Friday, February 6, 2026

सच्चे पत्रकार वही, लोकतंत्र की बाड़ हैं

जो सच को बेचकर के, मखमली बिस्तर बनाते हैं,
वो सत्ता के गलियारों में, जी-हुज़ूरी गुनगुनाते हैं।
कलम को गिरवी रख जो, नोट के तलवे चाटते हैं,
वो पत्रकार नहीं साहब, बस जूठन पे मुस्कुराते हैं।।

कलम को बेच खाया, ईमान को गँवा दिया,
सिक्कों की खनक पे जो, कमर मटकाते हैं।

अत्याचार देख जो तो, पट्टी बाँध आँखों बीच,
सत्ता की हवेली जाके, सोहर सुनाते हैं।।

चीखें अनसुनी करें, चाशनी में डूबे रहें,
झूठ के ही जाल बुन, जाल फैलाते हैं।

जनता की पीर तज, तलवे जो चाट रहे,
कलम के नाम पे वे, कलंक कहलाते हैं।।

सत्य की मशाल ले के, जुल्म से जो भिड़ जाते,
कायर न होते वे तो, शेर की दहाड़ हैं।

सत्ता के गलियारों में, शीश न झुकाते कभी,
दुखियों के दर्द वाली, ऊँची सी पुकार हैं।।

चाटुकार जो बने हैं, सिक्कों पे जो नाचते हैं,
कलम की साख पे वे, लगा रहे राड़ हैं।

बिकती न रूह जिनकी, झुकती न देह कभी,
सच्चे पत्रकार वही, लोकतंत्र की बाड़ हैं।।


           © खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
         मुंगेली,छ.ग. - 8120032834

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