Monday, June 8, 2026

कलम की धार और मर्यादा का गलियारा

कलम की धार और मर्यादा का गलियारा

साहित्य हमेशा से समाज का दर्पण रहा है। वह दर्पण, जो कभी मनुष्य के अंतर्मन की गहराइयों को कुरेदता है, तो कभी समाज की कुरीतियों पर प्रहार करता है। कलम के धनी लोग जब अपनी लेखनी उठाते हैं, तो उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे सभ्यता के शिल्पी बनेंगे। लेकिन, आज के दौर में कुछ लेखकों ने अपनी सृजनात्मकता का दायरा संकुचित कर लिया है।
आजकल साहित्यिक मंचों और सोशल मीडिया के पन्नों पर एक नया फैशन-सा चल गया है। कुछ रचनाकार अपनी 'विद्वता' को सिद्ध करने के लिए सनातन धर्म के ग्रंथों, देव-कथाओं और प्रतीकों को व्यंग्य का 'मसाला' बना रहे हैं। यह देखना विडंबनापूर्ण है कि जिस शब्दावली का उपयोग वे किसी समुदाय विशेष की आस्था को नीचा दिखाने या उस पर प्रहार करने के लिए कर रहे हैं, क्या वे वही साहस किसी अन्य संदर्भ में दिखाने का नैतिक बल रखते हैं?

व्यंग्य एक विधा है, जिसका उद्देश्य समाज का परिष्कार करना होता है, न कि किसी की श्रद्धा पर चोट करना। जब कोई लेखक किसी देवी-देवता के नाम या उनके पौराणिक आख्यानों को तोड़-मरोड़कर, उसे व्यंग्य का टाइटल या तुकबंदी का हिस्सा बनाता है, तो वह किसी 'उच्च बौद्धिक स्तर' का प्रमाण नहीं देता, बल्कि अपनी उस रुग्ण मानसिकता को प्रदर्शित करता है, जो संवाद की कला से अनभिज्ञ है।
यह समझना आवश्यक है कि 'धर्मनिरपेक्षता' का अर्थ किसी की आस्था का उपहास करना नहीं है। रचनात्मक स्वतंत्रता का झंडा लेकर चलना और बात है, और उसी झंडे की आड़ में किसी की आराध्य परंपराओं को अपमानित करना दूसरी बात।

महान साहित्य वही है जो जोड़ने का काम करता है। प्रेमचंद का 'ईदगाह' हो या रस्किन बॉन्ड की कहानियां, उनमें जो मानवीय संवेदनाएं हैं, वे किसी धर्म विशेष की सीमाओं में नहीं बँधीं। इसके विपरीत, यदि कोई लेखक अपनी पहचान बनाने के लिए दूसरों की भावनाओं को 'बलि का बकरा' बनाता है, तो वह साहित्यकार कम और विवाद का दलाल अधिक प्रतीत होता है।
साहित्य में तंज के लिए विषयों की कमी नहीं है। भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, सामाजिक विषमता, मानवीय संवेदनाओं का क्षरण—ये वे विषय हैं जिन पर कलम की स्याही भी सार्थक होगी और समाज को दिशा भी मिलेगी। लेकिन जब कलम का रुख किसी समाज की आस्था के केंद्रों की ओर मुड़ जाता है, तो वह साहित्य नहीं, बल्कि 'सांस्कृतिक विद्रूपता' बन जाता है।

लेखक का धर्म 'संवाद' है, 'विवाद' नहीं। यदि साहित्य के गलियारों में सनातनी ग्रंथों या देव-कथाओं का उपयोग केवल 'नीचा दिखाने' या 'सनसनी फैलाने' के लिए किया जा रहा है, तो यह उस लेखक की रचनात्मक निर्धनता का परिचायक है।
एक बेहतर समाज के निर्माण के लिए यह अनिवार्य है कि हम अपनी लेखनी को कुंठा के कीचड़ से बाहर निकालें। कला और साहित्य की सार्थकता इसी में है कि वह आलोचना करे, पर आहत न करे। व्यंग्य का अर्थ खंजर चलाना नहीं, बल्कि दर्पण दिखाना होना चाहिए, ताकि सामने वाला अपनी गलतियों को सुधार सके, न कि आहत होकर खड़ा हो जाए।
आखिरकार, कलम की असली ताकत शब्दों के चयन में ही नहीं, बल्कि उस गरिमा में भी है जिसे वह अपनी रचनाओं के माध्यम से जीवित रखती है।


©खेमेश्वर पुरी गोस्वामी®
मुंगेली छत्तीसगढ़,८१२००३२८३४

Sunday, June 7, 2026

खामोश होती डाल

खामोश होती डाल

मैं हूँ नन्ही चिड़िया, नीला अंबर मेरा घर था,
पंखों की उस उड़ान में, न कोई खौफ, न डर था।
पर अब तो कंक्रीट के जंगल, गगन को छूते जाते हैं,
मेरे उड़ने के रास्तों को, वे पल में ही खाते हैं।

जमाना हो गया मेरी जान का दुश्मन, अब तो ये जानो,
सिर्फ शोर और धुएं के साये में, मुझे न पहचानो।
पेड़ काट कर जो तुमने, अपनी इमारतें सजाई हैं,
उन्हीं ने मेरी चहचहाहट की, रूह तक रुलाई है।

मेरा दर्द किसी को नहीं दिखता, मैं प्यासी लौट आती हूँ,
साफ हवा की तलाश में, मैं दर-दर भटकती जाती हूँ।
इस भीड़-भाड़ की दुनिया में, इंसान कहाँ दिखते हैं,
सच्चे मर्द तो बहुत हैं, पर 'इंसानियत' वाले कहाँ दिखते हैं?
वो जो कभी हरियाली में, मेरे साथ गुनगुनाते थे,
आज शोर में खोकर, वे मुझे भूल ही जाते हैं।
क्या मुझे अब अपना घर, फिर से नसीब हो पाएगा?
या मेरा अस्तित्व, सिर्फ कागजों में सिमट कर रह जाएगा?

© खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
मुंगेली, छत्तीसगढ़ ८१२००३२८३४

Wednesday, June 3, 2026

राहों का सफ़र (बाल कविता)

 राहों का सफ़र

मैं स्कूल पढ़ने जाऊंगी,
खुद को गढ़ने जाऊंगी।
टीचर पाठ पढ़ाएगा,
मुन्ना खेल खिलाएगा।

सज-धज कर मैं जाऊंगी,
नई बातें सब पाऊंगी।
बस्ते में होंगी किताबें,
सुनूँगी ढेर सारी बातें।

पेंसिल से लिखूंगी नाम,
काम करूँगी बड़े तमाम।
क, ख, ग, घ का ज्ञान पाऊं,
ऊँचे सपनों को मैं सजाऊं।

गणित में जोड़-घटाना होगा,
ज्ञान का नया खजाना होगा।
खेल के मैदान में दौड़ूंगी,
जीत की डोरी को मोड़ूंगी।

दोस्त मिलेंगे प्यारे-प्यारे,
चमकेंगे हम सब तारे।
अनुशासन का पाठ पढूँगी,
ऊपर की ओर मैं बढ़ूँगी।

मेहनत करके नाम कमाऊं,
अपनी राह खुद ही बनाऊं।
टीचर का आदर मैं पाऊं,
सफलता की सीढ़ी चढ़ जाऊं।



           © खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
       मुंगेली छत्तीसगढ़,८१२००३२८३४

चलो खेलें खेल निराले (बाल कविता)


चलो खेलें खेल निराले (बाल कविता)

आओ बच्चों, पास में आओ,
खेल पुराने मजे से गाओ।
गली-मोहल्ले, धूल-मिट्टी में,
खुशियां ढूँढें पक्की-पक्की में।

गुल्ली-डंडा ज़ोर से मारें,
आसमान में जीत उतारें।
भंवरा घूमे गोल-मटोल,
बांटी खेले सब अनमोल।

छुपन-छुपाई में छिप जाना,
पीट्टो को फिर से जमाना।
लंगड़ी-टांग उछल कर दौड़ें,
मैदानों के बंधन तोड़ें।

रस्सा-कसी में दम लगाएं,
कुदम कुदाई खेल रचाएं।
पत्ते वाली नाव बनाएं,
बरखा में हम सैर कराएं।

कंचे खेलें, कोड़ा दौड़ें,
हाथों में हम हाथ जोड़ें।
स्क्रीन छोड़ कर बाहर आएं,
आंगन में हम धूम मचाएं।

 फोन-टैबलेट रख दो भैया,
खेलें सब मिल, छोड़ के मैया।
पसीना बहने में है शान,
खेल ही है बचपन की जान!

           © खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
       मुंगेली छत्तीसगढ़,८१२००३२८३४

Friday, May 29, 2026

चोला राष्ट्रभक्ति का ये, जो दिखावे में ओढ़े हैं,

चोला राष्ट्रभक्ति का ये, जो दिखावे में ओढ़े हैं

चोला राष्ट्रभक्ति का ये, जो दिखावे में ओढ़े हैं,
वतन से सारे मतलब तो, ये ही छोड़े हैं।
जुबां पर नाम भारत का, मगर दिल में सरोकार नहीं,
सियाही के सिवा इनके, वतन का कोई त्यौहार नहीं।

ये कागज़ पर खिंची रेखा, सरहद मान बैठे हैं,
तिरंगे को महज अपनी, सनद मान बैठे हैं।
मगर जब बात माटी की, मुसीबत सामने आई,
तो पीछे हट के अपनी, ढाल इन्होंने तोड़े हैं।
चोला राष्ट्रभक्ति का ये, जो दिखावे में ओढ़े हैं।

कोई तो कंकड़ों को भी, हीरा कहके पूजे है,
कोई माटी के मस्तक पर, लहू का टीका गूँथे है।
ये सत्ता की रसाकशी में, वतन को भूल बैठे हैं,
लकीरें खींचने वाले, खुद अपनी राहें मोड़े हैं।
चोला राष्ट्रभक्ति का ये, जो दिखावे में ओढ़े हैं।

जो खुद को मुल्क का रक्षक, बताने का ढोंग करते हैं,
वही असल में इस माटी के, जमीर को सौदा करते हैं।
मगर याद रहे ये इनको, इतिहास का ये पन्ना है,
वतन की फिक्र करने वाले, न कभी पीछे हटे हैं।
वतन के असल वारिस तो, ये दिखावे में नहीं,
खून-पसीने से अपनी, तक़दीर खुद ही गढ़े हैं।

© खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
मुंगेली छत्तीसगढ़,8120032834

Wednesday, May 27, 2026

'दुख' का बाजार और संवेदनाओं के सन्नाटे का 'रेट लिस्ट'

*'दुख' का बाजार और संवेदनाओं के सन्नाटे का 'रेट लिस्ट'*

आलेख : खेमेश्वर पुरी गोस्वामी
मुंगेली, छत्तीसगढ़ ८१२००३२८३४

छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले से सोशल मीडिया के गलियारों तक तैरता एक विज्ञापन इन दिनों विमर्श के केंद्र में है। एक व्यक्ति ने 'दुख सुनने' को बाकायदा एक पेशे का रूप दे दिया है—वह भी बकायदा रेट लिस्ट के साथ। पहली नजर में यह हास्यास्पद लग सकता है, लेकिन यदि संजीदगी से विचार करें, तो यह हमारे उस 'आधुनिक' समाज की सबसे बड़ी त्रासदी है, जहां तकनीक ने दुनिया को मुट्ठी में तो कर दिया, पर दिलों के बीच की दूरियां मीलों लंबी कर दी हैं।

उस विज्ञापन की इबारत गौर करने लायक है—"दुख कोई भी हो, किसी का भी हो, मैं सुनूंगा।" सुनने की इस प्रक्रिया के लिए ₹500 से लेकर ₹12000 तक का शुल्क निर्धारित है। यह विडंबना ही है कि जिस समाज में कभी बड़े-बुजुर्गों की चौपालें और पड़ोसियों का 'कंधा' बिना किसी मोल के उपलब्ध रहता था, वहां अब 'कान' किराए पर लेने पड़ रहे हैं। क्या हम इतने अकेले हो गए हैं कि अपनी पीड़ा साझा करने के लिए हमें सशुल्क श्रोता की आवश्यकता है? यह विज्ञापन उस मानसिक कंगाली का परिचायक है, जहां हमारे पास 'फेसबुक फ्रेंड्स' तो हजारों हैं, लेकिन दुख बांटने के लिए एक भी सच्चा इंसान नहीं।

आज हम सूचना क्रांति के युग में जी रहे हैं। 5जी की रफ्तार वाले इस दौर में सूचनाएं तो तेजी से पहुंच रही हैं, लेकिन भावनाएं बीच रास्ते में ही दम तोड़ रही हैं। महानगरों की बहुमंजिला इमारतों से लेकर छोटे शहरों के ड्राइंग रूम तक, संवादहीनता का एक गहरा सन्नाटा पसरा है। परिवार के सदस्य एक ही छत के नीचे बैठकर एक-दूसरे को देखने के बजाय मोबाइल स्क्रीन पर 'इमोजी' के जरिए भावनाएं व्यक्त कर रहे हैं। जब अपनों के पास सुनने का धैर्य नहीं बचा, तो स्वाभाविक है कि 'दुख सुनने वाले' बाजार में अपनी दुकान सजाएंगे ही।

मार्केटिंग के इस दौर में सब कुछ बिकाऊ है—हंसी भी और आंसू भी। दुर्ग के इस 'दुखियारे के साथी' ने दरअसल उस बाजार को पहचाना है, जिसे हमारी उपेक्षा ने पैदा किया है। इसे केवल एक व्यक्ति की चतुराई कहना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि यह हमारे सामाजिक पतन का अलार्म है। यदि आत्मीयता का स्थान अर्थशास्त्र ले ले, तो समझ लेना चाहिए कि मानवीय संवेदनाएं वेंटिलेटर पर हैं।

यह विज्ञापन एक व्यंग्य है उस व्यवस्था पर, जहां हम भौतिक समृद्धि के शिखर पर तो पहुंच गए, पर भावनात्मक रूप से दरिद्र हो गए। यह हमें आइना दिखाता है कि यदि हमने समय रहते अपनों को 'वक्त' देना शुरू नहीं किया, तो भविष्य में संवेदनाओं की बोली ऐसे ही सरेआम लगती रहेगी। दुख सुनने के लिए किसी को पैसे देना उस 'बीमारी' का इलाज नहीं है, बल्कि उस 'अकेलेपन' की पुष्टि है, जिसे हमने खुद ओढ़ा है।

> *तल्ख हकीकत यह है कि आज इंसान के पास अपनी बात कहने के लिए 'स्टेटस' तो है, पर सुनने के लिए कोई 'रिश्ता' नहीं बचा।*
>

'हरी झंडी' का मोह और औचित्य का उपहास : उद्घाटनजीवी राजनीति का एक नया अध्याय

'हरी झंडी' का मोह और औचित्य का उपहास : उद्घाटनजीवी राजनीति का एक नया अध्याय

आलेख : खेमेश्वर पुरी गोस्वामी
सह संपादक - न्यूज़लाइन नेटवर्क, छत्तीसगढ़ 

छत्तीसगढ़ की सड़कों पर हाल ही में 'डायल 112' के रूप में सुरक्षा और आपातकालीन सेवा का एक नया काफिला उतरा। केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने छत्तीसगढ़ आकर जब इन वाहनों को हरी झंडी दिखाई, तो प्रदेश की जनता को लगा कि अब संकट के समय 'मदद' महज एक फोन कॉल की दूरी पर है। लेकिन, इस सरकारी कवायद के महज दो दिनों के भीतर जो दृश्य देखने को मिला, वह जनसेवा से अधिक 'स्व-प्रचार' और 'उद्घाटनजीवी' मानसिकता का एक ऐसा प्रहसन है, जो लोकतंत्र में मितव्ययिता के दावों को आईना दिखाता है।

सवाल यह उठता है कि क्या छत्तीसगढ़ के उन जिला मुख्यालयों में वाहन इसलिए नहीं चल सकते थे क्योंकि वहां के स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने उसे 'पुनः हरी झंडी' नहीं दिखाई थी? क्या दिल्ली से आई हरी झंडी का महत्व स्थानीय स्तर पर तब तक शून्य रहता है, जब तक कि वह किसी स्थानीय मंत्री या विधायक के हाथ से दोबारा न फहराई जाए?

यह स्थिति किसी हास्यास्पद फिल्म के दृश्य जैसी प्रतीत होती है, जहाँ पटकथा में तार्किक चूक हो। ऐसा लगता है कि इन वाहनों के इंजन का 'स्टार्ट बटन' चाबी से नहीं, बल्कि स्थानीय नेताओं के हाथों में थमी उस हरी झंडी से संचालित होता है। यदि व्यवस्था वाकई इतनी ही जटिल है, तो फिर केंद्रीय मंत्री का आगमन मात्र एक औपचारिकता बनकर रह जाता है। यह प्रश्न अनुत्तरित है कि आखिर केंद्रीय मंत्री के आगमन का 'औचित्य' क्या था—क्या वे केवल फोटो खिंचवाने आए थे या सरकारी व्यवस्था को सुदृढ़ करने?


किसी भी सरकारी आयोजन में मंच, बैनर, प्रचार-प्रसार और प्रशासनिक अमले की उपस्थिति के लिए सरकारी खजाने का व्यय होता है। एक बार केंद्रीय गृह मंत्री के हाथों उद्घाटन के बाद, जिलों में वही रस्म फिर से दोहराना न केवल समय की बर्बादी है, बल्कि करदाताओं के धन का खुला दुरुपयोग भी है।
> *संवाद और संवादहीनता के बीच का यह फासला जनता समझ रही है। जब जनप्रतिनिधि जनसेवा से ज्यादा 'रिबन कटिंग' और 'फ्लैग ऑफ' में रुचि दिखाने लगें, तो समझ लेना चाहिए कि वे विकास के बजाय 'दृश्यता' की दौड़ में शामिल हो गए हैं। क्या जनता के पास इन व्यर्थ के आयोजनों का हिसाब मांगने का अधिकार नहीं है?*

क्या यह केंद्रीय नेतृत्व के प्रति एक प्रकार की अरुचि या अनादर का प्रदर्शन है—यह राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय हो सकता है। 
जब केंद्रीय गृह मंत्री की पहल को स्थानीय स्तर पर 'पुनः प्रमाणित' करने की होड़ मचे, तो यह एक प्रकार के 'सत्ता के संघर्ष' या 'क्रेडिट वॉर' को जन्म देता है।
यह व्यवहार केंद्रीय गृह मंत्री की गरिमा को कम करे या न करे, लेकिन यह स्थानीय नेताओं की उस 'आत्ममुग्धता' को जरूर प्रदर्शित करता है जहाँ वे खुद को व्यवस्था का केंद्र मान बैठे हैं। यदि यह महज जनसम्पर्क का एक प्रयास है, तो यह अत्यंत भोंडा है,और यदि यह केंद्रीय नेतृत्व के कद को छोटा दिखाने की कोई सुनियोजित रणनीति है, तो यह राजनीतिक अपरिपक्वता का चरमोत्कर्ष है।

अंततः, छत्तीसगढ़ की सड़कों पर दौड़ने वाली ये गाड़ियाँ जनता के लिए हैं, नेताओं के 'फोटो-ऑप्स' के लिए नहीं। यदि ये वाहन हरी झंडी दिखाए जाने के इंतजार में जिलों में खड़े रहे, तो यह प्रशासनिक विफलता है।
राजनीतिक शुचिता का तकाजा यह है कि नेता अपनी 'विजिबिलिटी' के बजाय 'एक्सेसिबिलिटी' पर ध्यान दें। जनता को हरी झंडी देखने में कोई दिलचस्पी नहीं है, उसे दिलचस्पी है तो इस बात में कि 112 डायल करने पर पुलिस या एम्बुलेंस कितनी जल्दी उसके दरवाजे पर पहुंचती है।
समय आ गया है कि हमारी राजनीति 'हरी झंडी' के प्रतीकों से ऊपर उठकर, जमीन पर उतरने वाले वास्तविक 'कार्यों' पर केंद्रित हो। वरना, जनता भी जल्द ही यह समझ जाएगी कि यह 'डायल 112' की सेवा कम और नेताओं के 'शो' का प्रदर्शन ज्यादा था।

कलम की धार और मर्यादा का गलियारा

कलम की धार और मर्यादा का गलियारा साहित्य हमेशा से समाज का दर्पण रहा है। वह दर्पण, जो कभी मनुष्य के अंतर्मन की गहराइयों को कुरेदता है, तो कभी...