Monday, October 19, 2026

श्री रावण माहात्म्य स्तोत्रम

:- श्रीरावणमाहात्म्यस्तोत्रम् -:

ब्रह्मवंशसमुद्भूतो विश्रवस्तनयो बली ।
पुलस्त्यपौत्रो धीमान् स दशग्रीवो महायशाः ॥ १ ॥

वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञो नीतिशास्त्रविशारदः ।
सामगानरतो नित्यं लङ्काधीशो महामतिः ॥ २ ॥

तपस्तप्त्वा महत् घोरं गोकर्णे स नराधिपः ।
दशधा स्वात्मशीर्षाणि चक्रे होमं महेश्वरे ॥ ३ ॥

प्रसन्नो वरदस्तस्मै शङ्करो भक्तवत्सलः ।
ददौ चन्द्रहासं दिव्यं सर्वास्त्रैश्चापराजितम् ॥ ४ ॥

महाबलप्रतापी स कैलासं तोलयन्नपि ।
अङ्गुष्ठपीडिते शैले शिवस्तवनमाचरत् ॥ ५ ॥

सद्यः स्तुत्वा महादेवं छन्दोभिर्ललितैर्वरैः ।
जगाद मङ्गलस्तोत्रं शिवताण्डवसंज्ञकम् ॥ ६ ॥

जटाकटाहसम्भ्रम-भ्रमन्निलिम्पनिर्झरीम् ।
गीयमानो मुदा शम्भोस्तोषणाय महात्मना ॥ ७ ॥

रुद्रेण परया तुष्ट्या रावणो नाम संददौ ।
तव नादेन त्रैलोक्यं कम्पितं साधु रावण ॥ ८ ॥

आयुर्वेदप्रणेता स रसशास्त्रविचक्षणः ।
अर्करूपं परं ज्ञानं प्रकाशयति भूतले ॥ ९ ॥

ज्योतिषे च महाविद्वांस्तन्त्रशास्त्रे च दीक्षितः ।
रावणीया संहिता च लोके ख्याता विशेषतः ॥ १० ॥

स्वधर्मपालकः शूरः प्रजापालनतत्परः ।
हेममयीं पुरीं रम्यां रक्षति स्म सुखेन सः ॥ ११ ॥

दानवीरो जितक्रोधो विद्वद्वृन्दसमर्चितः ।
नासीत् कश्चिद्दरिद्रोऽपि लङ्कायां तस्य शासने ॥ १२ ॥

अहङ्कारवशाद् भ्रष्टो विधिना प्रेरितो बली ।
जहार मैथिलीं देवीं मोक्षकामी न संशयः ॥ १३ ॥

जयश्च विजयश्चोभौ सनकादिशापमोहितौ ।
राक्षसत्वं गतौ वीरौ शापान्ते मुक्तिवाञ्छिनौ ॥ १४ ॥

देवेभ्यो न हि मुक्तिः स्यात् साक्षाद् विष्णुं विना यतः ।
वैरेण भक्तियोगेन ध्यायन् रामं स रावणः ॥ १५ ॥

यस्य हन्तुं न शक्यन्ते सुराः सर्वे सवासवाः ।
तं तारयितुमेवात्र श्रीनारायण आगमः ॥ १६ ॥

मानुषं रूपमास्थाय साक्षात् रघुकुलोद्वहः ।
अवततार भूम्यां स धर्मसंस्थापनाय च ॥ १७ ॥

युद्धे दृष्ट्वा महाकायं रामं राजीवलोचनम् ।
क्षणे मोहमपाकृत्य शरणं मनसा गतः ॥ १८ ॥

रामबाणेन संभिन्नः पतितो धरणीतले ।
सर्वं पापं विनिर्मुक्तं ज्ञानं ददौ च लक्ष्मणे ॥ १९ ॥

राजनीतिं च धर्मं च मोक्षतत्त्वं तथैव च ।
अन्ते ज्ञानामृतं दत्त्वा प्रयातो विष्णुपार्षदः ॥ २० ॥

दिव्यं तेजः समुद्भूतं शरीरात्तस्य तेजिनः ।
प्रविश्य रामदेहे तु लीनं जातं महाप्रभम् ॥ २१ ॥

स एव शिवभक्तस्तु स एव हरसेवकः ।
सद्गुणानां निधानं च प्रमादाद् भ्रष्टतां गतः ॥ २२ ॥

न तस्य सदृशो ज्ञानी न तस्य सदृशः सुधीः ।
शिवभक्तिपरा काष्ठा रावणस्य महौजसः ॥ २३ ॥

इति रावणमाहात्म्यं पुण्यदं पापनाशनम् ।
गुणानां ग्रहणं कुर्यात् दोषं त्यक्त्वा विचक्षणः ॥ २४ ॥

गृहावधूतसंज्ञेन खेमेश्वरेण धीमता ।
गोस्वामिना रचितं स्तोत्रं शिवभक्तिप्रदायकम् ।
पठनात् पापमुक्त्वा सच्छिवमार्गं भजेन्नरः ॥ २५ ॥


        © सर्वाधिकार सुरक्षित ®
   खेमेश्वर पुरी गोस्वामी (गृहावधूत)
   डिंडोरी - मुंगेली, छत्तीसगढ़ ४९५३३४
         दूरभाष - ८१२००३२८३४

श्लोकों का सरल हिन्दी भावार्थ  :- 

श्लोक १: ब्रह्मा जी के पावन वंश में महर्षि विश्रवा के पुत्र तथा महर्षि पुलस्त्य के पौत्र के रूप में महापराक्रमी, अत्यंत बुद्धिमान एवं यशस्वी दशग्रीव (रावण) का प्राकट्य हुआ।

श्लोक २: वे चारों वेदों तथा वेदांगों के मर्मज्ञ, नीतिशास्त्र में निपुण, निरंतर सामवेद की ऋचाओं का गायन करने वाले तथा लंका के अत्यंत मेधावी अधिपति थे।

श्लोक ३: उन नरश्रेष्ठ ने गोकर्ण तीर्थ में अत्यंत कठिन तपस्या की और भगवान शिव की प्रसन्नता हेतु अपने दसों शीशों को काट-काटकर आहुति के रूप में समर्पित कर दिया।

श्लोक ४: उनकी अनन्य तपस्या से प्रसन्न होकर भक्तवत्सल भगवान शंकर ने उन्हें साक्षात वरदान दिया और तीनों लोकों में किसी भी अस्त्र से न कटने वाली दिव्य 'चन्द्रहास' खड्ग प्रदान की।

श्लोक ५: महाबली रावण ने जब कैलाश पर्वत को अपनी भुजाओं से उठा लिया, तब महादेव द्वारा केवल अंगूठे के भार से पर्वत दबाने पर उन्होंने अत्यंत शांत चित्त से शिव स्तुति की।

श्लोक ६: उसी क्षण अत्यंत मधुर और छंदोबद्ध वाणी में उन्होंने देवाधिदेव महादेव की स्तुति की, जो आज संसार में 'शिव ताण्डव स्तोत्र' के नाम से प्रसिद्ध है।

श्लोक ७: "जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी..." के पावन पदों से युक्त होकर उन्होंने महादेव को प्रसन्न करने के लिए आनंदपूर्वक इस परम स्तोत्र का गान किया।

श्लोक ८: उनके उस प्रचंड घोष और स्तवन से संतुष्ट होकर स्वयं महादेव ने कहा—"हे वीर! तुम्हारे नाद से तीनों लोक कंपित हो गए, अतः आज से तुम्हारा नाम 'रावण' होगा।"

श्लोक ९: वे महान आयुर्वेदाचार्य तथा रसशास्त्र के ज्ञाता थे। 'अर्कप्रकाश' आदि ग्रंथों के माध्यम से उन्होंने संपूर्ण धरातल पर अद्वितीय ज्ञान का प्रकाश फैलाया।

श्लोक १०: वे ज्योतिष शास्त्र के अप्रतिम विद्वान तथा तंत्र विद्या के निष्णात ज्ञाता थे। उनके द्वारा रचित 'रावण संहिता' आज भी ज्योतिष जगत में अत्यंत प्रामाणिक मानी जाती है।

श्लोक ११: वे अपनी प्रजा के रक्षक, शूरवीर और शासन-व्यवस्था में प्रवीण थे। उनके राज्य में सुवर्णमयी लंकापुरी में सर्वत्र शांति, ऐश्वर्य और वैभव का वास था।

श्लोक १२: वे अत्यंत दानी, ज्ञानी पुरुषों का आदर करने वाले तथा नीतिवान शासक थे। उनके शासनकाल में लंका में कोई भी दीन, दुखी अथवा दरिद्र नहीं था।

श्लोक १३: कालान्तर में अहंकार तथा प्रारब्ध (विधि के विधान) से प्रेरित होकर उन्होंने सीता हरण किया; परंतु गूढ़ रूप से उनका वास्तविक उद्देश्य प्रभु के करकमलों से मुक्ति प्राप्त करना ही था।

श्लोक १४: सनकादि ऋषियों के शाप के प्रभाव से भगवान विष्णु के पार्षद जय और विजय ही राक्षस योनि में आए थे और वे शीघ्र इस शाप से मुक्त होकर प्रभु के धाम लौटना चाहते थे।

श्लोक १५: क्योंकि अन्य किसी साधारण देवता में उन्हें मुक्ति देने का सामर्थ्य नहीं था, अतः रावण ने वैर-भक्ति (विद्वेष भक्ति) का मार्ग चुनकर निरंतर श्रीराम का ध्यान किया।

श्लोक १६: जिस रावण को इंद्र आदि समस्त देवता मिलकर भी परास्त नहीं कर सकते थे, उसी अपने पार्षद का उद्धार (तारण) करने के लिए स्वयं साक्षात श्रीनारायण ने संकल्प लिया।

श्लोक १७: धर्म की पुनः स्थापना करने तथा रावण को शापमुक्त करने हेतु स्वयं भगवान विष्णु ने रघुकुल में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के रूप में मानुष अवतार ग्रहण किया।

श्लोक १८: अंत समय में रणभूमि में जब रावण ने कमलनयन श्रीराम के दिव्य स्वरूप को देखा, तो क्षणमात्र में उनका सारा अज्ञान मिट गया और वे मानसिक रूप से प्रभु की शरण में आ गए।

श्लोक १९: श्रीराम के बाण से विद्ध होकर जब वे भूमि पर गिरे, तब वे समस्त पापों से विमुक्त हो गए और अंतिम पलों में उन्होंने लक्ष्मण जी को राजनीति और जीवन का गूढ़ ज्ञान प्रदान किया।

श्लोक २०: राजनीति, धर्मनीति तथा मोक्ष के अंतिम गूढ़ तत्त्वों का उपदेश देकर भगवान विष्णु के पार्षद रावण अपने परम धाम की ओर प्रस्थान कर गए।

श्लोक २१: उनके शरीर से एक अत्यंत देदीप्यमान दिव्य ज्योति प्रकट हुई, जो संपूर्ण आकाश को आलोकित करती हुई भगवान श्रीराम के श्रीविग्रह में विलीन हो गई।

श्लोक २२: वे परम शिवभक्त तथा महादेव के अनन्य सेवक थे, सद्गुणों के भंडार होते हुए भी केवल एक प्रमाद (अहंकार) के कारण पतन को प्राप्त हुए।

श्लोक २३: उनके समान कोई दूसरा प्रकांड ज्ञानी और तीव्र बुद्धि वाला नहीं हुआ; भगवान शिव के प्रति उनकी अनन्य भक्ति निष्ठा की सर्वोच्च पराकाष्ठा है।

श्लोक २४: इस प्रकार यह रावण का माहात्म्य स्तोत्र पुण्य प्रदान करने वाला तथा पापों का नाश करने वाला है। बुद्धिमान मनुष्य को चाहिए कि वह उनके अवगुणों को त्यागकर उनके सद्गुणों, ज्ञान और भक्ति को ग्रहण करे।

श्लोक २५ (फलश्रुति):
गृहावधूत खेमेश्वर पुरी गोस्वामी द्वारा रचित यह पावन स्तोत्र भगवान शिव की निश्चल भक्ति प्रदान करने वाला है। इसके नित्य पाठ व अनुशीलन से मनुष्य के भीतर सकारात्मक परिवर्तन होता है, वह समस्त दुर्गुणों और बुराइयों से मुक्त होकर भगवान आशुतोष शिव के पावन चरणों का अनुसरण करता है।

No comments:

Post a Comment

श्री रावण माहात्म्य स्तोत्रम

:- श्रीरावणमाहात्म्यस्तोत्रम् -: ब्रह्मवंशसमुद्भूतो विश्रवस्तनयो बली । पुलस्त्यपौत्रो धीमान् स दशग्रीवो महायशाः ॥ १ ॥ वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञो न...