*आलेख: खेमेश्वर पुरी गोस्वामी*
मुंगेली, छत्तीसगढ़
भारत के ग्रामीण अंचलों और मध्यमवर्गीय गलियों से जब कोई बच्चा बोर्ड परीक्षाओं या प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रदेश की मेरिट लिस्ट में स्थान बनाता है, तो वह केवल एक परिवार की सफलता नहीं होती। वह उस पूरे परिवेश की उम्मीदों का सूरज होता है। लेकिन विडंबना देखिए, जिस दिन परिणाम आता है, नेताओं और जन प्रतिनिधियों का तांता उस 'होनहार' के दरवाजे पर लग जाता है। मालाएं पहनाई जाती हैं, मिठाई के डिब्बे खुलते हैं और कैमरों की फ्लैश के बीच बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं।
किंतु, जैसे ही अखबार की सुर्खियां पुरानी पड़ती हैं और सोशल मीडिया की 'रील्स' बदलती हैं, वे वादे और वे नेता दोनों नदारद हो जाते हैं। पीछे छूट जाता है वह मेधावी छात्र, जो अपनी फटी जेब और बड़े सपनों के बीच फिर से अकेला खड़ा होता है।
राजनीतिक गलियारों में 'टॉपर' को एक उत्पाद की तरह इस्तेमाल करने की होड़ मची है। नेता अपनी 'इंसानियत' दिखाने के लिए फोटो तो खिंचवा लेते हैं, लेकिन छात्र की "सतत शैक्षणिक यात्रा" की जिम्मेदारी लेने से बचते हैं।शोध बताते हैं कि भारत में उच्च शिक्षा का खर्च पिछले एक दशक में तेजी से बढ़ा है। एक गरीब मेधावी बच्चा स्कूल तो टॉप कर लेता है, लेकिन मेडिकल, इंजीनियरिंग या शोध , रिसर्च जैसे क्षेत्रों की महंगी फीस उसके भविष्य की दीवार बन जाती है।
इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है जहाँ व्यवस्था की बेरुखी ने प्रतिभाओं का गला घोंटा है। जैसे बिहार के एक जिले के 'स्टेट टॉपर' की कहानी पिछले दिनों चर्चा में रही, जो आर्थिक तंगी के कारण आगे की पढ़ाई छोड़कर मनरेगा में मजदूरी करने पर मजबूर हुआ। उत्तर प्रदेश के एक मेधावी छात्र, जिसने गणित में शत-प्रतिशत अंक प्राप्त किए थे, आज एक ढाबे पर बर्तन धोने को विवश है क्योंकि उसके पास स्नातक की फीस भरने के लिए पैसे नहीं थे।
ये केवल दो नाम नहीं हैं, बल्कि उस तंत्र की विफलता के स्मारक हैं जो 'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ' या 'पढ़ेगा इंडिया तभी बढ़ेगा इंडिया' जैसे नारों के बीच अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेता है।
सवाल यह है कि क्या केवल एक बार का सम्मान और कुछ हजार रुपयों का चेक किसी छात्र के 'करियर' की गारंटी हो सकता है? कतई नहीं।
सरकारें 'स्कॉलरशिप' की घोषणा तो करती हैं, लेकिन उसकी जटिल प्रक्रिया और भ्रष्टाचार छात्र तक मदद पहुँचने ही नहीं देता। शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी जब नौकरी की बारी आती है, तो सिफारिश और रसूख की राजनीति फिर आड़े आ जाती है।
जन प्रतिनिधियों के लिए ये बच्चे केवल 'वोट बैंक' को लुभाने के साधन बन गए हैं। यदि वे वास्तव में गंभीर होते, तो हर जिले में एक 'एजुकेशन टाॅपर्स फंड' होता जो केवल ऐसे वंचित मेधावियों के लिए आरक्षित रहता।
राजनीति को अपनी चमक बढ़ाने के लिए मासूम सपनों का इस्तेमाल बंद करना होगा। यदि कोई नेता किसी टॉपर के साथ फोटो खिंचवाता है, तो जनता को उससे यह पूछने का हक होना चाहिए कि उस छात्र की डिग्री पूरी होने तक का आर्थिक खाका क्या है?
मेहनत गरीब के बच्चे की होती है, पसीना उसका परिवार बहाता है, और श्रेय की मलाई राजनीति काटती है—यह खेल अब बंद होना चाहिए। प्रतिभाओं को केवल 'सम्मान' नहीं, 'संसाधन' चाहिए। विज्ञापन वाली राजनीति से इतर, जब तक हम इन बच्चों के भविष्य की 'हैंडहोल्डिंग' नहीं करेंगे, तब तक देश की मेधा इसी तरह मजदूरी की भेंट चढ़ती रहेगी।
*समय आ गया है कि नेतागिरी 'फोटोग्राफी' से निकलकर 'परोपकार' और 'नीति-निर्माण' के धरातल पर उतरे। क्योंकि एक मेधावी का टूटना, केवल एक छात्र की हार नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की बौद्धिक संपदा की हत्या है।*
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