चौपालों पर रोजा रखते, विकास के सपने सारे,
कागजों पर जगमगाते, झूठे झूठे चाँद-तारे।
आज़ादी के कितने बरसों बाद भी यह लाचार,
बुनियादी हक के खातिर, क्यों होती है नित्य पुकार?
अस्पताल की दूरी देखो, खाट बनी अब है गाड़ी,
रास्तों के सीनों पर चलती,पत्थर और कंकड़ की गाड़ी।
दर्द कराह रहा सीने में, सड़क नहीं पर नदियाँ भारी,
कच्चे मार्गों की किस्मत पर, रोती हर जीवन-फुलवारी।
पेड़ छांव में ज्ञान बँट रहा, अक्षर-अक्षर ज्ञान अधूरा,
बिन छत वाले उस स्कूल का, सपना रहता सदा अधूरा।
किताबें पहुँचीं सत्र बीत कर, शिक्षक का न पता ठिकाना,
बच्चों के इन मासूम मुखों पर, किसका है पहरा अनजाना?
बिजली आती-जाती जैसे, मेहमान कोई घर आता,
पानी के खातिर हर नारी, मीलों दूर भटका खाता।
चुए का गंदा पानी पीकर, उमर बिताते लोग यहाँ पर,
विकास रथ के पहिए अटके, इन वीरानो की माटी पर।
फाइलों के बोझ तले अब, दबकर दम तोड़े कानून,
न्याय माँगने वाला जाने, कितने काट रहा है जून।
खनिजों से यह माटी चमकी, घर-घर को रौशन करती,
पर खुद अपनी ही किस्मत पर, दीप शिखा यह क्यों है डरती?
हीरे-मोती पेट न भरते, न ही पानी देते झरने,
अमीरी की इस धरती पर, दुख के बादल बरसे?
आखिरी पंक्ति में बैठा जो, वो व्यथा किसे बतलाए?
कागज़ की इन योजनाओं से, पेट भला कब भर पाए?
जागो अब तो नींद से अपनी, हे हुक्मों के पहरेदार,
छोर-छोर तक हक पहुँचा दो, मत करो अब और इंतज़ार।
तभी मनाएंगे जश्न सही से, जब हर घर में दीप जलेगा,
छत्तीसगढ़ का हर बाशिंदा, गर्वित होकर साथ चलेगा।
सर्वाधिकार सुरक्षित
खेमेश्वर पुरी गोस्वामी
मुंगेली, छत्तीसगढ़ 8120032834
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