Tuesday, January 27, 2026

छद्म सेवक

कुर्सी की हवस पाल, सेवक कहावत हैं,
भीतर कसाई रूप, बाहर सुजान हैं।

देश बेंच खात आज, गोदी में उघोगपति,
कर्ज के कुचक्र माहि, फँसा हिन्दुस्तान है।।

बिकती दवाइयाँ हैं, बिकती पढ़ाई यहाँ,
लूट के बाजार बीच, आम इंसान है।

महल चुनावी खड़े, नोटों की चिनाई होय,
झोपड़ी के भाग माहि, सूना खलिहान है।।

डिग्री की गठरी ले, डोलत सड़न माँहि,
मॉकरी करत नेता, डंडा ही विधान है।

संसद में गाली-गलौज, भ्रष्टाचार की मौज,
कैसा यह लोकतंत्र, कैसा संविधान है?

        © खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
        मुंगेली, छत्तीसगढ़, भारतवर्ष
             मो. ८१२००३२८३४

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