॥ भारतवर्ष महात्म्य स्तोत्रम् ॥
हिमालयोत्तमा यस्य शिरोदेशे विराजते।
सागरो यत्पदाम्भोजौ प्रक्षालयति नित्यशः ॥ १ ॥
पुण्यभूमिः सुविस्तारा भारतं नाम विश्रुतम्।
सर्वधर्मसमन्विता वसुधा रत्नगर्भिणी ॥ २ ॥
गङ्गा यमुना सिन्धुश्च पावनाः सरितो यतः।
पवित्रयन्ति च महीं स्वजलैः पुण्यदायिभिः ॥ ३ ॥
ऋषिभिर्ज्ञानिभिः पूर्णं तपोभूमिर्मनोहरा।
यत्र वेदोच्चरैर्दिव्यं वातावरणं वर्धते ॥ ४ ॥
पुण्यक्षेत्राणि यत्रैव काशी काञ्ची च पुष्करम्।
हरिद्वारं प्रयागं च मुक्तिं यच्छन्ति भूरिशः ॥ ५ ॥
ज्ञानस्य दीपका यत्र वेदान्तेषु प्रतिष्ठिताः।
सत्यं शिवं सुन्दरं च यत्र धर्मः प्रवर्तते ॥ ६ ॥
अहिंसा परमो धर्म इति यस्य च शासनम्।
वसुधैव कुटुम्बकमिदं राष्ट्रं वदत्यलम् ॥ ७ ॥
वीराः प्रसूयन्ते यत्र त्यागीनां भूमिरीदृशी।
देशभक्त्या समायुक्ताः प्राणान् त्यक्तुं च सन्नद्धः ॥ ८ ॥
प्राचीनसंस्कृतेर्धारा अविरलप्रवाहिनी।
परम्पराऽनुसारेण यत्र सदा प्रवर्धते ॥ ९ ॥
शौर्यं धैर्यं च शौचं च यत्र नित्यं विराजते।
विद्याविनयसम्पन्नाः सन्तो यत्र वसन्ति च ॥ १० ॥
ऋतूनां च समाहारः प्राकृतिकसौन्दर्यभूषितम्।
निखिलैर्गुणसम्पन्नं भारतं मे प्रियं सदा ॥ ११ ॥
रामस्य चरितं यत्र कृष्णस्य योगदर्शनम्।
बुद्धस्य करुणा यत्र महावीरस्य संयमः ॥ १२ ॥
अनेकताऽपि यत्रैव एकतायाः प्रकीर्तनम्।
विविधैः सम्प्रदायैस्तु संयतं देशगौरवम् ॥ १३ ॥
वेदपुराणशास्त्राणां उत्पत्तिस्थानमुत्तमम्।
सभ्यतायाश्च केन्द्रं वै भारतं विश्वमङ्गलम् ॥ १४ ॥
यत्र सन्ति गिरि श्रेष्ठाः काननानि च कुत्रचित्।
यत्र नद्यः प्रवहन्ति नन्दनं भारतं ततः ॥ १५ ॥
पुण्यं यशः च कीर्तिं च यदवाप्य नरा जनाः।
स्वर्गं विहाय इच्छन्ति भारतं भुवि मङ्गलम् ॥ १६ ॥
सर्वे भवन्तु सुखिनः प्रार्थना यत्र गीयते।
सर्वकल्याणकारिण्यां भुवि श्रेष्ठं च भारतम् ॥ १७ ॥
इतिहासस्य साक्षी वै सनातनी च संस्कृतिः।
यत्रैव जीवति सदा यस्याः कोऽपि न वारकः ॥ १८ ॥
अभिवाद्य महात्मानं भारतं मातृरूपिणम्।
प्रणमामि मुदा नित्यं धन्योऽहं भारतोद्भवः ॥ १९ ॥
इति भारतमाहात्म्यं पठतां भक्तिपूर्वकम्।
देशप्रेमं च वर्धेत सुखं चैव च वर्धते ॥ २० ॥
॥ इति श्री खेमेश्वर पुरी गोस्वामी विरचित भारतवर्महात्म्य स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
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॥ भारतवर्ष महात्म्य स्तोत्र: भावार्थ ॥
१. जिसके सिर (उत्तर) पर हिमालय पर्वत विराजमान है और जिसके चरणों को सागर नित्य धोता है, ऐसा यह भारतवर्ष है।
२. यह पुण्यभूमि भारत के नाम से विख्यात है, जो अत्यंत विस्तृत, सभी धर्मों को समाहित करने वाली और रत्नों की खान है।
३. जहाँ गंगा, यमुना और सिंधु जैसी पावन नदियाँ अपने पवित्र जल से इस धरती को सदा पुनीत करती हैं।
४. यह ऋषियों और ज्ञानियों से पूर्ण तपोभूमि है, जहाँ वेदों के उच्चार से दिव्य वातावरण सदैव बना रहता है।
५. जहाँ काशी, कांची, पुष्कर, हरिद्वार और प्रयाग जैसे पवित्र क्षेत्र हैं, जो मोक्ष प्रदान करने वाले हैं।
६. जहाँ वेदांतों में प्रतिष्ठित ज्ञान के दीपक जलते हैं और जहाँ 'सत्यं शिवं सुन्दरं' का धर्म मार्ग प्रशस्त है।
७. 'अहिंसा ही परम धर्म है'—यह जिसका शासन (नियम) है, और जो पूरे विश्व को ही 'वसुधैव कुटुम्बकम्' (एक परिवार) मानता है।
८. जहाँ वीर उत्पन्न होते हैं, यह त्यागियों की भूमि है, जहाँ के निवासी देशभक्ति के लिए प्राण देने को सदा तत्पर रहते हैं।
९. यहाँ की प्राचीन संस्कृति की धारा अविरल प्रवाहित है, जो परंपरा के अनुसार निरंतर आगे बढ़ रही है।
१०. जहाँ शौर्य, धैर्य और पवित्रता नित्य विराजते हैं, और जहाँ विद्या और विनय से युक्त संत निवास करते हैं।
११. जहाँ सभी ऋतुओं का संगम है, जो प्राकृतिक सौंदर्य से सुसज्जित है, ऐसा गुणों से संपन्न भारत मुझे सदैव प्रिय है।
१२. जहाँ राम का चरित्र है, कृष्ण का योग दर्शन है, बुद्ध की करुणा है और महावीर का संयम है।
१३. जहाँ अनेकता में भी एकता का गान होता है, और विभिन्न संप्रदायों के होते हुए भी देश का गौरव संयमित (जुड़ा हुआ) है।
१४. यह वेद, पुराण और शास्त्रों का उत्तम उत्पत्ति स्थान है, सभ्यता का केंद्र और विश्व का कल्याण करने वाला भारत है।
१५. जहाँ कहीं ऊंचे पर्वत हैं तो कहीं घने वन, और जहाँ नदियाँ बहती हैं; इसलिए यह भारत धरती का नंदनवन (स्वर्ग) है।
१६. यहाँ के पुण्य, यश और कीर्ति को प्राप्त करके मनुष्य स्वर्ग को छोड़कर इस मंगलकारी भारत में रहना चाहते हैं।
१७. जहाँ 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' (सभी सुखी हों) की प्रार्थना गाई जाती है, ऐसे सबका कल्याण करने वाले संसार में भारत श्रेष्ठ है।
१८. यह इतिहास का साक्षी है और इसकी सनातनी संस्कृति सदैव जीवित रहती है, जिसे कोई रोक नहीं सकता।
१९. माता के स्वरूप वाले इस महान भारत को प्रणाम करके, मैं सदा आनंदपूर्वक नमन करता हूँ। मैं धन्य हूँ कि मेरा जन्म भारत में हुआ है।
२०. इस भारत महात्म्य को जो भक्तिपूर्वक पढ़ते हैं, उनका देशप्रेम बढ़ता है और जीवन में सुख की वृद्धि होती है।
।।श्री खेमेश्वर पुरी गोस्वामी कृत भारतवर्ष महात्म्य स्तोत्र सम्पूर्ण हुआ।।