Thursday, July 30, 2026

अंगूठाछाप जो बने हैं, राष्ट्र के विधाता आज

अंगूठाछाप जो बने हैं, राष्ट्र के विधाता आज

कुर्सी पर ऐंठ बैठे, एक ना अक्षर जाने,
कलम न पकड़ी जो, नियम बनाते हैं।
संसद की सभा बीच, जमाकर पाँव बैठे,
विद्या की किताब छोड़, दाँव ही चलाते हैं।
ज्ञान का न लेश मात्र, बनते महान फिर,
देश के नसीब पर, अंगूठा लगाते हैं।
वीर जो ज्ञानी थे वे, मौन साधे खड़े आज,
मूर्ख जन देश के ही, भाग्य को चलाते हैं।

पीएचडी की उपाधि को, हाथ में उठाये घूमें,
कागज़ के टुकड़ों पे, धूल ही जमाते हैं।
योग्य सब नौजवान, दर-दर भटकते हैं,
सूखी एक रोटी को भी, तरस ही जाते हैं।
प्रतिभा का जहाँ कभी, मान-सम्मान होता,
आज वहाँ चाटुकार, बाज़ी मार जाते हैं।
कलम की धार छोड़, माँगते हैं न्याय आज,
देश के ही कर्णधार, आँसू हैं बहाते हैं।

शास्त्रों को पढ़के भी जो, आस लगा बैठे थे जी,
काम नहीं मिलता तो, धैर्य टूट जाता है।
भूख की बुझाने आग, क्या ही उपाय करें,
न्याय जब रूठ जाता, पाप ही सुहाता है।
बाहुबल-छल को ही, राह मान लेते युवा,
अपराध-मार्ग पर, पाँव बढ़ जाता है।
ज्ञान का प्रकाश जहाँ, जगमग होना था जी,
अंधकार का ही राज, वहाँ छा ही जाता है।

जागो हे गुणी जन अब, नींद को त्याग दो सब,
अज्ञानी की सत्ता को, उखाड़ के फेंकिए।
कलम की शक्ति को ही, सिंह-सी दहाड़ बना,
विद्या की विजय ध्वजा, देश में दिखाइए।
अंगूठाछाप जो बने हैं, राष्ट्र के विधाता आज,
ज्ञान के सिंहासन पे, ज्ञानी को बिठाइए।
युवाओं की शक्ति से ही, बदलेगी भाग्य-रेखा,
न्याय का नया ही एक, सूर्य चमकाइए।


सर्वाधिकार सुरक्षित 
खेमेश्वर पुरी गोस्वामी (गृहावधूत)
मुंगेली छत्तीसगढ़,८१२००३२८३४

Monday, July 20, 2026

नया मंदिर स्टोरी ताला

भारत का एकलौता - अनोखा शिव मंदिर जहां रखवाली करते हैं प्रजापति दक्ष ,हाथ में लाठी लिए बने हैं द्वारपाल

राजा बलि करते हैं सिरदान तो वहीं मंदिर के गर्भगृह में नृत्य करते हैं भस्मासुर, योगियों को मिलती है दिव्य पुंज 

योग,ध्यान, तपस्या व विभिन्न पौराणिक कथाओं को परिलक्षित करती प्रतिमाएं व विभिन्न पशु-पक्षियों,जलचर-नभचरों की मुर्तियां मन मोह लेती हैं 


प्रस्तुति - न्यूज़लाइन नेटवर्क ,नई दिल्ली,भारत 

आलेख - खेमेश्वर पुरी गोस्वामी (धार्मिक प्रवक्ता/खोजी पत्रकार)

भारतवर्ष की संस्कृति व सभ्यता की विश्व पटल पर एक अलग व अनूठा स्थान है, वहीं पुरातत्व, प्राचीन मंदिरों व विभिन्न देवी देवताओं की मुर्तियों तथा इनके पीछे जुड़े इतिहास व पौराणिक कथाओं की प्रमाणिकता की रोमांचकता अपने आप में अद्वितीय है।

ठीक इसी तरह एक मंदिर है छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में। जिस स्थान पर यह मंदिर स्थित है वह इतिहास में कभी संगम ग्राम के नाम से जाना जाता था,व इसके नाम के पीछे कारण था छत्तीसगढ़ की महत्वपूर्ण नदी शिवनाथ व सहायक नदी मनियारी का संगम होना।
पर हम बात करते हैं वर्तमान नाम का तो इस स्थल को ताला के नाम से जाना जाता है जिसका अर्थ होता है नगर जहां कभी राजाओं का राजवाड़ा हुआ करता था।
यह ताला नामक स्थान अमेरी कापा गांव का ही हिस्सा है जहां विश्व प्रसिद्ध व भारत की सबसे प्राचीन मंदिरों में से ही दो मंदिर देवरानी - जेठानी मंदिर के लिए जाना जाता है।
देवरानी जेठानी मंदिर शिव को समर्पित मंदिर है। जहां शिव सती विवाह, रूद्रशिव,कई पौराणिक पात्र देवी देवताओं,नदी देवियां, पशु-पक्षियां, भूत-पिशाच व शिवगणों के साथ ऊंची मुर्तियां संजोए रखने में देश भर में अपना अलग स्थान बनाए हुए है।

यहां कई मुर्तियां ऐसी है जो विश्व भर में अपना अलग व अनूठा होने का प्रमाण देती है।कई मुर्तियां देश के विभिन्न मंदिरों में पाए गए मुर्तियों की तरह ही तो कई अद्वितीय व अद्भुत रहस्यों से भरे हुए हैं, जिनमें अभी तक सिर्फ रूद्रशिव की मुर्ति को जाना जाता रहा है।


पर हम आज बात करते हैं यहां सबसे विशेष जो मुर्ति है और सतयुग तथा शिवपुराण की एक वृहद व रोमांचित कर देने वाली कथा से जुड़ी है जो इस मंदिर को बनवाने वाले के शिव के प्रति प्रेम व भक्ति की समर्पण को पुरे विश्व में एक अनूठा पहचान देता है।

और वह अनुठा पहचान है कि, भगवान शिव के सबसे बड़े विरोध व शिव को शत्रु मानने वाले राजा दक्ष प्रजापति की मुर्ति को भगवान शिव के मंदिर में द्वारपाल बनाकर रखने को लेकर है।
जी हां यहां शिव पुराण में वर्णित राजा दक्ष प्रजापति को शिव मंदिर में द्वारपाल के रूप विराजित किया गया है जो शिव भक्ति को समर्पित मंदिर निर्माणकर्ता के भक्ति को परिभाषित करता है।

विश्व में व भारत में अनेकानेक शिव मंदिर है लेकिन ऐसा एक भी मंदिर नही जहां राजा दक्ष प्रजापति चौकीदारी करते हों मंदिर की रखवाली करते हों, कहीं न कहीं यह दक्ष के द्वारा सतयुग में शिव को अपमानित करने के कुत्सित प्रयास का बदला लेते हुए दक्ष को शिव के आगे उनका स्थान बताने का प्रयास किया गया है।
और इसकी प्रमाणिकता देती है राजा दक्ष प्रजापति की वह मुर्ति जो शिव पुराण के एक कथा के अनुसार राजा दक्ष प्रजापति को शिव जी ने बकरे का सिर लगाकर पुनर्जीवित किया था। और ताला के देवरानी शिव मंदिर में ठीक उसी रूप में बकरे के सिर रूपी राजा दक्ष प्रजापति को मंदिर की चौकीदारी सौंपी गई है। जिससे यह अद्वितीय व अद्भुत मंदिर पुरे देश भर में अपना एक अनूठा  पहचान रखता है।

यदि शिवभक्त इस विचित्र व अद्भुत तथा अद्वितीय मंदिर का दर्शन करना चाहते हैं तो एक बार ताला का देवरानी जेठानी मंदिर अवश्य आना चाहिए शिव के भक्ति के इस अनूठे उदाहरण रूपी मंदिर का दर्शन अवश्य करना चाहिए।

आइए जानते हैं कि भगवान शिव ने राजा दक्ष को क्यों लगाया था बकरे का सिर? 

माता सती और उनके पिता राजा दक्ष प्रजापति को आप लोग जानते ही होंगे. इसके अलावा आप लोगों ने माता सती कथा भी सुनी होगी. लेकिन क्या आप जानते हैं कि भगवान शिव में क्रोध में आकर राजा दक्ष का सिर काटकर उन्हें बकरे का सिर लगा दिया था.

उत्तरखंड के हरिद्वार में कनखल गांव में दक्षेश्वर महादेव मंदिर स्थित है. ये वहीं मंदिर है जहां राजा दक्ष ने एक भव्य यज्ञ का आयोजन किया था, जिसमें सभी देवी-देवताओं, ऋषियों और संतों को तो आमंत्रित किया गया था, परंतु भगवान शंकर को आमंत्रित नहीं किया गया था. राजा दक्ष द्वारा शिव का अपमान माता सती सहन नहीं कर पाई और यज्ञ की अग्नि में कूद कर अपने प्राण त्याग दिए थे. जब ये बात महादेव को पता लगी तो उन्होंने गुस्से में दक्ष का सिर काट दिया था. देवताओं के अनुरोध पर भगवान शिव ने राजा दक्ष को जीवनदान दिया और उस पर बकरे का सिर लगा दिया.

इसके बाद जब राजा दक्ष को अपनी गलतियों का एहसास हुआ और उन्होंने भगवान शिव से क्षमा मांगी. तब भगवान शिव ने घोषणा की कि वे अपने हृदय से शत्रुता का भाव‌ त्याग करें व सेवा में लगे।

शायद इसी कथा से अभिप्रेरित होकर ताला के इस शिव मन्दिर में राजा दक्ष प्रजापति को चौकीदारी दी गई या यूं कहें कि द्वारपाल के रूप में सेवादार बना कर शिश सेवक के रूप में दर्शाया गया है।

अब आपके मन में जरुर एक बार इस मंदिर में जाकर दर्शन लाभ लेने का विचार आ रहा होगा तो आइए जानते हैं ताला के इस मंदिर का पुरातत्विक इतिहास व सनातन धर्म में इस मंदिर की महत्ता क्या रही है।

ताला छत्तीसगढ़ राज्य का एक गाँव है। जहाँ तक मूर्तिकला पर्यटन और पुरातात्विक महत्व का सवाल है, ताला की मूर्तिकला कला सर्वोत्कृष्ट है। इसकी बेजोड़ सुंदरता कई पर्यटकों को छत्तीसगढ़ की ओर आकर्षित करती है।
ताला अपने दो मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है जिन्हें देवरानी और जेठानी कहा जाता है। यह बिलासपुर से लगभग 29 किलोमीटर दक्षिण में है। भारतीय मूर्तिकला और कला का एक उत्कृष्ट उदाहरण, ये मंदिर एक ही परिसर में स्थित हैं और एक-दूसरे के बगल में स्थित हैं, इनका नाम उनके आयामों के कारण पड़ा है। बड़े वाले को ग्रामीणों ने जेठानी (बड़ी भाभी) नाम दिया जबकि छोटे वाले को देवरानी या छोटी भाभी कहा जाने लगा। इस प्रकार, मंदिरों का नामकरण अपने आप में अनूठा है। शिव मंदिर के रूप में प्रसिद्ध ये मंदिर मनियारी नदी के तट पर स्थित हैं।
पुरातत्वविदों के अनुसार जेठानी और देवरानी मंदिर का निर्माण पांचवीं शताब्दी में हुआ था।

1984 में सरकार द्वारा संरक्षित स्मारक घोषित देवरानी मंदिर में वर्ष 1987-88 के दौरान की गई खुदाई में भगवान शिव की एक अत्यंत अनोखी मूर्ति सामने आई है।

आज जेठानी मंदिर जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है और मंदिर की केवल उत्कृष्ट रूप से गढ़ी गई मूर्तियाँ ही बची हैं। देवरानी मंदिर बेहतर तरीके से संरक्षित है, भारत की समृद्ध धार्मिक परंपराओं के उदाहरण के रूप में सीधा और ऊँचा खड़ा है। इन मंदिरों में हिंदू देवताओं के विभिन्न देवी-देवताओं, अर्ध देवताओं, जानवरों, पौराणिक आकृतियों, पुष्प चित्रण और विभिन्न ज्यामितीय और गैर ज्यामितीय रूपांकनों सहित विभिन्न प्रकार की मूर्तियाँ हैं।

जेठानी मंदिर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बना है। हालांकि, आंशिक रूप से उजागर होने के बावजूद, मंदिर की भूतल योजना स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। जेठानी मंदिर के आधार पर प्रवेश द्वार पर एक सुंदर चंद्रशिला है। मंदिर में गर्भगृह, अर्ध मंडप और अंतराल शामिल हैं। इसका प्रवेश द्वार तीन तरफ से है, यानी दक्षिण, पूर्व और पश्चिम। मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार तक सीढ़ियों की एक विस्तृत उड़ान के माध्यम से पहुंचा जा सकता है। मंदिर का निर्माण परतदार लाल-बलुआ पत्थर से किया गया है।

मंदिर की ओर जाने वाली सीढ़ियों पर सजावटी खंभे हैं। भगवान शिव के यक्षगान और भारवाहक गणों की आकृतियाँ उन पर उकेरी गई हैं। खंभे के आधार भाग को कुंभों से डिज़ाइन किया गया है जबकि स्तंभ के शीर्ष पर अमलका एक कलश पर टिका हुआ है। विशाल हाथी की मूर्तियाँ आंतरिक कक्षों के किनारों की रक्षा करती हैं, जो रहस्यमय माहौल में और अधिक राजसीपन जोड़ती हैं।

देवरानी मंदिर पूर्व दिशा की ओर मुख किए हुए है, मंदिर में कोई महत्वपूर्ण शिलालेख नहीं है।पहले चरण पर उत्कीर्ण हैं और द्वारपाल की छवि ।

देवरानी मंदिर में गर्भगृह, अंतराल, मुखमंडप और खुला स्थान है, जहां सीढ़ियों के माध्यम से पहुंचा जा सकता है तथा एक बड़ी चंद्र शिला है।

मुखमंडप में एक सुंदर द्वार है, जिस पर नदी देवी की छवि बनी हुई है। मंदिर के अंदर जाने वाले द्वार में पाँच जटिल पैटर्न वाली आयताकार सीमाएँ हैं। आंतरिक कक्ष के दरवाजों पर कलात्मक रूप से फूलदार लताएँ उकेरी गई हैं। यहाँ शिव और पार्वती की कई मूर्तियाँ हैं जो कई भागों में टूटी हुई हैं। गर्भगृह का हिस्सा बहुत क्षतिग्रस्त है।

इस परिसर में रुद्र शिव की एक विशाल मूर्ति है। यह खड़ी मुद्रा में 2.70 मीटर ऊंची एक अखंड विशाल मूर्ति है। इसमें असामान्य प्रतीकात्मक विशेषताएं हैं जो शरीर के अंगों के रूप में मानव और शेर के सिर के साथ-साथ विभिन्न जानवरों को दर्शाती हैं। एक पगड़ी सांपों की जोड़ी से बनी है। मूर्ति को सांप की आकृति से सजाया गया है। अन्य जानवरों में मोर को कानों की सजावट के रूप में दर्शाया गया है। भौंहें और नाक छिपकलियों से बनी हैं। ठोड़ी केकड़े के आकार की है। दोनों कंधों पर मगरमच्छों का चित्रण है। शरीर के विभिन्न हिस्सों में सात देव मानव सिर उकेरे गए हैं। ऊपर वर्णित असामान्य चित्रण के कारण, इस मूर्ति की पहचान अभी भी विद्वानों के बीच विवाद का विषय है।

इस मुर्ति के बारे आप इतना तो जानते हैं या कभी आए होंगे तो मंदिर प्रांगण में लगे पुरातत्व विभाग द्वारा प्रदर्शित इतिहास जरूर पढ़े होंगे पर इनका वर्णन करने वाले पुरातत्वविदों या  विभागीय अधिकारियों से कुछ हिस्सा छुट गया है जो आज आपको हम बताने वाले हैं जिनमें हैं मुर्ति में बना शिश्न का स्वरूप जो लम्बे शिर वाले बाघ के रूप में है व वहीं अण्डाशय दो कछुओं के रूप में दिखाई देता है तो वहीं मुर्ति में बने मानवीय मुछ मानवीय न होकर दो मीन, अर्थात दो मछलियों से मूछ बनाई गई हैं। वहीं भुजा में बाल हाथी का सुंड का आकार है तो मकर की आंखें शंख के रूप में बनाया गया है,तो वहीं जटाएं विभिन्न सर्प जाल सा प्रतीत होता है।

उक्त रूद्रशिव की  मुर्ति भले ही पुरातत्व वेत्ताओं में विवादों का विषय हो परंतु छत्तीसगढ़ी भाषा में जस गीत में वर्षों से उक्त मुर्ति की विशेषता से जुड़ी शिव जी भक्ति गीत गाई जाती है जिसमें नाग का माला बिच्छू का कुण्डल, पिरपिटिया सर्प का जटा सहित विभिन्न पशु-पक्षियों व जन्तुओं को शिव के आभूषण के रूप में वर्णित किया गया है जिससे यह मुर्ति छत्तीसगढ़ में शिव जी का ही माना जाता है।

यह भी जानें 

ताला मंदिर प्रांगण में कई ऐसी मुर्तियां व चित्र उकेरे गए हैं जिनका सीधा संबंध पौराणिक कथाओं से है, इसमें विभिन्न मुद्राओं में योग करते हुए चित्र तो वहीं दूसरी ओर तपस्या की साधना से अमरत्व के समान दिव्य पुंज प्राप्त करते हुए योगियों की मुर्तियां भी दिखाई देती है जो अपने आप में अद्भुत रहस्यों से परिपूर्ण है व कहीं न कहीं यहां के शिव मंदिर पूर्ण रूप से शिवपुराण कथा के अनुसार ही बनाई गई परिलक्षित होती है।

तो वहीं एक खण्डित मुर्ति इस तरह दिखाई देती है मानो राजा बली वामनावतार को अपना सिर दान कर रहे हैं और भगवान विष्णु वामनावतार में उनके सिर पर पैर रखे हुए हैं,बलि के मुर्ति के सिर के बराबर पूरा एक पैर चित्रित किया गया है।

ताला एक ऐसी भूमि है, जो अतीत की खूबसूरत मूर्तियों से समृद्ध है, जो रहस्य में दबी हुई हैं। धरती माता के गर्भ से उत्खनन करके, ताला में ऐसी कई प्रसिद्ध मूर्तियाँ संरक्षित की गई हैं। उनमें से एक है श्री चतुर्भुज कार्तिकेय की विश्व प्रसिद्ध मूर्ति, जो मयूरासन की मुद्रा में तारकासुर का वध करते हैं। भगवान गणेश की एक शानदार ढंग से गढ़ी गई मूर्ति, जो शांत चंद्रमा की ओर निडर होकर आकाश में उड़ रही है, भी यहाँ देखी जा सकती है। द्विमुखी भगवान गणेश अपने दाँत पकड़े हुए हैं और अपार शक्ति और गर्व का अनुभव कर रहे हैं। अर्धनारीश्वर, उमा-महेश, नागपुरुष और अन्य यक्ष मूर्तियों की मूर्तियाँ एक सुंदर, ऐतिहासिक रूप से समृद्ध भूमि की महान किंवदंतियों और कहानियों को बताती हैं। शालभंजिका की एक दुर्लभ पत्थर की मूर्ति और कई अन्य मूर्तियाँ पूरे मंदिर में बिखरी हुई हैं। मंदिर के गर्भगृह में नृत्य करते हुए भस्मासुर,तो वहीं विभिन्न शिलाखंडों में शिव सती विवाह के चित्र उकेरे हुए हैं।
 वैज्ञानिकों और पुरातत्वविदों ने विभिन्न जटिल मूर्तियों पर लंबे समय तक विचार किया है और फिर भी, उनकी उत्पत्ति रहस्य में डूबी हुई लगती है।
अक्सर मेकला के पांडुवंशियों के अभिलेखों में उल्लिखित संगमग्राम के रूप में पहचाने जाने वाले ताला शिवनाथ और मनियारी नदी के संगम पर स्थित है। देवरानी-जेठानी मंदिरों के लिए सबसे प्रसिद्ध, ताला की खोज जेडी वेल्गर ने की थी, जो 1873-74 में प्रसिद्ध पुरातत्वविद् अलेक्जेंडर कनिंघम के सहायक थे। इतिहासकारों ने दावा किया है कि ताला गांव 7-8वीं शताब्दी ईस्वी पूर्व का है।
ताला के पास स्थित सरगांव गांव है जो धूम नाथ मंदिर का दावा करता है। इस मंदिर में भगवान किरारी के शिव स्मारक हैं पुरातत्ववेत्ता और इतिहासकार जटिल रूप से तैयार की गई पत्थर की नक्काशी को देखकर मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। गांव में देवरानी जेठानी मंदिर परिसर का एक मंदिर परिसर है जो आधे खंडहर अवस्था में है। ऐसा माना जाता है कि इसे शरभपुरिया राजवंश के शासक राजप्रसाद की दो रानियों ने बनवाया था। पुरातत्वविदों का मानना है कि यह 5वीं या 6वीं शताब्दी का है। देवरानी मंदिर लाल बलुआ पत्थर से बना है जो मुख्य रूप से गुप्तकालीन पुरातात्विक शैली का है। जबकि जेठानी मंदिर कुषाण शैली का है। हालाँकि, प्राप्त विभिन्न उत्खनन खंडहर और मूर्तिकला-शैली हमें बताती है कि ताला में शासन करने वाले विभिन्न राजवंश भगवान शिव के भक्त और शिव धर्म के प्रचारक थे। शायद इसीलिए आज भी शिव भक्त विभिन्न अनुष्ठान करने और पवित्र महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने के लिए यहाँ मंदिरों में आते हैं। भगवान शिव के भक्त यहाँ अपनी प्रार्थना करते हैं और अन्य उत्खनन स्थलों को देखना भी पसंद करते हैं।

Sunday, July 19, 2026

चातुर्मास महात्म्यम्

चातुर्मास महात्म्यम्

सुप्ते देवे जगन्नाथे, आषाढ़े हरिवासरै।
चातुर्मास्यव्रतं कुर्यात्, सर्वपापप्रणाशनम् ॥१

हरौ शयानं देवेशे, यः करोति व्रतं नरः।
तस्य तुष्टो भवेद्विष्णुः, ददाति परमं पदम् ॥२॥

वेदेषु च पुराणेषु, शास्त्राणामवलोकने।
चातुर्मास्यसमो नास्ति, पावनो भुवि कश्चन ॥३॥

आहारं मैथुनं निद्रां, रागद्वेषमथापि च।
यः संयच्छति वर्षासु, स योगी नात्र संशयः ॥४॥

सात्त्विकं भोजनं कुर्यात्, अल्पं च वरवर्णिनि।
तामसं वर्जयेत्सर्वं, व्रती भूत्वा समाहितः ॥५॥

श्रावणे वर्जयेच्छाकं, दधि भाद्रपदे तथा।
दुग्धं च आश्विने मासि, कार्त्तिके द्विदलं त्यजेत् ॥६॥

भूमौ शयनं कुर्वीत, ब्रह्मचर्यपरायणः।
अक्षय्यं लभते पुण्यं, विष्णुलोकं स गच्छति ॥७॥

असत्यं न वदेत्क्वापि, क्रूरवादं च वर्जयेत्।
मौनव्रतं विशेषेण, कीर्तितं सर्वसिद्धिदम् ॥८॥

अहिंसा परमं धर्मं, मनसा वचसा गिरा।
पालयेत्सततं धीमान्, सर्वभूतहिते रतः ॥९॥

नित्यं स्नानं प्रकुर्वीत, प्रात:काले विशुद्धधीः।
गायत्रीं च जपेद्भक्त्या, संध्यावन्दनतत्परः ॥१०॥

दीपदानं प्रकुर्वीत, हरये चक्रपाणये।
अंधकारक्षयो यद्वत्, ज्ञानदीपस्तथा भवेत् ॥११॥

तुलसीं पूजयेन्नित्यं, प्रदक्षिणामथापि च।
यः करोति नरो भक्त्या, तस्य नश्यति पातकम् ॥१२॥

परनिन्दां न कुर्वीत, परवादं च वर्जयेत्।
आत्मवत्सर्वभूतेषु, पश्येन्नारायणं प्रभुम् ॥१३॥

अन्नदानं जलं दानं, वस्त्रदानं च कार्त्तिके।
यद्दत्तं चातुर्मास्येषु, तदक्षय्यं भवेद्भुवि ॥१४॥

विष्णुकीर्तनसक्तो यः, पुराणाश्रवणे रतः।
तस्य तिष्ठति गोविन्दः, हृदये नात्र संशयः ॥१५॥

एकभक्तेन नक्त वा, यः करोति व्रतं मुदा।
आरोग्यं लभते नित्यं, धनधान्यं च वर्धते ॥१६॥

कांस्यपात्रं त्यजेन्नित्यं, पलाशपत्रभोजनम्।
सर्वकामप्रदं प्रोक्तं, ऋषिसंघैः पुरातनैः ॥१७॥

कामं क्रोधं च लोभं च, मोहमदं तथापि च।
त्यक्त्वा भजति यः कृष्णं, स जीवन्मुक्त उच्यते ॥१८॥

प्रबोधिन्यां प्रबुद्धे तु, वासुदेवे जगद्गुरौ।
व्रतप्रतिष्ठां कुर्वीत, विप्रान्नारायणं स्मरन् ॥१९॥

एवं यः कुरुते भक्त्या, चातुर्मास्यव्रतं शुभम्।
इहामुत्र च सौख्यं च, लब्ध्वा याति हरेः पदम् ॥२०॥

॥ इति श्री गृहावधूत खेमेश्वर पुरी जी महाराज विरचितं चातुर्मास्य महात्म्य स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥


Saturday, July 18, 2026

वो अब नावों में चढ़कर, जल-भराव देखने आते हैं

वो अब नावों में चढ़कर, जल-भराव देखने आते हैं


यहाँ कंक्रीट के जंगल खड़े हर मोड़ पर कर दिए,
जो कुदरती थे बहने के, वो सारे रास्ते भर दिए।
दिखाकर 'स्मार्ट सिटी' का हसीं ख़्वाब इस ज़माने को,
हमारे तैरते शहरों को, बस तालाब कर दिए।

करोड़ों रुपए नालों की सफाई में बहाते हैं,
नतीजा 'ढाक के तीन पात' ही हर बार लाते हैं।
ये प्रशासनिक विफलता है कि पानी थम नहीं पाता,
मगर वो आपदा कह कर, ज़िम्मेदारी छुपाते हैं।

तराशा है शहर ऐसा कि मिट्टी अब बची ही नहीं,
जल संचयन और सीवरेज की सुध किसी ने ली नहीं।
बनाए फ्लाईओवर और इमारत तो ऊँची की,
मगर बुनियादी ढाँचे की, कभी चिंता कोई की नहीं।

वो वादे खोखले करके, हमें हर बार छलते हैं,
जलमग्न इन गलियों में, हमारे ख़्वाब गलते हैं।
बदलते मौसमों को दोष देकर बच निकलते हैं,
मगर हम हर बरस इस त्रासदी की आग में जलते हैं।

बना कर योजना काग़ज़ पे, वो अक्सर मुस्कुराते हैं,
मगर पहली ही बारिश में, सभी वादे बह जाते हैं।
जो कहते थे कि हम शहर को पेरिस बना देंगे,
वो अब नावों में चढ़कर, जल-भराव देखने आते हैं।

सर्वाधिकार सुरक्षित 
खेमेश्वर पुरी गोस्वामी 
मुंगेली छ.ग. ८१२००३२८३४

Friday, July 10, 2026

शहर या तालाब? बेतरतीब शहरीकरण और जल निकासी की विफलता

शहर या तालाब? बेतरतीब शहरीकरण और जल निकासी की विफलता

​लेखक: खेमेश्वर पुरी गोस्वामी 
मुंगेली छत्तीसगढ़ 8120032834

​मानसून की पहली कुछ बौछारें अक्सर मन को राहत देने वाली होती हैं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में भारतीय शहरों के लिए ये बौछारें 'आफत की बारिश' बनकर आ रही हैं। दिल्ली की पॉश कॉलोनियों से लेकर मुंबई की सड़कों तक और रायपुर के निचले इलाकों से लेकर बेंगलुरु के आईटी हब तक, हर शहर की कहानी एक जैसी है—आधे घंटे की मूसलाधार बारिश और सड़कें किसी विशाल तालाब में तब्दील। प्रश्न यह है कि क्या हमारा शहरी नियोजन (Urban Planning) प्रकृति की चुनौतियों के सामने घुटने टेक चुका है, या फिर यह 'विकास' की अंधी दौड़ में हमने अपनी ही कब्र खुद खोदी है?
आज हमारे शहर 'स्मार्ट' होने का दावा तो करते हैं, लेकिन उनकी धमनियां यानी जल निकासी व्यवस्था पूरी तरह 'मृत' हो चुकी हैं। हमने कंक्रीट के जंगल खड़े करने के लिए प्राकृतिक ढलानों को पाट दिया, जलभराव वाले तालाबों को मिट्टी से भरकर वहां बहुमंजिला इमारतें खड़ी कर दीं और शहरी विस्तार के नाम पर कुदरती जल निकासी के रास्तों को अवरुद्ध कर दिया। जब पृथ्वी की सतह को कंक्रीट की चादर से ढक दिया जाएगा, तो बारिश का पानी आखिर कहाँ जाएगा? धरती तो अब पानी सोखने के लिए बची ही नहीं है।
भारतीय शहरों का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि यहाँ 'विकास' का मतलब सिर्फ फ्लाईओवर और ऊंची इमारतें हो गई हैं, जबकि जल संचयन, सीवरेज नेटवर्क और स्टॉर्म वॉटर ड्रेनेज जैसी बुनियादी चीजों को हमेशा हाशिए पर रखा गया। दशकों पुराने ड्रेनेज सिस्टम पर आज की आबादी का भार है। नगर निगमों की सुस्ती का आलम यह है कि हर साल मानसून से पहले नालों की सफाई के नाम पर करोड़ों रुपये पानी में बहा दिए जाते हैं, लेकिन परिणाम वही 'ढाक के तीन पात'। अर्बन फ्लडिंग अब केवल प्रकृति का प्रकोप नहीं है, यह प्रशासनिक विफलता का जीता-जागता प्रमाण है।
जलवायु परिवर्तन ने मानसून के मिजाज को पूरी तरह बदल दिया है। 'कम समय में अत्यधिक बारिश' की घटनाएं अब आम हो गई हैं। हमारे पुराने शहर इस नई जलवायु वास्तविकता के लिए तैयार नहीं हैं। जब तक हम 'स्पंज सिटी' की अवधारणा—जहाँ शहर खुद पानी को सोखने और उसे संचित करने की क्षमता रखे—को नहीं अपनाएंगे, तब तक हर साल हम यही त्रासदी झेलने के लिए अभिशप्त रहेंगे।
शहरों को तालाब बनने से बचाने के लिए अब केवल खोखले वादों से काम नहीं चलेगा। पहली जरूरत है—शहरों के मास्टर प्लान का पुनर्निरीक्षण, जिसमें 'नेचर-बेस्ड सॉल्यूशंस' को प्राथमिकता दी जाए। वेटलैंड्स (आर्द्रभूमि) का संरक्षण अनिवार्य है, क्योंकि ये शहर के 'फेफड़े' और 'किडनी' दोनों का काम करते हैं। साथ ही, अतिक्रमण मुक्त ड्रेनेज और वर्षा जल संचयन को अनिवार्य रूप से लागू करना होगा।
शहरों का जलमग्न होना इस बात का अलार्म है कि हम प्रकृति के साथ संतुलन बनाने में बुरी तरह विफल रहे हैं। यदि समय रहते हमने जल निकासी की बुनियादी संरचना में सुधार नहीं किया, तो आने वाले समय में हमारे शहर रहने योग्य नहीं, बल्कि डूबने योग्य रह जाएंगे। विकास की चमक-धमक के नीचे दबी इस 'जल-त्रासदी' को अनदेखा करना अब आने वाली पीढ़ियों के प्रति एक बड़ा अपराध होगा। क्या हम अभी भी नहीं जागेंगे?

व्यवस्था और आम आदमी

व्यवस्था और आम आदमी

दफ्तर की धूल भरी फाइलें तो मौन खड़ी,
काम के बहाने हमें रोज दौड़ाते हैं।

टेबल के नीचे और बाबू की निगाहों में,
उम्मीदों के दीप यहाँ रोज बुझ जाते हैं॥

सफेद लिबास में हैं बैठे जो हुक्मरान,
आम आदमी की वे तो पीड़ा न बताते हैं।

फाइल के कागज़ों में दम तोड़ती है आस,
सिस्टम के चक्र में हम पिसते ही जाते हैं॥

सर्वाधिकार सुरक्षित 
खेमेश्वर पुरी गोस्वामी 
मुंगेली, छत्तीसगढ़ ८१२००३२८३४

Friday, June 26, 2026

कबीरदास जी को समर्पित

सत्य की राह दिखाई,
अज्ञान की रात मिटाई।

कबीर वाणी में है सार,
प्रेम का किया प्रसार।

छुआछूत का भेद तोड़ा,
राम नाम से नाता जोड़ा।

ऐसे संत कबीर महान,
कोटि नमन मेरा प्रणाम।

सर्वाधिकार सुरक्षित : खेमेश्वर पुरी गोस्वामी 
मुंगेली, छत्तीसगढ़,८१२००३२८३४

अंगूठाछाप जो बने हैं, राष्ट्र के विधाता आज

अंगूठाछाप जो बने हैं, राष्ट्र के विधाता आज कुर्सी पर ऐंठ बैठे, एक ना अक्षर जाने, कलम न पकड़ी जो, नियम बनाते हैं। संसद की सभा बीच, जमाकर पाँव...