अयोध्ययां सुजातोऽयं, पुत्रो दशरथस्य च।
विश्वामित्रमुनीन्द्रेण, रक्षितो हि महामखः॥ १॥
सीतास्वयंवरं दृष्ट्वा, भक्त्वा चापं महेश्वरम्।
विवाहं च विधायैव, गतो हि मिथिलां मुदा॥ २॥
कैकेय्या वरयाचेऽथ, वनवासो हि तस्य वै।
लक्ष्मणस्तेन सार्धं तु, जगाम च वनं तदा॥ ३॥
मायामृगवधार्थं तु, सीतापहरणं तदा।
हनुमन्तं समासाद्य, सुग्रीवेण सखा कृतः॥ ४॥
सेतुबन्धनं कृत्वा, लङ्कायां च प्रधर्षितम्।
रावणं सानुजं हत्वा, प्राप राज्यं सुखावहम्॥ ५॥
तमेवं रामचन्द्रं तं, भजामि सुगुणाकरम्।
प्रसन्नो भव मे देव, पाहि मां च जगत्पते॥ ६॥
॥ इति -खेमेश्वर-पुरी-गोस्वामी-विरचिता श्री राम स्तुतिः संपूर्णा ॥
अनुवाद:
अयोध्या में दशरथ के पुत्र के रूप में आपका जन्म हुआ और विश्वामित्र मुनि के यज्ञ की आपने रक्षा की।
आपने शिवजी का धनुष तोड़कर सीताजी से विवाह किया और मिथिला से प्रसन्नतापूर्वक लौटे।
कैकेयी के वरदान के कारण आपको वनवास मिला और लक्ष्मण के साथ आप वन को गए।
मायावी मृग के कारण सीता का अपहरण हुआ, फिर आपने हनुमान जी को प्राप्त किया और सुग्रीव से मित्रता की।
सेतुबंध बनाकर लंका पर विजय प्राप्त की, रावण का वध किया और पुनः अयोध्या आकर सुखद राज्य संभाला।
ऐसे गुणों के भंडार श्री रामचन्द्र जी को मैं भजता हूँ। हे देव! हे जगत्पति! आप मुझ पर प्रसन्न हों और मेरी रक्षा करें।
सर्वाधिकार सुरक्षित : खेमेश्वर पुरी गोस्वामी
मुंगेली, छत्तीसगढ़,८१२००३२८३४
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