Sunday, February 22, 2026

सरस्वती वंदना

॥ भगवती सरस्वती वंदना ॥
श्वेत पदमासना माँ, ज्ञान की प्रकाश पुंज,
वीणा कर सोहै शुभ, रागिनी रसाल है।
हंस की सवारी साजे, मंद-मंद मुसक्याँहि,
वाणी की विधात्री मात, रूप विमलाल है॥
अंग आभा कुंद जैसी, शरद् मयंक मुख,
विद्या की प्रदात्री तू ही, काटती जंजाल है।
वेद औ’ पुराण गावें, महिमा अपार तेरी,
जड़ता विनाशिनी माँ, मति की मशाल है॥
ब्रह्म-मुख-वासिनी जो, सुरों की है प्राण-शक्ति,
शब्द-ब्रह्म रूप धरे, मेटती कु-चाल है।
मुनि-जन ध्यावें तोहे, शारदे कृपालु मात,
भक्तन के हेत सदा, रहती दयाल है॥
पंकज समान कर, पुस्तक विराजै सोहै,
अक्षर की जननी माँ, तू ही आदि-काल है।
'शून्य' को विस्तार देवे, बुद्धि की प्रदाता देवि,
तव शरण आए ताहि, होत निहाल है॥

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॥ शारदा स्तुति ॥
कुंद इंदु सम देह, श्वेत धारैं परिधान,
वीणा की झंकार माहिं, अमृत की धार है।
हंस पै विराजैं मातु, मन्द मुसकानि मन्द,
कंठ की मधुरता में, बसत संसार है॥
शुभ्र कर सोहैं जप-माला औ’ किताब नीकी,
अज्ञान की कालिमा को, करती संहार है।
अक्षर के दीप बारि, चित्त को उजास देति,
बुद्धि की अधिष्ठात्री, तू ही आधार है॥
राग रागिनी की सृष्टि, ताल छंद लय माहिं,
शब्द के श्रृंगार में, तिहारो उपकार है।
वाक-शक्ति दैके माँ, मौन को भी मुखर कीन्हों,
जाके शीश हाथ धरौ, बेड़ा वही पार है॥
शारदे भवानी तोहिं, शीश निवावौं बार-बार,
भक्तन की विनती ये, सुनौ माँ पुकार है।
ज्ञान के प्रकाश सों, हरो तुम मोह-तम,
मेटौ सब जड़ता को, विनती हमार है॥

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॥ कवि मंच वंदना: सरस्वती आह्वान ॥
शब्द के श्रृंगार सों, सजाऊँ माँ की आरती मैं,
कंठ में विराजिए, जो धारती सँवार है।
अक्षर के अर्क सों, मिटाइये अमावस को,
ज्ञान के प्रकाश को, मनावौं त्यौहार है॥
जड़ता की बेड़ियाँ, तड़ा-तड़ टूटि जावें,
वाणी में पियूष धार, बहैं अपरम्पार है।
कलम को धार दैके, सत्य को पुकार देहु,
काव्य के निकुंज में, तिहारो जय-जयकार है॥
तर्क की कसौटी पै, जो खरो-खरो उतरी है,
बुद्धि की अधिष्ठात्री, तू ही सूत्रधार है।
शून्य को अनंत करि, छंद की उमंग भरि,
सोती जो चेतना, जगावत झंकार है॥
हंस की सवारी साजे, मंद-मंद मुसक्याँहि,
कवि-कुल-मंडनी, तू ही माँ आधार है।
हाथ जोड़ि शीश नाय, विनती करत भक्त,
खोलि देहु ज्ञान-कोष, विनती हमार है॥
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॥ सरस्वती वंदना ॥
(मुखड़ा)
हे शारदे माँ! अज्ञानता का, घोर तम हर लीजिये,
सत्यम्-शिवम्-सुन्दरम से, कंठ को भर दीजिये।
हे शारदे माँ! अज्ञानता का, घोर तम हर लीजिये॥
(अंतरा - 1)
वीणा की झंकार से, सोई चेतना को जगा,
शब्दाक्षरों की जोत से, सोये हुए भाग्यो को जगा।
अमृतमयी माँ! ज्ञान की, अविरल धारा कर दीजिये,
हे शारदे माँ! अज्ञानता का, घोर तम हर लीजिये॥
(अंतरा - 2)
साहित्य के इस मंच पर, सुर-ताल का वरदान दे,
हर लेखनी को ओज दे, हर शब्द को सम्मान दे।
जड़ बुद्धि को चैतन्य कर, माँ! दिव्य दृष्टि दीजिये,
हे शारदे माँ! अज्ञानता का, घोर तम हर लीजिये॥
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"शब्द-ब्रह्म की साधना, सिद्ध करौ माँ आय।
कवि के कोमल हृदय में, बसौ शारदे माय॥"



"अंधेरे दिल के कोनों में, उजाला आप भर देना,
मरी जो भावनाएं हैं, उन्हें जीवित ही कर देना।
खड़ा हूँ द्वार पर माँ! हाथ में कागज कलम लेकर,
अधूरी रह न जाए बात, पूरी आप कर देना॥"

अँधेरे मन के कोनों में, उजाला भर दिया जाए,
जड़त की शुष्क धारा को, रसीला कर दिया जाए।
खड़ा हूँ द्वार पर माँ! रिक्त अंजलि ले के श्रद्धा की,
मेरे शब्दों के प्याले को, अमृत से भर दिया जाए॥

कलम की धार को माँ! सत्य की तलवार कर देना,
जगत के हर अँधेरे पर, कड़ा प्रहार कर देना।
झुकी जो गर्दनें अन्याय के आगे, उन्हें बल दे,
मेरी हर एक रचना को, सु-संस्कार कर देना॥

सृजन की इस इबादत को, मुकम्मल मोड़ दे देना,
मेरे बिखरे हुए लफ़्ज़ों को, डोरी जोड़ दे देना।
न झुकने पाए ये गर्दन, किसी भी स्वार्थ के आगे,
मेरी इस लेखनी को माँ! गजब का मरोड़ दे देना॥

मिले जो शब्द माँ! तुझसे, वो अनमोल रत्न हो जाएँ,
कि अज्ञानी जनों के चित्त भी, चैतन्य हो जाएँ।
बहे रसधार ऐसी मंच पर, तेरी कृपा से माँ,
कि सुनने वाले सारे लोग भी, धन्य हो जाएँ॥

सत्य की मशाल को, माँ! प्रज्ज्वलित कर दीजिये,
मेरी हर एक पंक्ति को, माँ! कल्पतरु कर दीजिये।
न लिखूँ मैं कभी भी, चाटुकारी का कोई शब्द,
मेरी इस लेखनी को, माँ! अडिग कर दीजिये॥

कंठ में विराजिए माँ! रागिनी बन जाइये,
शब्द की साधना में माँ! मोहिनी बन जाइये।
झूम उठे ये सदन, सुन के कवि की वेदना,
मेरे गीतों के सुरों की, स्वामिनी बन जाइये॥

"अंधेरों से लड़ने का, हुनर माँ से मिला है,
ये जो महक रहा है चमन, दुआ माँ से मिला है।
मैं जो कुछ भी कहूँगा, वो शब्द माँ के होंगे,
मुझे जो कुछ भी मिला है, वो माँ से मिला है॥"

न गीदड़ की भभकियों से, ये शेर कभी डरते हैं,
न संकट के पहाड़ों से, कदम पीछे को धरते हैं।
लिखी जाती है गाथाएँ, सदा बलिदान की स्याही,
वही तो शूरमा हैं जो, वतन की आन पे मरते हैं॥

धमनियों में रक्त नहीं, माँ का प्यार बहता है,
हृदय में बस वतन का, एक विचार रहता है।
मिटा देंगे धरा से हम, अधर्मों की हर एक छाया,
कि हर इक भारतीय में, अब साक्षात काल रहता है॥

1. शत्रुओं का संहार और कलम की शक्ति:
सिंह की दहाड़ जैसी, वाणी में हुंकार देहु,
दुष्टों के दलन हेतु, चण्डिका की धार है।
अक्षरों के बाण छूटें, तर्क के कमान सों माँ,
कायरों की भीड़ माँहि, मची हाहाकार है॥
काट दे अधर्म शीश, सत्य की कृपाण धरि,
राष्ट्र के कपूतन को, दीजै तू दुलार है।
लिखूँ जो लहू सों गाथा, अमर शहीद की मैं,
गूँज उठै दशों डगर, ऐसी ललकार है॥
2. राष्ट्र-भक्ति का शंखनाद:
मस्तक पै भाल सोहै, देश की मशाल हाथ,
लेखनी सों क्रांति ज्वाला, बारती अपार है।
सोती जो जवानी ओहि, झिंझोड़ि जगाय देहु,
रण के नगाड़ों जैसी, गूँजती पुकार है॥
काँप उठैं थर-थर, पापी औ’ अधर्मी सब,
शारदे भवानी! तेरे, शब्दों की ये मार है।
वीर-रस-धार बहै, रग-रग माँहिं आज,
मातृ-भूमि हेतु देह, करूँ मैं निसार है॥

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1. सौंदर्य और माधुर्य का चित्रण:
कुंद के सुमन जैसे, कोमल कपोल सोहैं,
अंग-अंग आभा मानों, बिजुरी की धार है।
चाँदनी की ओढ़नी माँ, धवल धारैं देह पर,
मंद-मंद हास माहिं, बसत बहार है॥
मृग नैनी शारदे माँ! मोहनी मूरत तोरी,
प्रेम की पीयूष-वृष्टि, करत उद्धार है।
शून्य मन-उपवन, महक उठै पुष्प सम,
पावन सुवास सों माँ! महकत संसार है॥
2. रस, ताल और संगीत का संगम:
वीणा की तरंगन में, सात सुर जागत हैं,
ताल और छंद माहिं, प्रेम को अभिसार है।
कोकिला की कूक जैसी, मिठास घोलि देहु माँ,
गीत-काव्य-कुंज माँहि, सुरीली झंकार है॥
भीगे हुए भाव जगें, हृदय की पीर मिटै,
शब्द के श्रृंगार सों माँ! कीन्हों श्रृंगार है।
रस के कलश ढोरि, सींचि देहु प्राण मेरे,
तव रूप देखि-देखि, भयो बेड़ा पार है॥

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कलम को तलवार बनाने का संकल्प:
नमन है शारदे तुमको, हृदय में जोश भर देना,
मेरी हर एक पंक्ति को, माँ! अंगारा कर देना।
लिखूँ मैं जब वतन की आन पर कोई भी कविता तो,
बुजदिल के भी हाथों में, माँ! तलवार धर देना॥
2. राष्ट्र के प्रति समर्पण:
भले ही प्राण जाएँ पर, न झुकने पाए ये मस्तक,
मेरे शब्दों की गूँजें माँ! गगन के पार हों दस्तक।
जगा दूँ सोई सोई चेतना, इस देश की पूरी,
बना देना मुझे माँ! राष्ट्र-वेदी का अमर रक्षक॥

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1. प्रेम और सौंदर्य का वरदान:
हृदय के सूने आँगन में, माँ! चंदन घोल देना तुम,
मेरे शब्दों की वाणी में, शहद भी घोल देना तुम।
मिले जब दृष्टि तो माँ! हर तरफ बस प्यार ही दिखे,
जहाँ नफरत की दीवारें, वो जड़ से छील देना तुम॥
2. रस और माधुर्य की याचना:
विराजो कंठ में आकर, मधुर झंकार बन करके,
बरस जाओ धरा पर माँ! प्रेम की धार बन करके।
सजे यह मंच गीतों से, सजे यह काव्य रश्मि से,
मेरे हर शब्द को माँ! रूप का श्रृंगार देना तुम॥

Saturday, February 14, 2026

शिव वंदना

         ॥ शिव-स्तुति ॥

जटाजूट सघन में, सोहै गंगधार शुभ,
गले बिराजै भुजंग, हार जो विकराल है

डम-डम डमरू की, गूँज उठै दशों दिश,
ताण्डव रचत शिव, नाम महाकाल है॥

भाल बाल-चन्द्र सोहै, मन्द-मन्द मुसक्याँहि,
तीजी आँख बीच जागै, अग्नि की कराल है।

लहरें अपार उठैं, पावन सुरसरी बीच,
काटत हैं काल शिव, रूप अ्ति-विशाल है॥

हिमालय-लाड़ली को, मन जो सदैव मोहैं,
करुणा की धार बहै, मेटैं पीर-जाल है।

सोहैं दिगम्बर वेश, ओढ़ें गज-खाल भारी,
भजौं भव्-भीरु भंजन, नटराज-हाल है॥

नीलकण्ठ विषधारी, कामदेव के विनाशी,
त्रिपुर के नाशक जो, जग के अधार है।

धूल और रत्न माहिं, राखत जो सम-दृष्टि,
मुक्ति के प्रदाता शिव, करत उद्धार है॥

          © खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
      मुंगेली छत्तीसगढ़,८१२००३२८३४

शिव तांडव - शिव स्तुति : अनुवादित रचना - गृहावधूत खेमेश्वर पुरी

॥॥ श्री शिव स्तुति : अनुवादित रचना॥॥
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जटा-जाल बीच खेलैं, देवनदी गंग-धार,
गले बीच सोहै हार, नाग विकराल है।

डम-डम डम-डम, डमरू की गूँज उठै,
चण्ड ताण्डव को ठानैं, शिव महाकाल है ॥१॥


जटा के कटाह बीच, गंगा लहरैयाँ लेत,
मस्तक पै चन्द्र सोहै, मन्द मुसकाय है।

धक्-धक् धक्-धक्, अग्नि भाल बीच जरै,
ऐसो रूप महादेव, मन को लुभाय है ॥२॥

गिरिराज-नन्दिनी के, सुख के निधान शिव,
कृपा की कटाक्ष-धार, मेटैं सब पीर को।

अम्बर ही चीर निज, मन में प्रमोद भरैं,
भजौं विश्वनाथ देव, तजौं भव-भीर को ॥३॥

फण की मणिन आभा, दिशा-मुख लाल करें,
कुंकुम की धार जैसे, अंग पै अनूप है।

गज-चर्म ओढ़ैं प्रभु, मद से भरे जो सदा,
भूतनाथ शिव जी को, अचरज रूप है ॥४॥

इन्द्र आदि देव-वृन्द, झुकावें जो शीश सदा,
चरणों की धूलि पावन, मस्तक पे सोहती।

नागराज हार बाँधे, जटा-जूट पे बिराजैं,
चन्द्र की चकोर-कला, सबके मन मोहती ॥५॥

भाल-पट्ट बीच जरै, अग्नि की प्रचण्ड धार,
काम-देव भस्म कियो, जाकी तेज-जाल ने।

इन्द्र हूँ नमावैं शीश, सिद्ध मुनि नमन करें,
सुधा-धार धारी शीश, जटा के गुलाल ने ॥६॥

धग-धग धग-धग, अग्नि भाल पे धधकै,
आहुति बनी है काम, मदन के बाण की।

पार्वती के कुच-अग्र, चित्र-कला रचने में,
कुशल जो शिल्पी शिव, शोभा उन प्राण की ॥७॥

नवीन जो मेघ-माला, श्याम कण्ठ बीच बसै,
अमावस रात जैसी, काली छटा छाई है।

गंगा-धर गजासुर, मारि के जो शान्त भये,
जग के अधार शिव, शोभा सुखदाई है ॥८॥

नील-पद्म पुंज सम, कण्ठ की सु-आभा फैलै,
काम और त्रिपुरा के, जो विनाशी देव हैं।

दक्ष-यज्ञ नाश कियो, अन्तक को मारि दीन्हो,
भजौं भव-भय-हारी, जो अखण्ड देव हैं ॥९॥

मंगला की सर्व-कला, मंजरी के रस-सिक्त,
भँवरे समान शिव, रस-पान ठाने हैं।

यमराज-काल और, काम-देव-हारी विभु,
अन्तक के अन्तक को, जग ने बखाने हैं ॥१०॥

फुँकारत नाग-राज, भाल-अग्नि को जगावैं,
धीमि-धीमि मृदंग की, बाज रही ताल है।

प्रचण्ड जो ताण्डव को, करत जो शम्भु आज,
मंगल ही मंगल को, करत कपाल है ॥११॥

सर्प-हार रत्न-माला, मिट्टी और स्वर्ण-टूक,
शत्रु-मित्र तृण-चक्षु, एक सम मानहीं।

प्रजा और चक्रवर्ती, सम-दृष्टि राखें सदा,
कदा भजौं सदाशिव, जो भेद न जानहीं ॥१२॥

गंग-तट कुंज-बीच, वास मैं करूँगो कब,
हाथ जोड़ि शीश-पर, मन्त्र शिव गावहूँ।

चंचल जो नैन त्यागि, भाल-चन्द्र ध्यान धरि,
परम सुखी मैं होइ, शिव-पद पावहूँ ॥१३॥

नित्य जो पढे़गा नर, स्तोत्र सुख-कारी यह,
शुद्धि पावै तन-मन, शिव-भक्ति पायगा।

मोह-जाल काटि प्रभु, मुक्ति के प्रदाता सदा,
शम्भु की शरण जाइ, परम गति पायगा ॥॥


           © खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
      मुंगेली, छत्तीसगढ़ - ८१२००३२८३४


महाशिवरात्रि महापर्व पर विशेष हार्दिक शुभकामनाएं,सादर ॐ नमो नारायण 🚩हर हर महादेव,जय सनातन 🚩

Friday, February 13, 2026

अमर बलिदान को नमन

॥ अमर बलिदान को नमन ॥

मातृ-सेवा हित जिये, राष्ट्र-प्रेम रंग रँगे,
प्राणों की समिधा देके, अमर वो हो गए।

वीरता की गाथा लिख, गगन को चूम लिया,
भारत के मान हेतु, चंदन से सो गए।।

पर्वत सा साहस था, सिंधु सा विशाल हृदय,
कर्तव्य की राह पर, पुष्प बन खो गए।

याद रखेगा जहाँ, उनकी शहादत को,
अमर तिरंगे बीच, ज्योति बन बो गए।।

          © खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
    मुंगेली, छत्तीसगढ़ ८१२००३२८३४

Monday, February 9, 2026

वर्तमान का कर्ण : युवा पीढ़ी

॥ वर्तमान का कर्ण : युवा पीढ़ी ॥

डिग्रियां हाथ लिए, द्वारे-द्वारे भटकता,
योग्यताओं का पिटारा, मौन खड़ा आज है।

पूँजीवाद चकाचौंध, घेरे खड़ी चारों ओर,
व्यथा वीर प्रतिभा की, सुनता समाज है॥

आरक्षण भँवर में, फँसा आज का ये कर्ण,
राजनीति की मार से, घायल ये मन है।

आँखों में सजे हैं स्वप्न, सेज संघर्षों की सजी,
तपते हुए पथों पे, झुलसता तन है॥

कुसंगति हाथ थाम, दुर्योधन मोह फँसे,
खोया निज मान-ज्ञान, कैसा ये विन्यास है।

नशे की हैं बेड़ियाँ ये, जकड़े हैं हाथ-पाँव,
मरे अरमान आज, बुझती सी प्यास है॥

उठो आधुनिक कर्ण, त्यागो मोह-जाल सब,
श्रम का चढ़ाओ चाप, भाग्य खुद गढ़ना।

बाधा छल-तंत्र वाली, रोक न सकेगी राह,
धर्म रूपी कर्म पथ, निरंतर बढ़ना॥

हृदय दुर्बलता को, त्याग कर आज खड़ा,
आत्म-बोध की मशाल, हाथ में जलाए जा।

अंगराज का साहस, रगों में प्रवाहित हो,
बाधाओं के पर्वतों को, धूल में मिलाए जा॥

कवच है तेरा श्रम, कुंडल आत्मविश्वास,
लक्ष्य की ही आँख देख, बाण को चलाए जा।

हार को स्वीकार नहीं, वीर है तू रण का रे,
विजय की गाथा यहाँ, जग को सुनाए जा॥


       © खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
   मुंगेली, छत्तीसगढ़ ८१२००३२८३४

Friday, February 6, 2026

सच्चे पत्रकार वही, लोकतंत्र की बाड़ हैं

जो सच को बेचकर के, मखमली बिस्तर बनाते हैं,
वो सत्ता के गलियारों में, जी-हुज़ूरी गुनगुनाते हैं।
कलम को गिरवी रख जो, नोट के तलवे चाटते हैं,
वो पत्रकार नहीं साहब, बस जूठन पे मुस्कुराते हैं।।

कलम को बेच खाया, ईमान को गँवा दिया,
सिक्कों की खनक पे जो, कमर मटकाते हैं।

अत्याचार देख जो तो, पट्टी बाँध आँखों बीच,
सत्ता की हवेली जाके, सोहर सुनाते हैं।।

चीखें अनसुनी करें, चाशनी में डूबे रहें,
झूठ के ही जाल बुन, जाल फैलाते हैं।

जनता की पीर तज, तलवे जो चाट रहे,
कलम के नाम पे वे, कलंक कहलाते हैं।।

सत्य की मशाल ले के, जुल्म से जो भिड़ जाते,
कायर न होते वे तो, शेर की दहाड़ हैं।

सत्ता के गलियारों में, शीश न झुकाते कभी,
दुखियों के दर्द वाली, ऊँची सी पुकार हैं।।

चाटुकार जो बने हैं, सिक्कों पे जो नाचते हैं,
कलम की साख पे वे, लगा रहे राड़ हैं।

बिकती न रूह जिनकी, झुकती न देह कभी,
सच्चे पत्रकार वही, लोकतंत्र की बाड़ हैं।।


           © खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
         मुंगेली,छ.ग. - 8120032834

Monday, February 2, 2026

कानून बनाने वाले : बस शोर ही मचाते हैं

सेल्फी खिंचवाते रहे, रिबन कटवाते रहे,
मुख्य अतिथि बन, मंच चमकाते हैं।

क्षेत्र में न दिखें कभी, दिल्ली में विलासी बनें,
जनता की भीड़ देख, हाथ को हिलाते हैं।।

लव और जिहाद रुका, न ही धर्मांतरण,
गौ-रक्षा हेतु मौन, शब्द न उगाते हैं।

मेज़ थपथपाने वाले, कानून बनाने वाले,
कानून न बना के, बस शोर ही मचाते हैं।।


            © खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
        मुंगेली, छत्तीसगढ़,8120032834

सरस्वती वंदना

॥ भगवती सरस्वती वंदना ॥ श्वेत पदमासना माँ, ज्ञान की प्रकाश पुंज, वीणा कर सोहै शुभ, रागिनी रसाल है। हंस की सवारी साजे, मंद-मंद मुसक्याँहि, वा...