Thursday, June 11, 2026

बरखा आई, मस्ती लाई! बाल कविता


बरखा आई, मस्ती लाई!


तप-तप तपती गरमी भागी,
देखो झूम के बरखा आई।
काले-काले बादल छाए,
अपने संग फुहारें लाए।

छत पर भागे चिंटू-मीना,
अब नहीं भाई घर में जीना!
"अम्मा, जाने दो ना बाहर,
भीगेंगे हम अबकी बार!"

नंगे पैर आँगन में आना,
छप-छप कर के शोर मचाना।
एक-दूजे पर पानी फेंकना,
हंसना और फिर आंखें मीचना।

कागज की एक नाव बनाई,
नीले पानी में तैराई।
"मछली रानी, रास्ता देना,
मेरी नैया पार लगा देना!"

बूँदें गिरतीं टिप-टिप-टिप,
मेंढक कूदें टर-टर-टिप।
भीग गए सब बाल-सखा अब,
खत्म हुई गरमी की रुत सब।


खेमेश्वर पुरी गोस्वामी "गृहावधूत"
मुंगेली छत्तीसगढ़,८१२००३२८३४

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