Friday, November 28, 2025

naxal hidma

जंगल, ज़मीन, और गुमशुदा 'हीरो' : क्या हिडमा सिर्फ एक नक्सली था,या व्यवस्था का आईना?


बीते दिनों जब एक कथित नक्सली कमांडर हिडमा के नाम की चर्चा ने ज़ोर पकड़ा,तो इसके साथ ही एक ऐसी बहस ने भी सिर उठाया,जो केवल सुरक्षा बलों की कार्रवाई या नक्सलवाद के आंकड़ों तक सीमित नहीं है। अगर हिडमा वाकई खूंखार नक्सली था,तो निसंदेह हममें से हर राष्ट्रप्रेमी नागरिक इस देश के ख़िलाफ़ होने वाली हर हिंसा का कड़ा विरोध करता है। लेकिन सवाल तब गहरा हो जाता है जब तथाकथित 'आतंक' के इस चेहरे को उसके अंतिम समय में आदिवासियों के एक बड़े तबके ने 'हीरो' जैसा सम्मान दिया और उसके इर्द-गिर्द भीड़ उमड़ी।
यह भीड़, यह सम्मान, और यह 'हीरो-पूजा' किसी भी कीमत पर नक्सलवाद का समर्थन नहीं हो सकती,बल्कि यह व्यवस्था के कान खोलने वाला एक ज़बरदस्त सवाल है। यह हमें सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर क्यों एक विद्रोही, जिसे राज्य दुश्मन मानता है, अपनी ही धरती के बेटों के बीच इतना स्वीकार्य बन जाता है?

*आदिवासी: प्रकृति के संरक्षक, अन्याय के विरोधी*

हमारा विश्वास है कि सच्चा आदिवासी—जो जंगल, नदी, पहाड़ और प्रकृति के हर कण का रक्षक है—वह कभी भी क्रूरता या गलत का अंधसमर्थन नहीं करता। उनकी खुद्दारी, उनका आत्मसम्मान और उनका अस्तित्व, उनके लिए किसी भी राजनीतिक या हिंसक विचारधारा से बड़ा है।
जब ये लोग किसी हिडमा जैसे व्यक्ति के साथ खड़े होते हैं, तो इसका अर्थ यह नहीं कि वे नक्सली विचारधारा के साथ हैं। इसका सीधा अर्थ यह है कि उन्हें अपनी जल-जंगल-ज़मीन पर, अपने अधिकारों पर और अपने अस्तित्व पर संकट दिख रहा है। जब उन्हें लगता है कि उनकी बात सुनी नहीं जा रही, जब उन्हें विस्थापन और दमन का सामना करना पड़ता है, तब मजबूरी उन्हें विरोध के ऐसे रास्तों की ओर धकेलती है। और अगर हालात सच में बदतर हो जाएं, तो वही आदिवासी सच के साथ खड़े होने के लिए हथियार उठाने को भी मजबूर हो जाते हैं—चाहे वह विरोध सरकार का हो या फिर हिडमा जैसे किसी नक्सली का, जिसने उनके नाम पर हिंसा की हो।

*आंकड़ों में गुम होता बेगुनाह आदिवासी*

यहाँ मुद्दा केवल एक हिडमा का नहीं है। मुद्दा उन अनगिनत बेगुनाह आदिवासियों का है, जो इन सालों के संघर्ष में अनावश्यक रूप से मारे गए हैं। वे, जिन्हें जबरन नक्सली का ठप्पा लगाकर ख़त्म कर दिया जाता है, जिनकी आवाज़ पुलिसिया या नक्सली हिंसा की गोलियों की आवाज़ में हमेशा के लिए दब जाती है।
कितनी ही रिपोर्टें हैं, जिनमें निर्दोष आदिवासियों की मौत को मात्र 'एनकाउंटर' या 'क्रॉस-फायर' का आंकड़ा बताकर निपटा दिया गया। उनका दर्द किसी अख़बार की हेडलाइन नहीं बना, उनकी कहानी किसी मानवाधिकार रिपोर्ट में जगह नहीं पा सकी। वे सिर्फ इसलिए मारे गए, क्योंकि उनके हिस्से का जंगल, उनकी पुश्तैनी ज़मीन, और उनके संवैधानिक अधिकार किसी कॉरपोरेट या सत्ता प्रतिष्ठान की नज़र में आ गए थे।
हिडमा का 'हीरो' बनना व्यवस्था की विफलता का प्रतीक है। यह बताता है कि जब न्याय की प्रक्रिया विफल होती है, जब प्रशासन आदिवासियों के संरक्षक की जगह उनके दमनकर्ता के रूप में खड़ा होता है, तो निराशा की ख़ाली जगह को भरने के लिए कोई भी विद्रोही चेहरा 'हीरो' बन सकता है।

*न्याय की मांग: बंदूक नहीं, संवाद*

अब समय आ गया है कि इस पूरे संघर्ष को केवल 'कानून व्यवस्था' की समस्या मानकर देखना बंद किया जाए। यह अधिकारों, पहचान और न्याय का सवाल है।
हम सरकार और व्यवस्था से आग्रह करते हैं कि बंदूक की भाषा छोड़कर संवाद का रास्ता अपनाया जाए। हर उस बेगुनाह आदिवासी की मौत की निष्पक्ष और समयबद्ध जांच हो, जिसे 'नक्सली' बताकर मार दिया गया।

जंगल, जल और ज़मीन पर आदिवासियों के पेसा (Panchayats Extension to Scheduled Areas Act) और वन अधिकार अधिनियम (Forest Rights Act) को केवल कागज़ पर नहीं, बल्कि ईमानदारी से ज़मीन पर उतारा जाए।

आदिवासियों को विकास के नाम पर विस्थापित करने की नीतियों पर तुरंत रोक लगे और उनकी संस्कृति तथा पर्यावरण की रक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।
जब तक आदिवासियों को यह विश्वास नहीं होगा कि न्याय उनके साथ है, तब तक ऐसे 'हीरो' पैदा होते रहेंगे। हमें एक ऐसा भारत बनाना है, जहाँ जंगल का हर निवासी सुरक्षित महसूस करे, जहाँ उसकी ज़मीन उसकी हो, और जहाँ न्याय का दीपक हर झोंपड़ी में रोशनी दे। तभी नक्सलवाद की जड़ पर वार होगा और तभी हिडमा जैसे नाम अतीत बनेंगे।


आलेख : खेमेश्वर पुरी गोस्वामी 
सह संपादक : न्यूज़लाइन नेटवर्क 
रायपुर, छत्तीसगढ़ 8120032834

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