Friday, August 14, 2026

आज़ादी के आईने में छत्तीसगढ़ का सच

आज़ादी के आईने में छत्तीसगढ़ का सच

चौपालों पर रोजा रखते, विकास के सपने सारे,
कागजों पर जगमगाते, झूठे झूठे चाँद-तारे।

आज़ादी के कितने बरसों बाद भी यह लाचार,
बुनियादी हक के खातिर, क्यों होती है नित्य पुकार?

अस्पताल की दूरी देखो, खाट बनी अब है गाड़ी,
रास्तों के सीनों पर चलती,पत्थर और कंकड़ की गाड़ी।

दर्द कराह रहा सीने में, सड़क नहीं पर नदियाँ भारी,
कच्चे मार्गों की किस्मत पर, रोती हर जीवन-फुलवारी।

पेड़ छांव में ज्ञान बँट रहा, अक्षर-अक्षर ज्ञान अधूरा,
बिन छत वाले उस स्कूल का, सपना रहता सदा अधूरा।

किताबें पहुँचीं सत्र बीत कर, शिक्षक का न पता ठिकाना,
बच्चों के इन मासूम मुखों पर, किसका है पहरा अनजाना?

बिजली आती-जाती जैसे, मेहमान कोई घर आता,
पानी के खातिर हर नारी, मीलों दूर भटका खाता।

चुए का गंदा पानी पीकर, उमर बिताते लोग यहाँ पर,
विकास रथ के पहिए अटके, इन वीरानो की माटी पर।

फाइलों के बोझ तले अब, दबकर दम तोड़े कानून,
न्याय माँगने वाला जाने, कितने काट रहा है जून।

खनिजों से यह माटी चमकी, घर-घर को रौशन करती,
पर खुद अपनी ही किस्मत पर, दीप शिखा यह क्यों है डरती?

हीरे-मोती पेट न भरते, न ही पानी देते झरने,
अमीरी की इस धरती पर, दुख के बादल बरसे?

आखिरी पंक्ति में बैठा जो, वो व्यथा किसे बतलाए?
कागज़ की इन योजनाओं से, पेट भला कब भर पाए?

जागो अब तो नींद से अपनी, हे हुक्मों के पहरेदार,
छोर-छोर तक हक पहुँचा दो, मत करो अब और इंतज़ार।

तभी मनाएंगे जश्न सही से, जब हर घर में दीप जलेगा,
छत्तीसगढ़ का हर बाशिंदा, गर्वित होकर साथ चलेगा।

 सर्वाधिकार सुरक्षित 
खेमेश्वर पुरी गोस्वामी 
मुंगेली, छत्तीसगढ़ 8120032834

Monday, August 10, 2026

अष्टनाग स्तोत्रम् (खेमेश्वर पुरी विरचित)

अष्टनाग स्तोत्रम् (खेमेश्वर पुरी विरचित)

अनन्तस्तार्क्ष्यानुजः ख्यातः शेषो विश्वस्य धारकः। प्रथमो नागराजोऽयं पातु नः सर्वदा मुदा ॥ १ ॥

द्वितीयो वासुकिर्नाम शिवस्य भुषणोत्तमः। समुद्रमथने योऽभूद् रज्जुः ख्यातिगतो भुवि ॥ २ ॥

तृतीयस्तक्षकः श्रीमान् तक्षकाख्यः महाबलः। परीक्षित्तक्षकः ख्यातः नागानां मध्ये विश्रुतम् ॥ ३ ॥

चतुर्थः कार्कोटकस्तु महाघोरपराक्रमः। नलस्य दंशने ख्यातश्चित्रगुप्तादिपूजितः ॥ ४ ॥

पञ्चमः पद्मनाभस्तु महापद्मश्च पञ्चमः। निधिपालकयोर्द्वन्द्वं कुबेरस्य प्रियं सदा ॥ ५ ॥

षष्ठो महापदः ख्यातः सुवर्णस्य च रक्षकः। नागानां कुलगोत्रेषु पूजितो वै दिशो दश ॥ ६ ॥

सप्तमो शङ्खनादस्तु शङ्खपालो महाबलः। पुण्यात्मनां च रक्षकश्च पवित्रः पापनाशनः ॥ ७ ॥

अष्टमो कुलकश्चैव गुलिकोऽपि महाबलः। अन्ते च संहती चैव सर्वनागाधिपः प्रभुः ॥ ८ ॥

अनन्तस्य प्रभावेण भूमिश्चैवातिधारिता। शेषनागस्य फणासु लोकान् स्थापिताः खलु ॥ ९ ॥

वासुकिः कण्ठभूषा च देवदेवस्य शङ्करः। येन दृष्टा महादेवाः तेन मुक्तिर्हि शाश्वती ॥ १० ॥

तक्षकस्य प्रभावेण विषवेगः सुदारुणः। स्मृतेन तक्षकस्यैव विषबाधा विनश्यति ॥ ११ ॥

कार्कोटकस्य च मन्त्रेण नागदोषो विनश्यति। स्मरणान्मुक्तिदातासौ सर्पभयात् प्रमुच्यते ॥ २२ ॥

पद्मनाभस्य नाम्ना तु धनान्युपलभ्यते। महापद्मस्य प्रभावात् सर्वसौभाग्यवर्धनम् ॥ १३ ॥

शङ्खपालस्य प्रभावात् पुण्यवृद्धिः प्रजायते। कुले तेषां न जायते कभीतिर्नागसम्भवा ॥ १४ ॥

कुलकस्य च स्मरणेन कुलं तिष्ठति शाश्वतम्। वंशवृद्धिः सदा तेषां ये पठन्ति इदं स्तोत्रकम् ॥ १५ ॥

अष्टनागाः प्रसीदन्तु सर्वकालं सुखावहाः। सर्पेभ्यो रक्षन्तु नित्यं विषभयं हरन्तु च ॥ १६ ॥

नागाः कुलस्य रक्षकाः भूमेश्र्वैवाधिदेवताः। ये पूजयन्ति नागान् वै तेषां गेहे वसेत् श्रिया ॥ १७ ॥

कालसर्पविधानानि ये कुर्वन्ति मुदा नराः। अष्टनागस्य जपमात्रेण शान्तिं प्राप्नुवन्ति ते ॥ १८ ॥

नागपञ्चम्यां वै काले ये पठेयुः इदं स्तोत्रम्। तेषां कुले नागबाधा कदापि न भवति ध्रुवम् ॥ १९ ॥

ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा वा ये च मानवाः। अष्टनागस्य पाठेन सर्वसिद्धिं लभन्ति ते ॥ २० ॥

य इदं पठते नित्यं प्रातरुत्थाय मानवः। तस्य गेहे न सर्पाणां भयं भवति कुत्रचित् ॥ २१ ॥

इदं स्तोत्रं महापुण्यमष्टनागस्य कीर्तितम्। भक्तिमद्भिः पठेद् यस्तु स याति परमां गतिम् ॥ २२ ॥

नागाः प्रीयन्तामत्र विप्रमुख्याः सुरादयः। सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वसन्तोषवर्धिताः ॥ २३ ॥

अष्टनागमिदं स्तोत्रं सम्पूर्णं सुखदं शुभम्। पठतां श्रुणुतां नॄणां सर्वसिद्धिप्रदायकम् ॥ २४ ॥

इदं स्तोत्रं खेमेश्वर पुरी गृहावधूत विरचितम् सम्पूर्णम् ॥

Sunday, August 2, 2026

श्रावण मास महात्म्य स्तोत्रम (खेमेश्वर पुरी कृत)

 श्रावणमासमाहात्म्यस्तोत्रम् (खेमेश्वर पुरी कृत)

नमस्तस्मै महेशाय भक्तानां वरदायिने।
श्रावणस्य च मासानामधिपाय कपर्दिने॥

श्रावणो मङ्गलो मासः सर्वपापप्रणाशनः।
शिवपूजा-रतानां च सर्वसिद्धि-प्रदायकः॥

मासानां प्रवरो मासः शंभोः प्रियतमो मतः।
अत्र पूजा महेशस्य सर्वकामप्रदा नृणाम्॥

सोमवारेषु यः कुर्याच्छिवव्रतमखण्डितम्।
तस्य तुष्यति देवेशो ददाति विपुलं सुखम्॥

गङ्गाजलेन यो लिङ्गं सेचयेच्छ्रावणे मुदा।
तस्य नश्यन्ति पापानि जन्मकोटिसमुद्भवाः॥

बिल्वपत्रैः सुपुष्पैश्च त्रिदलैः कोमलैः शुभैः।
पूजयित्वा महादेवं सर्वपापैः प्रमुच्यते॥

चन्दनं कुङ्कुमं चैव अक्षतान् धूप-दीपकौ।
समर्प्य पार्वतीशाय लभते परमां गतिम्॥

पञ्चामृतैश्च यो लिङ्गं स्नापयेत् भक्तिभावतः।
तस्य गेहे स्थिरा लक्ष्मीः वर्धते च प्रजासुखम्॥

महामृत्युञ्जयं मन्त्रं यो जपत्यत्र भक्तितः।
तस्य मृत्युभयं नास्ति नीरोगः स च जीवति॥

रुद्राष्टाध्यायिनो मन्त्राः पद्यन्ते श्रावणे तु यैः।
तेषां गृहे सदा वासो भवानी-शङ्करोः ध्रुवम्॥

मङ्गलागौरी-व्रतं कुर्यू नारीणां सौभाग्यवर्धकम्।
अखण्डमङ्गलं तासां पुत्र-पौत्रादि-सम्पदः॥

नागपञ्चमी-दिने यो वै नागानां पूजनं चरेत्।
नागभीतिः न तस्यास्ति कुले तस्य सुखं भवेत्॥

पौर्णमास्यां तु यो धीमान् धारयेत् सूत्रमुत्तमम्।
रक्षासूत्रस्य माहात्म्यात् सर्वबाधा विनश्यति॥

कज्जली-तीज-पूजां च या करोति च कामिनी।
पतिव्रता-गुणाढ्या सा शिवलोकमवाप्नुयात्॥

अन्नदानं जलस्यापि दानं यः कुरुते शशी।
तस्य पुण्यमसंख्यातं लभते नात्र संशयः॥

विषं पीत्वा महादेवे जगद् रक्षितवान् पुरा।
श्रावणे तस्य पूजा हि सन्तापं हरति ध्रुवम्॥

नारायणोऽपि लोकेशः शेते नारायणो हरौ।
शिवः करोति जगतां पालनं श्रावणे विभुः॥

व्रतेनानेन लभ्यन्ते धर्म-कामाः सुखादयः।
अन्ते च लभते मुक्तिं शिवलोके महीयते॥

य इदं पठति स्तोत्रं श्रावणे नियमव्रती।
सर्वान् कामानवाप्नोति शिवभक्तिं च विन्दति॥

श्रावणस्य महात्म्यं तु शंभुना भाषितं पुरा।
इति स्तोत्रं समाप्तं हि शङ्करस्य प्रसाद्जम्॥

सर्वाधिकार सुरक्षित 
खेमेश्वर पुरी गोस्वामी (गृहावधूत)
मुंगेली छत्तीसगढ़,८१२००३२८३४

 सरल हिन्दी अर्थ

श्लोक १: उन भगवान् महेश को नमस्कार है जो भक्तों को वरदान देने वाले हैं, जटाधारी हैं और श्रावण मास के अधिपति देव हैं।
श्लोक २: श्रावण मास अति मङ्गलकारी और समस्त पापों का विनाश करने वाला है। जो इस मास में शिवजी की पूजा में लीन रहते हैं, यह मास उन्हें समस्त सिद्धियाँ प्रदान करता है।
श्लोक ३: श्रावण सभी महीनों में श्रेष्ठ और भगवान् शम्भु का सबसे प्रिय महीना माना गया है। इसमें महेश की पूजा मनुष्यों की सभी मनोकामनाओं को पूरा करती है।
श्लोक ४: जो व्यक्ति श्रावण के सोमवारों में अखण्ड (नियमपूर्वक) शिव व्रत करता है, उससे देवाधिदेव शिव प्रसन्न होकर उसे अपार सुख प्रदान करते हैं।
श्लोक ५: जो श्रावण मास में प्रसन्नतापूर्वक गङ्गाजल से शिवलिङ्ग का अभिषेक करता है, उसके करोडों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक ६: जो सुन्दर, कोमल और तीन पत्तों वाले शुभ बिल्वपत्रों तथा उत्तम पुष्पों से महादेव की पूजा करता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक ७: जो चन्दन, कुङ्कुम, अक्षत (चावल), धूप और दीप अर्पित करके पार्वतीपति शिव की उपासना करता है, वह परम गति (मोक्ष) को प्राप्त करता है।
श्लोक ८: जो भक्तिभाव से पञ्चामृत से शिवलिङ्ग को स्नान कराता है, उसके घर में लक्ष्मी का स्थिर वास होता है और वंश व सन्तान का सुख बढ़ता है।
श्लोक ९: जो इस महीने में भक्तिपूर्वक महामृत्युञ्जय मन्त्र का जप करता है, उसे मृत्यु का भय नहीं रहता और वह निरोगी होकर जीवन जीता है।
श्लोक १०: श्रावण में जिनके द्वारा रुद्राष्टाध्यायी के मन्त्रों का पाठ किया जाता है, उनके घर में भवानी और शङ्कर का सदैव वास रहता है, यह निश्चित है।
श्लोक ११: इस मास में स्त्रियाँ जो मङ्गलागौरी का व्रत करती हैं, वह उनके सौभाग्य को बढ़ाता है। उन्हें अखण्ड सौभाग्य, पुत्र और पौत्र आदि सम्पदाएँ प्राप्त होती हैं।
श्लोक १२: नागपञ्चमी के दिन जो मनुष्य नागों की पूजा करता है, उसे नागभय (सर्पभय) नहीं रहता और उसके कुल में सदा सुख रहता है।
श्लोक १३: श्रावण पूर्णिमा के दिन जो बुद्धिमान मनुष्य उत्तम रक्षासूत्र (रक्षाबन्धन) धारण करता है, उस रक्षासूत्र के प्रभाव से उसकी सभी बाधाएँ दूर हो जाती हैं।
श्लोक १४: जो स्त्री कज्जली तीज की पूजा करती है, वह पतिव्रता गुणों से युक्त होकर अन्त में शिवलोक को प्राप्त करती है।
श्लोक १५: जो मनुष्य इस मास में अन्नदान और जलदान करता है, उसे अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है, इसमें कोई सन्देह नहीं है।
श्लोक १६: प्राचीन काल में महादेव ने विषपान करके सम्पूर्ण संसार की रक्षा की थी; अतः श्रावण में उनकी पूजा करने से हृदय का समस्त सन्ताप दूर हो जाता है।
श्लोक १७: श्रावण के महीने में जब जगत्पति श्रीहरि विष्णु योगनिद्रा में होते हैं, तब सम्पूर्ण जगत् के पालन का दायित्व स्वयं सर्वव्यापी भगवान् शिव सँभालते हैं।
श्लोक १८: श्रावण के इस पवित्र व्रत से धर्म, काम और सुख आदि प्राप्त होते हैं तथा अन्त काल में प्राणी मुक्ति पाकर शिवलोक में पूजित होता है।
श्लोक १९: जो व्यक्ति श्रावण मास में नियम-व्रत का पालन करते हुए इस स्तोत्र का पाठ करता है, वह अपनी सभी मनोकामनाएँ पूरी करता है और शिवभक्ति प्राप्त करता है।
श्लोक २०: श्रावण मास का यह माहात्म्य स्वयं भगवान् शम्भु द्वारा पूर्वकाल में कहा गया था। भगवान् शङ्कर की कृपा से रचित यह स्तोत्र यहाँ पूर्ण होता है।

आज़ादी के आईने में छत्तीसगढ़ का सच

आज़ादी के आईने में छत्तीसगढ़ का सच चौपालों पर रोजा रखते, विकास के सपने सारे, कागजों पर जगमगाते, झूठे झूठे चाँद-तारे। आज़ादी के कितने बरसों ब...