गरजा वह वन-सिंह सरीखा, सागर पार शिकागो में,
दहल उठे सब दिग्गज ज्ञानी, उस युवक के नारों में।
नहीं हाथ में अस्त्र-शस्त्र थे, न सेना का घेरा था,
पर उस गेरुए के भीतर, सूरज का सा सवेरा था॥
जब गूँजी वह कड़क स्वरूपी, "भाइयों और बहनों" की वाणी,
थम गई विश्व की धड़कन सारी, जैसे थम जाता तूफ़ानी।
हिला दिया पाश्चात्य दंभ को, पल भर की हुंकार में,
हिंदू धर्म का ध्वज गाड़ दिया, सात समंदर पार में॥
"कायरता ही मृत्यु है" - उसने रणभेरी फूँकी थी,
सोए हुए इस आर्यावर्त की, तकदीर उसने लिखी थी।
दुर्बलता को त्याग बना दो, वज्र जैसी अपनी देह,
शक्ति ही है धर्म जगत में, शक्ति ही है पुण्य-गेह॥
बाधाओं के पर्वत को जिसने, चरणों से कुचल दिया,
युगों-युगों की जड़ता को, पुरुषार्थ में बदल दिया।
वह सन्यासी नहीं मात्र, वह तो क्रांति का शोला था,
दहक उठा जो राष्ट्र-प्रेम में, साक्षात् महाकाल बोला था॥
उठो जवानों! गुरु-मंत्र यह, रगो-रगों में भर लो तुम,
विवेकानंद की ज्वाला बनकर, विश्व-विजय अब कर लो तुम।
मृत्यु डरे जिस वीर पुरुष से, वैसा तुम अवतार बनो,
भारत माता की रक्षा को, तुम तीखी तलवार बनो॥
।। स्वामी विवेकानंद पुरी जी महाराज की जय ।।
© खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
गृहावधुत छत्तीसगढ़
मो. 8120032834
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