्त किया और सुग्रीव से मित्रता की।

सेतुबंध बनाकर लंका पर विजय प्राप्त की, रावण का वध किया और पुनः अयोध्या आकर सुखद राज्य संभाला।

ऐसे गुणों के भंडार श्री रामचन्द्र जी को मैं भजता हूँ। हे देव! हे जगत्पति! आप मुझ पर प्रसन्न हों और मेरी रक्षा करें।


सर्वाधिकार सुरक्षित : खेमेश्वर पुरी गोस्वामी 
मुंगेली, छत्तीसगढ़,८१२००३२८३४

महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम् (भुजंगप्रयात छंद)

महिषासुरमर्दिनी  स्तोत्रम् (भुजंगप्रयात छंद) 

​१. गिरीशस्य पुत्री गिरीशस्य गेहे, सुमेदा प्रदात्री सुमेदा सदेहे।
विचित्रैव लीला विचित्रा विलासा, नता विष्णुना सा सदा विष्णुपासा॥

​२. सुरैर्वन्दिता चामरैः पूजिता सा, विनाशा विनाशा विनाशोदिता सा।
त्रिलोकी भवा पोषिता विष्णुमाया, दया सिंधु रूपा सदा विश्वजाया॥

​३. दनुर्वैरिणी दैत्यदंभी कृता सा, विनाशा विनाशा विनाशे स्थिता सा।
रमे भद्रकाली महानीलवर्णा, सदा विश्वमाता भवा दु:खहर्णा॥

​४. जगन्मातृका शैलजा शैलपुत्री, सदानन्ददात्री सुहासा सुमित्री।
प्रपन्नाभये शैलजा शैलकान्ता, विनाशा विनाशा सुरेन्द्रस्य हन्ता॥

​५. महाविघ्ननाशा महाशक्तिरूपा, विनाशा विनाशा सदा चारुरूपा।
विनाशा विनाशा विनाशा विनाशा, विनाशा विनाशा विनाशा विनाशा॥ (शत्रु-संहारक भाव)

​६. रणे युद्धमत्ता सुदुर्गा सुवीरा, महाशक्तिरूपा महातेजधीरा।
त्रिलोकी प्रपूज्या सदा विश्वमाता, विनाशा विनाशा विनाशा विनाशा॥

​७. इयं शैलपुत्री सदा विश्वरम्या, सुरैर्वन्दिता सा सदा पुण्यगम्या।
विनाशा विनाशा विनाशा विनाशा, जयं देहि देवि सदा विश्वदासा॥

​८. महाकालरूपा महाकालहन्त्री, विनाशा विनाशा विनाशा प्रदात्री।
सुपुष्पै: सदा पूजिता विश्वमाता, जयं देहि देवि सदा शैलजाता॥

॥ इति -खेमेश्वरपुरी-गोस्वामी-विरचिता महिषासुरमर्दिनी  स्तोत्रम् सम्पूर्णा ॥

भावार्थ
१. गिरीशस्य पुत्री गिरीशस्य गेहे...
जो हिमालय (गिरीश) की पुत्री हैं और हिमालय के ही घर में निवास करती हैं, जो परम बुद्धि (सुमेधा) प्रदान करने वाली हैं और साक्षात देह धारण किए हुए हैं। जिनकी लीलाएँ विचित्र हैं और विलास अद्भुत हैं, जो सदैव भगवान विष्णु द्वारा वंदित हैं और उन्हीं की शक्ति (विष्णुपासा) हैं, मैं उन देवी को प्रणाम करता हूँ।

२. सुरैर्वन्दिता चामरैः पूजिता सा...
देवताओं द्वारा वंदित और चमर से पूजी जाने वाली, दुष्टों का विनाश करने वाली, और विनाश के समय स्वयं प्रलय बनकर खड़ी होने वाली देवी। जो तीनों लोकों का भरण-पोषण करने वाली विष्णुमाया हैं और करुणा का सागर हैं, वही संपूर्ण जगत की जननी हैं।

३. दनुर्वैरिणी दैत्यदंभी कृता सा...
दानवों की शत्रु और दैत्यों का दंभ चूर करने वाली, विनाश के समय विनाश रूप में स्थित रहने वाली। जो लक्ष्मी (रमे) स्वरूपा, भद्रकाली और गहरे नीले रंग वाली हैं, वही विश्व की माता और संसार के दुखों को हरने वाली हैं।

४. जगन्मातृका शैलजा शैलपुत्री...
जगत की माता, पर्वत से उत्पन्न (शैलजा), शैलपुत्री, सदा आनंद देने वाली, सुंदर मुस्कान वाली और सुमित्र (भक्तों की अच्छी मित्र) हैं। जो शरणागत को अभय देने वाली और हिमालय की शोभा हैं, वे दुष्टों का विनाश करने वाली और सुरेन्द्र (इन्द्र) के शत्रुओं को मारने वाली हैं।

५. महाविघ्ननाशा महाशक्तिरूपा...
सभी बड़े विघ्नों का नाश करने वाली, महाशक्ति के रूप में स्थित, सदा सुंदर रूप धारण करने वाली। हे देवी! आप दुष्टों का विनाश करने वाली हैं (यहाँ 'विनाशा' का बार-बार प्रयोग शत्रु-संहार और दुष्ट प्रवृत्तियों के नाश के संकल्प को दर्शाता है)।

६. रणे युद्धमत्ता सुदुर्गा सुवीरा...
रणभूमि में युद्ध के लिए उन्मत्त, परम दुर्गा (जिसे कठिनता से पाया जा सके), महाशक्तिशाली, महातेजस्वी और धैर्यवान। तीनों लोकों द्वारा पूजी जाने वाली और विश्व की माता, आप दुष्टों का संहार करने वाली हैं।

७. इयं शैलपुत्री सदा विश्वरम्या...
यह हिमालय की पुत्री सदैव संपूर्ण विश्व में रमण करने वाली और पुण्य कर्मों से प्राप्त होने वाली हैं। हे देवी! आप दुष्टों का विनाश करें। आप विश्व की दासी (भक्तों) को सदैव विजय प्रदान करें।

८. महाकालरूपा महाकालहन्त्री...
आप महाकाल का स्वरूप हैं और महाकाल (समय/मृत्यु) का भी संहार करने वाली हैं। आप ही विनाशक हैं और आप ही सुख प्रदान करने वाली हैं। सुंदर पुष्पों से सदैव पूजी जाने वाली हे विश्वमाता! हे शैलजा! आप हमें सदैव विजय प्रदान करें।

सर्वाधिकार सुरक्षित :  खेमेश्वर पुरी गोस्वामी 
मुंगेली, छत्तीसगढ़,८१२००३२८३४

॥ श्री शिव स्तुति ॥ शार्दूलविक्रीडित,वसन्ततिलका छंद मिश्रित

​॥ श्री शिव स्तुति ॥

​जटाजालमध्ये वहति सुरनदी फेनधवला,
फणीन्द्रैः कण्ठालङ्कृतमिह विकालं च वपुषम्।
डमरू-ध्वनि-नादैरथ चण्ड-ताण्डव-रतं,
नमामि त्वं साक्षाच्छिवं महाकाल-रूपम् ॥१॥

​जटाजूटे गङ्गा लहरि-लहरी-खेलन-वती,
ललाटे चन्द्रोऽयं मलयज-सुगन्धोऽमृत-करः।
प्रदीप्ताग्नि-ज्वाला दहति मदनं भाल-विवरे,
प्रसीद त्वं देवं मम हृदये ध्यामि सततम ॥२॥

​गिरिराज-सुता-चित्त-रञ्जन-परं, सुखाधार-शिवं,
कृपा-दृष्टि-पातेन हरसि सकलं दुःख-जालम्।
तजित्वैव संसार-भीतिं विहाय, अहमेव सदा,
भजे विश्वनाथं हरं मोक्षदं दिव्य-रूपम् ॥३॥

​स्फुरन्मणिरत्न-प्रभा-रञ्जितं, दिशो वदनं यस्य,
गजाजिन-वस्त्रं तद्द्भुतं रूपमस्य सुशोभितम्।
विभूति-विलेपं धत्ते भूतनाथः स्वयं यः,
अचिन्त्यं सुभावं भजे शङ्करं देव-देवम् ॥४॥

​सुरेन्द्र-मुनीन्द्राः नतं यस्य पादं, धरन्तीह रेणुं,
जटाजूट-धृत्वा शशि-चकोर-कलां मोदमानाः।
भुजङ्गैः सुबद्धोऽथ कण्ठे विराजन्,
भजे तं शिवं शान्त-भावं मनोऽभिष्ट-दं मे ॥५॥

​ललाटे ज्वलन्ती ज्वलज्ज्वालमाला,
महाकाल-तेजः क्षयं कामदेवम्।
सुर-सिद्ध-संघे नतं तं सदा वै,
जटा-गुल्म-धारी हरं नूतनाहम् ॥६॥

​धगद्-धगद्-धगद्-धगद्-ज्वलच्छिखा-भाले,
मदनस्य बाणैः पुनरहुतिं ददाति।
गौरी-कुच-चित्र-लेखन-कुशलोऽसौ,
शिल्पी-वरोऽयं हरः प्राण-रूपः ॥७॥

​नव-मेघ-श्यामं तव कण्ठ-मूलं,
अमावास्या-वत् कान्ति-युक्तं च नित्यम्।
गजासुर-हन्तारं गङ्गा-धरं तं,
जगदाधार-रूपं भजे दुःख-शमनम् ॥८॥

​नीलोत्पल-दल-श्यामं कण्ठमस्य विलोक्यते,
कामस्य त्रिपुरस्यापि विनाशी देव-पूजितः।
दक्ष-यज्ञ-विनाशी च अन्तकस्यापि कालकः,
भजेऽहं भव-भीति-हारिणमखण्डं शिवं सदा ॥९॥

​मङ्गलायाः कलाभिर्युतं भृङ्ग-तुल्यं,
रसज्ञं प्रपन्नं रस-पान-लीनम्।
यमादीन् विजित्य स्थितं तं विभूतिं,
भजेऽन्तकस्याप्यन्तकं देव-नाथम् ॥१०॥

​फणोच्छ्वास-युक्तैः भुजङ्गैः समेतं,
मृदङ्गस्य नादैरथ ताण्डव-मग्नम्।
प्रचण्ड-प्रभावं कपालं धरन्तं,
शिवं मङ्गलं मङ्गलं सर्वदा मे ॥११॥

​सर्प-हार-रत्न-माला स्वर्ण-मृत्तिका-तुल्य-भावः,
शत्रु-मित्र-तुल्य-दृष्टिः सर्वदा समभावा।
सम-दृष्टि-स्थितं देवं चक्रवर्ति-रक्षकं,
भजे सदाशिवं भेद-हीनं च नित्यम् ॥१२॥

​गङ्गा-तटे कुञ्ज-गृहे वसामि,
मन्त्रं जपन् हस्त-युतं च शीर्षणम्।
त्यक्त्वा नयन-चापलं ध्यान-युक्तं,
प्राप्नोमि शिव-पदं सुख-रूपं सदा ॥१३॥

​इदं स्तोत्रं नित्यं पठति नर-देवः सुख-करम्,
विशुद्धः स आत्मा भवति शिव-भक्तिं च लभते।
मोह-जालं छित्वा मुक्तिं ददाति शम्भुः,
शरणं गच्छति तं परम-गतिं लभते नृपः ॥१४॥

​॥ इति -खेमेश्वर-पुरी-गोस्वामी-विरचिता श्री शिव स्तुतिः संपूर्णा ॥

भावार्थ 
 
१. जिनकी जटाओं में फेन जैसी श्वेत गंगा बहती है, जिनका कंठ सर्पों से सुशोभित है और जिनका रूप विकराल है, जो डमरू की ध्वनि के साथ तांडव में लीन रहते हैं, मैं उन महाकाल रूप साक्षात् शिव को प्रणाम करता हूँ।

२. जिनकी जटाओं में गंगा की लहरें क्रीड़ा करती हैं, जिनके मस्तक पर चंद्रमा विराजमान है और जो चंदन की सुगंध से सुवासित हैं। जिनके ललाट की अग्नि ने कामदेव को भस्म कर दिया, मैं उन देव को अपने हृदय में निरंतर धारण करता हूँ।

३. जो गिरिराज-पुत्री पार्वती के चित्त को प्रसन्न करने वाले और सुख के आधार हैं, जो अपनी कृपा दृष्टि से सभी दुखों को हर लेते हैं। मैं संसार के भय को त्यागकर, उन विश्वनाथ, मोक्ष प्रदाता और दिव्य रूप धारी शिव का भजन करता हूँ।

४. जिनके मुख की आभा मणियों और रत्नों की कांति से दिशाओं को प्रकाशित करती है, जो गजचर्म (हाथी की खाल) धारण करते हैं। जिनका शरीर विभूति (भस्म) से लिप्त है, मैं उन अचिंत्य, भूतनाथ शंकर को भजता हूँ।

५. जिनके चरणों को देवता और मुनि नमन करते हैं और जो जटाओं में चंद्रमा की कला को धारण कर प्रसन्न रहते हैं। जिनका कंठ सर्पों से सुशोभित है, मैं उन शांत भाव वाले शिव का भजन करता हूँ, जो मेरे मन की सभी इच्छाएं पूरी करें।

६. जिनके ललाट पर प्रज्वलित अग्नि की ज्वालाएँ कामदेव के विनाश का कारण बनीं, देवताओं और सिद्धों द्वारा पूजित, जटाओं को धारण करने वाले उन हर (शिव) को मैं निरंतर नमन करता हूँ।

७. जिनके ललाट पर 'धगद्-धगद्' शब्द करती हुई अग्नि की शिखाएँ हैं, जो कामदेव को पुन: भस्म कर देते हैं। जो गौरी (पार्वती) के अंगों पर चित्रकारी करने में कुशल हैं, वे शिल्पकार स्वरूप महादेव ही मेरे प्राण हैं।

८. जिनका कंठ नए मेघों के समान श्याम वर्ण का है, जो अमावस्या की भांति नित्य कांतिमान हैं। जो गजासुर का वध करने वाले और गंगा को धारण करने वाले हैं, मैं उन दुःख विनाशक जगत के आधार शिव का भजन करता हूँ।

९. जिनका कंठ नीले कमल के समान श्याम है, जो कामदेव और त्रिपुर के विनाशक हैं। जिन्होंने दक्ष के यज्ञ को नष्ट किया और जो यमराज के लिए भी काल हैं, मैं उन भव-भय से मुक्ति दिलाने वाले अखंड शिव का सदा भजन करता हूँ।

१०. जो कल्याणकारी कलाओं से युक्त, भृंग (भौरे) के समान रसज्ञ और आत्म-लीन हैं। जिन्होंने यम आदि को जीत लिया है और जो काल के भी काल हैं, मैं उन देव-नाथ का भजन करता हूँ।

११. जो सर्पों से युक्त हैं, मृदंग की थाप पर ताण्डव में मग्न हैं और हाथ में कपाल धारण किए हुए प्रचंड प्रभावशाली हैं, वे मंगलकारी शिव सदैव मेरा कल्याण करें।

१२. जो सर्प और रत्नों की माला धारण करते हैं, जिन्हें शत्रु और मित्र में कोई भेद नहीं है। जो सदैव समदर्शी हैं और संसार की रक्षा करने वाले हैं, मैं उन भेद-रहित सदाशिव का नित्य भजन करता हूँ।

१३. मैं गंगा तट के कुंज में निवास कर, शिव मंत्र का जप करते हुए अपने मन को चंचलता से हटाकर ध्यान में लीन रहता हूँ। इस प्रकार मैं उस सुख-स्वरूप शिव पद को प्राप्त करता हूँ।

१४. जो मनुष्य नित्य इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसका अंतःकरण शुद्ध हो जाता है और उसे शिव-भक्ति प्राप्त होती है। शम्भु उसके मोह के जाल को काटकर उसे मुक्ति प्रदान करते हैं और वह परम गति को प्राप्त होता है।

सर्वाधिकार सुरक्षित :  खेमेश्वर पुरी गोस्वामी 
मुंगेली, छत्तीसगढ़,८१२००३२८३४

।। भारतवर्ष महात्म्य स्तोत्रम ।।

॥ भारतवर्ष महात्म्य स्तोत्रम् ॥ हिमालयोत्तमा यस्य शिरोदेशे विराजते। सागरो यत्पदाम्भोजौ प्रक्षालयति नित्यशः ॥ १ ॥ पुण्यभूमिः सुविस्तारा भारतं...