आलेख : खेमेश्वर पुरी गोस्वामी
मुंगेली, छत्तीसगढ़ ८१२००३२८३४
छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले से सोशल मीडिया के गलियारों तक तैरता एक विज्ञापन इन दिनों विमर्श के केंद्र में है। एक व्यक्ति ने 'दुख सुनने' को बाकायदा एक पेशे का रूप दे दिया है—वह भी बकायदा रेट लिस्ट के साथ। पहली नजर में यह हास्यास्पद लग सकता है, लेकिन यदि संजीदगी से विचार करें, तो यह हमारे उस 'आधुनिक' समाज की सबसे बड़ी त्रासदी है, जहां तकनीक ने दुनिया को मुट्ठी में तो कर दिया, पर दिलों के बीच की दूरियां मीलों लंबी कर दी हैं।
उस विज्ञापन की इबारत गौर करने लायक है—"दुख कोई भी हो, किसी का भी हो, मैं सुनूंगा।" सुनने की इस प्रक्रिया के लिए ₹500 से लेकर ₹12000 तक का शुल्क निर्धारित है। यह विडंबना ही है कि जिस समाज में कभी बड़े-बुजुर्गों की चौपालें और पड़ोसियों का 'कंधा' बिना किसी मोल के उपलब्ध रहता था, वहां अब 'कान' किराए पर लेने पड़ रहे हैं। क्या हम इतने अकेले हो गए हैं कि अपनी पीड़ा साझा करने के लिए हमें सशुल्क श्रोता की आवश्यकता है? यह विज्ञापन उस मानसिक कंगाली का परिचायक है, जहां हमारे पास 'फेसबुक फ्रेंड्स' तो हजारों हैं, लेकिन दुख बांटने के लिए एक भी सच्चा इंसान नहीं।
आज हम सूचना क्रांति के युग में जी रहे हैं। 5जी की रफ्तार वाले इस दौर में सूचनाएं तो तेजी से पहुंच रही हैं, लेकिन भावनाएं बीच रास्ते में ही दम तोड़ रही हैं। महानगरों की बहुमंजिला इमारतों से लेकर छोटे शहरों के ड्राइंग रूम तक, संवादहीनता का एक गहरा सन्नाटा पसरा है। परिवार के सदस्य एक ही छत के नीचे बैठकर एक-दूसरे को देखने के बजाय मोबाइल स्क्रीन पर 'इमोजी' के जरिए भावनाएं व्यक्त कर रहे हैं। जब अपनों के पास सुनने का धैर्य नहीं बचा, तो स्वाभाविक है कि 'दुख सुनने वाले' बाजार में अपनी दुकान सजाएंगे ही।
मार्केटिंग के इस दौर में सब कुछ बिकाऊ है—हंसी भी और आंसू भी। दुर्ग के इस 'दुखियारे के साथी' ने दरअसल उस बाजार को पहचाना है, जिसे हमारी उपेक्षा ने पैदा किया है। इसे केवल एक व्यक्ति की चतुराई कहना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि यह हमारे सामाजिक पतन का अलार्म है। यदि आत्मीयता का स्थान अर्थशास्त्र ले ले, तो समझ लेना चाहिए कि मानवीय संवेदनाएं वेंटिलेटर पर हैं।
यह विज्ञापन एक व्यंग्य है उस व्यवस्था पर, जहां हम भौतिक समृद्धि के शिखर पर तो पहुंच गए, पर भावनात्मक रूप से दरिद्र हो गए। यह हमें आइना दिखाता है कि यदि हमने समय रहते अपनों को 'वक्त' देना शुरू नहीं किया, तो भविष्य में संवेदनाओं की बोली ऐसे ही सरेआम लगती रहेगी। दुख सुनने के लिए किसी को पैसे देना उस 'बीमारी' का इलाज नहीं है, बल्कि उस 'अकेलेपन' की पुष्टि है, जिसे हमने खुद ओढ़ा है।
> *तल्ख हकीकत यह है कि आज इंसान के पास अपनी बात कहने के लिए 'स्टेटस' तो है, पर सुनने के लिए कोई 'रिश्ता' नहीं बचा।*
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