Wednesday, May 27, 2026

डिजिटल चकाचौंध का मायाजाल और वास्तविकता की अनदेखी

डिजिटल चकाचौंध का मायाजाल और वास्तविकता की अनदेखी

लेखक: खेमेश्वर पुरी गोस्वामी 

आज के दौर में यदि आप सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं, तो अक्सर आपके मन में एक ही सवाल कौंधता होगा—क्या पूरी दुनिया रातों-रात अमीर हो गई है? इंस्टाग्राम की 'रील' और 'एक्स' (पूर्व ट्विटर) की फीड को स्क्रॉल करते ही हमें ऐसे युवा 'एंटरप्रेन्योर' और 'मेंटॉर' नजर आते हैं, जो अपनी उम्र से कहीं ज्यादा का अनुभव और सफलता का दावा करते हैं। लेकिन, स्क्रीन पर चमकती यह तस्वीर क्या वाकई वास्तविक है? या फिर यह एक ऐसा डिजिटल मायाजाल है, जिसमें उलझकर आज की युवा पीढ़ी अपना मानसिक सुकून खो रही है?

सोशल मीडिया की दुनिया में 'दिखावा' ही आज की सबसे बड़ी मुद्रा (करेंसी) बन गई है। रील बनाने के लिए लक्जरी गाड़ियों को किराए पर लेना, आईफोन ईएमआई पर खरीदना और किसी महंगे कैफे में महज एक कॉफी के सहारे घंटों रील शूट करना अब एक सामान्य चलन बन चुका है। यह 'फेक इट टिल यू मेक इट' (जब तक सफल न हो जाओ, तब तक सफलता का नाटक करो) वाली मानसिकता का ही विस्तार है। दुखद यह है कि इस दिखावे के पीछे अक्सर भारी कर्ज और मानसिक तनाव छिपा होता है।


आज इंटरनेट 'ज्ञान' की सबसे बड़ी दुकान बन चुका है। हैरानी की बात यह है कि जो लोग खुद अनुशासन के नाम पर शून्य हैं, वे सोशल मीडिया पर '5 AM Club' और उत्पादकता (प्रोडक्टिविटी) के सूत्र सिखा रहे हैं। बिना किसी जमीनी अनुभव के, चंद दिनों के 'मोटिवेशनल कोट्स' पढ़कर 'लाइफ कोच' बनने का यह धंधा युवाओं को गुमराह कर रहा है। इंटरनेट पर परोसा जा रहा यह सस्ता मोटिवेशन, वास्तविकता से कोसों दूर एक काल्पनिक दुनिया रच रहा है।


सोशल मीडिया पर दिखने वाली 'परफेक्ट' लाइफ, परफेक्ट कपल्स और परफेक्ट रिश्तों के पीछे का सच अक्सर बेहद कड़वा होता है। लाइक्स और व्यूज की भूख में लोग अपनी निजता, प्राइवेसी और मानवीय संबंधों की पवित्रता को दांव पर लगा रहे हैं। कैमरा बंद होते ही जो रिश्ते बिखरने लगते हैं, वे कैमरे के सामने 'मेड फॉर ईच अदर' का मुखौटा पहनकर सोशल मीडिया पर वाहवाही लूट रहे हैं। यह स्थिति समाज में एक ऐसे 'कृत्रिम व्यवहार' को जन्म दे रही है, जहाँ लोग अपनी वास्तविकता को स्वीकार करने में शर्मिंदगी महसूस करने लगे हैं।

इस पूरी कवायद का सबसे भयावह पहलू यह है कि इसका शिकार एक सामान्य मध्यमवर्गीय युवा हो रहा है। दिन के 10-12 घंटे मेहनत करने वाला एक ईमानदार युवक जब अपनी स्क्रीन पर दूसरों की 'सजावटी सफलता' देखता है, तो वह अनजाने में खुद को कमतर समझने लगता है। यही हीन भावना धीरे-धीरे अवसाद (डिप्रेशन) का रूप ले लेती है। उसे लगने लगता है कि वह जिंदगी की दौड़ में पीछे छूट गया है, जबकि वह यह भूल जाता है कि उसने जो देखा, वह केवल एक 'एडिटेड' और 'फिल्टर्ड' वर्जन था, न कि पूरी सच्चाई।

डिजिटल दुनिया के इस दौर में हमें यह समझने की आवश्यकता है कि सोशल मीडिया पर जो कुछ भी दिख रहा है, वह जीवन का केवल एक छोटा सा हिस्सा हो सकता है, अक्सर वह हिस्सा जो बहुत अधिक 'मैनीपुलेटेड' होता है। वास्तविक सफलता का पैमाना ईएमआई पर खरीदी गई गाड़ियां या रील के व्यूज नहीं हैं, बल्कि वास्तविक जीवन में हमारा काम, हमारा अनुशासन और हमारे अपनों के साथ हमारे रिश्ते हैं।
युवाओं को यह समझना होगा कि 'दिखावे की दौड़' में शामिल होने से बेहतर है 'स्वयं की उन्नति' पर ध्यान देना। रील के शोर में अपनी 'रीयल' दुनिया की शांति को खोना समझदारी नहीं है। अंततः, सफलता कोई ओवरनाइट शॉट नहीं, बल्कि धैर्य और निरंतरता की लंबी तपस्या है, जिसे रील्स के जरिए नहीं, बल्कि कड़ी मेहनत से अर्जित किया जाता है।

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