Monday, February 2, 2026

कानून बनाने वाले : बस शोर ही मचाते हैं

सेल्फी खिंचवाते रहे, रिबन कटवाते रहे,
मुख्य अतिथि बन, मंच चमकाते हैं।

क्षेत्र में न दिखें कभी, दिल्ली में विलासी बनें,
जनता की भीड़ देख, हाथ को हिलाते हैं।।

लव और जिहाद रुका, न ही धर्मांतरण,
गौ-रक्षा हेतु मौन, शब्द न उगाते हैं।

मेज़ थपथपाने वाले, कानून बनाने वाले,
कानून न बना के, बस शोर ही मचाते हैं।।


            © खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
        मुंगेली, छत्तीसगढ़,8120032834

Sunday, February 1, 2026

बिरसा के वंशज उठो अब, गौरव गान सुनाना है।

मुक्तक : धरा की आन बचाने को, नया इतिहास लिखा था,
मिटाने दमन के साये, लहू से खास लिखा था।
जिन्हें 'धरती पिता' कहकर, ज़माना आज पूजता है,
उसी बिरसा ने जंगल में, विजय-विश्वास लिखा था।

चारों ओर कुहासा छाया, छद्म वेश का डेरा है,
भोली-भाली पावन धरती, को लालच ने घेरा है।
कोई बांटे नोट, कोई बस धर्म बदलने आया है,
अपनी ही जड़ों को काटने, ज़हरीला भ्रम छाया है।
पुरखों की मर्यादा का नित, हरण दिखाई देता है,
अपनों के ही हाथों अपना, मरण दिखाई देता है।
मौनव्रती बनकर रहने से, अधिकार नहीं मिल सकता,
झूठे वादों के पीछे अब, उजियार नहीं मिल सकता।

आत्मबोध की अलख जगाकर, नया सवेरा लाना है,
बिरसा के वंशज उठो अब, गौरव गान सुनाना है। (1)

मुक्तक : हुकूमत काँप उठती थी, गरजती जब कमानें थीं,
वो रॉबिनहुड था माटी का, जिसे रटती ज़बानें थीं।
नमन टंट्या को जो भूखों, की ख़ातिर लड़ गया सबसे,
उसी के शौर्य की गवाह, निमाड़ की सब ढलानें थीं।

सीधी-सादी बातों में अब, तुम मत फँसना भाइयों,
तोड़ रहे जो मेल-जोल, उन पर मत हँसना भाइयों।
नेता आते पाँच साल में, झूठे वादे करते हैं,
मंचों पर वो ऊँची-ऊँची, फर्जी बातें करते हैं।
मजहब के जो ठेकेदार हैं, घर में आग लगाते हैं,
संस्कृति को मिटाने खातिर, नया पाठ पढ़ाते हैं।
घात लगाये बैठे तुम पर, चौकन्ने मक्कार सभी,
अभी नहीं यदि जागे तुम तो, खो दोगे अधिकार सभी।

सत्य मार्ग को चुनकर तुमको, नई इबारत लिखना है,
टंट्या के वंशज उठो अब, जग को राह दिखाना है। (2)

मुक्तक : प्रथम हुंकार माटी की, उसी के तीर से निकली,
अटल आज़ादी की ज्वाला, उसी के वीर से निकली।
गिराया क्लीवलैंड को, झुकाया ज़ुल्म का परचम,
वो बाबा तिलका की हस्ती, बड़ी तक़दीर से निकली।


जल-जंगल-ज़मीन तुम्हारी, पुरखों की थाती है,
इस मिट्टी की रक्षा करना, जिम्मेदारी आती है।
केवल तीर-कमान नहीं, अब कलम भी उठाना सीखो तुम,
दुनिया की चालाकी को अब, पढ़ना-लिखना सीखो तुम।
बनो शांति के पथगामी, पर क्रांति पुत्र भी बने रहो,
अनाचार के सम्मुख हर क्षण, सीना ताने तने रहो।
शिक्षा के उजियारे से ही, स्वाभिमान बच पाएगा,
वैचारिक संग्राम लड़ोगे, तभी मान बच पाएगा।

ज्ञान-शक्ति को पाकर तुमको, अपना भाग्य बनाना है,
तिलका के वंशज उठो अब, स्वाभिमान चमकाना है। (3)

उठाकर 'हूल' का नारा, फिरंगियों को हिला डाला,
वो दो भाई जिन्होंने, सुलगता इक दिया पाला।
लड़े सिद्धू और कान्हू, कि अपना राज कायम हो,
मिटाया अपनी हिम्मत से, गुलामी का वो हर जाला।

मत भूलो तुम मान-मर्यादा, और अपनी पहचान को,
मत बदलो तुम स्वार्थ में आकर, पूर्वज के सम्मान को।
शोषण का प्रतिकार करो तुम, कर्म से अपने मत भागो,
आलस की चादर को त्यागो, कल्पित निद्रा से जागो।
अधिकार छीनना सीखो अब तुम, भीख किसी से मत माँगो,
वक्त आ गया है अब वीरों, धर्म-युद्ध में तुम जागो।
सत्य मार्ग पर चल कर अपनी, मंज़िल पाना सीखो तुम,
अधर्म की हर साज़िश को अब, धूल चटाना सीखो तुम।

शौर्य-बीज बोकर मिट्टी में, नन्दन वन मुस्काना है,
सिद्धू-कान्हू के वंशज उठो अब, नव-इतिहास रचाना है। (4)

Tuesday, January 27, 2026

छद्म सेवक

कुर्सी की हवस पाल, सेवक कहावत हैं,
भीतर कसाई रूप, बाहर सुजान हैं।

देश बेंच खात आज, गोदी में उघोगपति,
कर्ज के कुचक्र माहि, फँसा हिन्दुस्तान है।।

बिकती दवाइयाँ हैं, बिकती पढ़ाई यहाँ,
लूट के बाजार बीच, आम इंसान है।

महल चुनावी खड़े, नोटों की चिनाई होय,
झोपड़ी के भाग माहि, सूना खलिहान है।।

डिग्री की गठरी ले, डोलत सड़न माँहि,
मॉकरी करत नेता, डंडा ही विधान है।

संसद में गाली-गलौज, भ्रष्टाचार की मौज,
कैसा यह लोकतंत्र, कैसा संविधान है?

        © खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
        मुंगेली, छत्तीसगढ़, भारतवर्ष
             मो. ८१२००३२८३४

प्राण हो शरीर में तो, स्वाभिमान पुष्ट रखो

कायर जो होते वही, धारा संग बहते हैं,
मरी मछली की भाँति, नियति को सहते।

पौरुष न जिनमें है, मौन मुख धारण कर,
अन्याय की मार को भी, अपना ही कहते।।
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वीर वो कहाते जग, साहस दिखाते जो ही,
विपरीत लहरों में, जो कि सदा रहते।

सत्य की मशाल ले के, पथ पर बढ़ते सदा,
पाप के पहाड़ देख, कभी ना जो ढहते।।
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जीवित हो अगर तुम, चेतना जगाओ अब,
गलत का विरोध करो, वीर भाव गहते।

मौन जो रहेगा आज, काल उसे खाएगा ही,
क्रांति के स्वर ही यहाँ, युगों-युगों बहते।।
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बाधाओं को चीर कर, मार्ग जो बनाते वीर,
शौर्य की कहानी वही, दुनिया को कहते।

सोए हुए सोयेंगे ही, भाग्य के भरोसे बैठ,
जागे हुए योद्धा सदा, समर में दहते।।
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प्राण हो शरीर में तो, स्वाभिमान पुष्ट रखो,
जुल्म के आगे जो कभी, घुटने न टेकते।

जीवित की संज्ञा वही, पाता है जहाँ में यहाँ,
अन्याय के विरुद्ध जो ही, ज्वाला बन बहते।।
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            © खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
             मुंगेली,छत्तीसगढ़,भारतवर्ष 
             मोबाइल : 8120032834

Sunday, January 25, 2026

वंदे मातरम् बोल : खोल दे प्रगति द्वार - खेमेश्वर पुरी गोस्वामी

खेमेश्वर पुरी गोस्वामी विरचित काव्य संग्रह : गीत वंदे मातरम् 

> नसों में देश-भक्ति का, प्रबल तूफान पल जाए,
कदम जो बढ़ चलें आगे, हिमालय भी पिघल जाए।
धरा की अस्मिता पर जो, कभी भी आँख उठाएगा,
उसे अपनी ही ज्वाला में, जलाकर राख कर आएँ।।<


काल का कपाल चीरे, शत्रु का सत्व धीरे,
रण में जो वीर धीर, हुंकारते दहाड़ के।

अग्नि की लपट जैसे, इंकलाब जागे तैसे,
अस्मिता की रक्षा हेतु, बढ़े गिरि फाड़ के।।

वंदे मातरम् गूँजे, दनुज दल को जो पूँजे,
रक्त से तिलक करें, काल चक्र मोड़ के।

शीश की चढ़ा के भेंट, गुलामी की जाल मेट,
सिंह से सपूत जागे, बेड़ियाँ ये तोड़ के।।
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शौर्य का प्रतीक बना, बिजली सा वेग बना,
काँप उठी राजधानी, नारों के मरोड़ से।

सुजलां सुफलां माँ, शक्ति की स्वरूपा यहाँ,
अमृत की धार बही, क्रांति के निचोड़ से।।

वंदे मातरम् मंत्र, फूँके तंत्र-मंत्र यंत्र,
वैरी सब थर्राए, प्राणों के ही छोड़ से।

राजेंद्र ने मान दिया, राष्ट्र को विधान दिया,
गूँजता है गान अब, अंबर के छोर से।।

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<चढ़ाएँ शीश चरणों में, यही अरमान रहता है,
हृदय के हर एक कोने में, हिंदुस्तान रहता है।
मिटा दें हम गुलामी के, बचे जो चिह्न बाकी हैं,
जुबां पर हर घड़ी वंदे, मातरम् गान रहता है।।>


कोटि-कोटि बाहु जागे, कायरता दूर भागे,
प्रलय का रूप जागे, राष्ट्र की पुकार पे।

मातृभूमि की वेदी पे, शीश चढ़े हँस-हँस,
अमिय की वर्षा हुई, खड्ग की ही धार पे।।

वंदे मातरम् गान, शत्रुओं का करे पान,
अंकुश है काल का ये, दुष्ट के प्रहार पे।

बलिदानी परम्परा, शौर्य से भरी ये धरा,
लिखी है विजय-गाथा, लहू की बौछार पे।।
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आँखों में अंगार भरे, सीने में हुंकार भरे,
वीर जो हुंकार भरे, मौत के भी द्वार पे।

झुके नहीं, रुके नहीं, काल से भी थके नहीं,
शक्ति का प्रचंड रूप, चंडी की कटार पे।।

वंदे मातरम् बोल, खोल दे विजय के द्वार,
गूँजे यह मंत्र अब, अंबर के पार पे।

अखंड है प्रचंड है, भारती का चण्ड है,
नमन है कोटि बार, माँ के ही दरबार पे।।
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>उठो हे भारती पुत्रो, नया इतिहास गढ़ना है,
कठिन हो राह तो क्या है, सतत आगे ही बढ़ना है।
बनो तुम काल के सम्मुख, अडिग सा एक पर्वत अब,
विजई ध्वज विश्व-अंबर के, शिखर पर जा के जड़ना है।।<

उठो ओ जवान अब, थामो तुम कमान अब,
राष्ट्र का विधान अब, हाथ में तुम्हारे है।

छोड़ो तुम आलस को, तोड़ो जंजालों को,
सत्य के प्रकाश हेतु, पंथ ये पुकारे है।।

वंदे मातरम् गाओ, सोई हुई शक्ति जगाओ,
अग्रिम कतार बनो, संकट के द्वारे है।

ज्ञान की मशाल थाम, कर्म का तू कर काम,
भारत की शान तुझे, चोटी पे संवारे है।।
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बुद्धि बलवान रहे, ध्येय का ही ध्यान रहे,
ऊँचा यह निशान रहे, युगों के उजियारे में।

त्याग और तप सीख, माँगना न कोई भीख,
पुरुषार्थ को तू लिख, कर्म के गलियारे में।।

वंदे मातरम् बोल, खोल दे प्रगति द्वार,
मंजिल पुकारती है, जीत के ही नारे में।

युवा है तू देश का रे, प्राण है तू भेष का रे,
चमक तू ध्रुव जैसा, अंबर के तारे में।।

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           © खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
           मुंगेली, छत्तीसगढ़, भारतवर्ष
            मोबाइल - ८१२००३२८३४

गणतंत्र दिवस 2026

*॥ गणतंत्र-महिमा ॥*

पूर्ण हुआ स्वप्न वहीं, शौर्य की वो गाथा बनी,
सत्ता अब हाथ जन-गण के सुहाती है।

पंद्रह अगस्त मिली, मुक्ति गोरे शासन से,
छब्बीस की सुुुबह, स्व-तन्त्र को जगाती है॥

लाहौर के तट लगा, गूँजने स्वराज मंत्र,
नेहरू की टेक आज, लक्ष्य को दिलाती है।

दो साल और ग्यारह, मास अठारह दिन,
संविधान-शक्ति जग, शीश को झुकाती है॥

भगत-आजाद-बोस, लहू से लिखी है नींव,
वीर बलिदानियों की, याद अकुलाती है।

कर्तव्य की राह चली, झाँकियाँ अनेक सजी,
भारत की एकता ही, विश्व को लुभाती है॥

मिटे भेद-भाव सारे, समता का दीप जले,
न्याय की मशाल सदा, राह को दिखाती है।

सीमा पे जवान डटे, देश की सुरक्षा हेतु,
तिरंगे की आन हमें, जीना ये सिखाती है॥

*🇮🇳शुभ गणतंत्र दिवस🇮🇳*

   © खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
   मुंगेली, छत्तीसगढ़,भारतवर्ष

Thursday, January 22, 2026

बसंत पंचमी 2026 काव्य - मुक्तक


🌸 सरस्वती वंदना एवं बसंत स्वागत 🌸

वीणा की झंकार से, गूँज उठा संसार,
ब्रह्मा की उस सृष्टि को, मिला दिव्य उपहार।
अज्ञान का तिमिर मिटे, ज्ञान ज्योति जल जाए,
शारदे माँ की कृपा से, सुधरे जीवन का सार।

सरसों की उन बालियों में, सोना सा मुस्काया है,
आमों की उस मौर ने, मादक राग सुनाया है।
पीले अम्बर, पीले केसर, पीली छटा चहुँ ओर,
ऋतुराज बसंत ने देखो, अपना कदम बढ़ाया है।

शिव-परिधि का योग बना, रवि किरणों की लाली है,
ज्ञान और विवेक की माँ, जगत की रखवाली है।
अबूझ मुहूर्त शुभ घड़ी, कर लो मंगल का श्रीगणेश,
सरस्वती की भक्ति से ही, आती खुशहाली है।

कलियों पर भँवरे मँडराए, कोयल कूक सुनाती है,
शुष्क पड़े उन हृदय-वनों में, नव-ऊर्जा भर जाती है।
बागीश्वरी माँ चरणों में, शीश झुकाए सारा जग,
बसंत की ये पंचमी, नव-बोध हमें कराती है।

बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं 💐 💐 

          © खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
         मुंगेली - छत्तीसगढ़, भारतवर्ष 
              मो.- ८१२००३२८३४

कानून बनाने वाले : बस शोर ही मचाते हैं

सेल्फी खिंचवाते रहे, रिबन कटवाते रहे, मुख्य अतिथि बन, मंच चमकाते हैं। क्षेत्र में न दिखें कभी, दिल्ली में विलासी बनें, जनता की भीड़ देख, हाथ ...