खामोश होती डाल
मैं हूँ नन्ही चिड़िया, नीला अंबर मेरा घर था,
पंखों की उस उड़ान में, न कोई खौफ, न डर था।
पर अब तो कंक्रीट के जंगल, गगन को छूते जाते हैं,
मेरे उड़ने के रास्तों को, वे पल में ही खाते हैं।
जमाना हो गया मेरी जान का दुश्मन, अब तो ये जानो,
सिर्फ शोर और धुएं के साये में, मुझे न पहचानो।
पेड़ काट कर जो तुमने, अपनी इमारतें सजाई हैं,
उन्हीं ने मेरी चहचहाहट की, रूह तक रुलाई है।
मेरा दर्द किसी को नहीं दिखता, मैं प्यासी लौट आती हूँ,
साफ हवा की तलाश में, मैं दर-दर भटकती जाती हूँ।
इस भीड़-भाड़ की दुनिया में, इंसान कहाँ दिखते हैं,
सच्चे मर्द तो बहुत हैं, पर 'इंसानियत' वाले कहाँ दिखते हैं?
वो जो कभी हरियाली में, मेरे साथ गुनगुनाते थे,
आज शोर में खोकर, वे मुझे भूल ही जाते हैं।
क्या मुझे अब अपना घर, फिर से नसीब हो पाएगा?
या मेरा अस्तित्व, सिर्फ कागजों में सिमट कर रह जाएगा?
© खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
मुंगेली, छत्तीसगढ़ ८१२००३२८३४
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