Sunday, February 1, 2026

बिरसा के वंशज उठो अब, गौरव गान सुनाना है।

मुक्तक : धरा की आन बचाने को, नया इतिहास लिखा था,
मिटाने दमन के साये, लहू से खास लिखा था।
जिन्हें 'धरती पिता' कहकर, ज़माना आज पूजता है,
उसी बिरसा ने जंगल में, विजय-विश्वास लिखा था।

चारों ओर कुहासा छाया, छद्म वेश का डेरा है,
भोली-भाली पावन धरती, को लालच ने घेरा है।
कोई बांटे नोट, कोई बस धर्म बदलने आया है,
अपनी ही जड़ों को काटने, ज़हरीला भ्रम छाया है।
पुरखों की मर्यादा का नित, हरण दिखाई देता है,
अपनों के ही हाथों अपना, मरण दिखाई देता है।
मौनव्रती बनकर रहने से, अधिकार नहीं मिल सकता,
झूठे वादों के पीछे अब, उजियार नहीं मिल सकता।

आत्मबोध की अलख जगाकर, नया सवेरा लाना है,
बिरसा के वंशज उठो अब, गौरव गान सुनाना है। (1)

मुक्तक : हुकूमत काँप उठती थी, गरजती जब कमानें थीं,
वो रॉबिनहुड था माटी का, जिसे रटती ज़बानें थीं।
नमन टंट्या को जो भूखों, की ख़ातिर लड़ गया सबसे,
उसी के शौर्य की गवाह, निमाड़ की सब ढलानें थीं।

सीधी-सादी बातों में अब, तुम मत फँसना भाइयों,
तोड़ रहे जो मेल-जोल, उन पर मत हँसना भाइयों।
नेता आते पाँच साल में, झूठे वादे करते हैं,
मंचों पर वो ऊँची-ऊँची, फर्जी बातें करते हैं।
मजहब के जो ठेकेदार हैं, घर में आग लगाते हैं,
संस्कृति को मिटाने खातिर, नया पाठ पढ़ाते हैं।
घात लगाये बैठे तुम पर, चौकन्ने मक्कार सभी,
अभी नहीं यदि जागे तुम तो, खो दोगे अधिकार सभी।

सत्य मार्ग को चुनकर तुमको, नई इबारत लिखना है,
टंट्या के वंशज उठो अब, जग को राह दिखाना है। (2)

मुक्तक : प्रथम हुंकार माटी की, उसी के तीर से निकली,
अटल आज़ादी की ज्वाला, उसी के वीर से निकली।
गिराया क्लीवलैंड को, झुकाया ज़ुल्म का परचम,
वो बाबा तिलका की हस्ती, बड़ी तक़दीर से निकली।


जल-जंगल-ज़मीन तुम्हारी, पुरखों की थाती है,
इस मिट्टी की रक्षा करना, जिम्मेदारी आती है।
केवल तीर-कमान नहीं, अब कलम भी उठाना सीखो तुम,
दुनिया की चालाकी को अब, पढ़ना-लिखना सीखो तुम।
बनो शांति के पथगामी, पर क्रांति पुत्र भी बने रहो,
अनाचार के सम्मुख हर क्षण, सीना ताने तने रहो।
शिक्षा के उजियारे से ही, स्वाभिमान बच पाएगा,
वैचारिक संग्राम लड़ोगे, तभी मान बच पाएगा।

ज्ञान-शक्ति को पाकर तुमको, अपना भाग्य बनाना है,
तिलका के वंशज उठो अब, स्वाभिमान चमकाना है। (3)

उठाकर 'हूल' का नारा, फिरंगियों को हिला डाला,
वो दो भाई जिन्होंने, सुलगता इक दिया पाला।
लड़े सिद्धू और कान्हू, कि अपना राज कायम हो,
मिटाया अपनी हिम्मत से, गुलामी का वो हर जाला।

मत भूलो तुम मान-मर्यादा, और अपनी पहचान को,
मत बदलो तुम स्वार्थ में आकर, पूर्वज के सम्मान को।
शोषण का प्रतिकार करो तुम, कर्म से अपने मत भागो,
आलस की चादर को त्यागो, कल्पित निद्रा से जागो।
अधिकार छीनना सीखो अब तुम, भीख किसी से मत माँगो,
वक्त आ गया है अब वीरों, धर्म-युद्ध में तुम जागो।
सत्य मार्ग पर चल कर अपनी, मंज़िल पाना सीखो तुम,
अधर्म की हर साज़िश को अब, धूल चटाना सीखो तुम।

शौर्य-बीज बोकर मिट्टी में, नन्दन वन मुस्काना है,
सिद्धू-कान्हू के वंशज उठो अब, नव-इतिहास रचाना है। (4)

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