Sunday, June 14, 2026

॥ श्री शिव स्तुति ॥ शार्दूलविक्रीडित,वसन्ततिलका छंद मिश्रित

​॥ श्री शिव स्तुति ॥

​जटाजालमध्ये वहति सुरनदी फेनधवला,
फणीन्द्रैः कण्ठालङ्कृतमिह विकालं च वपुषम्।
डमरू-ध्वनि-नादैरथ चण्ड-ताण्डव-रतं,
नमामि त्वं साक्षाच्छिवं महाकाल-रूपम् ॥१॥

​जटाजूटे गङ्गा लहरि-लहरी-खेलन-वती,
ललाटे चन्द्रोऽयं मलयज-सुगन्धोऽमृत-करः।
प्रदीप्ताग्नि-ज्वाला दहति मदनं भाल-विवरे,
प्रसीद त्वं देवं मम हृदये ध्यामि सततम ॥२॥

​गिरिराज-सुता-चित्त-रञ्जन-परं, सुखाधार-शिवं,
कृपा-दृष्टि-पातेन हरसि सकलं दुःख-जालम्।
तजित्वैव संसार-भीतिं विहाय, अहमेव सदा,
भजे विश्वनाथं हरं मोक्षदं दिव्य-रूपम् ॥३॥

​स्फुरन्मणिरत्न-प्रभा-रञ्जितं, दिशो वदनं यस्य,
गजाजिन-वस्त्रं तद्द्भुतं रूपमस्य सुशोभितम्।
विभूति-विलेपं धत्ते भूतनाथः स्वयं यः,
अचिन्त्यं सुभावं भजे शङ्करं देव-देवम् ॥४॥

​सुरेन्द्र-मुनीन्द्राः नतं यस्य पादं, धरन्तीह रेणुं,
जटाजूट-धृत्वा शशि-चकोर-कलां मोदमानाः।
भुजङ्गैः सुबद्धोऽथ कण्ठे विराजन्,
भजे तं शिवं शान्त-भावं मनोऽभिष्ट-दं मे ॥५॥

​ललाटे ज्वलन्ती ज्वलज्ज्वालमाला,
महाकाल-तेजः क्षयं कामदेवम्।
सुर-सिद्ध-संघे नतं तं सदा वै,
जटा-गुल्म-धारी हरं नूतनाहम् ॥६॥

​धगद्-धगद्-धगद्-धगद्-ज्वलच्छिखा-भाले,
मदनस्य बाणैः पुनरहुतिं ददाति।
गौरी-कुच-चित्र-लेखन-कुशलोऽसौ,
शिल्पी-वरोऽयं हरः प्राण-रूपः ॥७॥

​नव-मेघ-श्यामं तव कण्ठ-मूलं,
अमावास्या-वत् कान्ति-युक्तं च नित्यम्।
गजासुर-हन्तारं गङ्गा-धरं तं,
जगदाधार-रूपं भजे दुःख-शमनम् ॥८॥

​नीलोत्पल-दल-श्यामं कण्ठमस्य विलोक्यते,
कामस्य त्रिपुरस्यापि विनाशी देव-पूजितः।
दक्ष-यज्ञ-विनाशी च अन्तकस्यापि कालकः,
भजेऽहं भव-भीति-हारिणमखण्डं शिवं सदा ॥९॥

​मङ्गलायाः कलाभिर्युतं भृङ्ग-तुल्यं,
रसज्ञं प्रपन्नं रस-पान-लीनम्।
यमादीन् विजित्य स्थितं तं विभूतिं,
भजेऽन्तकस्याप्यन्तकं देव-नाथम् ॥१०॥

​फणोच्छ्वास-युक्तैः भुजङ्गैः समेतं,
मृदङ्गस्य नादैरथ ताण्डव-मग्नम्।
प्रचण्ड-प्रभावं कपालं धरन्तं,
शिवं मङ्गलं मङ्गलं सर्वदा मे ॥११॥

​सर्प-हार-रत्न-माला स्वर्ण-मृत्तिका-तुल्य-भावः,
शत्रु-मित्र-तुल्य-दृष्टिः सर्वदा समभावा।
सम-दृष्टि-स्थितं देवं चक्रवर्ति-रक्षकं,
भजे सदाशिवं भेद-हीनं च नित्यम् ॥१२॥

​गङ्गा-तटे कुञ्ज-गृहे वसामि,
मन्त्रं जपन् हस्त-युतं च शीर्षणम्।
त्यक्त्वा नयन-चापलं ध्यान-युक्तं,
प्राप्नोमि शिव-पदं सुख-रूपं सदा ॥१३॥

​इदं स्तोत्रं नित्यं पठति नर-देवः सुख-करम्,
विशुद्धः स आत्मा भवति शिव-भक्तिं च लभते।
मोह-जालं छित्वा मुक्तिं ददाति शम्भुः,
शरणं गच्छति तं परम-गतिं लभते नृपः ॥१४॥

​॥ इति -खेमेश्वर-पुरी-गोस्वामी-विरचिता श्री शिव स्तुतिः संपूर्णा ॥

भावार्थ 
 
१. जिनकी जटाओं में फेन जैसी श्वेत गंगा बहती है, जिनका कंठ सर्पों से सुशोभित है और जिनका रूप विकराल है, जो डमरू की ध्वनि के साथ तांडव में लीन रहते हैं, मैं उन महाकाल रूप साक्षात् शिव को प्रणाम करता हूँ।

२. जिनकी जटाओं में गंगा की लहरें क्रीड़ा करती हैं, जिनके मस्तक पर चंद्रमा विराजमान है और जो चंदन की सुगंध से सुवासित हैं। जिनके ललाट की अग्नि ने कामदेव को भस्म कर दिया, मैं उन देव को अपने हृदय में निरंतर धारण करता हूँ।

३. जो गिरिराज-पुत्री पार्वती के चित्त को प्रसन्न करने वाले और सुख के आधार हैं, जो अपनी कृपा दृष्टि से सभी दुखों को हर लेते हैं। मैं संसार के भय को त्यागकर, उन विश्वनाथ, मोक्ष प्रदाता और दिव्य रूप धारी शिव का भजन करता हूँ।

४. जिनके मुख की आभा मणियों और रत्नों की कांति से दिशाओं को प्रकाशित करती है, जो गजचर्म (हाथी की खाल) धारण करते हैं। जिनका शरीर विभूति (भस्म) से लिप्त है, मैं उन अचिंत्य, भूतनाथ शंकर को भजता हूँ।

५. जिनके चरणों को देवता और मुनि नमन करते हैं और जो जटाओं में चंद्रमा की कला को धारण कर प्रसन्न रहते हैं। जिनका कंठ सर्पों से सुशोभित है, मैं उन शांत भाव वाले शिव का भजन करता हूँ, जो मेरे मन की सभी इच्छाएं पूरी करें।

६. जिनके ललाट पर प्रज्वलित अग्नि की ज्वालाएँ कामदेव के विनाश का कारण बनीं, देवताओं और सिद्धों द्वारा पूजित, जटाओं को धारण करने वाले उन हर (शिव) को मैं निरंतर नमन करता हूँ।

७. जिनके ललाट पर 'धगद्-धगद्' शब्द करती हुई अग्नि की शिखाएँ हैं, जो कामदेव को पुन: भस्म कर देते हैं। जो गौरी (पार्वती) के अंगों पर चित्रकारी करने में कुशल हैं, वे शिल्पकार स्वरूप महादेव ही मेरे प्राण हैं।

८. जिनका कंठ नए मेघों के समान श्याम वर्ण का है, जो अमावस्या की भांति नित्य कांतिमान हैं। जो गजासुर का वध करने वाले और गंगा को धारण करने वाले हैं, मैं उन दुःख विनाशक जगत के आधार शिव का भजन करता हूँ।

९. जिनका कंठ नीले कमल के समान श्याम है, जो कामदेव और त्रिपुर के विनाशक हैं। जिन्होंने दक्ष के यज्ञ को नष्ट किया और जो यमराज के लिए भी काल हैं, मैं उन भव-भय से मुक्ति दिलाने वाले अखंड शिव का सदा भजन करता हूँ।

१०. जो कल्याणकारी कलाओं से युक्त, भृंग (भौरे) के समान रसज्ञ और आत्म-लीन हैं। जिन्होंने यम आदि को जीत लिया है और जो काल के भी काल हैं, मैं उन देव-नाथ का भजन करता हूँ।

११. जो सर्पों से युक्त हैं, मृदंग की थाप पर ताण्डव में मग्न हैं और हाथ में कपाल धारण किए हुए प्रचंड प्रभावशाली हैं, वे मंगलकारी शिव सदैव मेरा कल्याण करें।

१२. जो सर्प और रत्नों की माला धारण करते हैं, जिन्हें शत्रु और मित्र में कोई भेद नहीं है। जो सदैव समदर्शी हैं और संसार की रक्षा करने वाले हैं, मैं उन भेद-रहित सदाशिव का नित्य भजन करता हूँ।

१३. मैं गंगा तट के कुंज में निवास कर, शिव मंत्र का जप करते हुए अपने मन को चंचलता से हटाकर ध्यान में लीन रहता हूँ। इस प्रकार मैं उस सुख-स्वरूप शिव पद को प्राप्त करता हूँ।

१४. जो मनुष्य नित्य इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसका अंतःकरण शुद्ध हो जाता है और उसे शिव-भक्ति प्राप्त होती है। शम्भु उसके मोह के जाल को काटकर उसे मुक्ति प्रदान करते हैं और वह परम गति को प्राप्त होता है।

सर्वाधिकार सुरक्षित :  खेमेश्वर पुरी गोस्वामी 
मुंगेली, छत्तीसगढ़,८१२००३२८३४

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