खुली जो आँख तो न वो था न वो ज़माना था,
बस दहकती आग थी तन्हाई थी फ़साना था,
क्या हुआ जो चंद ही क़दमों पे थक के बैठ गए,
तुम्हें तो साथ मेरा अभी दूर तक निभाना था...!!
सेल्फी खिंचवाते रहे, रिबन कटवाते रहे, मुख्य अतिथि बन, मंच चमकाते हैं। क्षेत्र में न दिखें कभी, दिल्ली में विलासी बनें, जनता की भीड़ देख, हाथ ...
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