Wednesday, May 27, 2026

'दुख' का बाजार और संवेदनाओं के सन्नाटे का 'रेट लिस्ट'

*'दुख' का बाजार और संवेदनाओं के सन्नाटे का 'रेट लिस्ट'*

आलेख : खेमेश्वर पुरी गोस्वामी
मुंगेली, छत्तीसगढ़ ८१२००३२८३४

छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले से सोशल मीडिया के गलियारों तक तैरता एक विज्ञापन इन दिनों विमर्श के केंद्र में है। एक व्यक्ति ने 'दुख सुनने' को बाकायदा एक पेशे का रूप दे दिया है—वह भी बकायदा रेट लिस्ट के साथ। पहली नजर में यह हास्यास्पद लग सकता है, लेकिन यदि संजीदगी से विचार करें, तो यह हमारे उस 'आधुनिक' समाज की सबसे बड़ी त्रासदी है, जहां तकनीक ने दुनिया को मुट्ठी में तो कर दिया, पर दिलों के बीच की दूरियां मीलों लंबी कर दी हैं।

उस विज्ञापन की इबारत गौर करने लायक है—"दुख कोई भी हो, किसी का भी हो, मैं सुनूंगा।" सुनने की इस प्रक्रिया के लिए ₹500 से लेकर ₹12000 तक का शुल्क निर्धारित है। यह विडंबना ही है कि जिस समाज में कभी बड़े-बुजुर्गों की चौपालें और पड़ोसियों का 'कंधा' बिना किसी मोल के उपलब्ध रहता था, वहां अब 'कान' किराए पर लेने पड़ रहे हैं। क्या हम इतने अकेले हो गए हैं कि अपनी पीड़ा साझा करने के लिए हमें सशुल्क श्रोता की आवश्यकता है? यह विज्ञापन उस मानसिक कंगाली का परिचायक है, जहां हमारे पास 'फेसबुक फ्रेंड्स' तो हजारों हैं, लेकिन दुख बांटने के लिए एक भी सच्चा इंसान नहीं।

आज हम सूचना क्रांति के युग में जी रहे हैं। 5जी की रफ्तार वाले इस दौर में सूचनाएं तो तेजी से पहुंच रही हैं, लेकिन भावनाएं बीच रास्ते में ही दम तोड़ रही हैं। महानगरों की बहुमंजिला इमारतों से लेकर छोटे शहरों के ड्राइंग रूम तक, संवादहीनता का एक गहरा सन्नाटा पसरा है। परिवार के सदस्य एक ही छत के नीचे बैठकर एक-दूसरे को देखने के बजाय मोबाइल स्क्रीन पर 'इमोजी' के जरिए भावनाएं व्यक्त कर रहे हैं। जब अपनों के पास सुनने का धैर्य नहीं बचा, तो स्वाभाविक है कि 'दुख सुनने वाले' बाजार में अपनी दुकान सजाएंगे ही।

मार्केटिंग के इस दौर में सब कुछ बिकाऊ है—हंसी भी और आंसू भी। दुर्ग के इस 'दुखियारे के साथी' ने दरअसल उस बाजार को पहचाना है, जिसे हमारी उपेक्षा ने पैदा किया है। इसे केवल एक व्यक्ति की चतुराई कहना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि यह हमारे सामाजिक पतन का अलार्म है। यदि आत्मीयता का स्थान अर्थशास्त्र ले ले, तो समझ लेना चाहिए कि मानवीय संवेदनाएं वेंटिलेटर पर हैं।

यह विज्ञापन एक व्यंग्य है उस व्यवस्था पर, जहां हम भौतिक समृद्धि के शिखर पर तो पहुंच गए, पर भावनात्मक रूप से दरिद्र हो गए। यह हमें आइना दिखाता है कि यदि हमने समय रहते अपनों को 'वक्त' देना शुरू नहीं किया, तो भविष्य में संवेदनाओं की बोली ऐसे ही सरेआम लगती रहेगी। दुख सुनने के लिए किसी को पैसे देना उस 'बीमारी' का इलाज नहीं है, बल्कि उस 'अकेलेपन' की पुष्टि है, जिसे हमने खुद ओढ़ा है।

> *तल्ख हकीकत यह है कि आज इंसान के पास अपनी बात कहने के लिए 'स्टेटस' तो है, पर सुनने के लिए कोई 'रिश्ता' नहीं बचा।*
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'हरी झंडी' का मोह और औचित्य का उपहास : उद्घाटनजीवी राजनीति का एक नया अध्याय

'हरी झंडी' का मोह और औचित्य का उपहास : उद्घाटनजीवी राजनीति का एक नया अध्याय

आलेख : खेमेश्वर पुरी गोस्वामी
सह संपादक - न्यूज़लाइन नेटवर्क, छत्तीसगढ़ 

छत्तीसगढ़ की सड़कों पर हाल ही में 'डायल 112' के रूप में सुरक्षा और आपातकालीन सेवा का एक नया काफिला उतरा। केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने छत्तीसगढ़ आकर जब इन वाहनों को हरी झंडी दिखाई, तो प्रदेश की जनता को लगा कि अब संकट के समय 'मदद' महज एक फोन कॉल की दूरी पर है। लेकिन, इस सरकारी कवायद के महज दो दिनों के भीतर जो दृश्य देखने को मिला, वह जनसेवा से अधिक 'स्व-प्रचार' और 'उद्घाटनजीवी' मानसिकता का एक ऐसा प्रहसन है, जो लोकतंत्र में मितव्ययिता के दावों को आईना दिखाता है।

सवाल यह उठता है कि क्या छत्तीसगढ़ के उन जिला मुख्यालयों में वाहन इसलिए नहीं चल सकते थे क्योंकि वहां के स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने उसे 'पुनः हरी झंडी' नहीं दिखाई थी? क्या दिल्ली से आई हरी झंडी का महत्व स्थानीय स्तर पर तब तक शून्य रहता है, जब तक कि वह किसी स्थानीय मंत्री या विधायक के हाथ से दोबारा न फहराई जाए?

यह स्थिति किसी हास्यास्पद फिल्म के दृश्य जैसी प्रतीत होती है, जहाँ पटकथा में तार्किक चूक हो। ऐसा लगता है कि इन वाहनों के इंजन का 'स्टार्ट बटन' चाबी से नहीं, बल्कि स्थानीय नेताओं के हाथों में थमी उस हरी झंडी से संचालित होता है। यदि व्यवस्था वाकई इतनी ही जटिल है, तो फिर केंद्रीय मंत्री का आगमन मात्र एक औपचारिकता बनकर रह जाता है। यह प्रश्न अनुत्तरित है कि आखिर केंद्रीय मंत्री के आगमन का 'औचित्य' क्या था—क्या वे केवल फोटो खिंचवाने आए थे या सरकारी व्यवस्था को सुदृढ़ करने?


किसी भी सरकारी आयोजन में मंच, बैनर, प्रचार-प्रसार और प्रशासनिक अमले की उपस्थिति के लिए सरकारी खजाने का व्यय होता है। एक बार केंद्रीय गृह मंत्री के हाथों उद्घाटन के बाद, जिलों में वही रस्म फिर से दोहराना न केवल समय की बर्बादी है, बल्कि करदाताओं के धन का खुला दुरुपयोग भी है।
> *संवाद और संवादहीनता के बीच का यह फासला जनता समझ रही है। जब जनप्रतिनिधि जनसेवा से ज्यादा 'रिबन कटिंग' और 'फ्लैग ऑफ' में रुचि दिखाने लगें, तो समझ लेना चाहिए कि वे विकास के बजाय 'दृश्यता' की दौड़ में शामिल हो गए हैं। क्या जनता के पास इन व्यर्थ के आयोजनों का हिसाब मांगने का अधिकार नहीं है?*

क्या यह केंद्रीय नेतृत्व के प्रति एक प्रकार की अरुचि या अनादर का प्रदर्शन है—यह राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय हो सकता है। 
जब केंद्रीय गृह मंत्री की पहल को स्थानीय स्तर पर 'पुनः प्रमाणित' करने की होड़ मचे, तो यह एक प्रकार के 'सत्ता के संघर्ष' या 'क्रेडिट वॉर' को जन्म देता है।
यह व्यवहार केंद्रीय गृह मंत्री की गरिमा को कम करे या न करे, लेकिन यह स्थानीय नेताओं की उस 'आत्ममुग्धता' को जरूर प्रदर्शित करता है जहाँ वे खुद को व्यवस्था का केंद्र मान बैठे हैं। यदि यह महज जनसम्पर्क का एक प्रयास है, तो यह अत्यंत भोंडा है,और यदि यह केंद्रीय नेतृत्व के कद को छोटा दिखाने की कोई सुनियोजित रणनीति है, तो यह राजनीतिक अपरिपक्वता का चरमोत्कर्ष है।

अंततः, छत्तीसगढ़ की सड़कों पर दौड़ने वाली ये गाड़ियाँ जनता के लिए हैं, नेताओं के 'फोटो-ऑप्स' के लिए नहीं। यदि ये वाहन हरी झंडी दिखाए जाने के इंतजार में जिलों में खड़े रहे, तो यह प्रशासनिक विफलता है।
राजनीतिक शुचिता का तकाजा यह है कि नेता अपनी 'विजिबिलिटी' के बजाय 'एक्सेसिबिलिटी' पर ध्यान दें। जनता को हरी झंडी देखने में कोई दिलचस्पी नहीं है, उसे दिलचस्पी है तो इस बात में कि 112 डायल करने पर पुलिस या एम्बुलेंस कितनी जल्दी उसके दरवाजे पर पहुंचती है।
समय आ गया है कि हमारी राजनीति 'हरी झंडी' के प्रतीकों से ऊपर उठकर, जमीन पर उतरने वाले वास्तविक 'कार्यों' पर केंद्रित हो। वरना, जनता भी जल्द ही यह समझ जाएगी कि यह 'डायल 112' की सेवा कम और नेताओं के 'शो' का प्रदर्शन ज्यादा था।

मेधा का सम्मान या सियासत का 'फोटो-ऑप': कहाँ खो जाते हैं हमारे टॉपर?

*मेधा का सम्मान या सियासत का 'फोटो-ऑप': कहाँ खो जाते हैं हमारे टॉपर?*

*आलेख: खेमेश्वर पुरी गोस्वामी*
मुंगेली, छत्तीसगढ़ 


भारत के ग्रामीण अंचलों और मध्यमवर्गीय गलियों से जब कोई बच्चा बोर्ड परीक्षाओं या प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रदेश की मेरिट लिस्ट में स्थान बनाता है, तो वह केवल एक परिवार की सफलता नहीं होती। वह उस पूरे परिवेश की उम्मीदों का सूरज होता है। लेकिन विडंबना देखिए, जिस दिन परिणाम आता है, नेताओं और जन प्रतिनिधियों का तांता उस 'होनहार' के दरवाजे पर लग जाता है। मालाएं पहनाई जाती हैं, मिठाई के डिब्बे खुलते हैं और कैमरों की फ्लैश के बीच बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं।
किंतु, जैसे ही अखबार की सुर्खियां पुरानी पड़ती हैं और सोशल मीडिया की 'रील्स' बदलती हैं, वे वादे और वे नेता दोनों नदारद हो जाते हैं। पीछे छूट जाता है वह मेधावी छात्र, जो अपनी फटी जेब और बड़े सपनों के बीच फिर से अकेला खड़ा होता है।

राजनीतिक गलियारों में 'टॉपर' को एक उत्पाद की तरह इस्तेमाल करने की होड़ मची है। नेता अपनी 'इंसानियत' दिखाने के लिए फोटो तो खिंचवा लेते हैं, लेकिन छात्र की "सतत शैक्षणिक यात्रा" की जिम्मेदारी लेने से बचते हैं।शोध बताते हैं कि भारत में उच्च शिक्षा का खर्च पिछले एक दशक में तेजी से बढ़ा है। एक गरीब मेधावी बच्चा स्कूल तो टॉप कर लेता है, लेकिन मेडिकल, इंजीनियरिंग या शोध , रिसर्च जैसे क्षेत्रों की महंगी फीस उसके भविष्य की दीवार बन जाती है।

इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है जहाँ व्यवस्था की बेरुखी ने प्रतिभाओं का गला घोंटा है। जैसे बिहार के एक जिले के 'स्टेट टॉपर' की कहानी पिछले दिनों चर्चा में रही, जो आर्थिक तंगी के कारण आगे की पढ़ाई छोड़कर मनरेगा में मजदूरी करने पर मजबूर हुआ। उत्तर प्रदेश के एक मेधावी छात्र, जिसने गणित में शत-प्रतिशत अंक प्राप्त किए थे, आज एक ढाबे पर बर्तन धोने को विवश है क्योंकि उसके पास स्नातक की फीस भरने के लिए पैसे नहीं थे।
ये केवल दो नाम नहीं हैं, बल्कि उस तंत्र की विफलता के स्मारक हैं जो 'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ' या 'पढ़ेगा इंडिया तभी बढ़ेगा इंडिया' जैसे नारों के बीच अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेता है।

सवाल यह है कि क्या केवल एक बार का सम्मान और कुछ हजार रुपयों का चेक किसी छात्र के 'करियर' की गारंटी हो सकता है? कतई नहीं।
 सरकारें 'स्कॉलरशिप' की घोषणा तो करती हैं, लेकिन उसकी जटिल प्रक्रिया और भ्रष्टाचार छात्र तक मदद पहुँचने ही नहीं देता। शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी जब नौकरी की बारी आती है, तो सिफारिश और रसूख की राजनीति फिर आड़े आ जाती है।
जन प्रतिनिधियों के लिए ये बच्चे केवल 'वोट बैंक' को लुभाने के साधन बन गए हैं। यदि वे वास्तव में गंभीर होते, तो हर जिले में एक 'एजुकेशन टाॅपर्स फंड' होता जो केवल ऐसे वंचित मेधावियों के लिए आरक्षित रहता।

राजनीति को अपनी चमक बढ़ाने के लिए मासूम सपनों का इस्तेमाल बंद करना होगा। यदि कोई नेता किसी टॉपर के साथ फोटो खिंचवाता है, तो जनता को उससे यह पूछने का हक होना चाहिए कि उस छात्र की डिग्री पूरी होने तक का आर्थिक खाका क्या है?

मेहनत गरीब के बच्चे की होती है, पसीना उसका परिवार बहाता है, और श्रेय की मलाई राजनीति काटती है—यह खेल अब बंद होना चाहिए। प्रतिभाओं को केवल 'सम्मान' नहीं, 'संसाधन' चाहिए। विज्ञापन वाली राजनीति से इतर, जब तक हम इन बच्चों के भविष्य की 'हैंडहोल्डिंग' नहीं करेंगे, तब तक देश की मेधा इसी तरह मजदूरी की भेंट चढ़ती रहेगी।

*समय आ गया है कि नेतागिरी 'फोटोग्राफी' से निकलकर 'परोपकार' और 'नीति-निर्माण' के धरातल पर उतरे। क्योंकि एक मेधावी का टूटना, केवल एक छात्र की हार नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की बौद्धिक संपदा की हत्या है।*

डिजिटल चकाचौंध का मायाजाल और वास्तविकता की अनदेखी

डिजिटल चकाचौंध का मायाजाल और वास्तविकता की अनदेखी

लेखक: खेमेश्वर पुरी गोस्वामी 

आज के दौर में यदि आप सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं, तो अक्सर आपके मन में एक ही सवाल कौंधता होगा—क्या पूरी दुनिया रातों-रात अमीर हो गई है? इंस्टाग्राम की 'रील' और 'एक्स' (पूर्व ट्विटर) की फीड को स्क्रॉल करते ही हमें ऐसे युवा 'एंटरप्रेन्योर' और 'मेंटॉर' नजर आते हैं, जो अपनी उम्र से कहीं ज्यादा का अनुभव और सफलता का दावा करते हैं। लेकिन, स्क्रीन पर चमकती यह तस्वीर क्या वाकई वास्तविक है? या फिर यह एक ऐसा डिजिटल मायाजाल है, जिसमें उलझकर आज की युवा पीढ़ी अपना मानसिक सुकून खो रही है?

सोशल मीडिया की दुनिया में 'दिखावा' ही आज की सबसे बड़ी मुद्रा (करेंसी) बन गई है। रील बनाने के लिए लक्जरी गाड़ियों को किराए पर लेना, आईफोन ईएमआई पर खरीदना और किसी महंगे कैफे में महज एक कॉफी के सहारे घंटों रील शूट करना अब एक सामान्य चलन बन चुका है। यह 'फेक इट टिल यू मेक इट' (जब तक सफल न हो जाओ, तब तक सफलता का नाटक करो) वाली मानसिकता का ही विस्तार है। दुखद यह है कि इस दिखावे के पीछे अक्सर भारी कर्ज और मानसिक तनाव छिपा होता है।


आज इंटरनेट 'ज्ञान' की सबसे बड़ी दुकान बन चुका है। हैरानी की बात यह है कि जो लोग खुद अनुशासन के नाम पर शून्य हैं, वे सोशल मीडिया पर '5 AM Club' और उत्पादकता (प्रोडक्टिविटी) के सूत्र सिखा रहे हैं। बिना किसी जमीनी अनुभव के, चंद दिनों के 'मोटिवेशनल कोट्स' पढ़कर 'लाइफ कोच' बनने का यह धंधा युवाओं को गुमराह कर रहा है। इंटरनेट पर परोसा जा रहा यह सस्ता मोटिवेशन, वास्तविकता से कोसों दूर एक काल्पनिक दुनिया रच रहा है।


सोशल मीडिया पर दिखने वाली 'परफेक्ट' लाइफ, परफेक्ट कपल्स और परफेक्ट रिश्तों के पीछे का सच अक्सर बेहद कड़वा होता है। लाइक्स और व्यूज की भूख में लोग अपनी निजता, प्राइवेसी और मानवीय संबंधों की पवित्रता को दांव पर लगा रहे हैं। कैमरा बंद होते ही जो रिश्ते बिखरने लगते हैं, वे कैमरे के सामने 'मेड फॉर ईच अदर' का मुखौटा पहनकर सोशल मीडिया पर वाहवाही लूट रहे हैं। यह स्थिति समाज में एक ऐसे 'कृत्रिम व्यवहार' को जन्म दे रही है, जहाँ लोग अपनी वास्तविकता को स्वीकार करने में शर्मिंदगी महसूस करने लगे हैं।

इस पूरी कवायद का सबसे भयावह पहलू यह है कि इसका शिकार एक सामान्य मध्यमवर्गीय युवा हो रहा है। दिन के 10-12 घंटे मेहनत करने वाला एक ईमानदार युवक जब अपनी स्क्रीन पर दूसरों की 'सजावटी सफलता' देखता है, तो वह अनजाने में खुद को कमतर समझने लगता है। यही हीन भावना धीरे-धीरे अवसाद (डिप्रेशन) का रूप ले लेती है। उसे लगने लगता है कि वह जिंदगी की दौड़ में पीछे छूट गया है, जबकि वह यह भूल जाता है कि उसने जो देखा, वह केवल एक 'एडिटेड' और 'फिल्टर्ड' वर्जन था, न कि पूरी सच्चाई।

डिजिटल दुनिया के इस दौर में हमें यह समझने की आवश्यकता है कि सोशल मीडिया पर जो कुछ भी दिख रहा है, वह जीवन का केवल एक छोटा सा हिस्सा हो सकता है, अक्सर वह हिस्सा जो बहुत अधिक 'मैनीपुलेटेड' होता है। वास्तविक सफलता का पैमाना ईएमआई पर खरीदी गई गाड़ियां या रील के व्यूज नहीं हैं, बल्कि वास्तविक जीवन में हमारा काम, हमारा अनुशासन और हमारे अपनों के साथ हमारे रिश्ते हैं।
युवाओं को यह समझना होगा कि 'दिखावे की दौड़' में शामिल होने से बेहतर है 'स्वयं की उन्नति' पर ध्यान देना। रील के शोर में अपनी 'रीयल' दुनिया की शांति को खोना समझदारी नहीं है। अंततः, सफलता कोई ओवरनाइट शॉट नहीं, बल्कि धैर्य और निरंतरता की लंबी तपस्या है, जिसे रील्स के जरिए नहीं, बल्कि कड़ी मेहनत से अर्जित किया जाता है।

परीक्षाओं का 'महाकुंभ' और भविष्य का 'मृगतृष्णा'

परीक्षाओं का 'महाकुंभ' और भविष्य का 'मृगतृष्णा'


आलेख : खेमेश्वर पुरी गोस्वामी 
मुंगेली,छत्तीसगढ़ 8120032834


भारतीय युवा की नियति अब एक अजीबोगरीब चक्रव्यूह में फँस गई है। यदि महाभारत में अर्जुन के पास लक्ष्य भेदने का कौशल था, तो आज के युवा के पास केवल 'प्रवेश पत्र' है—एक ऐसा कागज, जो इस बात की गारंटी तो नहीं देता कि परीक्षा होगी, लेकिन इस बात का पक्का सबूत जरूर देता है कि वह फिर से छले जाने वाला है।
पिछले कुछ समय से देश में परीक्षाओं के आयोजन का अर्थ 'मेधा की परख' नहीं, बल्कि 'धैर्य की परीक्षा' रह गया है। NEET जैसी प्रतिष्ठित प्रवेश परीक्षा से लेकर SSC GD जैसी सरकारी नौकरियों की सीढ़ियों तक, पेपर लीक का जो दौर चला है, उसने एक नया 'नेशनल रिकॉर्ड' बना दिया है। ऐसा प्रतीत होता है कि अब सरकार की प्राथमिकता रोजगार सृजन नहीं, बल्कि 'परीक्षा प्रबंधन' है। पहले परीक्षा का आयोजन होता है, फिर प्रश्नपत्र बाजार में 'नीलामी' के लिए उपलब्ध होता है, और अंत में सरकार 'पवित्रता' बनाए रखने के नाम पर परीक्षा रद्द कर देती है।
यह एक ऐसा 'रद्द-चक्र' है, जहाँ युवा अपनी ऊर्जा, पैसा और जवानी झोंक देते हैं, और बदले में उन्हें मिलता है—फिर से आवेदन करने का 'सुनहरा अवसर'।
विडंबना देखिए, जिस उम्र में युवाओं को राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान देना चाहिए, वे सड़कों पर उतरकर 'न्याय' की मांग कर रहे हैं। सरकार के गलियारों में इसे 'अव्यवस्था' नहीं, शायद 'प्रशासनिक सतर्कता' कहा जाता होगा। जब पेपर लीक होता है, तो सिस्टम अपनी पीठ थपथपाता है कि "हमने समय रहते इसे पकड़ लिया"। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे कोई डॉक्टर ऑपरेशन थिएटर में मरीज को मारने के बाद कहे कि "सर्जरी तो सफल रही, बस मरीज मर गया।"
सरकारी आंकड़ों में रिक्तियों की संख्या जितनी तेजी से नहीं बढ़ती, उससे कहीं अधिक तेजी से 'रद्द की गई परीक्षाओं' की सूची लंबी हो रही है। ऐसा लगता है कि अब 'परीक्षा रद्द करना' ही सबसे बड़ा रोजगार बन गया है। इसमें पूरी मशीनरी व्यस्त है—प्रश्नपत्र बनाने से लेकर, उसे लीक करने, फिर रद्द करने और अंत में दोबारा परीक्षा की तारीख तय करने तक।
क्या यह देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं है? जब शिक्षा और रोजगार की प्रक्रिया ही 'अविश्वसनीयता' के बोझ तले दब जाए, तो राष्ट्र की प्रगति का पहिया भला कैसे घूमेगा? युवाओं के आक्रोश को केवल 'सड़कों पर प्रदर्शन' मानकर खारिज कर देना सरकार की बड़ी भूल होगी। उन्हें सड़कों पर उतरना नहीं, बल्कि पुस्तकालयों में बैठकर अपनी मेधा निखारनी चाहिए थी। लेकिन आज का तंत्र उन्हें 'छात्र' से 'प्रदर्शनकारी' बनने पर मजबूर कर रहा है।
समय आ गया है कि सरकार इस 'लीक संस्कृति' के रसूखदारों पर लगाम कसे। परीक्षा की शुचिता केवल कागजों पर या मंत्रियों के बयानों में नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर दिखनी चाहिए। यदि तंत्र अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा सका, तो आने वाला इतिहास इस दौर को 'सुनहरा काल' नहीं, बल्कि 'डिग्री-धारियों की बेरोजगारी और भविष्य के अपहरण का काल' कहकर याद रखेगा।
युवाओं का धैर्य अब उस कगार पर है जहाँ से आक्रोश की ज्वाला निकलती है। सरकार को यह समझना होगा कि एक पीढ़ी का भविष्य 'रद्द' करके, किसी भी राष्ट्र की नियति कभी 'पास' नहीं की जा सकती।

'दुख' का बाजार और संवेदनाओं के सन्नाटे का 'रेट लिस्ट'

*'दुख' का बाजार और संवेदनाओं के सन्नाटे का 'रेट लिस्ट'* आलेख : खेमेश्वर पुरी गोस्वामी मुंगेली, छत्तीसगढ़ ८१२००३२८३४ छत्तीसगढ...