Sunday, June 14, 2026

॥ श्री शिव स्तुति ॥ शार्दूलविक्रीडित,वसन्ततिलका छंद मिश्रित

​॥ श्री शिव स्तुति ॥

​जटाजालमध्ये वहति सुरनदी फेनधवला,
फणीन्द्रैः कण्ठालङ्कृतमिह विकालं च वपुषम्।
डमरू-ध्वनि-नादैरथ चण्ड-ताण्डव-रतं,
नमामि त्वं साक्षाच्छिवं महाकाल-रूपम् ॥१॥

​जटाजूटे गङ्गा लहरि-लहरी-खेलन-वती,
ललाटे चन्द्रोऽयं मलयज-सुगन्धोऽमृत-करः।
प्रदीप्ताग्नि-ज्वाला दहति मदनं भाल-विवरे,
प्रसीद त्वं देवं मम हृदये ध्यामि सततम ॥२॥

​गिरिराज-सुता-चित्त-रञ्जन-परं, सुखाधार-शिवं,
कृपा-दृष्टि-पातेन हरसि सकलं दुःख-जालम्।
तजित्वैव संसार-भीतिं विहाय, अहमेव सदा,
भजे विश्वनाथं हरं मोक्षदं दिव्य-रूपम् ॥३॥

​स्फुरन्मणिरत्न-प्रभा-रञ्जितं, दिशो वदनं यस्य,
गजाजिन-वस्त्रं तद्द्भुतं रूपमस्य सुशोभितम्।
विभूति-विलेपं धत्ते भूतनाथः स्वयं यः,
अचिन्त्यं सुभावं भजे शङ्करं देव-देवम् ॥४॥

​सुरेन्द्र-मुनीन्द्राः नतं यस्य पादं, धरन्तीह रेणुं,
जटाजूट-धृत्वा शशि-चकोर-कलां मोदमानाः।
भुजङ्गैः सुबद्धोऽथ कण्ठे विराजन्,
भजे तं शिवं शान्त-भावं मनोऽभिष्ट-दं मे ॥५॥

​ललाटे ज्वलन्ती ज्वलज्ज्वालमाला,
महाकाल-तेजः क्षयं कामदेवम्।
सुर-सिद्ध-संघे नतं तं सदा वै,
जटा-गुल्म-धारी हरं नूतनाहम् ॥६॥

​धगद्-धगद्-धगद्-धगद्-ज्वलच्छिखा-भाले,
मदनस्य बाणैः पुनरहुतिं ददाति।
गौरी-कुच-चित्र-लेखन-कुशलोऽसौ,
शिल्पी-वरोऽयं हरः प्राण-रूपः ॥७॥

​नव-मेघ-श्यामं तव कण्ठ-मूलं,
अमावास्या-वत् कान्ति-युक्तं च नित्यम्।
गजासुर-हन्तारं गङ्गा-धरं तं,
जगदाधार-रूपं भजे दुःख-शमनम् ॥८॥

​नीलोत्पल-दल-श्यामं कण्ठमस्य विलोक्यते,
कामस्य त्रिपुरस्यापि विनाशी देव-पूजितः।
दक्ष-यज्ञ-विनाशी च अन्तकस्यापि कालकः,
भजेऽहं भव-भीति-हारिणमखण्डं शिवं सदा ॥९॥

​मङ्गलायाः कलाभिर्युतं भृङ्ग-तुल्यं,
रसज्ञं प्रपन्नं रस-पान-लीनम्।
यमादीन् विजित्य स्थितं तं विभूतिं,
भजेऽन्तकस्याप्यन्तकं देव-नाथम् ॥१०॥

​फणोच्छ्वास-युक्तैः भुजङ्गैः समेतं,
मृदङ्गस्य नादैरथ ताण्डव-मग्नम्।
प्रचण्ड-प्रभावं कपालं धरन्तं,
शिवं मङ्गलं मङ्गलं सर्वदा मे ॥११॥

​सर्प-हार-रत्न-माला स्वर्ण-मृत्तिका-तुल्य-भावः,
शत्रु-मित्र-तुल्य-दृष्टिः सर्वदा समभावा।
सम-दृष्टि-स्थितं देवं चक्रवर्ति-रक्षकं,
भजे सदाशिवं भेद-हीनं च नित्यम् ॥१२॥

​गङ्गा-तटे कुञ्ज-गृहे वसामि,
मन्त्रं जपन् हस्त-युतं च शीर्षणम्।
त्यक्त्वा नयन-चापलं ध्यान-युक्तं,
प्राप्नोमि शिव-पदं सुख-रूपं सदा ॥१३॥

​इदं स्तोत्रं नित्यं पठति नर-देवः सुख-करम्,
विशुद्धः स आत्मा भवति शिव-भक्तिं च लभते।
मोह-जालं छित्वा मुक्तिं ददाति शम्भुः,
शरणं गच्छति तं परम-गतिं लभते नृपः ॥१४॥

​॥ इति -खेमेश्वर-पुरी-गोस्वामी-विरचिता श्री शिव स्तुतिः संपूर्णा ॥

भावार्थ 
 
१. जिनकी जटाओं में फेन जैसी श्वेत गंगा बहती है, जिनका कंठ सर्पों से सुशोभित है और जिनका रूप विकराल है, जो डमरू की ध्वनि के साथ तांडव में लीन रहते हैं, मैं उन महाकाल रूप साक्षात् शिव को प्रणाम करता हूँ।

२. जिनकी जटाओं में गंगा की लहरें क्रीड़ा करती हैं, जिनके मस्तक पर चंद्रमा विराजमान है और जो चंदन की सुगंध से सुवासित हैं। जिनके ललाट की अग्नि ने कामदेव को भस्म कर दिया, मैं उन देव को अपने हृदय में निरंतर धारण करता हूँ।

३. जो गिरिराज-पुत्री पार्वती के चित्त को प्रसन्न करने वाले और सुख के आधार हैं, जो अपनी कृपा दृष्टि से सभी दुखों को हर लेते हैं। मैं संसार के भय को त्यागकर, उन विश्वनाथ, मोक्ष प्रदाता और दिव्य रूप धारी शिव का भजन करता हूँ।

४. जिनके मुख की आभा मणियों और रत्नों की कांति से दिशाओं को प्रकाशित करती है, जो गजचर्म (हाथी की खाल) धारण करते हैं। जिनका शरीर विभूति (भस्म) से लिप्त है, मैं उन अचिंत्य, भूतनाथ शंकर को भजता हूँ।

५. जिनके चरणों को देवता और मुनि नमन करते हैं और जो जटाओं में चंद्रमा की कला को धारण कर प्रसन्न रहते हैं। जिनका कंठ सर्पों से सुशोभित है, मैं उन शांत भाव वाले शिव का भजन करता हूँ, जो मेरे मन की सभी इच्छाएं पूरी करें।

६. जिनके ललाट पर प्रज्वलित अग्नि की ज्वालाएँ कामदेव के विनाश का कारण बनीं, देवताओं और सिद्धों द्वारा पूजित, जटाओं को धारण करने वाले उन हर (शिव) को मैं निरंतर नमन करता हूँ।

७. जिनके ललाट पर 'धगद्-धगद्' शब्द करती हुई अग्नि की शिखाएँ हैं, जो कामदेव को पुन: भस्म कर देते हैं। जो गौरी (पार्वती) के अंगों पर चित्रकारी करने में कुशल हैं, वे शिल्पकार स्वरूप महादेव ही मेरे प्राण हैं।

८. जिनका कंठ नए मेघों के समान श्याम वर्ण का है, जो अमावस्या की भांति नित्य कांतिमान हैं। जो गजासुर का वध करने वाले और गंगा को धारण करने वाले हैं, मैं उन दुःख विनाशक जगत के आधार शिव का भजन करता हूँ।

९. जिनका कंठ नीले कमल के समान श्याम है, जो कामदेव और त्रिपुर के विनाशक हैं। जिन्होंने दक्ष के यज्ञ को नष्ट किया और जो यमराज के लिए भी काल हैं, मैं उन भव-भय से मुक्ति दिलाने वाले अखंड शिव का सदा भजन करता हूँ।

१०. जो कल्याणकारी कलाओं से युक्त, भृंग (भौरे) के समान रसज्ञ और आत्म-लीन हैं। जिन्होंने यम आदि को जीत लिया है और जो काल के भी काल हैं, मैं उन देव-नाथ का भजन करता हूँ।

११. जो सर्पों से युक्त हैं, मृदंग की थाप पर ताण्डव में मग्न हैं और हाथ में कपाल धारण किए हुए प्रचंड प्रभावशाली हैं, वे मंगलकारी शिव सदैव मेरा कल्याण करें।

१२. जो सर्प और रत्नों की माला धारण करते हैं, जिन्हें शत्रु और मित्र में कोई भेद नहीं है। जो सदैव समदर्शी हैं और संसार की रक्षा करने वाले हैं, मैं उन भेद-रहित सदाशिव का नित्य भजन करता हूँ।

१३. मैं गंगा तट के कुंज में निवास कर, शिव मंत्र का जप करते हुए अपने मन को चंचलता से हटाकर ध्यान में लीन रहता हूँ। इस प्रकार मैं उस सुख-स्वरूप शिव पद को प्राप्त करता हूँ।

१४. जो मनुष्य नित्य इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसका अंतःकरण शुद्ध हो जाता है और उसे शिव-भक्ति प्राप्त होती है। शम्भु उसके मोह के जाल को काटकर उसे मुक्ति प्रदान करते हैं और वह परम गति को प्राप्त होता है।

सर्वाधिकार सुरक्षित :  खेमेश्वर पुरी गोस्वामी 
मुंगेली, छत्तीसगढ़,८१२००३२८३४

श्री शिव स्तुति (अनुष्टुप छंद)


॥ श्री शिव स्तुति ॥

जटायां गंग-धारैव, नाग-हारो गले स्थितः।
डमरू-नाद-संयुक्तो, ताण्डवः शिव-शङ्करः ॥१॥

ललाटे चन्द्रमा भाति, गंगा-लहरी-शोभिता।
अग्नि-ज्वाला-जटालोऽयं, महादेवः प्रसीदतु ॥२॥

गिरीश-सुख-दः शम्भुः, कृपया हरते व्यथाम्।
अम्बर-स्थित-विश्वेशो, भव-भीतिं विनाशयेत् ॥३॥

मणि-दीप्तैः फणैः पूर्णः, गज-चर्माम्बरो हरः।
भूतनाथः प्रभुः साक्षाद्, अद्भुतं रूपमास्थितः ॥४॥

देवेन्द्राः नम्र-शीर्षाश्च, पाद-रेणुं प्रपद्यते।
चन्द्र-कला-विराजन्ते, जटा-जूटे च शोभनाः ॥५॥

भाल-पट्ट-स्थित-ज्वालैः, कामदेवो भस्मीकृतः।
मुनि-सिद्ध-गणैर्वन्दितः, जटा-जालो विराजते ॥६॥

अग्नि-ज्वाला-धगधगिता, काम-दहन-तत्परः।
पार्वती-चित्त-हर्ता च, शिवः शोभा-समन्वितः ॥७॥

नीलकण्ठो मेघ-वर्णः, अमावास्या-तमः-प्रभः।
गजासुर-हरः शम्भुः, जगदाधार-रूपकः ॥८॥

नील-पद्म-निभः कण्ठः, त्रिपुरासुर-नाशकः।
दक्ष-यज्ञ-हरः देवो, भव-भय-निवारकः ॥९॥

मंगला-रस-सिक्तश्च, भृङ्गरूपो महेश्वरः।
यम-काल-हरः श्रीमान्, अन्तकस्यापि अन्तकः ॥१०॥

नाग-राज-फुत्कारात्, भाल-अग्नि-प्रदीपनम्।
मृदंग-नाद-तालेन, ताण्डवः शिव-शङ्करः ॥११॥

सर्प-रत्न-समस्तं च, शत्रु-मित्रं समांशतः।
सम-दृष्टिः सदाशिवो, भेद-भाव-विवर्जितः ॥१२॥

गंग-तट-विहारोऽहं, मन्त्रं गास्यामि नित्यशः।
चन्द्र-भालं सदा ध्यात्वा, प्राप्स्यामि शिव-सद्गतिम् ॥१३॥

इदं स्तोत्रं पठेद यस्तु, शुद्ध-बुद्धिः प्रजायते।
मोह-जालं विनिर्मुच्य, शिव-सान्निध्यमाप्नुयात् ॥१४॥

॥ इति -खेमेश्वरपुरी-गोस्वामी-विरचिता श्री शिव-स्तुतिः सम्पूर्णा ॥

भावार्थ
​१. जिनकी जटाओं में गंगाजी विराजमान हैं, गले में नागों का हार सुशोभित है, जिनके डमरू की ध्वनि से संपूर्ण सृष्टि गुंजायमान होती है, वे ताण्डव करते हुए शिव-शङ्कर को मेरा नमन है।

​२. जिनके ललाट पर चंद्रमा चमकता है और गंगा की लहरें सुशोभित होती हैं, जिनकी जटाओं में अग्नि की ज्वालाएं प्रज्वलित रहती हैं, वे महादेव मुझ पर प्रसन्न हों।

​३. पर्वतों के स्वामी, सुख प्रदान करने वाले शम्भु, कृपा करके मेरी व्यथाओं को दूर करें। आकाश में स्थित, विश्व के ईश्वर, संसार के भय को नष्ट करें।

​४. जो मणियों से चमकते फण वाले नागों से सुसज्जित हैं, जिन्होंने गज-चर्म (हाथी की खाल) को वस्त्र के रूप में धारण किया है, वे भूतों के स्वामी प्रभु साक्षात् अद्भुत रूप में स्थित हैं।

​५. इंद्र जैसे देवता भी जिनके चरणों में नतमस्तक होकर चरणों की धूलि लेते हैं, जिनकी जटाओं में चंद्रमा की कलाएं अत्यंत शोभा पाती हैं।

​६. जिनके भाल (मस्तक) पर स्थित ज्वालाओं से कामदेव भस्म हो गए थे, मुनियों और सिद्धों के समूहों द्वारा वंदित, जटाओं के जाल में सुशोभित वे प्रभु को नमन है।

​७. अग्नि की ज्वालाओं से 'धग-धग' शब्द करते हुए, कामदेव का दहन करने के लिए तत्पर, पार्वतीजी के चित्त को हरने वाले, वे शिवजी परम शोभा से युक्त हैं।

​८. जिनका कंठ नील वर्ण का है, जो मेघ के समान गंभीर हैं, जिनका तेज अमावस की रात्रि के अंधकार के समान गहरा है, वे गजासुर का संहार करने वाले और जगत के आधार स्वरूप शम्भु को नमन है।

​९. जिनका कंठ नील कमल के समान है, जो त्रिपुरासुर का नाश करने वाले, दक्ष के यज्ञ को नष्ट करने वाले, और भव (संसार) के भय का निवारण करने वाले देव हैं।

​१०. जो कल्याणकारी रस में सिक्त हैं, भृंगी (शिवभक्त) रूप धारण करने वाले महेश्वर, काल के भी काल और यमराज के भी अंत करने वाले श्रीमान प्रभु को प्रणाम है।

​११. नागराज के फुफकारने से जिनके मस्तक की अग्नि प्रदीप्त होती है, मृदंग के नाद और ताल पर जो ताण्डव करते हैं, वे शिव-शङ्कर हैं।

​१२. जो सांपों के रत्न और अन्य सभी वस्तुओं में, शत्रु और मित्र में समान भाव रखते हैं। वे सदाशिव समदृष्टि हैं और भेद-भाव से रहित हैं।

​१३. मैं गंगा तट पर विहार करते हुए नित्य इस मंत्र का गान करूँगा। चंद्रमा को मस्तक पर धारण करने वाले शिव का ध्यान कर, मैं निश्चित ही शिव-सद्गति को प्राप्त करूँगा।

​१४. जो व्यक्ति शुद्ध बुद्धि के साथ इस स्तोत्र का पाठ करता है, वह मोह-जाल से मुक्त होकर शिव के सान्निध्य (निकटता) को प्राप्त करता है।


सर्वाधिकार सुरक्षित :  खेमेश्वर पुरी गोस्वामी 
मुंगेली, छत्तीसगढ़,८१२००३२८३४

Thursday, June 11, 2026

बरखा आई, मस्ती लाई! बाल कविता


बरखा आई, मस्ती लाई!


तप-तप तपती गरमी भागी,
देखो झूम के बरखा आई।
काले-काले बादल छाए,
अपने संग फुहारें लाए।

छत पर भागे चिंटू-मीना,
अब नहीं भाई घर में जीना!
"अम्मा, जाने दो ना बाहर,
भीगेंगे हम अबकी बार!"

नंगे पैर आँगन में आना,
छप-छप कर के शोर मचाना।
एक-दूजे पर पानी फेंकना,
हंसना और फिर आंखें मीचना।

कागज की एक नाव बनाई,
नीले पानी में तैराई।
"मछली रानी, रास्ता देना,
मेरी नैया पार लगा देना!"

बूँदें गिरतीं टिप-टिप-टिप,
मेंढक कूदें टर-टर-टिप।
भीग गए सब बाल-सखा अब,
खत्म हुई गरमी की रुत सब।


खेमेश्वर पुरी गोस्वामी "गृहावधूत"
मुंगेली छत्तीसगढ़,८१२००३२८३४

Wednesday, June 10, 2026

पिता

पिता को समर्पित एक रचना 

छोड़ दो किताब सारी, देख लो पिता का मुख,
चेहरे की झुर्री बीच, ज्ञान का जहान है।

धूप और छाँव सह, पालते रहे जो हमें,
त्याग और रूप उनका, देव के समान है।

​रिश्तों का विधान सिखा, जीवन सँवार दिया,
शीश जो झुकेगा यहाँ, बढ़ता महन है।

पूँजी है आशीष उनकी, राह जो दिखाते सदा,
तात के चरन बीच, झुकता गगन है।


        © खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
   मुंगेली छत्तीसगढ़ ८१२००३२८३४

Monday, June 8, 2026

कलम की धार और मर्यादा का गलियारा

कलम की धार और मर्यादा का गलियारा

साहित्य हमेशा से समाज का दर्पण रहा है। वह दर्पण, जो कभी मनुष्य के अंतर्मन की गहराइयों को कुरेदता है, तो कभी समाज की कुरीतियों पर प्रहार करता है। कलम के धनी लोग जब अपनी लेखनी उठाते हैं, तो उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे सभ्यता के शिल्पी बनेंगे। लेकिन, आज के दौर में कुछ लेखकों ने अपनी सृजनात्मकता का दायरा संकुचित कर लिया है।
आजकल साहित्यिक मंचों और सोशल मीडिया के पन्नों पर एक नया फैशन-सा चल गया है। कुछ रचनाकार अपनी 'विद्वता' को सिद्ध करने के लिए सनातन धर्म के ग्रंथों, देव-कथाओं और प्रतीकों को व्यंग्य का 'मसाला' बना रहे हैं। यह देखना विडंबनापूर्ण है कि जिस शब्दावली का उपयोग वे किसी समुदाय विशेष की आस्था को नीचा दिखाने या उस पर प्रहार करने के लिए कर रहे हैं, क्या वे वही साहस किसी अन्य संदर्भ में दिखाने का नैतिक बल रखते हैं?

व्यंग्य एक विधा है, जिसका उद्देश्य समाज का परिष्कार करना होता है, न कि किसी की श्रद्धा पर चोट करना। जब कोई लेखक किसी देवी-देवता के नाम या उनके पौराणिक आख्यानों को तोड़-मरोड़कर, उसे व्यंग्य का टाइटल या तुकबंदी का हिस्सा बनाता है, तो वह किसी 'उच्च बौद्धिक स्तर' का प्रमाण नहीं देता, बल्कि अपनी उस रुग्ण मानसिकता को प्रदर्शित करता है, जो संवाद की कला से अनभिज्ञ है।
यह समझना आवश्यक है कि 'धर्मनिरपेक्षता' का अर्थ किसी की आस्था का उपहास करना नहीं है। रचनात्मक स्वतंत्रता का झंडा लेकर चलना और बात है, और उसी झंडे की आड़ में किसी की आराध्य परंपराओं को अपमानित करना दूसरी बात।

महान साहित्य वही है जो जोड़ने का काम करता है। प्रेमचंद का 'ईदगाह' हो या रस्किन बॉन्ड की कहानियां, उनमें जो मानवीय संवेदनाएं हैं, वे किसी धर्म विशेष की सीमाओं में नहीं बँधीं। इसके विपरीत, यदि कोई लेखक अपनी पहचान बनाने के लिए दूसरों की भावनाओं को 'बलि का बकरा' बनाता है, तो वह साहित्यकार कम और विवाद का दलाल अधिक प्रतीत होता है।
साहित्य में तंज के लिए विषयों की कमी नहीं है। भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, सामाजिक विषमता, मानवीय संवेदनाओं का क्षरण—ये वे विषय हैं जिन पर कलम की स्याही भी सार्थक होगी और समाज को दिशा भी मिलेगी। लेकिन जब कलम का रुख किसी समाज की आस्था के केंद्रों की ओर मुड़ जाता है, तो वह साहित्य नहीं, बल्कि 'सांस्कृतिक विद्रूपता' बन जाता है।

लेखक का धर्म 'संवाद' है, 'विवाद' नहीं। यदि साहित्य के गलियारों में सनातनी ग्रंथों या देव-कथाओं का उपयोग केवल 'नीचा दिखाने' या 'सनसनी फैलाने' के लिए किया जा रहा है, तो यह उस लेखक की रचनात्मक निर्धनता का परिचायक है।
एक बेहतर समाज के निर्माण के लिए यह अनिवार्य है कि हम अपनी लेखनी को कुंठा के कीचड़ से बाहर निकालें। कला और साहित्य की सार्थकता इसी में है कि वह आलोचना करे, पर आहत न करे। व्यंग्य का अर्थ खंजर चलाना नहीं, बल्कि दर्पण दिखाना होना चाहिए, ताकि सामने वाला अपनी गलतियों को सुधार सके, न कि आहत होकर खड़ा हो जाए।
आखिरकार, कलम की असली ताकत शब्दों के चयन में ही नहीं, बल्कि उस गरिमा में भी है जिसे वह अपनी रचनाओं के माध्यम से जीवित रखती है।


©खेमेश्वर पुरी गोस्वामी®
मुंगेली छत्तीसगढ़,८१२००३२८३४

Sunday, June 7, 2026

खामोश होती डाल

खामोश होती डाल

मैं हूँ नन्ही चिड़िया, नीला अंबर मेरा घर था,
पंखों की उस उड़ान में, न कोई खौफ, न डर था।
पर अब तो कंक्रीट के जंगल, गगन को छूते जाते हैं,
मेरे उड़ने के रास्तों को, वे पल में ही खाते हैं।

जमाना हो गया मेरी जान का दुश्मन, अब तो ये जानो,
सिर्फ शोर और धुएं के साये में, मुझे न पहचानो।
पेड़ काट कर जो तुमने, अपनी इमारतें सजाई हैं,
उन्हीं ने मेरी चहचहाहट की, रूह तक रुलाई है।

मेरा दर्द किसी को नहीं दिखता, मैं प्यासी लौट आती हूँ,
साफ हवा की तलाश में, मैं दर-दर भटकती जाती हूँ।
इस भीड़-भाड़ की दुनिया में, इंसान कहाँ दिखते हैं,
सच्चे मर्द तो बहुत हैं, पर 'इंसानियत' वाले कहाँ दिखते हैं?
वो जो कभी हरियाली में, मेरे साथ गुनगुनाते थे,
आज शोर में खोकर, वे मुझे भूल ही जाते हैं।
क्या मुझे अब अपना घर, फिर से नसीब हो पाएगा?
या मेरा अस्तित्व, सिर्फ कागजों में सिमट कर रह जाएगा?

© खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
मुंगेली, छत्तीसगढ़ ८१२००३२८३४

Wednesday, June 3, 2026

राहों का सफ़र (बाल कविता)

 राहों का सफ़र

मैं स्कूल पढ़ने जाऊंगी,
खुद को गढ़ने जाऊंगी।
टीचर पाठ पढ़ाएगा,
मुन्ना खेल खिलाएगा।

सज-धज कर मैं जाऊंगी,
नई बातें सब पाऊंगी।
बस्ते में होंगी किताबें,
सुनूँगी ढेर सारी बातें।

पेंसिल से लिखूंगी नाम,
काम करूँगी बड़े तमाम।
क, ख, ग, घ का ज्ञान पाऊं,
ऊँचे सपनों को मैं सजाऊं।

गणित में जोड़-घटाना होगा,
ज्ञान का नया खजाना होगा।
खेल के मैदान में दौड़ूंगी,
जीत की डोरी को मोड़ूंगी।

दोस्त मिलेंगे प्यारे-प्यारे,
चमकेंगे हम सब तारे।
अनुशासन का पाठ पढूँगी,
ऊपर की ओर मैं बढ़ूँगी।

मेहनत करके नाम कमाऊं,
अपनी राह खुद ही बनाऊं।
टीचर का आदर मैं पाऊं,
सफलता की सीढ़ी चढ़ जाऊं।



           © खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
       मुंगेली छत्तीसगढ़,८१२००३२८३४

।। भारतवर्ष महात्म्य स्तोत्रम ।।

॥ भारतवर्ष महात्म्य स्तोत्रम् ॥ हिमालयोत्तमा यस्य शिरोदेशे विराजते। सागरो यत्पदाम्भोजौ प्रक्षालयति नित्यशः ॥ १ ॥ पुण्यभूमिः सुविस्तारा भारतं...