Monday, October 19, 2026

श्री रावण माहात्म्य स्तोत्रम

:- श्रीरावणमाहात्म्यस्तोत्रम् -:

ब्रह्मवंशसमुद्भूतो विश्रवस्तनयो बली ।
पुलस्त्यपौत्रो धीमान् स दशग्रीवो महायशाः ॥ १ ॥

वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञो नीतिशास्त्रविशारदः ।
सामगानरतो नित्यं लङ्काधीशो महामतिः ॥ २ ॥

तपस्तप्त्वा महत् घोरं गोकर्णे स नराधिपः ।
दशधा स्वात्मशीर्षाणि चक्रे होमं महेश्वरे ॥ ३ ॥

प्रसन्नो वरदस्तस्मै शङ्करो भक्तवत्सलः ।
ददौ चन्द्रहासं दिव्यं सर्वास्त्रैश्चापराजितम् ॥ ४ ॥

महाबलप्रतापी स कैलासं तोलयन्नपि ।
अङ्गुष्ठपीडिते शैले शिवस्तवनमाचरत् ॥ ५ ॥

सद्यः स्तुत्वा महादेवं छन्दोभिर्ललितैर्वरैः ।
जगाद मङ्गलस्तोत्रं शिवताण्डवसंज्ञकम् ॥ ६ ॥

जटाकटाहसम्भ्रम-भ्रमन्निलिम्पनिर्झरीम् ।
गीयमानो मुदा शम्भोस्तोषणाय महात्मना ॥ ७ ॥

रुद्रेण परया तुष्ट्या रावणो नाम संददौ ।
तव नादेन त्रैलोक्यं कम्पितं साधु रावण ॥ ८ ॥

आयुर्वेदप्रणेता स रसशास्त्रविचक्षणः ।
अर्करूपं परं ज्ञानं प्रकाशयति भूतले ॥ ९ ॥

ज्योतिषे च महाविद्वांस्तन्त्रशास्त्रे च दीक्षितः ।
रावणीया संहिता च लोके ख्याता विशेषतः ॥ १० ॥

स्वधर्मपालकः शूरः प्रजापालनतत्परः ।
हेममयीं पुरीं रम्यां रक्षति स्म सुखेन सः ॥ ११ ॥

दानवीरो जितक्रोधो विद्वद्वृन्दसमर्चितः ।
नासीत् कश्चिद्दरिद्रोऽपि लङ्कायां तस्य शासने ॥ १२ ॥

अहङ्कारवशाद् भ्रष्टो विधिना प्रेरितो बली ।
जहार मैथिलीं देवीं मोक्षकामी न संशयः ॥ १३ ॥

जयश्च विजयश्चोभौ सनकादिशापमोहितौ ।
राक्षसत्वं गतौ वीरौ शापान्ते मुक्तिवाञ्छिनौ ॥ १४ ॥

देवेभ्यो न हि मुक्तिः स्यात् साक्षाद् विष्णुं विना यतः ।
वैरेण भक्तियोगेन ध्यायन् रामं स रावणः ॥ १५ ॥

यस्य हन्तुं न शक्यन्ते सुराः सर्वे सवासवाः ।
तं तारयितुमेवात्र श्रीनारायण आगमः ॥ १६ ॥

मानुषं रूपमास्थाय साक्षात् रघुकुलोद्वहः ।
अवततार भूम्यां स धर्मसंस्थापनाय च ॥ १७ ॥

युद्धे दृष्ट्वा महाकायं रामं राजीवलोचनम् ।
क्षणे मोहमपाकृत्य शरणं मनसा गतः ॥ १८ ॥

रामबाणेन संभिन्नः पतितो धरणीतले ।
सर्वं पापं विनिर्मुक्तं ज्ञानं ददौ च लक्ष्मणे ॥ १९ ॥

राजनीतिं च धर्मं च मोक्षतत्त्वं तथैव च ।
अन्ते ज्ञानामृतं दत्त्वा प्रयातो विष्णुपार्षदः ॥ २० ॥

दिव्यं तेजः समुद्भूतं शरीरात्तस्य तेजिनः ।
प्रविश्य रामदेहे तु लीनं जातं महाप्रभम् ॥ २१ ॥

स एव शिवभक्तस्तु स एव हरसेवकः ।
सद्गुणानां निधानं च प्रमादाद् भ्रष्टतां गतः ॥ २२ ॥

न तस्य सदृशो ज्ञानी न तस्य सदृशः सुधीः ।
शिवभक्तिपरा काष्ठा रावणस्य महौजसः ॥ २३ ॥

इति रावणमाहात्म्यं पुण्यदं पापनाशनम् ।
गुणानां ग्रहणं कुर्यात् दोषं त्यक्त्वा विचक्षणः ॥ २४ ॥

गृहावधूतसंज्ञेन खेमेश्वरेण धीमता ।
गोस्वामिना रचितं स्तोत्रं शिवभक्तिप्रदायकम् ।
पठनात् पापमुक्त्वा सच्छिवमार्गं भजेन्नरः ॥ २५ ॥


        © सर्वाधिकार सुरक्षित ®
   खेमेश्वर पुरी गोस्वामी (गृहावधूत)
   डिंडोरी - मुंगेली, छत्तीसगढ़ ४९५३३४
         दूरभाष - ८१२००३२८३४

श्लोकों का सरल हिन्दी भावार्थ  :- 

श्लोक १: ब्रह्मा जी के पावन वंश में महर्षि विश्रवा के पुत्र तथा महर्षि पुलस्त्य के पौत्र के रूप में महापराक्रमी, अत्यंत बुद्धिमान एवं यशस्वी दशग्रीव (रावण) का प्राकट्य हुआ।

श्लोक २: वे चारों वेदों तथा वेदांगों के मर्मज्ञ, नीतिशास्त्र में निपुण, निरंतर सामवेद की ऋचाओं का गायन करने वाले तथा लंका के अत्यंत मेधावी अधिपति थे।

श्लोक ३: उन नरश्रेष्ठ ने गोकर्ण तीर्थ में अत्यंत कठिन तपस्या की और भगवान शिव की प्रसन्नता हेतु अपने दसों शीशों को काट-काटकर आहुति के रूप में समर्पित कर दिया।

श्लोक ४: उनकी अनन्य तपस्या से प्रसन्न होकर भक्तवत्सल भगवान शंकर ने उन्हें साक्षात वरदान दिया और तीनों लोकों में किसी भी अस्त्र से न कटने वाली दिव्य 'चन्द्रहास' खड्ग प्रदान की।

श्लोक ५: महाबली रावण ने जब कैलाश पर्वत को अपनी भुजाओं से उठा लिया, तब महादेव द्वारा केवल अंगूठे के भार से पर्वत दबाने पर उन्होंने अत्यंत शांत चित्त से शिव स्तुति की।

श्लोक ६: उसी क्षण अत्यंत मधुर और छंदोबद्ध वाणी में उन्होंने देवाधिदेव महादेव की स्तुति की, जो आज संसार में 'शिव ताण्डव स्तोत्र' के नाम से प्रसिद्ध है।

श्लोक ७: "जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी..." के पावन पदों से युक्त होकर उन्होंने महादेव को प्रसन्न करने के लिए आनंदपूर्वक इस परम स्तोत्र का गान किया।

श्लोक ८: उनके उस प्रचंड घोष और स्तवन से संतुष्ट होकर स्वयं महादेव ने कहा—"हे वीर! तुम्हारे नाद से तीनों लोक कंपित हो गए, अतः आज से तुम्हारा नाम 'रावण' होगा।"

श्लोक ९: वे महान आयुर्वेदाचार्य तथा रसशास्त्र के ज्ञाता थे। 'अर्कप्रकाश' आदि ग्रंथों के माध्यम से उन्होंने संपूर्ण धरातल पर अद्वितीय ज्ञान का प्रकाश फैलाया।

श्लोक १०: वे ज्योतिष शास्त्र के अप्रतिम विद्वान तथा तंत्र विद्या के निष्णात ज्ञाता थे। उनके द्वारा रचित 'रावण संहिता' आज भी ज्योतिष जगत में अत्यंत प्रामाणिक मानी जाती है।

श्लोक ११: वे अपनी प्रजा के रक्षक, शूरवीर और शासन-व्यवस्था में प्रवीण थे। उनके राज्य में सुवर्णमयी लंकापुरी में सर्वत्र शांति, ऐश्वर्य और वैभव का वास था।

श्लोक १२: वे अत्यंत दानी, ज्ञानी पुरुषों का आदर करने वाले तथा नीतिवान शासक थे। उनके शासनकाल में लंका में कोई भी दीन, दुखी अथवा दरिद्र नहीं था।

श्लोक १३: कालान्तर में अहंकार तथा प्रारब्ध (विधि के विधान) से प्रेरित होकर उन्होंने सीता हरण किया; परंतु गूढ़ रूप से उनका वास्तविक उद्देश्य प्रभु के करकमलों से मुक्ति प्राप्त करना ही था।

श्लोक १४: सनकादि ऋषियों के शाप के प्रभाव से भगवान विष्णु के पार्षद जय और विजय ही राक्षस योनि में आए थे और वे शीघ्र इस शाप से मुक्त होकर प्रभु के धाम लौटना चाहते थे।

श्लोक १५: क्योंकि अन्य किसी साधारण देवता में उन्हें मुक्ति देने का सामर्थ्य नहीं था, अतः रावण ने वैर-भक्ति (विद्वेष भक्ति) का मार्ग चुनकर निरंतर श्रीराम का ध्यान किया।

श्लोक १६: जिस रावण को इंद्र आदि समस्त देवता मिलकर भी परास्त नहीं कर सकते थे, उसी अपने पार्षद का उद्धार (तारण) करने के लिए स्वयं साक्षात श्रीनारायण ने संकल्प लिया।

श्लोक १७: धर्म की पुनः स्थापना करने तथा रावण को शापमुक्त करने हेतु स्वयं भगवान विष्णु ने रघुकुल में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के रूप में मानुष अवतार ग्रहण किया।

श्लोक १८: अंत समय में रणभूमि में जब रावण ने कमलनयन श्रीराम के दिव्य स्वरूप को देखा, तो क्षणमात्र में उनका सारा अज्ञान मिट गया और वे मानसिक रूप से प्रभु की शरण में आ गए।

श्लोक १९: श्रीराम के बाण से विद्ध होकर जब वे भूमि पर गिरे, तब वे समस्त पापों से विमुक्त हो गए और अंतिम पलों में उन्होंने लक्ष्मण जी को राजनीति और जीवन का गूढ़ ज्ञान प्रदान किया।

श्लोक २०: राजनीति, धर्मनीति तथा मोक्ष के अंतिम गूढ़ तत्त्वों का उपदेश देकर भगवान विष्णु के पार्षद रावण अपने परम धाम की ओर प्रस्थान कर गए।

श्लोक २१: उनके शरीर से एक अत्यंत देदीप्यमान दिव्य ज्योति प्रकट हुई, जो संपूर्ण आकाश को आलोकित करती हुई भगवान श्रीराम के श्रीविग्रह में विलीन हो गई।

श्लोक २२: वे परम शिवभक्त तथा महादेव के अनन्य सेवक थे, सद्गुणों के भंडार होते हुए भी केवल एक प्रमाद (अहंकार) के कारण पतन को प्राप्त हुए।

श्लोक २३: उनके समान कोई दूसरा प्रकांड ज्ञानी और तीव्र बुद्धि वाला नहीं हुआ; भगवान शिव के प्रति उनकी अनन्य भक्ति निष्ठा की सर्वोच्च पराकाष्ठा है।

श्लोक २४: इस प्रकार यह रावण का माहात्म्य स्तोत्र पुण्य प्रदान करने वाला तथा पापों का नाश करने वाला है। बुद्धिमान मनुष्य को चाहिए कि वह उनके अवगुणों को त्यागकर उनके सद्गुणों, ज्ञान और भक्ति को ग्रहण करे।

श्लोक २५ (फलश्रुति):
गृहावधूत खेमेश्वर पुरी गोस्वामी द्वारा रचित यह पावन स्तोत्र भगवान शिव की निश्चल भक्ति प्रदान करने वाला है। इसके नित्य पाठ व अनुशीलन से मनुष्य के भीतर सकारात्मक परिवर्तन होता है, वह समस्त दुर्गुणों और बुराइयों से मुक्त होकर भगवान आशुतोष शिव के पावन चरणों का अनुसरण करता है।

Wednesday, October 7, 2026

श्रीसरस्वतीविद्यास्तोत्रम्

॥ श्रीसरस्वतीविद्यास्तोत्रम् ॥

ध्यात्वा देवीं सिताकारां ज्ञानदात्रीं जगद्गुरुम्। प्रवक्ष्ये पावनं स्तोत्रं विद्याप्राप्तिकरं शुभम्॥ १॥

नमामि शारदां देवीं हंसारूढां शुभप्रदाम्। श्वेतवस्त्रावृतां पुण्यां वीणावादनतत्पराम्॥ २॥

या बुद्धिं दिशति प्राज्ञां चेतसि ध्वान्तहारिणीम्। तामविद्याविनाशीनीं वन्दे वाग्देवतां सदा॥ ३॥

पुस्तकं धारयन्त्येका करे ज्ञानप्रदीपकम्। अक्षमालां परे हस्ते जपध्यानसमन्विता॥ ४॥

स्वरब्रह्ममयी वाणी सर्ववेदान्तभासिनी। कविचित्तप्रमोदज्ञा सा मां पातु सरस्वती॥ ५॥

जडतां हर मे मातर्गम्भीरां घोररूपिणीम्। दीव्यतां हृदये नित्यं दीपवन्निर्मला मतिः॥ ६॥

काव्यशास्त्रविनोदं च तर्कं व्याकरणं तथा। सर्वं कल्याणि मे देहि शुद्धं भाषणवैभवम्॥ ७॥

कलानां जननी त्वं हि गीतानां च सुरेश्वरी। भवत्याः कृपया देवि मूकोऽपि वाक्पतिर्भवेत्॥ ८॥

ब्रह्मलोकात् समायाता मानसे सरसि स्थिता। सत्यं शिवं च सुन्दरं रूपं ते सर्वमङ्गलम्॥ ९॥

प्रज्ञा मे वर्धतां नित्यं स्मृतिः पातालगामिनी। विद्युतेव समुद्भातु मेधा मे विपुला मयि॥ १०॥

चतुर्वक्त्रस्य या कान्ता धर्ममार्गप्रदर्शिनी। सा मे विशोधयेद्वाचं सत्ये धर्मे नियोज्य च॥ ११॥

कुबुद्धिं नाशय क्लेशांस्तमिस्रां च निवारय। प्रयच्छ विमलं ज्ञानं लोककल्याणसाधनम्॥ १२॥

अकारादिक्षकारान्तान् वर्णान् यत्नेन योजितान्। मातृकारूपिणीं देवीं नौमि वाङ्मनसातिगाम्॥ १३॥

संसारसिन्धुतरणे या नौका ज्ञानरूपिणी। तां देवीं सर्ववन्द्यां च श्रद्धया संस्मराम्यहम्॥ १४॥

त्वमेव माता जगतां त्वमेव शरणं मम। देहि विद्यां यशः शीलमायुश्च परमामृषिम्॥ १५॥

इदं षोडशकं स्तोत्रं त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः। सरस्वतीप्रसादेन स भवेद् वाक्पतिः सुधीः॥ १६॥

॥ इति गृहावधूत-खेमेश्वर-पुरी-विरचितं श्रीसरस्वतीविद्यास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥


 ©गृहावधूत खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®

  मुंगेली, छत्तीसगढ़ - ८१२००३२८३४

Friday, August 14, 2026

आज़ादी के आईने में छत्तीसगढ़ का सच

आज़ादी के आईने में छत्तीसगढ़ का सच

चौपालों पर रोजा रखते, विकास के सपने सारे,
कागजों पर जगमगाते, झूठे झूठे चाँद-तारे।

आज़ादी के कितने बरसों बाद भी यह लाचार,
बुनियादी हक के खातिर, क्यों होती है नित्य पुकार?

अस्पताल की दूरी देखो, खाट बनी अब है गाड़ी,
रास्तों के सीनों पर चलती,पत्थर और कंकड़ की गाड़ी।

दर्द कराह रहा सीने में, सड़क नहीं पर नदियाँ भारी,
कच्चे मार्गों की किस्मत पर, रोती हर जीवन-फुलवारी।

पेड़ छांव में ज्ञान बँट रहा, अक्षर-अक्षर ज्ञान अधूरा,
बिन छत वाले उस स्कूल का, सपना रहता सदा अधूरा।

किताबें पहुँचीं सत्र बीत कर, शिक्षक का न पता ठिकाना,
बच्चों के इन मासूम मुखों पर, किसका है पहरा अनजाना?

बिजली आती-जाती जैसे, मेहमान कोई घर आता,
पानी के खातिर हर नारी, मीलों दूर भटका खाता।

चुए का गंदा पानी पीकर, उमर बिताते लोग यहाँ पर,
विकास रथ के पहिए अटके, इन वीरानो की माटी पर।

फाइलों के बोझ तले अब, दबकर दम तोड़े कानून,
न्याय माँगने वाला जाने, कितने काट रहा है जून।

खनिजों से यह माटी चमकी, घर-घर को रौशन करती,
पर खुद अपनी ही किस्मत पर, दीप शिखा यह क्यों है डरती?

हीरे-मोती पेट न भरते, न ही पानी देते झरने,
अमीरी की इस धरती पर, दुख के बादल बरसे?

आखिरी पंक्ति में बैठा जो, वो व्यथा किसे बतलाए?
कागज़ की इन योजनाओं से, पेट भला कब भर पाए?

जागो अब तो नींद से अपनी, हे हुक्मों के पहरेदार,
छोर-छोर तक हक पहुँचा दो, मत करो अब और इंतज़ार।

तभी मनाएंगे जश्न सही से, जब हर घर में दीप जलेगा,
छत्तीसगढ़ का हर बाशिंदा, गर्वित होकर साथ चलेगा।

 सर्वाधिकार सुरक्षित 
खेमेश्वर पुरी गोस्वामी 
मुंगेली, छत्तीसगढ़ 8120032834

Monday, August 10, 2026

अष्टनाग स्तोत्रम् (खेमेश्वर पुरी विरचित)

अष्टनाग स्तोत्रम् (खेमेश्वर पुरी विरचित)

अनन्तस्तार्क्ष्यानुजः ख्यातः शेषो विश्वस्य धारकः। प्रथमो नागराजोऽयं पातु नः सर्वदा मुदा ॥ १ ॥

द्वितीयो वासुकिर्नाम शिवस्य भुषणोत्तमः। समुद्रमथने योऽभूद् रज्जुः ख्यातिगतो भुवि ॥ २ ॥

तृतीयस्तक्षकः श्रीमान् तक्षकाख्यः महाबलः। परीक्षित्तक्षकः ख्यातः नागानां मध्ये विश्रुतम् ॥ ३ ॥

चतुर्थः कार्कोटकस्तु महाघोरपराक्रमः। नलस्य दंशने ख्यातश्चित्रगुप्तादिपूजितः ॥ ४ ॥

पञ्चमः पद्मनाभस्तु महापद्मश्च पञ्चमः। निधिपालकयोर्द्वन्द्वं कुबेरस्य प्रियं सदा ॥ ५ ॥

षष्ठो महापदः ख्यातः सुवर्णस्य च रक्षकः। नागानां कुलगोत्रेषु पूजितो वै दिशो दश ॥ ६ ॥

सप्तमो शङ्खनादस्तु शङ्खपालो महाबलः। पुण्यात्मनां च रक्षकश्च पवित्रः पापनाशनः ॥ ७ ॥

अष्टमो कुलकश्चैव गुलिकोऽपि महाबलः। अन्ते च संहती चैव सर्वनागाधिपः प्रभुः ॥ ८ ॥

अनन्तस्य प्रभावेण भूमिश्चैवातिधारिता। शेषनागस्य फणासु लोकान् स्थापिताः खलु ॥ ९ ॥

वासुकिः कण्ठभूषा च देवदेवस्य शङ्करः। येन दृष्टा महादेवाः तेन मुक्तिर्हि शाश्वती ॥ १० ॥

तक्षकस्य प्रभावेण विषवेगः सुदारुणः। स्मृतेन तक्षकस्यैव विषबाधा विनश्यति ॥ ११ ॥

कार्कोटकस्य च मन्त्रेण नागदोषो विनश्यति। स्मरणान्मुक्तिदातासौ सर्पभयात् प्रमुच्यते ॥ २२ ॥

पद्मनाभस्य नाम्ना तु धनान्युपलभ्यते। महापद्मस्य प्रभावात् सर्वसौभाग्यवर्धनम् ॥ १३ ॥

शङ्खपालस्य प्रभावात् पुण्यवृद्धिः प्रजायते। कुले तेषां न जायते कभीतिर्नागसम्भवा ॥ १४ ॥

कुलकस्य च स्मरणेन कुलं तिष्ठति शाश्वतम्। वंशवृद्धिः सदा तेषां ये पठन्ति इदं स्तोत्रकम् ॥ १५ ॥

अष्टनागाः प्रसीदन्तु सर्वकालं सुखावहाः। सर्पेभ्यो रक्षन्तु नित्यं विषभयं हरन्तु च ॥ १६ ॥

नागाः कुलस्य रक्षकाः भूमेश्र्वैवाधिदेवताः। ये पूजयन्ति नागान् वै तेषां गेहे वसेत् श्रिया ॥ १७ ॥

कालसर्पविधानानि ये कुर्वन्ति मुदा नराः। अष्टनागस्य जपमात्रेण शान्तिं प्राप्नुवन्ति ते ॥ १८ ॥

नागपञ्चम्यां वै काले ये पठेयुः इदं स्तोत्रम्। तेषां कुले नागबाधा कदापि न भवति ध्रुवम् ॥ १९ ॥

ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा वा ये च मानवाः। अष्टनागस्य पाठेन सर्वसिद्धिं लभन्ति ते ॥ २० ॥

य इदं पठते नित्यं प्रातरुत्थाय मानवः। तस्य गेहे न सर्पाणां भयं भवति कुत्रचित् ॥ २१ ॥

इदं स्तोत्रं महापुण्यमष्टनागस्य कीर्तितम्। भक्तिमद्भिः पठेद् यस्तु स याति परमां गतिम् ॥ २२ ॥

नागाः प्रीयन्तामत्र विप्रमुख्याः सुरादयः। सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वसन्तोषवर्धिताः ॥ २३ ॥

अष्टनागमिदं स्तोत्रं सम्पूर्णं सुखदं शुभम्। पठतां श्रुणुतां नॄणां सर्वसिद्धिप्रदायकम् ॥ २४ ॥

इदं स्तोत्रं खेमेश्वर पुरी गृहावधूत विरचितम् सम्पूर्णम् ॥

Sunday, August 2, 2026

श्रावण मास महात्म्य स्तोत्रम (खेमेश्वर पुरी कृत)

 श्रावणमासमाहात्म्यस्तोत्रम् (खेमेश्वर पुरी कृत)

नमस्तस्मै महेशाय भक्तानां वरदायिने।
श्रावणस्य च मासानामधिपाय कपर्दिने॥

श्रावणो मङ्गलो मासः सर्वपापप्रणाशनः।
शिवपूजा-रतानां च सर्वसिद्धि-प्रदायकः॥

मासानां प्रवरो मासः शंभोः प्रियतमो मतः।
अत्र पूजा महेशस्य सर्वकामप्रदा नृणाम्॥

सोमवारेषु यः कुर्याच्छिवव्रतमखण्डितम्।
तस्य तुष्यति देवेशो ददाति विपुलं सुखम्॥

गङ्गाजलेन यो लिङ्गं सेचयेच्छ्रावणे मुदा।
तस्य नश्यन्ति पापानि जन्मकोटिसमुद्भवाः॥

बिल्वपत्रैः सुपुष्पैश्च त्रिदलैः कोमलैः शुभैः।
पूजयित्वा महादेवं सर्वपापैः प्रमुच्यते॥

चन्दनं कुङ्कुमं चैव अक्षतान् धूप-दीपकौ।
समर्प्य पार्वतीशाय लभते परमां गतिम्॥

पञ्चामृतैश्च यो लिङ्गं स्नापयेत् भक्तिभावतः।
तस्य गेहे स्थिरा लक्ष्मीः वर्धते च प्रजासुखम्॥

महामृत्युञ्जयं मन्त्रं यो जपत्यत्र भक्तितः।
तस्य मृत्युभयं नास्ति नीरोगः स च जीवति॥

रुद्राष्टाध्यायिनो मन्त्राः पद्यन्ते श्रावणे तु यैः।
तेषां गृहे सदा वासो भवानी-शङ्करोः ध्रुवम्॥

मङ्गलागौरी-व्रतं कुर्यू नारीणां सौभाग्यवर्धकम्।
अखण्डमङ्गलं तासां पुत्र-पौत्रादि-सम्पदः॥

नागपञ्चमी-दिने यो वै नागानां पूजनं चरेत्।
नागभीतिः न तस्यास्ति कुले तस्य सुखं भवेत्॥

पौर्णमास्यां तु यो धीमान् धारयेत् सूत्रमुत्तमम्।
रक्षासूत्रस्य माहात्म्यात् सर्वबाधा विनश्यति॥

कज्जली-तीज-पूजां च या करोति च कामिनी।
पतिव्रता-गुणाढ्या सा शिवलोकमवाप्नुयात्॥

अन्नदानं जलस्यापि दानं यः कुरुते शशी।
तस्य पुण्यमसंख्यातं लभते नात्र संशयः॥

विषं पीत्वा महादेवे जगद् रक्षितवान् पुरा।
श्रावणे तस्य पूजा हि सन्तापं हरति ध्रुवम्॥

नारायणोऽपि लोकेशः शेते नारायणो हरौ।
शिवः करोति जगतां पालनं श्रावणे विभुः॥

व्रतेनानेन लभ्यन्ते धर्म-कामाः सुखादयः।
अन्ते च लभते मुक्तिं शिवलोके महीयते॥

य इदं पठति स्तोत्रं श्रावणे नियमव्रती।
सर्वान् कामानवाप्नोति शिवभक्तिं च विन्दति॥

श्रावणस्य महात्म्यं तु शंभुना भाषितं पुरा।
इति स्तोत्रं समाप्तं हि शङ्करस्य प्रसाद्जम्॥

सर्वाधिकार सुरक्षित 
खेमेश्वर पुरी गोस्वामी (गृहावधूत)
मुंगेली छत्तीसगढ़,८१२००३२८३४

 सरल हिन्दी अर्थ

श्लोक १: उन भगवान् महेश को नमस्कार है जो भक्तों को वरदान देने वाले हैं, जटाधारी हैं और श्रावण मास के अधिपति देव हैं।
श्लोक २: श्रावण मास अति मङ्गलकारी और समस्त पापों का विनाश करने वाला है। जो इस मास में शिवजी की पूजा में लीन रहते हैं, यह मास उन्हें समस्त सिद्धियाँ प्रदान करता है।
श्लोक ३: श्रावण सभी महीनों में श्रेष्ठ और भगवान् शम्भु का सबसे प्रिय महीना माना गया है। इसमें महेश की पूजा मनुष्यों की सभी मनोकामनाओं को पूरा करती है।
श्लोक ४: जो व्यक्ति श्रावण के सोमवारों में अखण्ड (नियमपूर्वक) शिव व्रत करता है, उससे देवाधिदेव शिव प्रसन्न होकर उसे अपार सुख प्रदान करते हैं।
श्लोक ५: जो श्रावण मास में प्रसन्नतापूर्वक गङ्गाजल से शिवलिङ्ग का अभिषेक करता है, उसके करोडों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक ६: जो सुन्दर, कोमल और तीन पत्तों वाले शुभ बिल्वपत्रों तथा उत्तम पुष्पों से महादेव की पूजा करता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक ७: जो चन्दन, कुङ्कुम, अक्षत (चावल), धूप और दीप अर्पित करके पार्वतीपति शिव की उपासना करता है, वह परम गति (मोक्ष) को प्राप्त करता है।
श्लोक ८: जो भक्तिभाव से पञ्चामृत से शिवलिङ्ग को स्नान कराता है, उसके घर में लक्ष्मी का स्थिर वास होता है और वंश व सन्तान का सुख बढ़ता है।
श्लोक ९: जो इस महीने में भक्तिपूर्वक महामृत्युञ्जय मन्त्र का जप करता है, उसे मृत्यु का भय नहीं रहता और वह निरोगी होकर जीवन जीता है।
श्लोक १०: श्रावण में जिनके द्वारा रुद्राष्टाध्यायी के मन्त्रों का पाठ किया जाता है, उनके घर में भवानी और शङ्कर का सदैव वास रहता है, यह निश्चित है।
श्लोक ११: इस मास में स्त्रियाँ जो मङ्गलागौरी का व्रत करती हैं, वह उनके सौभाग्य को बढ़ाता है। उन्हें अखण्ड सौभाग्य, पुत्र और पौत्र आदि सम्पदाएँ प्राप्त होती हैं।
श्लोक १२: नागपञ्चमी के दिन जो मनुष्य नागों की पूजा करता है, उसे नागभय (सर्पभय) नहीं रहता और उसके कुल में सदा सुख रहता है।
श्लोक १३: श्रावण पूर्णिमा के दिन जो बुद्धिमान मनुष्य उत्तम रक्षासूत्र (रक्षाबन्धन) धारण करता है, उस रक्षासूत्र के प्रभाव से उसकी सभी बाधाएँ दूर हो जाती हैं।
श्लोक १४: जो स्त्री कज्जली तीज की पूजा करती है, वह पतिव्रता गुणों से युक्त होकर अन्त में शिवलोक को प्राप्त करती है।
श्लोक १५: जो मनुष्य इस मास में अन्नदान और जलदान करता है, उसे अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है, इसमें कोई सन्देह नहीं है।
श्लोक १६: प्राचीन काल में महादेव ने विषपान करके सम्पूर्ण संसार की रक्षा की थी; अतः श्रावण में उनकी पूजा करने से हृदय का समस्त सन्ताप दूर हो जाता है।
श्लोक १७: श्रावण के महीने में जब जगत्पति श्रीहरि विष्णु योगनिद्रा में होते हैं, तब सम्पूर्ण जगत् के पालन का दायित्व स्वयं सर्वव्यापी भगवान् शिव सँभालते हैं।
श्लोक १८: श्रावण के इस पवित्र व्रत से धर्म, काम और सुख आदि प्राप्त होते हैं तथा अन्त काल में प्राणी मुक्ति पाकर शिवलोक में पूजित होता है।
श्लोक १९: जो व्यक्ति श्रावण मास में नियम-व्रत का पालन करते हुए इस स्तोत्र का पाठ करता है, वह अपनी सभी मनोकामनाएँ पूरी करता है और शिवभक्ति प्राप्त करता है।
श्लोक २०: श्रावण मास का यह माहात्म्य स्वयं भगवान् शम्भु द्वारा पूर्वकाल में कहा गया था। भगवान् शङ्कर की कृपा से रचित यह स्तोत्र यहाँ पूर्ण होता है।

Friday, July 31, 2026

कागज़ की ही पटरियों पर यह रेल दौड़ती रही

कागज़ की ही पटरियों पर यह रेल दौड़ती रही

कागज़ की ही पटरियों पर यह रेल दौड़ती रही,
पुरानी उस बात को नए लिफाफे में मोड़ती रही।
सात सालों में काम का कोई अता-पता न था,
राजनीति मगर क्रेडिट के तार जोड़ती रही॥
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​फीता वही, कैंची वही, बस नए मंच सजा दिए,
शहर-शहर में ढोल के बाजे फिर से बजा दिए।
जनता समझ रही है इस सियासत की चाल को,
झूठे-सच्चे वादों के जलवे फिर से दिखा दिए॥
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​जिस बात का कलश सात साल पहले चढ़ाया गया,
उसी पुरानी बात पर फिर से फूल बरसाया गया।
ज़मीन पर एक ईंट भी आज तक न लग सकी,
मगर मंच से अपनी पीठ को फिर थपथपाया गया॥

              सर्वाधिकार सुरक्षित 
          ©खेमेश्वर पुरी गोस्वामी®
     मुंगेली, छत्तीसगढ़,८१२००३२८३४

Thursday, July 30, 2026

अंगूठाछाप जो बने हैं, राष्ट्र के विधाता आज

अंगूठाछाप जो बने हैं, राष्ट्र के विधाता आज

कुर्सी पर ऐंठ बैठे, एक ना अक्षर जाने,
कलम न पकड़ी जो, नियम बनाते हैं।
संसद की सभा बीच, जमाकर पाँव बैठे,
विद्या की किताब छोड़, दाँव ही चलाते हैं।
ज्ञान का न लेश मात्र, बनते महान फिर,
देश के नसीब पर, अंगूठा लगाते हैं।
वीर जो ज्ञानी थे वे, मौन साधे खड़े आज,
मूर्ख जन देश के ही, भाग्य को चलाते हैं।

पीएचडी की उपाधि को, हाथ में उठाये घूमें,
कागज़ के टुकड़ों पे, धूल ही जमाते हैं।
योग्य सब नौजवान, दर-दर भटकते हैं,
सूखी एक रोटी को भी, तरस ही जाते हैं।
प्रतिभा का जहाँ कभी, मान-सम्मान होता,
आज वहाँ चाटुकार, बाज़ी मार जाते हैं।
कलम की धार छोड़, माँगते हैं न्याय आज,
देश के ही कर्णधार, आँसू हैं बहाते हैं।

शास्त्रों को पढ़के भी जो, आस लगा बैठे थे जी,
काम नहीं मिलता तो, धैर्य टूट जाता है।
भूख की बुझाने आग, क्या ही उपाय करें,
न्याय जब रूठ जाता, पाप ही सुहाता है।
बाहुबल-छल को ही, राह मान लेते युवा,
अपराध-मार्ग पर, पाँव बढ़ जाता है।
ज्ञान का प्रकाश जहाँ, जगमग होना था जी,
अंधकार का ही राज, वहाँ छा ही जाता है।

जागो हे गुणी जन अब, नींद को त्याग दो सब,
अज्ञानी की सत्ता को, उखाड़ के फेंकिए।
कलम की शक्ति को ही, सिंह-सी दहाड़ बना,
विद्या की विजय ध्वजा, देश में दिखाइए।
अंगूठाछाप जो बने हैं, राष्ट्र के विधाता आज,
ज्ञान के सिंहासन पे, ज्ञानी को बिठाइए।
युवाओं की शक्ति से ही, बदलेगी भाग्य-रेखा,
न्याय का नया ही एक, सूर्य चमकाइए।


सर्वाधिकार सुरक्षित 
खेमेश्वर पुरी गोस्वामी (गृहावधूत)
मुंगेली छत्तीसगढ़,८१२००३२८३४

श्री रावण माहात्म्य स्तोत्रम

:- श्रीरावणमाहात्म्यस्तोत्रम् -: ब्रह्मवंशसमुद्भूतो विश्रवस्तनयो बली । पुलस्त्यपौत्रो धीमान् स दशग्रीवो महायशाः ॥ १ ॥ वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञो न...