Friday, July 10, 2026

शहर या तालाब? बेतरतीब शहरीकरण और जल निकासी की विफलता

शहर या तालाब? बेतरतीब शहरीकरण और जल निकासी की विफलता

​लेखक: खेमेश्वर पुरी गोस्वामी 
मुंगेली छत्तीसगढ़ 8120032834

​मानसून की पहली कुछ बौछारें अक्सर मन को राहत देने वाली होती हैं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में भारतीय शहरों के लिए ये बौछारें 'आफत की बारिश' बनकर आ रही हैं। दिल्ली की पॉश कॉलोनियों से लेकर मुंबई की सड़कों तक और रायपुर के निचले इलाकों से लेकर बेंगलुरु के आईटी हब तक, हर शहर की कहानी एक जैसी है—आधे घंटे की मूसलाधार बारिश और सड़कें किसी विशाल तालाब में तब्दील। प्रश्न यह है कि क्या हमारा शहरी नियोजन (Urban Planning) प्रकृति की चुनौतियों के सामने घुटने टेक चुका है, या फिर यह 'विकास' की अंधी दौड़ में हमने अपनी ही कब्र खुद खोदी है?
आज हमारे शहर 'स्मार्ट' होने का दावा तो करते हैं, लेकिन उनकी धमनियां यानी जल निकासी व्यवस्था पूरी तरह 'मृत' हो चुकी हैं। हमने कंक्रीट के जंगल खड़े करने के लिए प्राकृतिक ढलानों को पाट दिया, जलभराव वाले तालाबों को मिट्टी से भरकर वहां बहुमंजिला इमारतें खड़ी कर दीं और शहरी विस्तार के नाम पर कुदरती जल निकासी के रास्तों को अवरुद्ध कर दिया। जब पृथ्वी की सतह को कंक्रीट की चादर से ढक दिया जाएगा, तो बारिश का पानी आखिर कहाँ जाएगा? धरती तो अब पानी सोखने के लिए बची ही नहीं है।
भारतीय शहरों का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि यहाँ 'विकास' का मतलब सिर्फ फ्लाईओवर और ऊंची इमारतें हो गई हैं, जबकि जल संचयन, सीवरेज नेटवर्क और स्टॉर्म वॉटर ड्रेनेज जैसी बुनियादी चीजों को हमेशा हाशिए पर रखा गया। दशकों पुराने ड्रेनेज सिस्टम पर आज की आबादी का भार है। नगर निगमों की सुस्ती का आलम यह है कि हर साल मानसून से पहले नालों की सफाई के नाम पर करोड़ों रुपये पानी में बहा दिए जाते हैं, लेकिन परिणाम वही 'ढाक के तीन पात'। अर्बन फ्लडिंग अब केवल प्रकृति का प्रकोप नहीं है, यह प्रशासनिक विफलता का जीता-जागता प्रमाण है।
जलवायु परिवर्तन ने मानसून के मिजाज को पूरी तरह बदल दिया है। 'कम समय में अत्यधिक बारिश' की घटनाएं अब आम हो गई हैं। हमारे पुराने शहर इस नई जलवायु वास्तविकता के लिए तैयार नहीं हैं। जब तक हम 'स्पंज सिटी' की अवधारणा—जहाँ शहर खुद पानी को सोखने और उसे संचित करने की क्षमता रखे—को नहीं अपनाएंगे, तब तक हर साल हम यही त्रासदी झेलने के लिए अभिशप्त रहेंगे।
शहरों को तालाब बनने से बचाने के लिए अब केवल खोखले वादों से काम नहीं चलेगा। पहली जरूरत है—शहरों के मास्टर प्लान का पुनर्निरीक्षण, जिसमें 'नेचर-बेस्ड सॉल्यूशंस' को प्राथमिकता दी जाए। वेटलैंड्स (आर्द्रभूमि) का संरक्षण अनिवार्य है, क्योंकि ये शहर के 'फेफड़े' और 'किडनी' दोनों का काम करते हैं। साथ ही, अतिक्रमण मुक्त ड्रेनेज और वर्षा जल संचयन को अनिवार्य रूप से लागू करना होगा।
शहरों का जलमग्न होना इस बात का अलार्म है कि हम प्रकृति के साथ संतुलन बनाने में बुरी तरह विफल रहे हैं। यदि समय रहते हमने जल निकासी की बुनियादी संरचना में सुधार नहीं किया, तो आने वाले समय में हमारे शहर रहने योग्य नहीं, बल्कि डूबने योग्य रह जाएंगे। विकास की चमक-धमक के नीचे दबी इस 'जल-त्रासदी' को अनदेखा करना अब आने वाली पीढ़ियों के प्रति एक बड़ा अपराध होगा। क्या हम अभी भी नहीं जागेंगे?

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