Friday, February 13, 2026

अमर बलिदान को नमन

॥ अमर बलिदान को नमन ॥

मातृ-सेवा हित जिये, राष्ट्र-प्रेम रंग रँगे,
प्राणों की समिधा देके, अमर वो हो गए।

वीरता की गाथा लिख, गगन को चूम लिया,
भारत के मान हेतु, चंदन से सो गए।।

पर्वत सा साहस था, सिंधु सा विशाल हृदय,
कर्तव्य की राह पर, पुष्प बन खो गए।

याद रखेगा जहाँ, उनकी शहादत को,
अमर तिरंगे बीच, ज्योति बन बो गए।।

          © खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
    मुंगेली, छत्तीसगढ़ ८१२००३२८३४

Monday, February 9, 2026

वर्तमान का कर्ण : युवा पीढ़ी

॥ वर्तमान का कर्ण : युवा पीढ़ी ॥

डिग्रियां हाथ लिए, द्वारे-द्वारे भटकता,
योग्यताओं का पिटारा, मौन खड़ा आज है।

पूँजीवाद चकाचौंध, घेरे खड़ी चारों ओर,
व्यथा वीर प्रतिभा की, सुनता समाज है॥

आरक्षण भँवर में, फँसा आज का ये कर्ण,
राजनीति की मार से, घायल ये मन है।

आँखों में सजे हैं स्वप्न, सेज संघर्षों की सजी,
तपते हुए पथों पे, झुलसता तन है॥

कुसंगति हाथ थाम, दुर्योधन मोह फँसे,
खोया निज मान-ज्ञान, कैसा ये विन्यास है।

नशे की हैं बेड़ियाँ ये, जकड़े हैं हाथ-पाँव,
मरे अरमान आज, बुझती सी प्यास है॥

उठो आधुनिक कर्ण, त्यागो मोह-जाल सब,
श्रम का चढ़ाओ चाप, भाग्य खुद गढ़ना।

बाधा छल-तंत्र वाली, रोक न सकेगी राह,
धर्म रूपी कर्म पथ, निरंतर बढ़ना॥

हृदय दुर्बलता को, त्याग कर आज खड़ा,
आत्म-बोध की मशाल, हाथ में जलाए जा।

अंगराज का साहस, रगों में प्रवाहित हो,
बाधाओं के पर्वतों को, धूल में मिलाए जा॥

कवच है तेरा श्रम, कुंडल आत्मविश्वास,
लक्ष्य की ही आँख देख, बाण को चलाए जा।

हार को स्वीकार नहीं, वीर है तू रण का रे,
विजय की गाथा यहाँ, जग को सुनाए जा॥


       © खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
   मुंगेली, छत्तीसगढ़ ८१२००३२८३४

Friday, February 6, 2026

सच्चे पत्रकार वही, लोकतंत्र की बाड़ हैं

जो सच को बेचकर के, मखमली बिस्तर बनाते हैं,
वो सत्ता के गलियारों में, जी-हुज़ूरी गुनगुनाते हैं।
कलम को गिरवी रख जो, नोट के तलवे चाटते हैं,
वो पत्रकार नहीं साहब, बस जूठन पे मुस्कुराते हैं।।

कलम को बेच खाया, ईमान को गँवा दिया,
सिक्कों की खनक पे जो, कमर मटकाते हैं।

अत्याचार देख जो तो, पट्टी बाँध आँखों बीच,
सत्ता की हवेली जाके, सोहर सुनाते हैं।।

चीखें अनसुनी करें, चाशनी में डूबे रहें,
झूठ के ही जाल बुन, जाल फैलाते हैं।

जनता की पीर तज, तलवे जो चाट रहे,
कलम के नाम पे वे, कलंक कहलाते हैं।।

सत्य की मशाल ले के, जुल्म से जो भिड़ जाते,
कायर न होते वे तो, शेर की दहाड़ हैं।

सत्ता के गलियारों में, शीश न झुकाते कभी,
दुखियों के दर्द वाली, ऊँची सी पुकार हैं।।

चाटुकार जो बने हैं, सिक्कों पे जो नाचते हैं,
कलम की साख पे वे, लगा रहे राड़ हैं।

बिकती न रूह जिनकी, झुकती न देह कभी,
सच्चे पत्रकार वही, लोकतंत्र की बाड़ हैं।।


           © खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
         मुंगेली,छ.ग. - 8120032834

Monday, February 2, 2026

कानून बनाने वाले : बस शोर ही मचाते हैं

सेल्फी खिंचवाते रहे, रिबन कटवाते रहे,
मुख्य अतिथि बन, मंच चमकाते हैं।

क्षेत्र में न दिखें कभी, दिल्ली में विलासी बनें,
जनता की भीड़ देख, हाथ को हिलाते हैं।।

लव और जिहाद रुका, न ही धर्मांतरण,
गौ-रक्षा हेतु मौन, शब्द न उगाते हैं।

मेज़ थपथपाने वाले, कानून बनाने वाले,
कानून न बना के, बस शोर ही मचाते हैं।।


            © खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
        मुंगेली, छत्तीसगढ़,8120032834

Sunday, February 1, 2026

बिरसा के वंशज उठो अब, गौरव गान सुनाना है।

मुक्तक : धरा की आन बचाने को, नया इतिहास लिखा था,
मिटाने दमन के साये, लहू से खास लिखा था।
जिन्हें 'धरती पिता' कहकर, ज़माना आज पूजता है,
उसी बिरसा ने जंगल में, विजय-विश्वास लिखा था।

चारों ओर कुहासा छाया, छद्म वेश का डेरा है,
भोली-भाली पावन धरती, को लालच ने घेरा है।
कोई बांटे नोट, कोई बस धर्म बदलने आया है,
अपनी ही जड़ों को काटने, ज़हरीला भ्रम छाया है।
पुरखों की मर्यादा का नित, हरण दिखाई देता है,
अपनों के ही हाथों अपना, मरण दिखाई देता है।
मौनव्रती बनकर रहने से, अधिकार नहीं मिल सकता,
झूठे वादों के पीछे अब, उजियार नहीं मिल सकता।

आत्मबोध की अलख जगाकर, नया सवेरा लाना है,
बिरसा के वंशज उठो अब, गौरव गान सुनाना है। (1)

मुक्तक : हुकूमत काँप उठती थी, गरजती जब कमानें थीं,
वो रॉबिनहुड था माटी का, जिसे रटती ज़बानें थीं।
नमन टंट्या को जो भूखों, की ख़ातिर लड़ गया सबसे,
उसी के शौर्य की गवाह, निमाड़ की सब ढलानें थीं।

सीधी-सादी बातों में अब, तुम मत फँसना भाइयों,
तोड़ रहे जो मेल-जोल, उन पर मत हँसना भाइयों।
नेता आते पाँच साल में, झूठे वादे करते हैं,
मंचों पर वो ऊँची-ऊँची, फर्जी बातें करते हैं।
मजहब के जो ठेकेदार हैं, घर में आग लगाते हैं,
संस्कृति को मिटाने खातिर, नया पाठ पढ़ाते हैं।
घात लगाये बैठे तुम पर, चौकन्ने मक्कार सभी,
अभी नहीं यदि जागे तुम तो, खो दोगे अधिकार सभी।

सत्य मार्ग को चुनकर तुमको, नई इबारत लिखना है,
टंट्या के वंशज उठो अब, जग को राह दिखाना है। (2)

मुक्तक : प्रथम हुंकार माटी की, उसी के तीर से निकली,
अटल आज़ादी की ज्वाला, उसी के वीर से निकली।
गिराया क्लीवलैंड को, झुकाया ज़ुल्म का परचम,
वो बाबा तिलका की हस्ती, बड़ी तक़दीर से निकली।


जल-जंगल-ज़मीन तुम्हारी, पुरखों की थाती है,
इस मिट्टी की रक्षा करना, जिम्मेदारी आती है।
केवल तीर-कमान नहीं, अब कलम भी उठाना सीखो तुम,
दुनिया की चालाकी को अब, पढ़ना-लिखना सीखो तुम।
बनो शांति के पथगामी, पर क्रांति पुत्र भी बने रहो,
अनाचार के सम्मुख हर क्षण, सीना ताने तने रहो।
शिक्षा के उजियारे से ही, स्वाभिमान बच पाएगा,
वैचारिक संग्राम लड़ोगे, तभी मान बच पाएगा।

ज्ञान-शक्ति को पाकर तुमको, अपना भाग्य बनाना है,
तिलका के वंशज उठो अब, स्वाभिमान चमकाना है। (3)

उठाकर 'हूल' का नारा, फिरंगियों को हिला डाला,
वो दो भाई जिन्होंने, सुलगता इक दिया पाला।
लड़े सिद्धू और कान्हू, कि अपना राज कायम हो,
मिटाया अपनी हिम्मत से, गुलामी का वो हर जाला।

मत भूलो तुम मान-मर्यादा, और अपनी पहचान को,
मत बदलो तुम स्वार्थ में आकर, पूर्वज के सम्मान को।
शोषण का प्रतिकार करो तुम, कर्म से अपने मत भागो,
आलस की चादर को त्यागो, कल्पित निद्रा से जागो।
अधिकार छीनना सीखो अब तुम, भीख किसी से मत माँगो,
वक्त आ गया है अब वीरों, धर्म-युद्ध में तुम जागो।
सत्य मार्ग पर चल कर अपनी, मंज़िल पाना सीखो तुम,
अधर्म की हर साज़िश को अब, धूल चटाना सीखो तुम।

शौर्य-बीज बोकर मिट्टी में, नन्दन वन मुस्काना है,
सिद्धू-कान्हू के वंशज उठो अब, नव-इतिहास रचाना है। (4)

Tuesday, January 27, 2026

छद्म सेवक

कुर्सी की हवस पाल, सेवक कहावत हैं,
भीतर कसाई रूप, बाहर सुजान हैं।

देश बेंच खात आज, गोदी में उघोगपति,
कर्ज के कुचक्र माहि, फँसा हिन्दुस्तान है।।

बिकती दवाइयाँ हैं, बिकती पढ़ाई यहाँ,
लूट के बाजार बीच, आम इंसान है।

महल चुनावी खड़े, नोटों की चिनाई होय,
झोपड़ी के भाग माहि, सूना खलिहान है।।

डिग्री की गठरी ले, डोलत सड़न माँहि,
मॉकरी करत नेता, डंडा ही विधान है।

संसद में गाली-गलौज, भ्रष्टाचार की मौज,
कैसा यह लोकतंत्र, कैसा संविधान है?

        © खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
        मुंगेली, छत्तीसगढ़, भारतवर्ष
             मो. ८१२००३२८३४

प्राण हो शरीर में तो, स्वाभिमान पुष्ट रखो

न झुक कर तुम कभी जीना, विजय का गान होने दो,
अँधेरों के विरुद्ध अब फिर, प्रखर उत्थान होने दो।
न बहना धार के संग तुम, नियति यह है नहीं अपनी,
लहर के बीच पौरुष का, सदा सम्मान होने दो।।

कायर जो होते वही, धारा संग बहते हैं,
मरी मछली की भाँति, नियति को सहते।

पौरुष न जिनमें है, मौन मुख धारण कर,
अन्याय की मार को भी, अपना ही कहते।।
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वीर वो कहाते जग, साहस दिखाते जो ही,
विपरीत लहरों में, जो कि सदा रहते।

सत्य की मशाल ले के, पथ पर बढ़ते सदा,
पाप के पहाड़ देख, कभी ना जो ढहते।।
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जीवित हो अगर तुम, चेतना जगाओ अब,
गलत का विरोध करो, वीर भाव गहते।

मौन जो रहेगा आज, काल उसे खाएगा ही,
क्रांति के स्वर ही यहाँ, युगों-युगों बहते।।
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बाधाओं को चीर कर, मार्ग जो बनाते वीर,
शौर्य की कहानी वही, दुनिया को कहते।

सोए हुए सोयेंगे ही, भाग्य के भरोसे बैठ,
जागे हुए योद्धा सदा, समर में दहते।।
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प्राण हो शरीर में तो, स्वाभिमान पुष्ट रखो,
जुल्म के आगे जो कभी, घुटने न टेकते।

जीवित की संज्ञा वही, पाता है जहाँ में यहाँ,
अन्याय के विरुद्ध जो ही, ज्वाला बन बहते।।
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            © खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
             मुंगेली,छत्तीसगढ़,भारतवर्ष 
             मोबाइल : 8120032834

अमर बलिदान को नमन

॥ अमर बलिदान को नमन ॥ मातृ-सेवा हित जिये, राष्ट्र-प्रेम रंग रँगे, प्राणों की समिधा देके, अमर वो हो गए। वीरता की गाथा लिख, गगन को चूम लिया, भ...