*छत्तीसगढ़ : 25 वर्षों की विकास गाथा और रजत जयंती का संकल्प*
25 वर्षों का गौरव और पहचान.
1 नवंबर, 2000 को 'दक्षिण कोसल' की प्राचीन पहचान को एक आधुनिक राज्य 'छत्तीसगढ़' के रूप में नया जन्म मिला। अपनी रजत जयंती के उपलक्ष्य में, यह राज्य 25 वर्षों की उस संघर्षपूर्ण और गौरवशाली विकास यात्रा का अवलोकन कर रहा है, जिसने इसे प्राकृतिक संपदा के भंडार से एक आत्म-निर्भर और सांस्कृतिक रूप से जागरूक इकाई में बदल दिया है।
1 नवंबर, 2000 को छत्तीसगढ़ राज्य का गठन भारतीय इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना थी। यह केवल प्रशासनिक सीमाओं का पुनर्गठन नहीं था, बल्कि यहाँ की विशिष्ट आदिवासी संस्कृति, समृद्ध प्राकृतिक संसाधनों और दशकों पुरानी पृथक राज्य की माँग का साकार होना था। राज्य निर्माण के बाद, नवगठित सरकारों के समक्ष एक दोहरी चुनौती थी: पिछड़ापन दूर कर तीव्र विकास करना और साथ ही ‘गढ़ों’ की इस भूमि की सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक समरसता को अक्षुण्ण बनाए रखना। पिछले ढाई दशकों में, विभिन्न सरकारों ने अपने-अपने दृष्टिकोण से इस विकास यात्रा को दिशा दी है।
*1. इतिहास, राजवंश और पुरातात्विक विरासत*
छत्तीसगढ़ का इतिहास अत्यंत प्राचीन है, जो इसे भारत के समृद्ध सांस्कृतिक मानचित्र पर एक विशिष्ट स्थान दिलाता है।
• पौराणिक पृष्ठभूमि: यह क्षेत्र रामायण काल में 'दक्षिण कोसल' के नाम से जाना जाता था और यहाँ की राजधानी श्रावस्ती थी। पौराणिक मान्यता के अनुसार, भगवान राम की माता कौशल्या इसी क्षेत्र की थीं।
• प्रमुख राजवंश: शरभपुरीय एवं नल वंश: आरंभिक काल में, बस्तर क्षेत्र पर नल वंश और मैदानी भागों में शरभपुरीय राजवंशों का शासन रहा, जिनके सिक्कों और अभिलेखों से क्षेत्र की प्राचीन समृद्धि का पता चलता है। कलचुरी राजवंश: लगभग 10वीं शताब्दी से लेकर 18वीं शताब्दी तक, कलचुरी वंश ने रतनपुर को अपनी राजधानी बनाकर पूरे छत्तीसगढ़ पर शासन किया। उन्होंने ही 'छत्तीसगढ़' नाम को लोकप्रिय बनाया। कलचुरियों के शासनकाल को कला, संस्कृति और प्रशासनिक स्थिरता का स्वर्ण युग माना जाता है।
• पुरातात्विक स्थल: राज्य में सिरपुर (बौद्ध, शैव और वैष्णव धर्मों का संगम स्थल), मल्हार, ताला , भोरमदेव, रतनपुर,खरौद और बारसूर जैसे महत्वपूर्ण पुरातात्विक केंद्र हैं, जो यह दर्शाते हैं कि यह क्षेत्र प्राचीन काल से ही ज्ञान और कला का केंद्र रहा है।
*2. समृद्ध संपदा: अर्थव्यवस्था का आधार*
छत्तीसगढ़ भारत के उन कुछ राज्यों में से है जिनकी पहचान ही उसकी प्राकृतिक संपदा से है।
• खनिज शक्ति का विस्तार: यह राज्य कोयला, लौह अयस्क (बैलाडीला की उच्च गुणवत्ता का लौह अयस्क), बॉक्साइट और टिन का प्रमुख उत्पादक है। 25 वर्षों में, राज्य ने अपनी खनिज रॉयल्टी और राजस्व संग्रहण को सुदृढ़ किया है। यह राजस्व, जो कभी केंद्र पर निर्भरता का कारण था, अब राज्य की जनकल्याणकारी योजनाओं और औद्योगिक विकास की रीढ़ बन गया है। छत्तीसगढ़ को देश का 'स्टील हब' और 'पावर हब' कहा जाता है।
• वनोपज आधारित आजीविका: राज्य का लगभग 44% भूभाग वनाच्छादित है। यहाँ तेंदूपत्ता, साल और सागौन जैसी मूल्यवान वनोपज मिलती है। राज्य ने लघु वनोपज (Minor Forest Produce) की खरीद और प्रसंस्करण को संस्थागत रूप दिया है। न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर 60 से अधिक वनोपज खरीदने वाला यह देश का अग्रणी राज्य है, जिसने वनवासी समुदायों की आय और आत्मनिर्भरता में क्रांति ला दी है।
*3. कृषि: 'धान का कटोरा' से मिलेट क्रांति तक*
छत्तीसगढ़ की आत्मा कृषि में बसती है, और इसकी पहचान 'धान का कटोरा' है।
• जल संसाधन विकास: राज्य निर्माण के बाद सिंचाई सुविधाओं के विस्तार पर जोर दिया गया, जिससे धान की पैदावार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। किसान-केंद्रित नीतियों, विशेष रूप से धान पर दिए जाने वाले समर्थन मूल्य और बोनस ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को अभूतपूर्व मजबूती दी है।
• कृषि विविधीकरण की गहराई: पिछले कुछ वर्षों में, धान की एकल फसल पर निर्भरता कम करने के लिए कृषि विविधीकरण को एक मिशन के रूप में लिया गया है। 'मिलेट मिशन' के तहत कोदो, कुटकी, रागी जैसे पारंपरिक और पौष्टिक अनाजों के उत्पादन, प्रसंस्करण और विपणन को बढ़ावा दिया गया है। यह पहल न केवल किसानों की आय बढ़ा रही है, बल्कि राज्य को पोषण सुरक्षा के क्षेत्र में भी एक मॉडल बना रही है।
*4. विकास बनाम चुनौती*
राज्य की 25 वर्ष की यात्रा में कानून व्यवस्था का सबसे जटिल पहलू नक्सलवाद (माओवाद) की चुनौती रही है, जिस पर एक बहुआयामी रणनीति अपनाई गई है।
• समन्वित रणनीति (सुरक्षा-विकास समन्वय): राज्य ने केवल सैन्य समाधान पर निर्भर न रहते हुए, विकास, सुरक्षा और पुनर्वास की समन्वित रणनीति अपनाई। दुर्गम क्षेत्रों में फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस (FOBs) स्थापित किए गए, जिससे सुरक्षा बलों की उपस्थिति कोर क्षेत्रों तक बढ़ी। इन कैंपों के माध्यम से सड़कों, पुलिया, स्कूल और संचार नेटवर्क (मोबाइल टावर) जैसे विकास कार्य सुनिश्चित किए गए।
• नक्सल उन्मूलन की प्रगति: विगत वर्षों में, नक्सल प्रभावित क्षेत्रों का भौगोलिक दायरा काफी सीमित हुआ है। प्रमुख सफलता यह रही है कि कई अति-संवेदनशील इलाकों में पहली बार प्रशासनिक और पुलिस नियंत्रण स्थापित हुआ है। आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति को मजबूत किया गया है ताकि भटके हुए युवा मुख्यधारा में लौट सकें, जिससे सामाजिक शांति की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया गया है।
• सामान्य क्षेत्रों में पुलिसिंग: सामान्य क्षेत्रों में त्वरित न्याय और अपराध नियंत्रण के लिए सामुदायिक पुलिसिंग और तकनीक (जैसे सीसीटीवी निगरानी और साइबर सेल) का उपयोग बढ़ाया गया है।
*5. आर्थिक नियोजन और अधोसंरचना: बजट और सड़कों का जाल*
छत्तीसगढ़ ने 25 वर्षों में अपनी आर्थिक नींव को मजबूत किया है और तेजी से इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास किया है।
• राज्य बजट की प्राथमिकताएँ: गठन के बाद, राज्य को राजस्व घाटे की चुनौती का सामना करना पड़ा, लेकिन खनिज राजस्व के कुशल प्रबंधन और राजकोषीय अनुशासन से राज्य की वित्तीय स्थिति मजबूत हुई। राज्य के बजट की मुख्य प्राथमिकता मानव विकास सूचकांक (HDI) में सुधार रही है, जिसमें स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा पर उच्च व्यय शामिल है। कल्याणकारी योजनाओं और कृषि ऋण माफी जैसी पहलों के माध्यम से ग्रामीण क्रय शक्ति को बढ़ावा दिया गया है।
• फैली सड़कों का जाल (कनेक्टिविटी क्रांति): राज्य के विकास की गति को सड़कों के जाल ने अभूतपूर्व बल दिया है। ग्रामीण सड़कें: प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) और मुख्यमंत्री ग्राम सड़क योजना (CMGSY) के तहत वनांचल क्षेत्रों तक सड़कों की पहुंच सुनिश्चित की गई है, जिससे किसानों को अपनी उपज मंडियों तक ले जाने में आसानी हुई है। राष्ट्रीय राजमार्ग और आर्थिक गलियारे: राज्य से गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्गों का चौड़ीकरण और नए आर्थिक गलियारों (Economic Corridors) का विकास औद्योगिक गतिविधियों को बढ़ावा दे रहा है। बस्तर कनेक्टिविटी: बस्तर जैसे अति-दुर्गम क्षेत्रों में सड़कों और पुलों का निर्माण, नक्सल चुनौती के बावजूद, स्थानीय लोगों को प्रशासनिक और स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ने का सबसे बड़ा माध्यम बना है।
*6. राजनीतिक एवं प्रशासनिक पुनर्गठन: लोकतंत्र की नई पहचान*
बीते 25 वर्षों में, छत्तीसगढ़ ने अपने शासन और प्रशासन की संरचना को मजबूत करने के लिए कई दूरगामी कदम उठाए हैं।
• छत्तीसगढ़ का शासन प्रणाली सुशासन (Good Governance), सामाजिक न्याय और हाशिए पर पड़े समुदायों (विशेषकर अनुसूचित जनजाति) के सशक्तीकरण पर केंद्रित रही है। राज्य ने अपनी पहचान एक स्थिर राजनीतिक इकाई के रूप में बनाई है, जहाँ लोक कल्याण और समावेशी विकास मुख्य प्राथमिकता है।
• नए विधानसभा भवन का महत्व: रायपुर के नया रायपुर क्षेत्र में एक नए और आधुनिक विधानसभा भवन का निर्माण राज्य के लोकतांत्रिक मूल्यों की मजबूती और भविष्य की आकांक्षाओं का प्रतीक है। यह भवन न केवल राज्य के शासन केंद्र के रूप में कार्य करेगा, बल्कि छत्तीसगढ़ की कला, संस्कृति और स्थापत्य कला को भी प्रदर्शित करेगा।
• नए जिलों का निर्माण: सुदूर और दुर्गम क्षेत्रों तक प्रशासनिक पहुंच और विकास की गति तेज करने के लिए, राज्य ने पिछले कुछ वर्षों में कई नए जिलों और तहसीलों का निर्माण किया है। छोटे प्रशासनिक इकाइयों का गठन नागरिकों के लिए सरकारी सेवाओं को सुलभ बनाता है, जिससे विकेंद्रीकरण (Decentralization) और त्वरित विकास सुनिश्चित होता है।
*7. शिक्षा में क्रांति: ज्ञान की नई रौशनी*
राज्य निर्माण के समय आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा का बुनियादी ढांचा बेहद कमजोर था। पिछले 25 वर्षों में शिक्षा के क्षेत्र में क्रन्तिकारी बदलाव आए हैं।
• स्वामी आत्मानंद स्कूल योजना: यह राज्य में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की दिशा में सबसे बड़ा कदम है। सरकारी स्कूलों को उच्च मानकों के साथ हिंदी और अंग्रेजी दोनों माध्यमों में उत्कृष्ट शिक्षा केंद्रों के रूप में विकसित किया गया है।
• उच्च शिक्षा का विस्तार: रायपुर में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) और राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (NIT) की स्थापना के साथ-साथ कई नए मेडिकल कॉलेज और विश्वविद्यालय खोले गए हैं। इससे स्थानीय छात्रों को राज्य के भीतर ही गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिला है।
• डिजिटल पहल: दूरस्थ और वनांचल क्षेत्रों में ई-कंटेंट, वर्चुअल क्लासरूम और शिक्षा सारथी जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से शिक्षा की पहुंच सुनिश्चित की जा रही है, जिससे 'ज्ञान की खाई' को पाटने में मदद मिली है।
*8. चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवाओं में कायापलट*
स्वास्थ्य सुविधाएँ, विशेष रूप से आदिवासी बहुल क्षेत्रों में, हमेशा एक चुनौती रही हैं। 25 वर्षों में, राज्य ने इस क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है।
• सार्वभौमिक स्वास्थ्य सुरक्षा: डॉ. खूबचंद बघेल स्वास्थ्य सहायता योजना जैसी राज्य-विशिष्ट योजनाओं ने गरीब और मध्यम वर्ग के परिवारों को मुफ्त और गुणवत्तापूर्ण इलाज तक पहुंच सुनिश्चित की है, जो स्वास्थ्य को एक अधिकार के रूप में स्थापित करती है।
• अंतिम छोर तक पहुंच: मोबाइल मेडिकल यूनिट (MMUs) और शहरी क्षेत्रों में दाई-दीदी क्लीनिक जैसी पहल प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को दूर-दराज के और झुग्गी-झोपड़ी वाले क्षेत्रों तक पहुंचा रही हैं।
• शिशु एवं मातृ मृत्यु दर में कमी: संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देने और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHCs) के सुदृढ़ीकरण से शिशु मृत्यु दर (IMR) और मातृ मृत्यु दर (MMR) में उल्लेखनीय कमी आई है, जो राज्य की सबसे बड़ी सामाजिक उपलब्धियों में से एक है।
*9. रोजगार और स्वरोजगार: युवा सशक्तीकरण*
राज्य की युवा शक्ति को दिशा देने और पलायन रोकने के लिए रोजगार एवं स्वरोजगार को मुख्य एजेंडा बनाया गया है।
• सरकारी नौकरियों में स्थानीय प्राथमिकता: राज्य बनने के बाद से ही स्थानीय निवासियों को सरकारी नौकरियों में प्राथमिकता देने की नीति से युवाओं को अपने गृह राज्य में ही काम करने के अवसर मिले हैं।
• कौशल विकास पहल: मुख्यमंत्री कौशल विकास योजना जैसी पहलों के माध्यम से युवाओं को उद्योग-उन्मुख ट्रेडों में प्रशिक्षित किया गया है। विशेष रूप से औद्योगिक क्षेत्रों (जैसे भिलाई, रायगढ़) के आसपास कौशल विकास केंद्रों की स्थापना की गई है।
• स्वरोजगार को बढ़ावा: गौठान और रूरल इंडस्ट्रियल पार्क (RIPA): ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के लिए गौठानों को आजीविका केंद्र और RIPA के रूप में विकसित किया गया है। ये केंद्र महिलाओं और युवाओं को छोटे-छोटे उद्योग (जैसे वर्मी कंपोस्ट निर्माण, हस्तकला, खाद्य प्रसंस्करण) स्थापित करने का मंच प्रदान करते हैं, जिससे वे उद्यमशील बन सकें। स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र: आईटी और सेवा क्षेत्रों में स्वरोजगार को बढ़ावा देने के लिए, स्टार्टअप को प्रोत्साहन और वित्तीय सहायता प्रदान की जा रही है।
*10. भाषा एवं बोलियां: मौखिक विरासत का संरक्षण*
छत्तीसगढ़ की भाषाई विविधता इसकी सांस्कृतिक समृद्धि का एक और प्रमाण है, जो इसकी मौखिक विरासत को सदियों से पोषित करती आई है।
• छत्तीसगढ़ी भाषा: यह राज्य की राजभाषा और संपर्क भाषा है। इसे अक्सर पूर्वी हिंदी की एक बोली माना जाता है, लेकिन इसका अपना व्याकरण, साहित्य और लोकगीतों की समृद्ध परंपरा है। राज्य ने छत्तीसगढ़ी को पहचान दिलाने और इसे शिक्षा तथा प्रशासन में बढ़ावा देने के लिए छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के माध्यम से कदम उठाए हैं।
• जनजातीय बोलियाँ: राज्य के वनांचल क्षेत्रों में गोंडी, हल्बी, कुड़ुख (उरांव), सरगुजिया और भतरी जैसी कई महत्वपूर्ण जनजातीय बोलियां बोली जाती हैं। हल्बी को बस्तर क्षेत्र में एक संपर्क भाषा (Lingua Franca) का दर्जा प्राप्त है।
• भाषाई संरक्षण: राज्य सरकार इन जनजातीय भाषाओं और बोलियों के संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध है। इसके लिए जनजातीय भाषाओं के शब्दकोशों का निर्माण किया जा रहा है और प्राथमिक शिक्षा में मातृभाषा-आधारित शिक्षा (Mother Tongue Based Education) को प्रोत्साहित किया जा रहा है ताकि बच्चों को अपनी जड़ों से जोड़कर शिक्षा दी जा सके।
*11. सांस्कृतिक परंपरा, व्यंजन और विविधता का संरक्षण*
छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान इसकी विविधता, सादगी और परंपराओं के संरक्षण में निहित है।
• लोक कला और विश्व मंच: पंडवानी, राउत नाचा और पंथी नृत्य जैसी कलाओं को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंच पर पहचान मिली है। पंडवानी गायिका तीजन बाई ने राज्य की लोक कथाओं को जीवंत बनाए रखा है।
• पर्व और परंपराएं: बस्तर दशहरा का 75-दिवसीय आयोजन, राजिम कुंभ/माघी पुन्नी मेला, और हरेली (कृषि पर्व) राज्य की सांस्कृतिक एकता के प्रतीक हैं। राज्य ने इन परंपराओं को संरक्षित करने और उन्हें पर्यटन से जोड़ने का सफल प्रयास किया है।
• रहन-सहन और व्यंजन: यहाँ का रहन-सहन प्रकृति के साथ तालमेल बिठाता है। खान-पान में चावल आधारित व्यंजन जैसे फरा, चीला, मुठिया और पौष्टिक बासी शामिल हैं। यह सादगीपूर्ण जीवनशैली और जैविक कृषि पर आधारित खान-पान, आधुनिक 'वेलनेस' संस्कृति के लिए एक प्रेरणा है।
*12. छत्तीसगढ़ में विकास की भुमिका*
छत्तीसगढ़ में अब तक मुख्य रूप से दो प्रमुख राजनीतिक दलों ने शासन किया है, और दोनों के कार्यकाल में विकास के अलग-अलग आयामों पर ध्यान केंद्रित किया गया।
1. बुनियादी ढाँचे और सामाजिक सुरक्षा पर जोर (मुख्यतः 2003-2018)
इस अवधि में, सरकार का प्रमुख ध्यान बुनियादी ढाँचे को मजबूत करने और लक्षित सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करने पर रहा:
सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) सुधार: छत्तीसगढ़ ने अपनी सार्वजनिक वितरण प्रणाली को देश के एक मॉडल के रूप में स्थापित किया। चावल वितरण के लिए विशेष कानून बनाए गए, जिससे भ्रष्टाचार में कमी आई और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित हुई।
बिजली और सड़क नेटवर्क: राज्य में बिजली उत्पादन और वितरण क्षमता में वृद्धि की गई, और दूर-दराज के क्षेत्रों को जोड़ने के लिए सड़क नेटवर्क का विस्तार किया गया।
शिक्षा और स्वास्थ्य: दूरस्थ क्षेत्रों में स्कूलों और स्वास्थ्य केंद्रों की पहुँच बढ़ाने पर काम हुआ।
वनोपज आधारित नीतियाँ: तेंदूपत्ता संग्राहकों को बोनस वितरण जैसी योजनाओं के माध्यम से वन आधारित अर्थव्यवस्था से जुड़े लोगों को आर्थिक संबल प्रदान किया गया।
इस दौर की उपलब्धियों ने राज्य में एक मजबूत भौतिक और सामाजिक सुरक्षा का आधार तैयार किया।
2. कृषि, न्याय और सांस्कृतिक पुनरुत्थान पर जोर (मुख्यतः 2000-2003 और 2018 के बाद)
इस अवधि की सरकारों ने कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था और सामाजिक-आर्थिक न्याय के सिद्धांतों को प्राथमिकता दी:
कृषि ऋण माफी और आय सहायता: किसानों के लिए कृषि ऋण माफी योजनाएँ लागू की गईं। राजीव गांधी किसान न्याय योजना (RGKNY) के माध्यम से धान उत्पादकों को इनपुट सहायता दी गई, जिसने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सीधा लाभ पहुँचाया।
गोबर खरीद पहल (गोबर धन न्याय योजना): यह योजना नवाचार का एक अनूठा उदाहरण है, जिसने पर्यावरण संरक्षण और पशुधन के आर्थिक मूल्य को बढ़ाकर ग्रामीण आजीविका को सशक्त किया।
सांस्कृतिक संरक्षण और पर्यटन: सरकार ने छत्तीसगढ़ी अस्मिता को मजबूत करने पर बल दिया। राम वन गमन पथ का विकास, कौशल्या माता मंदिर (चंदखुरी) का जीर्णोद्धार और पारंपरिक तीज-त्योहारों को सार्वजनिक अवकाश का दर्जा देकर सांस्कृतिक गौरव को बढ़ावा दिया गया।
प्रशासनिक विकेंद्रीकरण: प्रशासन को नागरिकों के करीब लाने के लिए नए जिलों का गठन किया गया, जिससे स्थानीय विकास योजनाओं को गति मिली।
*13. रजत जयंती का संकल्प : गढ़बो नवा छत्तीसगढ़*
25 वर्षों की यह यात्रा दृढ़ संकल्प और प्रगति की गाथा है। रजत जयंती वर्ष के अवसर पर, छत्तीसगढ़ अब भविष्य की ओर देख रहा है:
• सतत विकास: अपनी खनिज संपदा का उपयोग करते हुए पर्यावरण संतुलन बनाए रखना।
• सामाजिक समरसता: जनजातीय और गैर-जनजातीय समाजों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना।
• युवा शक्ति: शिक्षा और कौशल विकास के माध्यम से युवाओं को रोजगार के लिए तैयार करना।
छत्तीसगढ़ अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ, लेकिन भविष्य की ओर उन्मुख, एक ऐसे 'नवा छत्तीसगढ़' के निर्माण के लिए प्रतिबद्ध है जो भारत के विकास में एक मजबूत और गौरवशाली भागीदार होगा।
छत्तीसगढ़ का विकास किसी एक सरकार की उपलब्धि नहीं, बल्कि एक निरंतर प्रक्रिया का परिणाम है। एक तरफ जहाँ कुछ सरकारों ने बुनियादी ढाँचे, खाद्य सुरक्षा और PDS के मॉडल पर काम किया, वहीं दूसरी ओर कृषि, सामाजिक न्याय और सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने पर जोर दिया गया।
इन राजनीतिक प्रयासों के मूल में शहीद वीर नारायण सिंह के बलिदान, गुरु घासीदास के सामाजिक समरसता के संदेश और डॉ. खूबचंद बघेल के भाषाई और सांस्कृतिक आंदोलन की नींव है। छत्तीसगढ़ की भविष्य की राह इन दोनों स्तंभों—मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति और विरासत में मिली सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना—पर निर्भर करती है। राज्य का भविष्य तभी उज्ज्वल होगा जब उसकी विकास की परिभाषा में आर्थिक समृद्धि के साथ-साथ यहाँ की विशिष्ट संस्कृति और ‘गढ़बो नवा छत्तीसगढ़’ का संकल्प भी शामिल हो।
आलेख - खेमेश्वर पुरी गोस्वामी
मुंगेली, छत्तीसगढ़ 8120032834