Saturday, January 3, 2026

बलिदानी वीर नारायण सिंह : समर्पित कविता

सोनाखान का शेर : वीर नारायण सिंह


महानदी की लहरों सा, जिसका पावन स्वाभिमान था,
सोनाखान की माटी का, जो बेटा बड़ा महान था,
दुर्भिक्ष पड़ा जब धरती पर, वह संकट का संबल बना,
गरीबों की भूख मिटाने को, जो काल का भी काल बना।

संपूर्ण क्रांति का छत्तीसगढ़ में, सच्चा स्वर गुंजार नहीं होगा ॥
जब तक इस धरती पर पैदा, फिर से नारायण नहीं होगा ॥१॥

बिंझवारों का गौरव था, वह शोषण का संहारक था,
अत्याचारी फिरंगियों का, वह वीर बड़ा विदारक था,
जनता के हित खातिर जिसने, अन्न के ताले तोड़ दिए,
सोने की चिड़िया के खातिर, सुख के बंधन छोड़ दिए।

शोषक उन गोरे अंग्रेजों का, अंत कभी स्वीकार नहीं होगा ॥
जब तक इस धरती पर पैदा, फिर से नारायण नहीं होगा ॥२॥

अग्नि स्तंभ सा खड़ा रहा, वह मौत से कभी डरा नहीं,
जो देश हेतु मर मिटता है, वह वीर कभी भी मरा नहीं,
फांसी का फंदा चूम लिया, भारत माता की जय कहकर,
चमक उठा वह बलिदान का, एक अमिट सितारा बनकर।

बलिदानों की इस गाथा का, कोई विकल्प तैयार नहीं होगा ॥
जब तक इस धरती पर पैदा, फिर से नारायण नहीं होगा ॥३॥

स्वाभिमान की रक्षा हित, जिसने दे दी अपनी कुर्बानी,
छत्तीसगढ़ की माटी गाती, आज भी उसकी अमर कहानी,
मुक्त हृदय से हम सब उसका, आओ अभिनंदन कर लें,
सोनाखान के उस बेटे को, हम शत-शत वंदन कर लें।

यह राष्ट्र-तिरंगा भारत का, तब तक आबाद नहीं होगा ॥
जब तक इस धरती पर पैदा, फिर से नारायण नहीं होगा ॥४॥

                ©पं.खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
                   छत्तीसगढ़िया, छत्तीसगढ़
                     मो. 8120032834

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