Saturday, February 14, 2026

शिव तांडव - शिव स्तुति : अनुवादित रचना - गृहावधूत खेमेश्वर पुरी

॥॥ श्री शिव स्तुति : अनुवादित रचना॥॥
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जटा-जाल बीच खेलैं, देवनदी गंग-धार,
गले बीच सोहै हार, नाग विकराल है।

डम-डम डम-डम, डमरू की गूँज उठै,
चण्ड ताण्डव को ठानैं, शिव महाकाल है ॥१॥


जटा के कटाह बीच, गंगा लहरैयाँ लेत,
मस्तक पै चन्द्र सोहै, मन्द मुसकाय है।

धक्-धक् धक्-धक्, अग्नि भाल बीच जरै,
ऐसो रूप महादेव, मन को लुभाय है ॥२॥

गिरिराज-नन्दिनी के, सुख के निधान शिव,
कृपा की कटाक्ष-धार, मेटैं सब पीर को।

अम्बर ही चीर निज, मन में प्रमोद भरैं,
भजौं विश्वनाथ देव, तजौं भव-भीर को ॥३॥

फण की मणिन आभा, दिशा-मुख लाल करें,
कुंकुम की धार जैसे, अंग पै अनूप है।

गज-चर्म ओढ़ैं प्रभु, मद से भरे जो सदा,
भूतनाथ शिव जी को, अचरज रूप है ॥४॥

इन्द्र आदि देव-वृन्द, झुकावें जो शीश सदा,
चरणों की धूलि पावन, मस्तक पे सोहती।

नागराज हार बाँधे, जटा-जूट पे बिराजैं,
चन्द्र की चकोर-कला, सबके मन मोहती ॥५॥

भाल-पट्ट बीच जरै, अग्नि की प्रचण्ड धार,
काम-देव भस्म कियो, जाकी तेज-जाल ने।

इन्द्र हूँ नमावैं शीश, सिद्ध मुनि नमन करें,
सुधा-धार धारी शीश, जटा के गुलाल ने ॥६॥

धग-धग धग-धग, अग्नि भाल पे धधकै,
आहुति बनी है काम, मदन के बाण की।

पार्वती के कुच-अग्र, चित्र-कला रचने में,
कुशल जो शिल्पी शिव, शोभा उन प्राण की ॥७॥

नवीन जो मेघ-माला, श्याम कण्ठ बीच बसै,
अमावस रात जैसी, काली छटा छाई है।

गंगा-धर गजासुर, मारि के जो शान्त भये,
जग के अधार शिव, शोभा सुखदाई है ॥८॥

नील-पद्म पुंज सम, कण्ठ की सु-आभा फैलै,
काम और त्रिपुरा के, जो विनाशी देव हैं।

दक्ष-यज्ञ नाश कियो, अन्तक को मारि दीन्हो,
भजौं भव-भय-हारी, जो अखण्ड देव हैं ॥९॥

मंगला की सर्व-कला, मंजरी के रस-सिक्त,
भँवरे समान शिव, रस-पान ठाने हैं।

यमराज-काल और, काम-देव-हारी विभु,
अन्तक के अन्तक को, जग ने बखाने हैं ॥१०॥

फुँकारत नाग-राज, भाल-अग्नि को जगावैं,
धीमि-धीमि मृदंग की, बाज रही ताल है।

प्रचण्ड जो ताण्डव को, करत जो शम्भु आज,
मंगल ही मंगल को, करत कपाल है ॥११॥

सर्प-हार रत्न-माला, मिट्टी और स्वर्ण-टूक,
शत्रु-मित्र तृण-चक्षु, एक सम मानहीं।

प्रजा और चक्रवर्ती, सम-दृष्टि राखें सदा,
कदा भजौं सदाशिव, जो भेद न जानहीं ॥१२॥

गंग-तट कुंज-बीच, वास मैं करूँगो कब,
हाथ जोड़ि शीश-पर, मन्त्र शिव गावहूँ।

चंचल जो नैन त्यागि, भाल-चन्द्र ध्यान धरि,
परम सुखी मैं होइ, शिव-पद पावहूँ ॥१३॥

नित्य जो पढे़गा नर, स्तोत्र सुख-कारी यह,
शुद्धि पावै तन-मन, शिव-भक्ति पायगा।

मोह-जाल काटि प्रभु, मुक्ति के प्रदाता सदा,
शम्भु की शरण जाइ, परम गति पायगा ॥॥


           © खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
      मुंगेली, छत्तीसगढ़ - ८१२००३२८३४


महाशिवरात्रि महापर्व पर विशेष हार्दिक शुभकामनाएं,सादर ॐ नमो नारायण 🚩हर हर महादेव,जय सनातन 🚩

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