डिग्रियां हाथ लिए, द्वारे-द्वारे भटकता,
योग्यताओं का पिटारा, मौन खड़ा आज है।
पूँजीवाद चकाचौंध, घेरे खड़ी चारों ओर,
व्यथा वीर प्रतिभा की, सुनता समाज है॥
आरक्षण भँवर में, फँसा आज का ये कर्ण,
राजनीति की मार से, घायल ये मन है।
आँखों में सजे हैं स्वप्न, सेज संघर्षों की सजी,
तपते हुए पथों पे, झुलसता तन है॥
कुसंगति हाथ थाम, दुर्योधन मोह फँसे,
खोया निज मान-ज्ञान, कैसा ये विन्यास है।
नशे की हैं बेड़ियाँ ये, जकड़े हैं हाथ-पाँव,
मरे अरमान आज, बुझती सी प्यास है॥
उठो आधुनिक कर्ण, त्यागो मोह-जाल सब,
श्रम का चढ़ाओ चाप, भाग्य खुद गढ़ना।
बाधा छल-तंत्र वाली, रोक न सकेगी राह,
धर्म रूपी कर्म पथ, निरंतर बढ़ना॥
हृदय दुर्बलता को, त्याग कर आज खड़ा,
आत्म-बोध की मशाल, हाथ में जलाए जा।
अंगराज का साहस, रगों में प्रवाहित हो,
बाधाओं के पर्वतों को, धूल में मिलाए जा॥
कवच है तेरा श्रम, कुंडल आत्मविश्वास,
लक्ष्य की ही आँख देख, बाण को चलाए जा।
हार को स्वीकार नहीं, वीर है तू रण का रे,
विजय की गाथा यहाँ, जग को सुनाए जा॥
© खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
मुंगेली, छत्तीसगढ़ ८१२००३२८३४
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