Wednesday, June 10, 2026

पिता

पिता को समर्पित एक रचना 

छोड़ दो किताब सारी, देख लो पिता का मुख,
चेहरे की झुर्री बीच, ज्ञान का जहान है।

धूप और छाँव सह, पालते रहे जो हमें,
त्याग और रूप उनका, देव के समान है।

​रिश्तों का विधान सिखा, जीवन सँवार दिया,
शीश जो झुकेगा यहाँ, बढ़ता महन है।

पूँजी है आशीष उनकी, राह जो दिखाते सदा,
तात के चरन बीच, झुकता गगन है।


        © खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
   मुंगेली छत्तीसगढ़ ८१२००३२८३४

No comments:

Post a Comment

बरखा आई, मस्ती लाई! बाल कविता

बरखा आई, मस्ती लाई! तप-तप तपती गरमी भागी, देखो झूम के बरखा आई। काले-काले बादल छाए, अपने संग फुहारें लाए। छत पर भागे चिंटू-मीना, अब नहीं भाई ...