खुली जो आँख तो न वो था न वो ज़माना था,
बस दहकती आग थी तन्हाई थी फ़साना था,
क्या हुआ जो चंद ही क़दमों पे थक के बैठ गए,
तुम्हें तो साथ मेरा अभी दूर तक निभाना था...!!
॥ भगवती सरस्वती वंदना ॥ श्वेत पदमासना माँ, ज्ञान की प्रकाश पुंज, वीणा कर सोहै शुभ, रागिनी रसाल है। हंस की सवारी साजे, मंद-मंद मुसक्याँहि, वा...
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