Saturday, February 14, 2026

शिव वंदना

         ॥ शिव-स्तुति ॥

जटाजूट सघन में, सोहै गंगधार शुभ,
गले बिराजै भुजंग, हार जो विकराल है

डम-डम डमरू की, गूँज उठै दशों दिश,
ताण्डव रचत शिव, नाम महाकाल है॥



भाल बाल-चन्द्र सोहै, मन्द-मन्द मुसक्याँहि,
तीजी आँख बीच जागै, अग्नि की कराल है।

लहरें अपार उठैं, पावन सुरसरी बीच,
काटत हैं काल शिव, रूप अ्ति-विशाल है॥


हिमालय-लाड़ली को, मन जो सदैव मोहैं,
करुणा की धार बहै, मेटैं पीर-जाल है।

सोहैं दिगम्बर वेश, ओढ़ें गज-खाल भारी,
भजौं भव्-भीरु भंजन, नटराज-हाल है॥

नीलकण्ठ विषधारी, कामदेव के विनाशी,
त्रिपुर के नाशक जो, जग के अधार है।

धूल और रत्न माहिं, राखत जो सम-दृष्टि,
मुक्ति के प्रदाता शिव, करत उद्धार है॥


          © खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
      मुंगेली छत्तीसगढ़,८१२००३२८३४

No comments:

Post a Comment

शिव वंदना

         ॥ शिव-स्तुति ॥ जटाजूट सघन में, सोहै गंगधार शुभ, गले बिराजै भुजंग, हार जो विकराल है डम-डम डमरू की, गूँज उठै दशों दिश, ताण्डव रचत शिव...