श्रावणमासमाहात्म्यस्तोत्रम् (खेमेश्वर पुरी कृत)
नमस्तस्मै महेशाय भक्तानां वरदायिने।
श्रावणस्य च मासानामधिपाय कपर्दिने॥
श्रावणो मङ्गलो मासः सर्वपापप्रणाशनः।
शिवपूजा-रतानां च सर्वसिद्धि-प्रदायकः॥
मासानां प्रवरो मासः शंभोः प्रियतमो मतः।
अत्र पूजा महेशस्य सर्वकामप्रदा नृणाम्॥
सोमवारेषु यः कुर्याच्छिवव्रतमखण्डितम्।
तस्य तुष्यति देवेशो ददाति विपुलं सुखम्॥
गङ्गाजलेन यो लिङ्गं सेचयेच्छ्रावणे मुदा।
तस्य नश्यन्ति पापानि जन्मकोटिसमुद्भवाः॥
बिल्वपत्रैः सुपुष्पैश्च त्रिदलैः कोमलैः शुभैः।
पूजयित्वा महादेवं सर्वपापैः प्रमुच्यते॥
चन्दनं कुङ्कुमं चैव अक्षतान् धूप-दीपकौ।
समर्प्य पार्वतीशाय लभते परमां गतिम्॥
पञ्चामृतैश्च यो लिङ्गं स्नापयेत् भक्तिभावतः।
तस्य गेहे स्थिरा लक्ष्मीः वर्धते च प्रजासुखम्॥
महामृत्युञ्जयं मन्त्रं यो जपत्यत्र भक्तितः।
तस्य मृत्युभयं नास्ति नीरोगः स च जीवति॥
रुद्राष्टाध्यायिनो मन्त्राः पद्यन्ते श्रावणे तु यैः।
तेषां गृहे सदा वासो भवानी-शङ्करोः ध्रुवम्॥
मङ्गलागौरी-व्रतं कुर्यू नारीणां सौभाग्यवर्धकम्।
अखण्डमङ्गलं तासां पुत्र-पौत्रादि-सम्पदः॥
नागपञ्चमी-दिने यो वै नागानां पूजनं चरेत्।
नागभीतिः न तस्यास्ति कुले तस्य सुखं भवेत्॥
पौर्णमास्यां तु यो धीमान् धारयेत् सूत्रमुत्तमम्।
रक्षासूत्रस्य माहात्म्यात् सर्वबाधा विनश्यति॥
कज्जली-तीज-पूजां च या करोति च कामिनी।
पतिव्रता-गुणाढ्या सा शिवलोकमवाप्नुयात्॥
अन्नदानं जलस्यापि दानं यः कुरुते शशी।
तस्य पुण्यमसंख्यातं लभते नात्र संशयः॥
विषं पीत्वा महादेवे जगद् रक्षितवान् पुरा।
श्रावणे तस्य पूजा हि सन्तापं हरति ध्रुवम्॥
नारायणोऽपि लोकेशः शेते नारायणो हरौ।
शिवः करोति जगतां पालनं श्रावणे विभुः॥
व्रतेनानेन लभ्यन्ते धर्म-कामाः सुखादयः।
अन्ते च लभते मुक्तिं शिवलोके महीयते॥
य इदं पठति स्तोत्रं श्रावणे नियमव्रती।
सर्वान् कामानवाप्नोति शिवभक्तिं च विन्दति॥
श्रावणस्य महात्म्यं तु शंभुना भाषितं पुरा।
इति स्तोत्रं समाप्तं हि शङ्करस्य प्रसाद्जम्॥
सर्वाधिकार सुरक्षित
खेमेश्वर पुरी गोस्वामी (गृहावधूत)
मुंगेली छत्तीसगढ़,८१२००३२८३४
सरल हिन्दी अर्थ
श्लोक १: उन भगवान् महेश को नमस्कार है जो भक्तों को वरदान देने वाले हैं, जटाधारी हैं और श्रावण मास के अधिपति देव हैं।
श्लोक २: श्रावण मास अति मङ्गलकारी और समस्त पापों का विनाश करने वाला है। जो इस मास में शिवजी की पूजा में लीन रहते हैं, यह मास उन्हें समस्त सिद्धियाँ प्रदान करता है।
श्लोक ३: श्रावण सभी महीनों में श्रेष्ठ और भगवान् शम्भु का सबसे प्रिय महीना माना गया है। इसमें महेश की पूजा मनुष्यों की सभी मनोकामनाओं को पूरा करती है।
श्लोक ४: जो व्यक्ति श्रावण के सोमवारों में अखण्ड (नियमपूर्वक) शिव व्रत करता है, उससे देवाधिदेव शिव प्रसन्न होकर उसे अपार सुख प्रदान करते हैं।
श्लोक ५: जो श्रावण मास में प्रसन्नतापूर्वक गङ्गाजल से शिवलिङ्ग का अभिषेक करता है, उसके करोडों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक ६: जो सुन्दर, कोमल और तीन पत्तों वाले शुभ बिल्वपत्रों तथा उत्तम पुष्पों से महादेव की पूजा करता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक ७: जो चन्दन, कुङ्कुम, अक्षत (चावल), धूप और दीप अर्पित करके पार्वतीपति शिव की उपासना करता है, वह परम गति (मोक्ष) को प्राप्त करता है।
श्लोक ८: जो भक्तिभाव से पञ्चामृत से शिवलिङ्ग को स्नान कराता है, उसके घर में लक्ष्मी का स्थिर वास होता है और वंश व सन्तान का सुख बढ़ता है।
श्लोक ९: जो इस महीने में भक्तिपूर्वक महामृत्युञ्जय मन्त्र का जप करता है, उसे मृत्यु का भय नहीं रहता और वह निरोगी होकर जीवन जीता है।
श्लोक १०: श्रावण में जिनके द्वारा रुद्राष्टाध्यायी के मन्त्रों का पाठ किया जाता है, उनके घर में भवानी और शङ्कर का सदैव वास रहता है, यह निश्चित है।
श्लोक ११: इस मास में स्त्रियाँ जो मङ्गलागौरी का व्रत करती हैं, वह उनके सौभाग्य को बढ़ाता है। उन्हें अखण्ड सौभाग्य, पुत्र और पौत्र आदि सम्पदाएँ प्राप्त होती हैं।
श्लोक १२: नागपञ्चमी के दिन जो मनुष्य नागों की पूजा करता है, उसे नागभय (सर्पभय) नहीं रहता और उसके कुल में सदा सुख रहता है।
श्लोक १३: श्रावण पूर्णिमा के दिन जो बुद्धिमान मनुष्य उत्तम रक्षासूत्र (रक्षाबन्धन) धारण करता है, उस रक्षासूत्र के प्रभाव से उसकी सभी बाधाएँ दूर हो जाती हैं।
श्लोक १४: जो स्त्री कज्जली तीज की पूजा करती है, वह पतिव्रता गुणों से युक्त होकर अन्त में शिवलोक को प्राप्त करती है।
श्लोक १५: जो मनुष्य इस मास में अन्नदान और जलदान करता है, उसे अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है, इसमें कोई सन्देह नहीं है।
श्लोक १६: प्राचीन काल में महादेव ने विषपान करके सम्पूर्ण संसार की रक्षा की थी; अतः श्रावण में उनकी पूजा करने से हृदय का समस्त सन्ताप दूर हो जाता है।
श्लोक १७: श्रावण के महीने में जब जगत्पति श्रीहरि विष्णु योगनिद्रा में होते हैं, तब सम्पूर्ण जगत् के पालन का दायित्व स्वयं सर्वव्यापी भगवान् शिव सँभालते हैं।
श्लोक १८: श्रावण के इस पवित्र व्रत से धर्म, काम और सुख आदि प्राप्त होते हैं तथा अन्त काल में प्राणी मुक्ति पाकर शिवलोक में पूजित होता है।
श्लोक १९: जो व्यक्ति श्रावण मास में नियम-व्रत का पालन करते हुए इस स्तोत्र का पाठ करता है, वह अपनी सभी मनोकामनाएँ पूरी करता है और शिवभक्ति प्राप्त करता है।
श्लोक २०: श्रावण मास का यह माहात्म्य स्वयं भगवान् शम्भु द्वारा पूर्वकाल में कहा गया था। भगवान् शङ्कर की कृपा से रचित यह स्तोत्र यहाँ पूर्ण होता है।
No comments:
Post a Comment