Tuesday, January 27, 2026

प्राण हो शरीर में तो, स्वाभिमान पुष्ट रखो

न झुक कर तुम कभी जीना, विजय का गान होने दो,
अँधेरों के विरुद्ध अब फिर, प्रखर उत्थान होने दो।
न बहना धार के संग तुम, नियति यह है नहीं अपनी,
लहर के बीच पौरुष का, सदा सम्मान होने दो।।

कायर जो होते वही, धारा संग बहते हैं,
मरी मछली की भाँति, नियति को सहते।

पौरुष न जिनमें है, मौन मुख धारण कर,
अन्याय की मार को भी, अपना ही कहते।।
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वीर वो कहाते जग, साहस दिखाते जो ही,
विपरीत लहरों में, जो कि सदा रहते।

सत्य की मशाल ले के, पथ पर बढ़ते सदा,
पाप के पहाड़ देख, कभी ना जो ढहते।।
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जीवित हो अगर तुम, चेतना जगाओ अब,
गलत का विरोध करो, वीर भाव गहते।

मौन जो रहेगा आज, काल उसे खाएगा ही,
क्रांति के स्वर ही यहाँ, युगों-युगों बहते।।
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बाधाओं को चीर कर, मार्ग जो बनाते वीर,
शौर्य की कहानी वही, दुनिया को कहते।

सोए हुए सोयेंगे ही, भाग्य के भरोसे बैठ,
जागे हुए योद्धा सदा, समर में दहते।।
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प्राण हो शरीर में तो, स्वाभिमान पुष्ट रखो,
जुल्म के आगे जो कभी, घुटने न टेकते।

जीवित की संज्ञा वही, पाता है जहाँ में यहाँ,
अन्याय के विरुद्ध जो ही, ज्वाला बन बहते।।
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            © खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
             मुंगेली,छत्तीसगढ़,भारतवर्ष 
             मोबाइल : 8120032834

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