Friday, November 28, 2025

naxal hidma

जंगल, ज़मीन, और गुमशुदा 'हीरो' : क्या हिडमा सिर्फ एक नक्सली था,या व्यवस्था का आईना?


बीते दिनों जब एक कथित नक्सली कमांडर हिडमा के नाम की चर्चा ने ज़ोर पकड़ा,तो इसके साथ ही एक ऐसी बहस ने भी सिर उठाया,जो केवल सुरक्षा बलों की कार्रवाई या नक्सलवाद के आंकड़ों तक सीमित नहीं है। अगर हिडमा वाकई खूंखार नक्सली था,तो निसंदेह हममें से हर राष्ट्रप्रेमी नागरिक इस देश के ख़िलाफ़ होने वाली हर हिंसा का कड़ा विरोध करता है। लेकिन सवाल तब गहरा हो जाता है जब तथाकथित 'आतंक' के इस चेहरे को उसके अंतिम समय में आदिवासियों के एक बड़े तबके ने 'हीरो' जैसा सम्मान दिया और उसके इर्द-गिर्द भीड़ उमड़ी।
यह भीड़, यह सम्मान, और यह 'हीरो-पूजा' किसी भी कीमत पर नक्सलवाद का समर्थन नहीं हो सकती,बल्कि यह व्यवस्था के कान खोलने वाला एक ज़बरदस्त सवाल है। यह हमें सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर क्यों एक विद्रोही, जिसे राज्य दुश्मन मानता है, अपनी ही धरती के बेटों के बीच इतना स्वीकार्य बन जाता है?

*आदिवासी: प्रकृति के संरक्षक, अन्याय के विरोधी*

हमारा विश्वास है कि सच्चा आदिवासी—जो जंगल, नदी, पहाड़ और प्रकृति के हर कण का रक्षक है—वह कभी भी क्रूरता या गलत का अंधसमर्थन नहीं करता। उनकी खुद्दारी, उनका आत्मसम्मान और उनका अस्तित्व, उनके लिए किसी भी राजनीतिक या हिंसक विचारधारा से बड़ा है।
जब ये लोग किसी हिडमा जैसे व्यक्ति के साथ खड़े होते हैं, तो इसका अर्थ यह नहीं कि वे नक्सली विचारधारा के साथ हैं। इसका सीधा अर्थ यह है कि उन्हें अपनी जल-जंगल-ज़मीन पर, अपने अधिकारों पर और अपने अस्तित्व पर संकट दिख रहा है। जब उन्हें लगता है कि उनकी बात सुनी नहीं जा रही, जब उन्हें विस्थापन और दमन का सामना करना पड़ता है, तब मजबूरी उन्हें विरोध के ऐसे रास्तों की ओर धकेलती है। और अगर हालात सच में बदतर हो जाएं, तो वही आदिवासी सच के साथ खड़े होने के लिए हथियार उठाने को भी मजबूर हो जाते हैं—चाहे वह विरोध सरकार का हो या फिर हिडमा जैसे किसी नक्सली का, जिसने उनके नाम पर हिंसा की हो।

*आंकड़ों में गुम होता बेगुनाह आदिवासी*

यहाँ मुद्दा केवल एक हिडमा का नहीं है। मुद्दा उन अनगिनत बेगुनाह आदिवासियों का है, जो इन सालों के संघर्ष में अनावश्यक रूप से मारे गए हैं। वे, जिन्हें जबरन नक्सली का ठप्पा लगाकर ख़त्म कर दिया जाता है, जिनकी आवाज़ पुलिसिया या नक्सली हिंसा की गोलियों की आवाज़ में हमेशा के लिए दब जाती है।
कितनी ही रिपोर्टें हैं, जिनमें निर्दोष आदिवासियों की मौत को मात्र 'एनकाउंटर' या 'क्रॉस-फायर' का आंकड़ा बताकर निपटा दिया गया। उनका दर्द किसी अख़बार की हेडलाइन नहीं बना, उनकी कहानी किसी मानवाधिकार रिपोर्ट में जगह नहीं पा सकी। वे सिर्फ इसलिए मारे गए, क्योंकि उनके हिस्से का जंगल, उनकी पुश्तैनी ज़मीन, और उनके संवैधानिक अधिकार किसी कॉरपोरेट या सत्ता प्रतिष्ठान की नज़र में आ गए थे।
हिडमा का 'हीरो' बनना व्यवस्था की विफलता का प्रतीक है। यह बताता है कि जब न्याय की प्रक्रिया विफल होती है, जब प्रशासन आदिवासियों के संरक्षक की जगह उनके दमनकर्ता के रूप में खड़ा होता है, तो निराशा की ख़ाली जगह को भरने के लिए कोई भी विद्रोही चेहरा 'हीरो' बन सकता है।

*न्याय की मांग: बंदूक नहीं, संवाद*

अब समय आ गया है कि इस पूरे संघर्ष को केवल 'कानून व्यवस्था' की समस्या मानकर देखना बंद किया जाए। यह अधिकारों, पहचान और न्याय का सवाल है।
हम सरकार और व्यवस्था से आग्रह करते हैं कि बंदूक की भाषा छोड़कर संवाद का रास्ता अपनाया जाए। हर उस बेगुनाह आदिवासी की मौत की निष्पक्ष और समयबद्ध जांच हो, जिसे 'नक्सली' बताकर मार दिया गया।

जंगल, जल और ज़मीन पर आदिवासियों के पेसा (Panchayats Extension to Scheduled Areas Act) और वन अधिकार अधिनियम (Forest Rights Act) को केवल कागज़ पर नहीं, बल्कि ईमानदारी से ज़मीन पर उतारा जाए।

आदिवासियों को विकास के नाम पर विस्थापित करने की नीतियों पर तुरंत रोक लगे और उनकी संस्कृति तथा पर्यावरण की रक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।
जब तक आदिवासियों को यह विश्वास नहीं होगा कि न्याय उनके साथ है, तब तक ऐसे 'हीरो' पैदा होते रहेंगे। हमें एक ऐसा भारत बनाना है, जहाँ जंगल का हर निवासी सुरक्षित महसूस करे, जहाँ उसकी ज़मीन उसकी हो, और जहाँ न्याय का दीपक हर झोंपड़ी में रोशनी दे। तभी नक्सलवाद की जड़ पर वार होगा और तभी हिडमा जैसे नाम अतीत बनेंगे।


आलेख : खेमेश्वर पुरी गोस्वामी 
सह संपादक : न्यूज़लाइन नेटवर्क 
रायपुर, छत्तीसगढ़ 8120032834

छत्तीसगढ़ : 25 वर्षों की विकास गाथा और रजत जयंती का संकल्प

*छत्तीसगढ़ : 25 वर्षों की विकास गाथा और रजत जयंती का संकल्प*



 25 वर्षों का गौरव और पहचान.
1 नवंबर, 2000 को 'दक्षिण कोसल' की प्राचीन पहचान को एक आधुनिक राज्य 'छत्तीसगढ़' के रूप में नया जन्म मिला। अपनी रजत जयंती के उपलक्ष्य में, यह राज्य 25 वर्षों की उस संघर्षपूर्ण और गौरवशाली विकास यात्रा का अवलोकन कर रहा है, जिसने इसे प्राकृतिक संपदा के भंडार से एक आत्म-निर्भर और सांस्कृतिक रूप से जागरूक इकाई में बदल दिया है।
1 नवंबर, 2000 को छत्तीसगढ़ राज्य का गठन भारतीय इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना थी। यह केवल प्रशासनिक सीमाओं का पुनर्गठन नहीं था, बल्कि यहाँ की विशिष्ट आदिवासी संस्कृति, समृद्ध प्राकृतिक संसाधनों और दशकों पुरानी पृथक राज्य की माँग का साकार होना था। राज्य निर्माण के बाद, नवगठित सरकारों के समक्ष एक दोहरी चुनौती थी: पिछड़ापन दूर कर तीव्र विकास करना और साथ ही ‘गढ़ों’ की इस भूमि की सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक समरसता को अक्षुण्ण बनाए रखना। पिछले ढाई दशकों में, विभिन्न सरकारों ने अपने-अपने दृष्टिकोण से इस विकास यात्रा को दिशा दी है।

*1. इतिहास, राजवंश और पुरातात्विक विरासत*
छत्तीसगढ़ का इतिहास अत्यंत प्राचीन है, जो इसे भारत के समृद्ध सांस्कृतिक मानचित्र पर एक विशिष्ट स्थान दिलाता है।
• पौराणिक पृष्ठभूमि: यह क्षेत्र रामायण काल में 'दक्षिण कोसल' के नाम से जाना जाता था और यहाँ की राजधानी श्रावस्ती थी। पौराणिक मान्यता के अनुसार, भगवान राम की माता कौशल्या इसी क्षेत्र की थीं।
• प्रमुख राजवंश: शरभपुरीय एवं नल वंश: आरंभिक काल में, बस्तर क्षेत्र पर नल वंश और मैदानी भागों में शरभपुरीय राजवंशों का शासन रहा, जिनके सिक्कों और अभिलेखों से क्षेत्र की प्राचीन समृद्धि का पता चलता है। कलचुरी राजवंश: लगभग 10वीं शताब्दी से लेकर 18वीं शताब्दी तक, कलचुरी वंश ने रतनपुर को अपनी राजधानी बनाकर पूरे छत्तीसगढ़ पर शासन किया। उन्होंने ही 'छत्तीसगढ़' नाम को लोकप्रिय बनाया। कलचुरियों के शासनकाल को कला, संस्कृति और प्रशासनिक स्थिरता का स्वर्ण युग माना जाता है।
• पुरातात्विक स्थल: राज्य में सिरपुर (बौद्ध, शैव और वैष्णव धर्मों का संगम स्थल), मल्हार, ताला , भोरमदेव, रतनपुर,खरौद और बारसूर जैसे महत्वपूर्ण पुरातात्विक केंद्र हैं, जो यह दर्शाते हैं कि यह क्षेत्र प्राचीन काल से ही ज्ञान और कला का केंद्र रहा है।
*2. समृद्ध संपदा: अर्थव्यवस्था का आधार*
छत्तीसगढ़ भारत के उन कुछ राज्यों में से है जिनकी पहचान ही उसकी प्राकृतिक संपदा से है।
• खनिज शक्ति का विस्तार: यह राज्य कोयला, लौह अयस्क (बैलाडीला की उच्च गुणवत्ता का लौह अयस्क), बॉक्साइट और टिन का प्रमुख उत्पादक है। 25 वर्षों में, राज्य ने अपनी खनिज रॉयल्टी और राजस्व संग्रहण को सुदृढ़ किया है। यह राजस्व, जो कभी केंद्र पर निर्भरता का कारण था, अब राज्य की जनकल्याणकारी योजनाओं और औद्योगिक विकास की रीढ़ बन गया है। छत्तीसगढ़ को देश का 'स्टील हब' और 'पावर हब' कहा जाता है।
• वनोपज आधारित आजीविका: राज्य का लगभग 44% भूभाग वनाच्छादित है। यहाँ तेंदूपत्ता, साल और सागौन जैसी मूल्यवान वनोपज मिलती है। राज्य ने लघु वनोपज (Minor Forest Produce) की खरीद और प्रसंस्करण को संस्थागत रूप दिया है। न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर 60 से अधिक वनोपज खरीदने वाला यह देश का अग्रणी राज्य है, जिसने वनवासी समुदायों की आय और आत्मनिर्भरता में क्रांति ला दी है।
*3. कृषि: 'धान का कटोरा' से मिलेट क्रांति तक*
छत्तीसगढ़ की आत्मा कृषि में बसती है, और इसकी पहचान 'धान का कटोरा' है।
• जल संसाधन विकास: राज्य निर्माण के बाद सिंचाई सुविधाओं के विस्तार पर जोर दिया गया, जिससे धान की पैदावार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। किसान-केंद्रित नीतियों, विशेष रूप से धान पर दिए जाने वाले समर्थन मूल्य और बोनस ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को अभूतपूर्व मजबूती दी है।
• कृषि विविधीकरण की गहराई: पिछले कुछ वर्षों में, धान की एकल फसल पर निर्भरता कम करने के लिए कृषि विविधीकरण को एक मिशन के रूप में लिया गया है। 'मिलेट मिशन' के तहत कोदो, कुटकी, रागी जैसे पारंपरिक और पौष्टिक अनाजों के उत्पादन, प्रसंस्करण और विपणन को बढ़ावा दिया गया है। यह पहल न केवल किसानों की आय बढ़ा रही है, बल्कि राज्य को पोषण सुरक्षा के क्षेत्र में भी एक मॉडल बना रही है।
*4.   विकास बनाम चुनौती*
राज्य की 25 वर्ष की यात्रा में कानून व्यवस्था का सबसे जटिल पहलू नक्सलवाद (माओवाद) की चुनौती रही है, जिस पर एक बहुआयामी रणनीति अपनाई गई है।
• समन्वित रणनीति (सुरक्षा-विकास समन्वय): राज्य ने केवल सैन्य समाधान पर निर्भर न रहते हुए, विकास, सुरक्षा और पुनर्वास की समन्वित रणनीति अपनाई। दुर्गम क्षेत्रों में फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस (FOBs) स्थापित किए गए, जिससे सुरक्षा बलों की उपस्थिति कोर क्षेत्रों तक बढ़ी। इन कैंपों के माध्यम से सड़कों, पुलिया, स्कूल और संचार नेटवर्क (मोबाइल टावर) जैसे विकास कार्य सुनिश्चित किए गए।
• नक्सल उन्मूलन की प्रगति: विगत वर्षों में, नक्सल प्रभावित क्षेत्रों का भौगोलिक दायरा काफी सीमित हुआ है। प्रमुख सफलता यह रही है कि कई अति-संवेदनशील इलाकों में पहली बार प्रशासनिक और पुलिस नियंत्रण स्थापित हुआ है। आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति को मजबूत किया गया है ताकि भटके हुए युवा मुख्यधारा में लौट सकें, जिससे सामाजिक शांति की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया गया है।
• सामान्य क्षेत्रों में पुलिसिंग: सामान्य क्षेत्रों में त्वरित न्याय और अपराध नियंत्रण के लिए सामुदायिक पुलिसिंग और तकनीक (जैसे सीसीटीवी निगरानी और साइबर सेल) का उपयोग बढ़ाया गया है।
*5. आर्थिक नियोजन और अधोसंरचना: बजट और सड़कों का जाल*
छत्तीसगढ़ ने 25 वर्षों में अपनी आर्थिक नींव को मजबूत किया है और तेजी से इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास किया है।
• राज्य बजट की प्राथमिकताएँ: गठन के बाद, राज्य को राजस्व घाटे की चुनौती का सामना करना पड़ा, लेकिन खनिज राजस्व के कुशल प्रबंधन और राजकोषीय अनुशासन से राज्य की वित्तीय स्थिति मजबूत हुई। राज्य के बजट की मुख्य प्राथमिकता मानव विकास सूचकांक (HDI) में सुधार रही है, जिसमें स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा पर उच्च व्यय शामिल है। कल्याणकारी योजनाओं और कृषि ऋण माफी जैसी पहलों के माध्यम से ग्रामीण क्रय शक्ति को बढ़ावा दिया गया है।
• फैली सड़कों का जाल (कनेक्टिविटी क्रांति): राज्य के विकास की गति को सड़कों के जाल ने अभूतपूर्व बल दिया है। ग्रामीण सड़कें: प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) और मुख्यमंत्री ग्राम सड़क योजना (CMGSY) के तहत वनांचल क्षेत्रों तक सड़कों की पहुंच सुनिश्चित की गई है, जिससे किसानों को अपनी उपज मंडियों तक ले जाने में आसानी हुई है। राष्ट्रीय राजमार्ग और आर्थिक गलियारे: राज्य से गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्गों का चौड़ीकरण और नए आर्थिक गलियारों (Economic Corridors) का विकास औद्योगिक गतिविधियों को बढ़ावा दे रहा है। बस्तर कनेक्टिविटी: बस्तर जैसे अति-दुर्गम क्षेत्रों में सड़कों और पुलों का निर्माण, नक्सल चुनौती के बावजूद, स्थानीय लोगों को प्रशासनिक और स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ने का सबसे बड़ा माध्यम बना है।
*6. राजनीतिक एवं प्रशासनिक पुनर्गठन: लोकतंत्र की नई पहचान*
बीते 25 वर्षों में, छत्तीसगढ़ ने अपने शासन और प्रशासन की संरचना को मजबूत करने के लिए कई दूरगामी कदम उठाए हैं।
•  छत्तीसगढ़ का शासन प्रणाली सुशासन (Good Governance), सामाजिक न्याय और हाशिए पर पड़े समुदायों (विशेषकर अनुसूचित जनजाति) के सशक्तीकरण पर केंद्रित रही है। राज्य ने अपनी पहचान एक स्थिर राजनीतिक इकाई के रूप में बनाई है, जहाँ लोक कल्याण और समावेशी विकास मुख्य प्राथमिकता है।
• नए विधानसभा भवन का महत्व: रायपुर के नया रायपुर क्षेत्र में एक नए और आधुनिक विधानसभा भवन का निर्माण राज्य के लोकतांत्रिक मूल्यों की मजबूती और भविष्य की आकांक्षाओं का प्रतीक है। यह भवन न केवल राज्य के शासन केंद्र के रूप में कार्य करेगा, बल्कि छत्तीसगढ़ की कला, संस्कृति और स्थापत्य कला को भी प्रदर्शित करेगा।
• नए जिलों का निर्माण: सुदूर और दुर्गम क्षेत्रों तक प्रशासनिक पहुंच और विकास की गति तेज करने के लिए, राज्य ने पिछले कुछ वर्षों में कई नए जिलों और तहसीलों का निर्माण किया है। छोटे प्रशासनिक इकाइयों का गठन नागरिकों के लिए सरकारी सेवाओं को सुलभ बनाता है, जिससे विकेंद्रीकरण (Decentralization) और त्वरित विकास सुनिश्चित होता है।
*7. शिक्षा में क्रांति: ज्ञान की नई रौशनी*
राज्य निर्माण के समय आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा का बुनियादी ढांचा बेहद कमजोर था। पिछले 25 वर्षों में शिक्षा के क्षेत्र में क्रन्तिकारी बदलाव आए हैं।
• स्वामी आत्मानंद स्कूल योजना: यह राज्य में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की दिशा में सबसे बड़ा कदम है। सरकारी स्कूलों को उच्च मानकों के साथ हिंदी और अंग्रेजी दोनों माध्यमों में उत्कृष्ट शिक्षा केंद्रों के रूप में विकसित किया गया है।
• उच्च शिक्षा का विस्तार: रायपुर में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) और राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (NIT) की स्थापना के साथ-साथ कई नए मेडिकल कॉलेज और विश्वविद्यालय खोले गए हैं। इससे स्थानीय छात्रों को राज्य के भीतर ही गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिला है।
• डिजिटल पहल: दूरस्थ और वनांचल क्षेत्रों में ई-कंटेंट, वर्चुअल क्लासरूम और शिक्षा सारथी जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से शिक्षा की पहुंच सुनिश्चित की जा रही है, जिससे 'ज्ञान की खाई' को पाटने में मदद मिली है।
*8. चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवाओं में कायापलट*
स्वास्थ्य सुविधाएँ, विशेष रूप से आदिवासी बहुल क्षेत्रों में, हमेशा एक चुनौती रही हैं। 25 वर्षों में, राज्य ने इस क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है।
• सार्वभौमिक स्वास्थ्य सुरक्षा: डॉ. खूबचंद बघेल स्वास्थ्य सहायता योजना जैसी राज्य-विशिष्ट योजनाओं ने गरीब और मध्यम वर्ग के परिवारों को मुफ्त और गुणवत्तापूर्ण इलाज तक पहुंच सुनिश्चित की है, जो स्वास्थ्य को एक अधिकार के रूप में स्थापित करती है।
• अंतिम छोर तक पहुंच: मोबाइल मेडिकल यूनिट (MMUs) और शहरी क्षेत्रों में दाई-दीदी क्लीनिक जैसी पहल प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को दूर-दराज के और झुग्गी-झोपड़ी वाले क्षेत्रों तक पहुंचा रही हैं।
• शिशु एवं मातृ मृत्यु दर में कमी: संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देने और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHCs) के सुदृढ़ीकरण से शिशु मृत्यु दर (IMR) और मातृ मृत्यु दर (MMR) में उल्लेखनीय कमी आई है, जो राज्य की सबसे बड़ी सामाजिक उपलब्धियों में से एक है।
*9. रोजगार और स्वरोजगार: युवा सशक्तीकरण*
राज्य की युवा शक्ति को दिशा देने और पलायन रोकने के लिए रोजगार एवं स्वरोजगार को मुख्य एजेंडा बनाया गया है।
• सरकारी नौकरियों में स्थानीय प्राथमिकता: राज्य बनने के बाद से ही स्थानीय निवासियों को सरकारी नौकरियों में प्राथमिकता देने की नीति से युवाओं को अपने गृह राज्य में ही काम करने के अवसर मिले हैं।
• कौशल विकास पहल: मुख्यमंत्री कौशल विकास योजना जैसी पहलों के माध्यम से युवाओं को उद्योग-उन्मुख ट्रेडों में प्रशिक्षित किया गया है। विशेष रूप से औद्योगिक क्षेत्रों (जैसे भिलाई, रायगढ़) के आसपास कौशल विकास केंद्रों की स्थापना की गई है।
• स्वरोजगार को बढ़ावा: गौठान और रूरल इंडस्ट्रियल पार्क (RIPA): ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के लिए गौठानों को आजीविका केंद्र और RIPA के रूप में विकसित किया गया है। ये केंद्र महिलाओं और युवाओं को छोटे-छोटे उद्योग (जैसे वर्मी कंपोस्ट निर्माण, हस्तकला, खाद्य प्रसंस्करण) स्थापित करने का मंच प्रदान करते हैं, जिससे वे उद्यमशील बन सकें। स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र: आईटी और सेवा क्षेत्रों में स्वरोजगार को बढ़ावा देने के लिए, स्टार्टअप को प्रोत्साहन और वित्तीय सहायता प्रदान की जा रही है।
*10. भाषा एवं बोलियां: मौखिक विरासत का संरक्षण*
छत्तीसगढ़ की भाषाई विविधता इसकी सांस्कृतिक समृद्धि का एक और प्रमाण है, जो इसकी मौखिक विरासत को सदियों से पोषित करती आई है।
• छत्तीसगढ़ी भाषा: यह राज्य की राजभाषा और संपर्क भाषा है। इसे अक्सर पूर्वी हिंदी की एक बोली माना जाता है, लेकिन इसका अपना व्याकरण, साहित्य और लोकगीतों की समृद्ध परंपरा है। राज्य ने छत्तीसगढ़ी को पहचान दिलाने और इसे शिक्षा तथा प्रशासन में बढ़ावा देने के लिए छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के माध्यम से कदम उठाए हैं।
• जनजातीय बोलियाँ: राज्य के वनांचल क्षेत्रों में गोंडी, हल्बी, कुड़ुख (उरांव), सरगुजिया और भतरी जैसी कई महत्वपूर्ण जनजातीय बोलियां बोली जाती हैं। हल्बी को बस्तर क्षेत्र में एक संपर्क भाषा (Lingua Franca) का दर्जा प्राप्त है।
• भाषाई संरक्षण: राज्य सरकार इन जनजातीय भाषाओं और बोलियों के संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध है। इसके लिए जनजातीय भाषाओं के शब्दकोशों का निर्माण किया जा रहा है और प्राथमिक शिक्षा में मातृभाषा-आधारित शिक्षा (Mother Tongue Based Education) को प्रोत्साहित किया जा रहा है ताकि बच्चों को अपनी जड़ों से जोड़कर शिक्षा दी जा सके।
*11. सांस्कृतिक परंपरा, व्यंजन और विविधता का संरक्षण*
छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान इसकी विविधता, सादगी और परंपराओं के संरक्षण में निहित है।
• लोक कला और विश्व मंच: पंडवानी, राउत नाचा और पंथी नृत्य जैसी कलाओं को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंच पर पहचान मिली है। पंडवानी गायिका तीजन बाई ने राज्य की लोक कथाओं को जीवंत बनाए रखा है।
• पर्व और परंपराएं: बस्तर दशहरा का 75-दिवसीय आयोजन, राजिम कुंभ/माघी पुन्नी मेला, और हरेली (कृषि पर्व) राज्य की सांस्कृतिक एकता के प्रतीक हैं। राज्य ने इन परंपराओं को संरक्षित करने और उन्हें पर्यटन से जोड़ने का सफल प्रयास किया है।
• रहन-सहन और व्यंजन: यहाँ का रहन-सहन प्रकृति के साथ तालमेल बिठाता है। खान-पान में चावल आधारित व्यंजन जैसे फरा, चीला, मुठिया और पौष्टिक बासी शामिल हैं। यह सादगीपूर्ण जीवनशैली और जैविक कृषि पर आधारित खान-पान, आधुनिक 'वेलनेस' संस्कृति के लिए एक प्रेरणा है।

*12. छत्तीसगढ़ में विकास की भुमिका*
छत्तीसगढ़ में अब तक मुख्य रूप से दो प्रमुख राजनीतिक दलों ने शासन किया है, और दोनों के कार्यकाल में विकास के अलग-अलग आयामों पर ध्यान केंद्रित किया गया।
1. बुनियादी ढाँचे और सामाजिक सुरक्षा पर जोर (मुख्यतः 2003-2018)
इस अवधि में, सरकार का प्रमुख ध्यान बुनियादी ढाँचे को मजबूत करने और लक्षित सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करने पर रहा:
सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) सुधार: छत्तीसगढ़ ने अपनी सार्वजनिक वितरण प्रणाली को देश के एक मॉडल के रूप में स्थापित किया। चावल वितरण के लिए विशेष कानून बनाए गए, जिससे भ्रष्टाचार में कमी आई और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित हुई।
बिजली और सड़क नेटवर्क: राज्य में बिजली उत्पादन और वितरण क्षमता में वृद्धि की गई, और दूर-दराज के क्षेत्रों को जोड़ने के लिए सड़क नेटवर्क का विस्तार किया गया।
शिक्षा और स्वास्थ्य: दूरस्थ क्षेत्रों में स्कूलों और स्वास्थ्य केंद्रों की पहुँच बढ़ाने पर काम हुआ।
वनोपज आधारित नीतियाँ: तेंदूपत्ता संग्राहकों को बोनस वितरण जैसी योजनाओं के माध्यम से वन आधारित अर्थव्यवस्था से जुड़े लोगों को आर्थिक संबल प्रदान किया गया।
इस दौर की उपलब्धियों ने राज्य में एक मजबूत भौतिक और सामाजिक सुरक्षा का आधार तैयार किया।
2. कृषि, न्याय और सांस्कृतिक पुनरुत्थान पर जोर (मुख्यतः 2000-2003 और 2018 के बाद)
इस अवधि की सरकारों ने कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था और सामाजिक-आर्थिक न्याय के सिद्धांतों को प्राथमिकता दी:
कृषि ऋण माफी और आय सहायता: किसानों के लिए कृषि ऋण माफी योजनाएँ लागू की गईं। राजीव गांधी किसान न्याय योजना (RGKNY) के माध्यम से धान उत्पादकों को इनपुट सहायता दी गई, जिसने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सीधा लाभ पहुँचाया।
गोबर खरीद पहल (गोबर धन न्याय योजना): यह योजना नवाचार का एक अनूठा उदाहरण है, जिसने पर्यावरण संरक्षण और पशुधन के आर्थिक मूल्य को बढ़ाकर ग्रामीण आजीविका को सशक्त किया।
सांस्कृतिक संरक्षण और पर्यटन: सरकार ने छत्तीसगढ़ी अस्मिता को मजबूत करने पर बल दिया। राम वन गमन पथ का विकास, कौशल्या माता मंदिर (चंदखुरी) का जीर्णोद्धार और पारंपरिक तीज-त्योहारों को सार्वजनिक अवकाश का दर्जा देकर सांस्कृतिक गौरव को बढ़ावा दिया गया।
प्रशासनिक विकेंद्रीकरण: प्रशासन को नागरिकों के करीब लाने के लिए नए जिलों का गठन किया गया, जिससे स्थानीय विकास योजनाओं को गति मिली।


*13. रजत जयंती का संकल्प : गढ़बो नवा छत्तीसगढ़*
25 वर्षों की यह यात्रा दृढ़ संकल्प और प्रगति की गाथा है। रजत जयंती वर्ष के अवसर पर, छत्तीसगढ़ अब भविष्य की ओर देख रहा है:
• सतत विकास: अपनी खनिज संपदा का उपयोग करते हुए पर्यावरण संतुलन बनाए रखना।
• सामाजिक समरसता: जनजातीय और गैर-जनजातीय समाजों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना।
• युवा शक्ति: शिक्षा और कौशल विकास के माध्यम से युवाओं को रोजगार के लिए तैयार करना।
छत्तीसगढ़ अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ, लेकिन भविष्य की ओर उन्मुख, एक ऐसे 'नवा छत्तीसगढ़' के निर्माण के लिए प्रतिबद्ध है जो भारत के विकास में एक मजबूत और गौरवशाली भागीदार होगा।
छत्तीसगढ़ का विकास किसी एक सरकार की उपलब्धि नहीं, बल्कि एक निरंतर प्रक्रिया का परिणाम है। एक तरफ जहाँ कुछ सरकारों ने बुनियादी ढाँचे, खाद्य सुरक्षा और PDS के मॉडल पर काम किया, वहीं दूसरी ओर कृषि, सामाजिक न्याय और सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने पर जोर दिया गया।
इन राजनीतिक प्रयासों के मूल में शहीद वीर नारायण सिंह के बलिदान, गुरु घासीदास के सामाजिक समरसता के संदेश और डॉ. खूबचंद बघेल के भाषाई और सांस्कृतिक आंदोलन की नींव है। छत्तीसगढ़ की भविष्य की राह इन दोनों स्तंभों—मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति और विरासत में मिली सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना—पर निर्भर करती है। राज्य का भविष्य तभी उज्ज्वल होगा जब उसकी विकास की परिभाषा में आर्थिक समृद्धि के साथ-साथ यहाँ की विशिष्ट संस्कृति और ‘गढ़बो नवा छत्तीसगढ़’ का संकल्प भी शामिल हो।

आलेख - खेमेश्वर पुरी गोस्वामी
मुंगेली, छत्तीसगढ़ 8120032834
              

chhattisgarhi

*छत्तीसगढ़ में राजभाषा छत्तीसगढ़ी और स्थानीय भाषाओं की उपेक्षा - एक गंभीर चिंतन*

*राजभाषा की घोषणा, कागजों तक सीमित! छत्तीसगढ़ी अस्मिता पर संकट*

छत्तीसगढ़ राज्य के गठन का एक प्रमुख आधार यहाँ की छत्तीसगढ़ी भाषा और उसकी विशिष्ट संस्कृति थी। राज्य बनने के बाद, 28 नवंबर 2007 को छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का दर्जा मिला, और इसके विकास व शासकीय उपयोग हेतु छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग की स्थापना भी की गई। यह कदम राज्य की अस्मिता को सम्मान देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल थी।
हालांकि, राजभाषा घोषित होने के वर्षों बाद भी, जमीनी हकीकत निराशाजनक है। छत्तीसगढ़ी आज भी सरकारी दफ्तरों से लेकर शिक्षा तक में विशेष महत्व प्राप्त नहीं कर पाई है। यह केवल कागजों तक सिमटकर रह गई है। इसके समानांतर, प्रदेश की अन्य स्थानीय बोलियाँ और आदिवासी भाषाएँ - जैसे गोंडी, हल्बी, कुड़ुख, सरगुजिया आदि - तो और भी अधिक उपेक्षा की शिकार हैं। इस उपेक्षा के सामाजिक, राजनैतिक, प्रशासनिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गंभीर चिंतन की आवश्यकता है।

*प्रशासनिक उदासीनता: राजकाज की भाषा कब बनेगी छत्तीसगढ़ी?*
छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का दर्जा तो मिला, लेकिन सरकारी कामकाज में इसका उपयोग न के बराबर है।

*हिंदी का वर्चस्व:* सरकारी कार्यालयों में राजकाज की भाषा आज भी प्रमुख रूप से हिंदी है। प्रशासनिक पत्र-व्यवहार, न्यायिक प्रक्रिया और अधिसूचनाएँ अधिकांशतः हिंदी में ही होती हैं।

*कर्मचारियों में अनिच्छा:* अधिकारियों और कर्मचारियों में छत्तीसगढ़ी में काम करने की अनिच्छा या प्रशिक्षण का अभाव एक बड़ी बाधा है।

*राजभाषा आयोग की सीमित शक्ति:* राजभाषा आयोग का गठन तो हुआ है, लेकिन इसे पर्याप्त वित्तीय और कानूनी शक्तियाँ प्राप्त नहीं हैं, जिसके कारण यह भाषा के प्रचार-प्रसार और प्रशासनिक उपयोग को अनिवार्य बनाने में कमजोर साबित हो रहा है।

*शिक्षा में उपेक्षा:* प्राथमिक शिक्षा में भी छत्तीसगढ़ी को अनिवार्य विषय के रूप में शामिल करने की माँग लंबे समय से है, लेकिन यह माँग पूरी नहीं हुई है। नतीजतन, नई पीढ़ी अपनी मातृभाषा से दूर होती जा रही है।

*.सामाजिक और सांस्कृतिक क्षति:* पहचान का संकट
भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि किसी भी समाज की संस्कृति और पहचान की वाहक होती है। छत्तीसगढ़ी और स्थानीय भाषाओं की उपेक्षा का सामाजिक और सांस्कृतिक ताने-बाने पर गहरा नकारात्मक असर पड़ रहा है।

*शहरीकरण और हीनता बोध:* शहरों में, खासकर शिक्षित वर्ग में, छत्तीसगढ़ी बोलने को हीनता की भावना से जोड़ा जाता है। हिंदी और अंग्रेजी का बोलबाला, खासकर बच्चों की शिक्षा और बोलचाल में, उनकी जड़ों से उन्हें काट रहा है।

*लोक-साहित्य का क्षरण:* छत्तीसगढ़ी का अपना समृद्ध लोक-साहित्य, लोकगीत, पंडवानी, ददरिया और लोकोक्तियाँ हैं। भाषा के प्रचलन में कमी आने से यह समृद्ध मौखिक परंपरा लुप्त होने के कगार पर है।

*मातृभाषा का महत्व:* ग्रामीण क्षेत्रों की 82% से अधिक आबादी की संपर्क भाषा छत्तीसगढ़ी ही है। जब शिक्षा और प्रशासन की भाषा उनकी मातृभाषा नहीं होती, तो वे विकास की दौड़ में पीछे छूट जाते हैं, और उनके लिए सरकारी योजनाओं को समझना भी मुश्किल हो जाता है।

*राजनैतिक इच्छाशक्ति का अभाव: केवल ब्रांडिंग का विषय*
छत्तीसगढ़ी भाषा को लेकर राजनेताओं के बयान और घोषणाएँ तो खूब आती हैं, लेकिन ठोस कार्यान्वयन की कमी साफ दिखती है।

*वोट बैंक की राजनीति:* चुनावों के दौरान छत्तीसगढ़ी अस्मिता की बात होती है, लेकिन सत्ता में आने के बाद यह केवल ब्रांडिंग या प्रतीकात्मक आयोजनों तक सीमित रह जाती है।

*आठवीं अनुसूची की माँग:* छत्तीसगढ़ी को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की माँग लंबे समय से लंबित है। राजनैतिक दल इस दिशा में अपेक्षित दबाव बनाने में विफल रहे हैं, जिससे भाषा को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता नहीं मिल पा रही है।

*हिंदी बनाम छत्तीसगढ़ी:* कुछ हिंदी-समर्थक समूहों का यह तर्क भी है कि छत्तीसगढ़ी को बढ़ावा देने से हिंदी को क्षति होगी, जो कि एक भ्रामक धारणा है। भाषाविदों के अनुसार, छत्तीसगढ़ी,अवधी और बघेली की सहोदरा है, और इसका समृद्ध साहित्य हिंदी को और विविधता प्रदान करता है।

*.आगे की राह: सशक्तिकरण और स्वीकार्यता.*

छत्तीसगढ़ी और स्थानीय भाषाओं को उपेक्षा के इस चक्र से बाहर निकालने के लिए जनता, सरकार और बुद्धिजीवियों सभी को मिलकर प्रयास करने होंगे।
शिक्षा में अनिवार्यता: प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक छत्तीसगढ़ी को अनिवार्य और महत्वपूर्ण विषय के रूप में शामिल किया जाए।

*प्रशासनिक उपयोग:* सरकारी दफ्तरों में छत्तीसगढ़ी का उपयोग अनिवार्य किया जाए, और इसके लिए कर्मचारियों को प्रशिक्षण दिया जाए।
स्थानीय भाषाओं का संरक्षण: गोंडी और अन्य आदिवासी भाषाओं के लिए विशेष अकादमी और कोश (डिक्शनरी) का निर्माण किया जाए, ताकि उनकी लिपि और साहित्य का संरक्षण हो सके।
जन-जागरण: समाज में छत्तीसगढ़ी बोलने के प्रति गौरव की भावना पैदा करने के लिए व्यापक जन-जागरण अभियान चलाया जाए।

*सरकारी योजनाएँ और पहल: केवल नाम की संजीवनी*

छत्तीसगढ़ी भाषा के हित में सरकार द्वारा कुछ योजनाएँ और पहल की गई हैं, लेकिन उनका कार्यान्वयन और प्रभाव अभी भी अपेक्षानुरूप नहीं है।

*छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग:* इसकी स्थापना का उद्देश्य भाषा का प्रचार-प्रसार, साहित्य सृजन और राजकीय उपयोग सुनिश्चित करना था। आयोग ने कई महत्वपूर्ण सेमिनार आयोजित किए हैं और शब्दकोश निर्माण की दिशा में कार्य किया है। हालांकि, इसे प्रशासनिक बाध्यता लागू करने की शक्ति नहीं मिली है, जिससे इसका प्रभाव सलाहकार तक सीमित रह जाता है।

*लोक-कला और साहित्य प्रोत्साहन:* राज्य अलंकरणों में छत्तीसगढ़ी साहित्यकारों और लोक कलाकारों को सम्मानित करना, राज्योत्सव जैसे आयोजनों में छत्तीसगढ़ी संस्कृति का प्रदर्शन करना। ये पहलें भाषा के प्रति गौरव जगाती हैं, लेकिन भाषा को जीविकोपार्जन और शिक्षा से नहीं जोड़ पाती हैं।

*मातृभाषा दिवस/राजभाषा दिवस:* प्रतिवर्ष 28 नवंबर को छत्तीसगढ़ी राजभाषा दिवस मनाना एक प्रतीकात्मक कदम है।
असर: ये पहलें आवश्यक तो हैं, लेकिन ये भाषा को सरकारी सिस्टम और रोजगार की मुख्यधारा से जोड़ने में नाकाफी साबित हुई हैं। भाषा के विकास के लिए योजनाओं का क्रियान्वयन केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि व्यावहारिक और बाध्यकारी होना चाहिए।

*छत्तीसगढ़ी के हित में सरकार से प्रमुख अपेक्षाएँ*

छत्तीसगढ़ी को उसकी उपेक्षा के चक्र से निकालने और उसे उसका वास्तविक स्थान दिलाने के लिए सरकार से निम्नलिखित ठोस अपेक्षाएँ हैं:
 *संवैधानिक और कानूनी अनिवार्यता*
आठवीं अनुसूची में शामिल करना: केंद्र सरकार पर प्रबल राजनैतिक दबाव बनाया जाए ताकि छत्तीसगढ़ी को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया जा सके। यह इसे राष्ट्रीय मान्यता और विकास के लिए केंद्र से वित्तीय सहायता का पात्र बनाएगा।
राजभाषा कानून का कड़ा क्रियान्वयन: राजभाषा आयोग को विधिक शक्ति प्रदान की जाए, ताकि वह प्रशासनिक कार्यालयों में छत्तीसगढ़ी के उपयोग को अनिवार्य कर सके और उल्लंघन पर दंडात्मक प्रावधान लागू हो सकें।

*शिक्षा और रोजगार में समावेशन*
 
*प्राथमिक शिक्षा का माध्यम:* प्रदेश के सभी ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक स्तर (कक्षा 1 से 5) पर शिक्षा का माध्यम (मीडियम) अनिवार्य रूप से छत्तीसगढ़ी या संबंधित स्थानीय बोली (जैसे गोंडी, हल्बी) को बनाया जाए।

*व्यावसायिक पाठ्यक्रम:* छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य को राज्य की उच्च शिक्षा में, खासकर पत्रकारिता, जनसंपर्क, और लोक प्रशासन के पाठ्यक्रमों में एक अनिवार्य विषय/विकल्प के रूप में जोड़ा जाए।

*रोजगार में प्राथमिकता:* राज्य सरकार की तृतीय और चतुर्थ श्रेणी की नौकरियों में छत्तीसगढ़ी भाषा के ज्ञान को अनिवार्य किया जाए और लिखित परीक्षा में इसे योग्यता का मापदंड बनाया जाए।

*आदिवासी भाषाओं का संरक्षण*
भाषा अकादमी: गोंडी, हल्बी, कुड़ुख, और सरगुजिया जैसी प्रमुख आदिवासी भाषाओं के लिए अलग-अलग अकादमियों की स्थापना की जाए।

*शिक्षक भर्ती:* इन भाषाओं के शिक्षक विशेष रूप से भर्ती किए जाएँ ताकि उन क्षेत्रों में मातृभाषा में शिक्षा दी जा सके, जहाँ ये बोलियाँ बोली जाती हैं।

*न्यायिक और प्रशासनिक सरलीकरण :*
*न्यायिक उपयोग:* निचले स्तर के न्यायालयों (जैसे व्यवहार न्यायालय) में पक्षकारों को छत्तीसगढ़ी में अपने बयान दर्ज कराने और कानूनी दस्तावेज तैयार करने की सुविधा दी जाए।
*सरल छत्तीसगढ़ी:* प्रशासनिक छत्तीसगढ़ी की एक मानकीकृत शब्दावली का निर्माण किया जाए, जो हिंदी से मिलती-जुलती हो,ताकि प्रशासनिक कार्यों में इसे आसानी से अपनाया जा सके।
सरकार से यह अपेक्षा है कि वह छत्तीसगढ़ी को वोट बटोरने के साधन से ऊपर उठकर, राज्य की आत्मा और जनता की आवाज के रूप में देखे, और इसके व्यावहारिक विकास के लिए एक स्पष्ट और समयबद्ध रोडमैप तैयार करे।

छत्तीसगढ़ी भाषा 2 करोड़ से अधिक लोगों की भावनाओं, संस्कृति और ज्ञान का भंडार है यह राज्य की अस्मिता का प्रतीक है। यह सरकार का नैतिक और संवैधानिक दायित्व है कि वह इस भाषा को केवल एक सरकारी घोषणा तक सीमित न रखे, बल्कि इसे शक्ति, सम्मान और उपयोग का माध्यम बनाए। इंतजार अब खत्म होना चाहिए।

Thursday, October 2, 2025

महाभारत: महाकाव्य, कालक्रम और उन्नत विज्ञान के अंतर्संबंधों का एक समालोचनात्मक विश्लेषण

महाभारत: महाकाव्य, कालक्रम और उन्नत विज्ञान के अंतर्संबंधों का एक समालोचनात्मक विश्लेषण
1. प्रस्तावना: इतिहास, मिथक और वैज्ञानिक अन्वेषण
1.1. महाकाव्य का संदर्भ और ऐतिहासिक महत्त्व
महाभारत को विश्व के सबसे लंबे महाकाव्यों में से एक माना जाता है, जो केवल कौरवों और पांडवों के बीच हुए कुरुक्षेत्र युद्ध का विस्तृत वृत्तांत मात्र नहीं है । यह महाकाव्य धर्म, न्याय, और जीवन के चार लक्ष्यों (पुरुषार्थों) पर गहन दार्शनिक सामग्री का भंडार है । इसके अलावा, शांति पर्व जैसे वर्गों में राजधर्म, दंडनीति, तत्वमीमांसा (मेटाफिजिक्स), भूगोल, और ब्रह्मांड विज्ञान (कॉस्मोलॉजी) पर भी weighty treatises शामिल हैं । महाभारत में सांख्य और योग जैसे प्राचीन भारतीय दार्शनिक विद्यालयों की विस्तृत चर्चा भी मिलती है ।
प्राचीन दक्षिण एशियाई इतिहासलेखन (हिस्टोरियोग्राफी) के स्रोतों के रूप में, महाभारत और रामायण अत्यंत महत्वपूर्ण हैं । चूंकि प्राचीन भारत में गैर-धार्मिक ऐतिहासिक साहित्य की गुणवत्ता और मात्रा सीमित थी, इसलिए विद्वान अक्सर इतिहास को समझने के लिए धार्मिक ग्रंथों पर निर्भर करते हैं । इस कारण, महाभारत की घटनाओं को केवल एक पौराणिक आख्यान (mythological allegory) या एक ऐतिहासिक खाते (historical account) के रूप में देखने को लेकर विद्वानों में निरंतर बहस बनी रहती है ।
1.2. आधुनिक विज्ञान और प्राचीन ज्ञान के बीच की खाई
हाल के वर्षों में, प्राचीन भारतीय ग्रंथों में वर्णित अवधारणाओं की वैज्ञानिक प्रामाणिकता को लेकर शैक्षणिक और सार्वजनिक मंचों पर तीव्र बहस छिड़ी है । कुछ विद्वान इन दावों को छद्म विज्ञान (pseudo-science) के रूप में खारिज करते हैं , जबकि अन्य इन्हें खोए हुए उन्नत ज्ञान के प्रमाण मानते हैं ।
एक वस्तुनिष्ठ विश्लेषण के लिए, सत्य को स्वीकार करने की शक्ति आवश्यक है, भले ही वह स्थापित आस्थाओं या व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों के विपरीत क्यों न हो । ऐतिहासिक शोध की चुनौतियों पर विचार करना आवश्यक है: चूँकि प्राचीन इतिहासलेखन मुख्य रूप से धार्मिक साहित्य पर निर्भर करता है , महाकाव्य में दर्ज किसी भी घटना (जैसे युद्ध की तिथि या उन्नत अस्त्रों का अस्तित्व) को सिद्ध करने के लिए भौतिक या पुरालेखीय साक्ष्यों की कठोर वैज्ञानिक सत्यापन की आवश्यकता होती है। खगोल विज्ञान का उपयोग इसी चुनौती को पार करने का एक प्रमुख प्रयास है, ताकि महाकाव्य को केवल कहानी मानने वाले पूर्ववर्ती दृष्टिकोण (जैसे ब्रिटिश पुरातत्वविदों द्वारा अपनाया गया)  को चुनौती दी जा सके। हालांकि, जैसा कि काल निर्धारण विवादों में देखा जाता है, इन नई पद्धतियों को भी कठोर शैक्षणिक सत्यापन की आवश्यकता होती है।
2. कालक्रम और पुरा-खगोल विज्ञान (Chronology and Archaeo-Astronomy)
महाभारत की ऐतिहासिकता को स्थापित करने का सबसे मजबूत प्रयास महाकाव्य में वर्णित विशिष्ट खगोलीय घटनाओं, जैसे कि ग्रहणों और ग्रहों की नक्षत्रों में स्थितियों, का उपयोग करके किया जाता है । इस पद्धति में, आधुनिक कंप्यूटर सॉफ्टवेयर (जैसे नासा का प्लैनेटेरियम और स्टेलारियम) का उपयोग करके हजारों साल पीछे की आकाश स्थिति का अनुकरण (स्काई सिमुलेशन) किया जाता है ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि कौन सी तिथि पाठ्य विवरणों से मेल खाती है ।
2.1. महाभारत काल-निर्धारण के मूलभूत साक्ष्य
महाभारत युद्ध की तिथि निर्धारित करने के लिए विद्वान कई खगोलीय और साहित्यिक साक्ष्यों का अध्ययन करते हैं । इनमें भीष्म मोक्ष तिथि, नक्षत्र गणना (नक्षत्र गणना), और शनि तथा बृहस्पति की विशिष्ट राशियाँ शामिल हैं ।
एक उल्लेखनीय तथ्य यह है कि महाभारत में उल्लेखित खगोल विज्ञान की गहराई में व्यास जैसे ऋषियों द्वारा दूर के ग्रहों का ज्ञान शामिल हो सकता है। उदाहरण के लिए, पाठ में श्याम (नीले और सफेद का मिश्रण) या नेपच्यून ग्रह का ज्येष्ठा नक्षत्र में होने का उल्लेख मिलता है । नेपच्यून जैसे बाहरी ग्रह की स्थिति और रंग का ज्ञान, जिसे आधुनिक युग में ही खोजा गया है, प्राचीन भारतीय खगोल विज्ञान की असाधारण सटीकता को दर्शाता है ।
2.2. प्रमुख काल-निर्धारण सिद्धांत और उनका मूल्यांकन
महाभारत युद्ध की तिथि के संबंध में कई मतभेद मौजूद हैं, जो कैलेंडर प्रणालियों या पाठ्य व्याख्याओं में भिन्नता के कारण उत्पन्न हुए हैं ।
 * पारंपरिक/आर्यभट्ट काल (3100 - 3102 ईसा पूर्व): पाँचवीं शताब्दी के गणितज्ञ आर्यभट्ट ने ग्रहों की स्थिति के आधार पर युद्ध की तिथि लगभग 3100 ईसा पूर्व निर्धारित की थी । यह तिथि पारंपरिक रूप से कलियुग के आरंभ से जुड़ी हुई है। प्रोफेसर सी.वी. वैद्य और प्रोफेसर आप्टे ने भी 3101 ईसा पूर्व की तिथि निकाली ।
 * डॉ. सरोज बाला का शोध (3139 ईसा पूर्व): इस शोध में खगोलीय घटनाओं का प्रमाण दिया गया है, जैसे कि 26 सितंबर 3139 ईसा पूर्व को हस्तिनापुर (29°उत्तर, 77°पूर्व) से कार्तिक माह की प्रथम पूर्णिमा को देखा गया चंद्र ग्रहण। इसके अतिरिक्त, 3 मार्च 3102 ईसा पूर्व को द्वारका से एक पूर्ण सूर्य ग्रहण देखा गया था । यह अध्ययन नासा के प्लैनेटेरियम और स्टेलारियम जैसे सॉफ्टवेयर का उपयोग करके 25,920 वर्षों तक की आकाश स्थितियों का अनुकरण करने पर आधारित था ।
 * नीलेश ओक का शोध (5561 ईसा पूर्व) और आलोचना: नीलेश ओक ने खगोल विज्ञान के साक्ष्यों के आधार पर महाभारत युद्ध की तिथि 5561 ईसा पूर्व निर्धारित की थी । यह सिद्धांत अरुंधति-वसिष्ठ नक्षत्रों की एक विशिष्ट दृश्य स्थिति पर केंद्रित है । हालांकि, इस तिथि को डॉ. राजा राम मोहन रॉय और अन्य विद्वानों द्वारा वैज्ञानिक आलोचना का सामना करना पड़ा है। आलोचना में मुख्य रूप से आधुनिक सॉफ्टवेयर की सटीकता की सीमाओं, मापन त्रुटियाँ (जैसे कि राइट असेंशन गणना में), और पाठ्य संदर्भों (जैसे महाभारत में अरुंधति के सभी 31 उल्लेखों) की संभावित गलत व्याख्या को आधार बनाया गया है ।
2.3. खगोलीय और मौसम विज्ञान की सटीकता
महाभारत में दर्ज खगोलीय विवरण अत्यंत सूक्ष्म हैं। उदाहरण के लिए, यह उल्लेख किया गया है कि 18 दिनों के युद्ध के दौरान शुक्र और मंगल ग्रह एक-दूसरे के निकट थे, जो लगभग 3 से 7 डिग्री के अलगाव पर थे, और सूर्यास्त के बाद दिखाई देते थे ।
ज्योतिषीय विज्ञान के अनुसार, ग्रहों के योग का अध्ययन भी किया गया है। 1962 ई. (विक्रम संवत् 2018) में आए एक विशिष्ट ग्रह योग (सभी ग्रहों का मकर राशि में स्थित होना) की तुलना महाभारत युद्धकालीन ग्रह स्थिति से की गई थी । यह तुलना दर्शाती है कि ज्योतिषीय गणनाओं में महाभारत के समय की ग्रह स्थिति को अत्यधिक विनाशकारी घटना (जैसे तृतीय विश्व युद्ध) का संकेत देने वाला एक दुर्लभ योग माना जाता था ।
महाकाव्य में खगोल विज्ञान (ज्योतिष शास्त्र) की दोहरी भूमिका दिखाई देती है: एक तो यह काल गणना (रिचुअल कैलेंडर) और समय कीपिंग के लिए आवश्यक था, और दूसरा इसका उपयोग भविष्य की भविष्यवाणी (फलित ज्योतिष) के लिए किया जाता था । काल निर्धारण पर विभिन्न विद्वानों के बीच 3102 ईसा पूर्व बनाम 5561 ईसा पूर्व जैसी तिथियों को लेकर तीव्र विवाद इस तथ्य को रेखांकित करता है कि पाठ में खगोलीय विवरण मौजूद होने के बावजूद, वे या तो प्रतीकात्मक हैं (शकुन के रूप में) या उनमें अस्पष्टता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारतीय खगोल ज्ञान अत्यंत उन्नत था, लेकिन इसका प्राथमिक उद्देश्य विशुद्ध रूप से ऐतिहासिक रिकॉर्डिंग से अधिक, धार्मिक और ज्योतिषीय आवश्यकताओं को पूरा करना था।
Table Title
| शोधकर्ता/स्रोत | प्रस्तावित तिथि | आधारभूत खगोलीय घटनाएँ/साक्ष्य | आलोचनात्मक टिप्पणी |
|---|---|---|---|
| आर्यभट्ट/पारंपरिक  | 3100-3101 ईसा पूर्व | कलियुग आरंभ, विशिष्ट ग्रहों की स्थिति | पारंपरिक रूप से स्वीकृत, आधुनिक शोधों द्वारा खगोलीय त्रुटियाँ इंगित |
| डॉ. सरोज बाला/के. वेंकटचलम  | 3139 ईसा पूर्व | हस्तिनापुर से चंद्र ग्रहण, द्वारका से सूर्य ग्रहण | प्लैनेटेरियम सॉफ्टवेयर पर आधारित, 3102 BCE घटनाएँ भी दर्ज |
| नीलेश ओक  | 5561 ईसा पूर्व | अरुंधति-वसिष्ठ अपवाद, अन्य विशिष्ट ग्रह योग | गंभीर शैक्षणिक आलोचना (मापन/सॉफ्टवेयर त्रुटियां, अस्पष्ट पाठ्य व्याख्या)  |
| वराहमिहिर  | 2400 ईसा पूर्व | कैलेंडर प्रणाली पर विरोधाभासी विचार | काल गणना की भिन्न प्रणालियों के कारण मतभेद |
3. विनाशकारी अस्त्र और उन्नत भौतिकी के सिद्धांत (Weapons of Mass Destruction and Applied Physics)
महाभारत में वर्णित दिव्य अस्त्रों (astras) की प्रकृति और विनाशकारी क्षमताएं आधुनिक युद्ध तकनीक और भौतिकी के सिद्धांतों के साथ आश्चर्यजनक समानताएं प्रस्तुत करती हैं।
3.1. ब्रह्मास्त्र: परमाणु समकक्ष?
ब्रह्मास्त्र को महाकाव्यों में सबसे विनाशकारी हथियारों में से एक माना गया है, जिसकी तुलना अक्सर आधुनिक परमाणु हथियारों से की जाती है । इसका वर्णन "ब्रह्मांड की सारी शक्ति से आवेशित एकल प्रक्षेप्य" के रूप में किया गया है, जो विस्फोट होने पर "दस हजार सूर्यों के समान उज्ज्वल धुएं और ज्वाला का एक प्रदीप्त स्तंभ" उत्पन्न करता था ।
ब्रह्मास्त्र के प्रभाव भयावह थे: यह पूरे शहर को राख में बदल सकता था, नदियों और झीलों को सुखा सकता था, और हवा को महीनों तक जलाने में सक्षम था । पाठ में यह भी दर्ज है कि इसके उपयोग के बाद भूमि बंजर हो जाती थी, और जीवित बचे लोगों के बाल व नाखून झड़ने लगते थे । आधुनिक विद्वानों ने इन परिणामों में थर्मोन्यूक्लियर विस्फोटों से होने वाले विनाश और विकिरण बीमारी (Radiation Sickness) के लक्षणों से चौंकाने वाली समानताएं पाई हैं । परमाणु बम के वास्तुकार जे. रॉबर्ट ओपेनहाइमर ने भी कथित तौर पर यह विश्वास व्यक्त किया था कि प्राचीन भारत में परमाणु जैसे विनाशकारी हथियारों का उपयोग किया गया होगा ।
इन अस्त्रों का संचालन और नियंत्रण भी उन्नत ज्ञान को दर्शाता है। ब्रह्मास्त्र का उपयोग पूरी लंका को साफ करने की क्षमता के कारण लक्ष्मण द्वारा टाल दिया गया था । इसके अलावा, वशिष्ठ मुनि जैसे ब्रह्मर्षियों के सम्मान में ब्रह्मास्त्र को बेअसर होते दिखाया गया है । यह सुझाव देता है कि इन हथियारों का भौतिक विनाश अत्यधिक होने के बावजूद, उनका संचालन और निष्क्रियता केवल भौतिकी पर नहीं, बल्कि मंत्र, चेतना, या विशिष्ट रक्षा प्रणालियों पर भी निर्भर करता था।
3.2. तत्वीय और अनुकूलक हथियार प्रणालियाँ (Elemental and Adaptive Weapon Systems)
ब्रह्मास्त्र के अलावा, महाभारत में ऐसे अस्त्रों का भी वर्णन है जो तत्वों को नियंत्रित करते थे:
 * आग्नेयास्त्र और वारुणास्त्र: आग्नेयास्त्र पूरे युद्धक्षेत्र को आग लगा सकता था । इसके विपरीत, वारुणास्त्र (जल तत्व का हथियार) का उपयोग व्यापक आग को बुझाने या दुश्मन सेना को डुबोने के लिए किया जाता था ।
 * नारायणास्त्र: इस हथियार की सबसे विशिष्ट विशेषता इसका अनुकूलक व्यवहार (adaptive behavior) था। यह शत्रु के प्रतिरोध के अनुसार अपनी विनाशकारी शक्ति को बढ़ाता था—जितना कठिन मुकाबला, उतनी ही अधिक तबाही ।
आधुनिक इंजीनियरिंग के लिए अनुकूलक हथियारों (adaptive weapons) का विचार अभी भी चुनौतीपूर्ण है, जहां हथियार वास्तविक समय में शत्रु की प्रतिक्रियाओं का विश्लेषण करके अपनी शक्ति या दिशा को बदल सकें ।
यदि ब्रह्मास्त्र परमाणु ऊर्जा का उपयोग करता था और अन्य अस्त्र तत्वों को नियंत्रित करते थे, तो उन्हें आह्वान करने का माध्यम—'मंत्र'—केवल धार्मिक पाठ नहीं हो सकता था। यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि 'मंत्र' किसी भौतिक उपकरण को सक्रिय करने या नियंत्रित करने के लिए उपयोग किए जाने वाले सटीक कोड, आवृत्तियाँ (Frequencies), या क्वांटम इंस्ट्रक्शन हो सकते थे । यह प्रौद्योगिकी के एक ऐसे स्तर को इंगित करता है जो वर्तमान भौतिकी और चेतना की परस्पर क्रिया पर आधारित हो सकता था, जिसे आज हम समझ नहीं पाते हैं और इसलिए 'जादू' या 'चमत्कार' के रूप में वर्णित करते हैं ।
Table Title
| अस्त्र का नाम | महाभारत में वर्णित प्रभाव | आधुनिक वैज्ञानिक समकक्ष/सिद्धांत | तकनीकी पहलू (विश्लेषण) |
|---|---|---|---|
| ब्रह्मास्त्र  | संपूर्ण शहर को भस्म करना, विकिरण प्रभाव, बंजर भूमि | परमाणु या थर्मोन्यूक्लियर हथियार (उच्च ऊर्जा घनत्व) | नियंत्रित ऊर्जा विमोचन, रेडियोधर्मिता के परिणामों का ज्ञान  |
| नारायणास्त्र  | प्रतिरोध बढ़ने पर विनाशकारी होना | अनुकूलक हथियार प्रणाली (Adaptive/AI Weaponry) | स्व-निर्देशित प्रणाली जो शत्रु के ऊर्जा हस्ताक्षर या प्रतिक्रिया को पहचानकर प्रतिक्रिया देती है  |
| आग्नेयास्त्र/वारुणास्त्र  | तत्वीय विनाश/शांत करना | मौसम/तत्व हेरफेर (Weather/Element Manipulation) | वायुमंडलीय ऊर्जा या रासायनिक प्रतिक्रियाओं का नियंत्रित उपयोग |
| संजय की दिव्य दृष्टि  | दूर से युद्ध की गतिविधियों को देखना | रिमोट व्यूइंग, टेलीविजन, या सैटेलाइट कवरेज | संचार और अवलोकन तकनीक का अत्यंत उन्नत रूप |
4. प्राचीन जैव-तकनीक और चिकित्सा विज्ञान (Ancient Biotechnology and Medical Science)
महाभारत में कौरवों के जन्म की कथा प्रजनन विज्ञान और आनुवंशिकी के क्षेत्र में प्राचीन भारतीयों के उन्नत ज्ञान का संकेत देती है, जिसे कुंभ गर्भ तकनीक के रूप में व्याख्यायित किया जाता है।
4.1. कौरवों का जन्म और कुंभ गर्भ तकनीक (Cloning and Pot-Womb)
कौरवों के जन्म की कहानी में रानी गांधारी का वर्णन है, जिन्होंने एक असामान्य रूप से लंबी गर्भावस्था (प्रोलॉन्गड जेस्टेशन, जिसे कुछ आधुनिक चिकित्सा अभिलेखों में दर्ज किया गया है, या स्यूडोसाइसिस) के बाद मांस का एक पिंड (मांस पिंड) जन्म दिया । ऋषि वेद व्यास ने इस पिंड को 101 टुकड़ों में विभाजित किया और उन्हें घी तथा आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों से भरे 101 मटकों (कुंभ) में रखवा दिया । दो वर्षों के पोषण के बाद, इन टुकड़ों से 100 पुत्रों (कौरवों) और एक पुत्री (दुशाला) का जन्म हुआ ।
यह प्रक्रिया आधुनिक जैव-तकनीक के साथ तुलना की जाती है। यह विभाजन और नियंत्रित वातावरण में विकास आधुनिक टेस्ट ट्यूब बेबी (IVF), नियंत्रित ऊतक संवर्धन (Tissue Culture), या स्टेम सेल सिद्धांत से मिलती-जुलती है । इस सिद्धांत के अनुसार, एक अविभेदित ऊतक या बीज कोशिका (seed cell) को विभाजित करके, उसे कृत्रिम वातावरण में पोषण प्रदान करके पूर्ण व्यक्तियों में विकसित किया जा सकता है। इस प्रकार, कुंभ गर्भ को प्राचीन क्लोनिंग या कृत्रिम गर्भाधान के ज्ञान का प्रमाण माना जाता है । कौरवों के जन्म की यह प्रक्रिया स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि उस काल के ऋषियों/वैज्ञानिकों को टोटिपोटेंसी—एक अविभेदित ऊतक से पूर्ण जीव विकसित करने की क्षमता—का गहरा ज्ञान था।
4.2. चिकित्सा और पुनर्जीवन तकनीक
प्राचीन चिकित्सा पद्धतियों में ऐसे ज्ञान का उल्लेख है जो आधुनिक विज्ञान के लिए भी रहस्यमय बना हुआ है:
 * संजीवनी विद्या: असुरों के गुरु शुक्राचार्य के पास संजीवनी विद्या थी, जिसके बल पर वे युद्ध में मारे गए दानवों को तुरंत जीवित कर सकते थे । यह तकनीक आधुनिक विज्ञान में ऊतक पुनर्जनन (Tissue Regeneration), पुनर्जीवन (Resuscitation), या मृत्यु की सीमा को उलट देने की अवधारणाओं को छूती है, लेकिन आज भी यह एक अनसुलझा रहस्य है।
 * लिंग परिवर्तन: शिखंडी के रूप में पुनर्जन्म लेने वाली अंबा की कथा में एक यक्ष की सहायता से स्त्री से पुरुष बनने का वर्णन है । यह घटना हार्मोनल या जेनेटिक हस्तक्षेप और लिंग परिवर्तन सर्जरी के उन्नत ज्ञान का संकेत देती है।
 * आयुर्वेद के सिद्धांत: आयुर्वेद, भारत की सबसे पुरानी पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों में से एक है । यह पांच तत्वों (आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी) के साथ मानव शरीर के संबंध पर आधारित है । यह प्रणाली शरीर, मन और चेतना के कार्यों को नियंत्रित करने वाले तीन दोषों (वात, पित्त, कफ) पर टिकी है, जो गति, पाचन और संरचना के कार्यों को शासित करते हैं ।
Table Title
| महाभारत का वर्णन  | प्राचीन भारतीय तकनीक का नाम | आधुनिक जैव-वैज्ञानिक सिद्धांत | तकनीकी निहितार्थ |
|---|---|---|---|
| गांधारी द्वारा मांस पिंड का प्रसव | अनियमित गर्भाधान/प्रोलॉन्गड जेस्टेशन  | स्यूडोसाइसिस या दुर्लभ प्रसव स्थिति | लंबी गर्भावस्था के चिकित्सा रिकॉर्ड का प्राचीन ज्ञान |
| मांस पिंड का 101 भागों में विभाजन | विभाजन (Fragmenting the mass) | स्टेम सेल संवर्धन/कोशिका विभाजन | अविभेदित ऊतक से विशिष्ट कोशिकाओं को अलग करने की क्षमता  |
| घी/औषधियों से भरे कुंभों में विकास | कुंभ गर्भ (Pot-Womb) | कृत्रिम गर्भाधान (IVF), कृत्रिम गर्भाशय (Artificial Womb) | शरीर के बाहर नियंत्रित पोषण माध्यम (कल्चर मीडिया) में विकास  |
5. इंजीनियरिंग, वास्तुकला और परिवहन (Engineering, Architecture, and Transport)
महाभारत काल के नगर नियोजन, धातुकर्म और परिवहन के विवरण प्राचीन भारत की परिष्कृत इंजीनियरिंग क्षमता को दर्शाते हैं।
5.1. नगर नियोजन और सिविल इंजीनियरिंग (Indraprastha)
पांडवों द्वारा श्रीकृष्ण और वास्तुकार मय दानव की सहायता से खांडववन को हटाकर इंद्रप्रस्थ नामक नगर का निर्माण किया गया था । यह नगर सुरक्षा और सौंदर्य दोनों के लिए नियोजित था। इसकी सबसे महत्वपूर्ण विशेषता समुद्र जैसी चौड़ी और जल से भरी हुई गहरी खाइयाँ थीं, जो नगर की सुरक्षा करती थीं । इसकी चहारदीवारी गगनचुम्बी थी और सुरक्षा के लिए प्राचीर पर विध्वंसकारी अस्त्र-शस्त्र पहले से ही जमा कर दिए गए थे ।
यह उन्नत नगर नियोजन सिंधु सरस्वती सभ्यता (5,000 वर्ष पूर्व) के इंजीनियरिंग चमत्कारों की याद दिलाता है, जहां मोहनजो-दारो और हड़प्पा जैसे शहरों में उत्कृष्ट जल निकासी प्रणालियां, व्यवस्थित अपशिष्ट निपटान, और प्रत्येक घर में निजी स्नानघर थे । इंद्रप्रस्थ की वास्तुकला, जिसमें व्यापक सुरक्षा उपाय और व्यवस्थित शिल्प कलाओं की उपस्थिति का उल्लेख है , दर्शाती है कि प्राचीन भारत में सिविल इंजीनियरिंग और शहरी नियोजन का स्तर अत्यंत उच्च था।
5.2. धातु विज्ञान और सामग्री विज्ञान (Metallurgy)
महाभारत काल में धातु विज्ञान का ज्ञान भी उन्नत था। राजसूय यज्ञ के समय युधिष्ठिर को भेंट किए गए उपहारों में पिपीलिका स्वर्ण (चींटियों का सोना) का उल्लेख मिलता है । यह उच्च शुद्धता वाला चूर्णित सोना था, जो चींटियों की बाम्बियों से प्लेसर गोल्ड डिपॉजिट वाले स्थानों पर प्राप्त होता था । कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी धातुकर्म के महत्व का वर्णन है, जिसमें धातुओं के निदेशक और खनन के निदेशक की भूमिकाएं निर्धारित की गई थीं ।
प्राचीन संस्कृत साहित्य में धातुओं के लिए विशिष्ट शब्दावली का प्रयोग किया गया है, जैसे अयस (धातु), कृष्ण-अयस (लोहा), और नैपालिका (नेपाल से प्राप्त उच्च शुद्धता वाला तांबा) । यह प्राचीन भारतीय समाज में संगठित खनन, निष्कर्षण प्रक्रियाओं और सामग्री विज्ञान की गहरी समझ को दर्शाता है।
5.3. उड्डयन और परिवहन (Vimana Technology)
महाकाव्य में विमानों (उड़ने वाले यंत्र) का उल्लेख है। उदाहरण के लिए, असुर मय के विमान का उल्लेख है, जिसका घेरा 12 क्यूबिट था और उसमें चार मजबूत पहिए लगे थे ।
समरांगणसूत्राधार जैसे संस्कृत ग्रंथों में विमानों के निर्माण और संचालन यांत्रिकी का वर्णन है। इसमें कहा गया है कि विमान का शरीर मजबूत, टिकाऊ और हल्के पदार्थ का बना होना चाहिए, जिसके नीचे लोहे के तापक उपकरण के साथ पारा इंजन (Mercury Engine) स्थापित किया जाता था । यह इंजन पारे में निहित शक्ति का उपयोग करके "ड्राइविंग व्हर्लविंड" को गति प्रदान करता था, जिससे विमान ऊर्ध्वाधर और तिरछी दिशाओं में उड़ान भरने में सक्षम होता था । यह तकनीक गैर-पारंपरिक ऊर्जा स्रोत, संभवतः आयन या प्लाज्मा चालित प्रणोदन, के उपयोग का सुझाव देती है।
हालांकि, विमानिकी के विषय पर शैक्षणिक आलोचना भी मौजूद है। भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), बेंगलुरु के 1974 के शोध ने वैमानिक शास्त्र के डिजाइनों की जांच की और निष्कर्ष निकाला कि ये विवरण "खराब कल्पना" थे और लेखक में विमानिकी की समझ की कमी थी, जिसके अनुसार रुकमा विमान जैसे वर्णित विमान वायुगतिकीय रूप से असंभव थे । पारा इंजन के विचार और आधुनिक वायुगतिकीय सिद्धांतों के बीच यह तीव्र विरोधाभास यह सवाल खड़ा करता है कि क्या प्राचीन ग्रंथों में वर्णित उन्नत यांत्रिकी को आज के न्यूटनियन भौतिकी के बजाय किसी अन्य, संभावित रूप से चेतना-आधारित या क्वांटम भौतिकी के तहत समझने की आवश्यकता है।
Table Title
| क्षेत्र | महाकाव्य संदर्भ/तकनीक | आधुनिक तकनीकी समानता | पुष्टि/प्रामाणिकता का स्तर |
|---|---|---|---|
| नगर नियोजन  | इंद्रप्रस्थ की खाई, सुरक्षा प्राचीर, वास्तुकला | आधुनिक रक्षा नियोजन, सिंधु घाटी सिविल इंजीनियरिंग  | उच्च, सिंधु घाटी साक्ष्यों से समर्थित |
| धातु विज्ञान  | पिपीलिका स्वर्ण (उच्च शुद्धता), अयस धातु | प्लेसर गोल्ड निष्कर्षण, सामग्री विज्ञान | उच्च, अर्थशास्त्र जैसे ग्रंथों में विवरण से समर्थित |
| उड्डयन  | पारा इंजन, ऊर्ध्वाधर उड़ान वाले विमान | प्लाज्मा प्रणोदन/गैर-पारंपरिक तकनीक | निम्न, IISc द्वारा वायुगतिकीय रूप से असंभव माना गया  |
| संचार  | संजय की दिव्य दृष्टि | रिमोट सेंसिंग/टेलीविजन | निम्न, वर्तमान भौतिकी में अप्रमाणित |
6. ब्रह्मांड विज्ञान और दार्शनिक भौतिकी (Cosmology and Philosophical Physics)
महाभारत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा, भगवद गीता और शांति पर्व, ब्रह्मांड की प्रकृति, काल गणना और पदार्थ के दार्शनिक सिद्धांतों पर गहन वैज्ञानिक अंतर्दृष्टि प्रदान करते हैं।
6.1. हिन्दू काल गणना और ब्रह्मांड का पैमाना
हिंदू काल गणना ब्रह्मांड की चक्रीय प्रकृति पर आधारित है, जिसे चार युगों (सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर युग, कलयुग) के चक्र में विभाजित किया गया है । काल गणना की ये इकाइयाँ आश्चर्यजनक रूप से बड़ी हैं। ग्रंथों के अनुसार, 1000 महायुग 1 कल्प के बराबर होते हैं, जिसकी अवधि चार अरब बत्तीस करोड़ मानव वर्ष (4,320,000,000 वर्ष) है । यह आंकड़ा विशेष रूप से उल्लेखनीय है क्योंकि यह सूर्य की खगोलीय वैज्ञानिक अनुमानित आयु (लगभग 4.57 बिलियन वर्ष) के साथ लगभग सटीक तालमेल बिठाता है । यह संयोग मात्र नहीं हो सकता है; यह इंगित करता है कि प्राचीन ऋषियों के पास ब्रह्मांडीय समय चक्रों की गणना के लिए उन्नत गणितीय मॉडल और खगोल विज्ञान का ज्ञान था (संभवतः सूर्य सिद्धांत से संबंधित)।
6.2. सृष्टि की संरचना और तत्त्वमीमांसा (Metaphysics)
भारतीय दर्शन में सृष्टि की रचना पाँच महाभूतों से मानी जाती है: पृथ्वी (मिट्टी), वायु, जल, अग्नि, और आकाश । यह सिद्धांत पदार्थ के मूलभूत तत्वों के विचार से दार्शनिक रूप से जुड़ा हुआ है।
महाभारत में तत्वमीमांसा (Metaphysics) पर गहन चर्चाएँ मिलती हैं । शांति पर्व में सांख्य और योग दर्शन की व्याख्या की गई है, जो परम सत्य (परम सत्), चेतना (कॉन्शियसनेस), और मन-शरीर द्वैतवाद (Mind-body dualism) जैसे विषयों का विश्लेषण करते हैं । सांख्य दर्शन पदार्थ (प्रकृति) और आत्मा (पुरुष) के विश्लेषण पर जोर देता है।
इसके अतिरिक्त, मानव व्यवहार की भौतिकी को तीन गुणों (त्रिगुण) के माध्यम से समझाया गया है: सत्त्व (उत्तमता), रजस (क्रिया/उत्कटता), और तमास (जड़ता/आलस्य) । यह वर्गीकरण आधुनिक मनोविज्ञान और व्यवहार विज्ञान में प्रयुक्त व्यक्तित्व वर्गीकरणों के समान है, जो दर्शाता है कि प्राचीन ज्ञान ने भौतिकी के सिद्धांतों को दार्शनिक और व्यवहारिक तत्वमीमांसा के साथ एकीकृत किया था।
6.3. परिवर्तन और ऊर्जा का नियम
भगवद गीता का एक केंद्रीय वैज्ञानिक-दार्शनिक संदेश यह है कि विनाश (destruction) पुनरुद्धार, परिवर्तन और नए निर्माण का अपरिहार्य मार्ग है । यह अवधारणा आधुनिक भौतिकी के महत्वपूर्ण नियम, ऊष्मागतिकी (Laws of Thermodynamics) और पदार्थ के संरक्षण के नियम (Law of Conservation of Mass/Energy) के साथ दार्शनिक रूप से प्रतिध्वनित होती है, जो बताते हैं कि ऊर्जा केवल एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित होती है, उसका विनाश नहीं होता।
7. निष्कर्ष और भावी अनुसंधान (Conclusion and Future Research)
महाभारत केवल एक महाकाव्य नहीं है; यह उन्नत ज्ञान और प्रौद्योगिकी के कई क्षेत्रों—जैसे सटीक खगोल विज्ञान, प्रयोगात्मक जैव-तकनीक, और संभावित उच्च ऊर्जा भौतिकी—के संदर्भों से भरा पड़ा है।
7.1. महाभारत में विज्ञान की प्रासंगिकता का सारांश
प्रस्तुत विश्लेषण यह सिद्ध करता है कि महाभारत काल में वर्णित कई अवधारणाएं आधुनिक विज्ञान के अग्रिम सिद्धांतों के साथ समानता रखती हैं। खगोल विज्ञान का उपयोग 3100 ईसा पूर्व के आसपास की तिथि निर्धारित करने के लिए शक्तिशाली साक्ष्य प्रदान करता है , हालांकि इस पर शैक्षणिक मतभेद मौजूद हैं। कुंभ गर्भ तकनीक प्रजनन जीव विज्ञान के मूलभूत ज्ञान का संकेत देती है , और ब्रह्मास्त्र के विवरण विनाशकारी ऊर्जा विमोचन के सिद्धांतों (परमाणु भौतिकी) के ज्ञान की ओर इशारा करते हैं ।
7.2. पौराणिक वर्णन और खोई हुई तकनीक के बीच की खाई
महाकाव्य में वर्णित कई "वैज्ञानिक" विवरण, जैसे शुक्राचार्य की संजीवनी विद्या या नारायणास्त्र की अनुकूलक क्षमता , वर्तमान वैज्ञानिक ढांचे के भीतर अप्रमाणित हैं और कभी-कभी वर्तमान भौतिकी के नियमों का उल्लंघन करते हैं (उदाहरण के लिए, आईआईएससी द्वारा विमानों का विश्लेषण) । यह इंगित करता है कि प्राचीन तकनीक या तो खो चुकी है, या यह प्रौद्योगिकी और चेतना के बीच एक ऐसे संबंध पर आधारित थी जिसे आधुनिक वैज्ञानिक पद्धति अभी तक नहीं समझ पाई है। मंत्रों के माध्यम से अस्त्रों को सक्रिय करने की क्षमता , एक ऐसी चेतना-आधारित प्रौद्योगिकी के अस्तित्व का सुझाव देती है जो भौतिकी के नियमों का उपयोग एक ऐसे तरीके से करती थी जो आज हमारे लिए 'जादुई' है।
7.3. भावी अनुसंधान की दिशाएँ
महाभारत में निहित उन्नत ज्ञान की संभावनाओं को पूरी तरह से समझने के लिए, भविष्य के शोध को निम्नलिखित दिशाओं में आगे बढ़ना चाहिए:
 * खगोलीय डेटा का मानकीकरण: महाभारत के खगोलीय श्लोकों का एक मानकीकृत, त्रुटि-मुक्त डेटाबेस तैयार करना, जो आधुनिक खगोल विज्ञान सॉफ्टवेयर की सीमाओं और पूर्वाग्रहों से परे हो, ताकि काल-निर्धारण विवादों को हल किया जा सके।
 * सामग्री विज्ञान और रसायन शास्त्र का सत्यापन: प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में वर्णित धातुकर्म, जैसे पिपीलिका स्वर्ण निष्कर्षण, और रसायन विज्ञान (रसशास्त्र) के सूत्रों का प्रायोगिक सत्यापन करना ।
 * उच्च ऊर्जा भौतिकी मॉडल: प्राचीन अस्त्रों (विशेषकर ब्रह्मास्त्र और नारायणास्त्र) के भौतिकी-आधारित मॉडलों का विकास करना, जो न केवल ऊर्जा विमोचन की व्याख्या करें, बल्कि दूरस्थ नियंत्रण (मंत्रों) और अनुकूलन क्षमता (adaptability) के सिद्धांतों को भी शामिल करें।

संघ शताब्दी वर्ष को समर्पित कविता

सौ वर्षों की तपस्या, यह संघ शक्ति का विस्तार।
बीज बोया था जिसने, आज वटवृक्ष साकार।

संकटों में भी रहा अटल, न झुका कभी यह शीश।
सेवा, समर्पण, राष्ट्रप्रेम, है इसका आधार।

​नवयुग का आह्वान है, हर शाखा में नई आस।
चरैवेति, चरैवेति का मंत्र, गूँजे दिशा और पास।

जाति-पाँति के भेद मिटाकर, समरसता हो स्थापित।
एक राष्ट्र की भावना से, जीवन हो अनुप्राणित।

​प्रतिदिन प्रातःकाल में, एक नई चेतना जागे।
नित्य नियम की साधना, सब भेदभाव से भागे।

संस्कृति की यह धारा, बहती युगों से आई।
हिन्दू जीवन-मूल्यों की, इसने ज्योत जलाई।

​कितने वीरों ने दिया, अपना सर्वोच्च बलिदान।
उन हुतात्माओं को आज, करता कोटि-कोटि प्रणाम।

युवा शक्ति का संगठन, यही देश की आशा।
दूर करेगी मिलकर, हर अज्ञान की भाषा।

​हर हाथ में राष्ट्रियता, हर मुख पर जन-जागरण।
संघ-कार्य में लीन हों, हम करें पुण्य आचरण।

यह शताब्दी वर्ष है, ध्येय पथ पर चलना है।
परम वैभव की ओर, भारत को फिर सँवरना है।

©पं. खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
   कवि/लेखक/पत्रकार
    मुंगेली - छत्तीसगढ़ 
दूरभाष - ८१२००३२८३४

Saturday, June 18, 2022

माता पिता के चरण स्पर्श से होता है संतान के संपूर्ण अमंगलों नाश

माता पिता के चरण स्पर्श से होता है संतान के संपूर्ण अमंगलों नाश : पं.खेमेश्व


माता-पिता और बच्चों के बीच का रिश्ता हर बंधन से बढ़कर है बच्चा माता पिता का ही अंश होता है जहां मां बच्चे पर भरपूर मातृत्व बरसाती है तो वहीं पिता बच्चे को समाज में एक सुरक्षित वातावरण और उनकी जरूरतों को पूरा करने का हर मुमकिन प्रयास करता है
माता पिता अपने बच्चों से बहुत प्यार करते हैं वैसे तो दुनिया में कई सारे रिलेशनशिप होते हैं लेकिन माता पिता से रिश्ता किसी कारण से नहीं होता न ही माता पिता अपने बच्चे से किसी चीज की चाह रखते हैं अगर वह कोई उम्मीद रखते भी हैं तो वह सिर्फ बच्चों के भविष्य को सुरक्षित रखने की उम्मीद है

हालांकि आज के दौर में बच्चे बड़े होने के साथ माता पिता के प्यार बलिदान परिश्रम को भूल जाते हैं वह ज्यादातर अपने कामों,दोस्तों और भविष्य को लेकर इतना व्यस्त हो जाते हैं कि उन्हें बाहरी दुनियाँ और दोस्तों के कारण वह माता पिता की परवाह ही नहीं करते उनके साथ बैठना उनसे बातें करना उनके बारे मे कुछ जानना ये सब उन्हें अच्छा नहीं लगता
अगर माता पिता के साथ बैठना भी पड़ जाये तों उनकी सुनने के लियॆ नहीं केवल अपनी सुनाने के लियॆ बैठते है अपनी जरूरतों को पूरी करने के लियॆ बैठते है

बच्चों के लिए कभी कभी अपने माता पिता के निस्वार्थ प्रेम और उनके समर्पण बलिदान की सराहना भी करनी चाहियॆ इससे उनको आत्मबल मिलता है आपके अंदर एक अच्छे संस्कारों जन्म होता है और इससे आपके आने बाला कल और आपका भविष्य भी उज्जवल होता है

अगर आप ज्यादा कुछ नहीं कर सकते तों कम से कम श्रधा पूर्वक सुबह शाम उनके पैर छूकर बहुत सारे शुभ आशीर्वाद तों आप उनसे ले ही सकते हो ना उनके लियॆ इतना काफी है

माता पिता के लियॆ आपके प्यार के दो शब्द काफी है उन्हें आपके धन दौलत कि इतनी उन्हें आवश्यकता नहीं होती जितना आप उनके बारे मे सोचते इस गलत फ़ैमि को आप दिल से दूर करें और अपना थोड़ा कीमती समय भी उनके साथ बैठकर गुजारने का कष्ट करें यही उनके लियॆ पर्याप्त

इसलिये रोज श्रधा पूर्वक अपने माता पिता अपने गुरुजनों को अपने बड़ों को प्रणाम करे इससे आपके जीवन शुभ संस्कार जागृत होते है जीवन कि बहुत सारी मुसीबतें स्वतः ही नष्ट होने लगती है आपके संपूर्ण अमंगलों का नाश होता है और आपके जीवन मे सर्वत्र मंगल ही मंगल होने लगता है

मित्रों जब आप अपनी किसी भी समस्या का समाधान कराते हुये पूरी तरह से थक चुके हो और आपको भविष्य मैं कही भी कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा हो तभी आप हमसें संपर्क करें अन्यथा आप भूलकर भी हमसें बिल्कुल संपर्क ना करें।


 पं.खेमेश्वरपुरी गोस्वामी
धार्मिक प्रवक्ता - ओज कवि
राष्ट्रीय प्रवक्ता
राष्ट्र भाषा प्रचार मंच-भारत
डिंडोरी,मुंगेली,छत्तीसगढ़

Wednesday, May 25, 2022

सनातन धर्म में पीपल का महत्व

पीपल का सनातन धर्म में महत्व

पीपल को वृक्षों का राजा कहते है। इसकी वंदना में एक श्लोक देखिए:-
मूलम् ब्रह्मा, त्वचा विष्णु,
सखा शंकरमेवच ।
पत्रे-पत्रेका सर्वदेवानाम,
वृक्षराज नमोस्तुते ।।

सनातन धर्म में पीपल के पेड़ का बहुत महत्व माना गया है। शास्त्रों के अनुसार इस वृक्ष में सभी देवी-देवताओं और हमारे पितरों का वास भी माना गया है।

पीपल वस्तुत: भगवान विष्णु का जीवन्त और पूर्णत:मूर्तिमान स्वरूप ही है। भगवान श्रीकृष्ण ने भी कहा है की वृक्षों में मैं पीपल हूँ।

पुराणो में उल्लेखित है कि

मूलतः ब्रह्म रूपाय मध्यतो विष्णु रुपिणः।
 अग्रतः शिव रुपाय अश्वत्त्थाय नमो नमः।। 
अर्थात इसके मूल में भगवान ब्रह्म, मध्य में भगवान श्री विष्णु तथा अग्रभाग में भगवान शिव का वास होता है।

शास्त्रों के अनुसार पीपल की विधि पूर्वक पूजा-अर्चना करने से समस्त देवता स्वयं ही पूजित हो जाते हैं।
कहते है पीपल से बड़ा मित्र कोई भी नहीं है, जब आपके सभी रास्ते बंद हो जाएँ, आप चारो ओर से अपने को परेशानियों से घिरा हुआ समझे, आपकी परछांई भी आपका साथ ना दे, हर काम बिगड़ रहे हो तो 
आप पीपल के शरण में चले जाएँ, उनकी पूजा अर्चना करे , उनसे मदद की याचना करें  निसंदेह कुछ ही समय में आपके घोर से घोर कष्ट दूर जो जायेंगे।

धर्म शास्त्रों के अनुसार हर व्यक्ति को जीवन में पीपल का पेड़ अवश्य ही लगाना चाहिए । पीपल का पौधा लगाने वाले व्यक्ति को जीवन में किसी भी प्रकार संकट नहीं रहता है। पीपल का पौधा लगाने के बाद उसे रविवार को छोड़कर नियमित रूप से जल भी अवश्य ही अर्पित करना चाहिए। जैसे-जैसे यह वृक्ष बढ़ेगा आपके घर में सुख-समृद्धि भी बढ़ती जाएगी।  पीपल का पेड़ लगाने के बाद बड़े होने तक इसका पूरा ध्यान भी अवश्य ही रखना चाहिए, लेकिन ध्यान रहे कि पीपल को आप अपने घर से दूर लगाएं, घर पर पीपल की छाया भी नहीं पड़नी चाहिए।

मान्यता है कि यदि कोई व्यक्ति पीपल के वृक्ष के नीचे शिवलिंग स्थापित करता है तो उसके जीवन से बड़ी से बड़ी परेशानियां भी दूर हो जाती है। पीपल के नीचे शिवलिंग स्थापित करके उसकी नित्य पूजा भी अवश्य ही करनी चाहिए। इस उपाय से जातक को सभी भौतिक सुख सुविधाओं की प्राप्ति होती है।

सावन मास की अमवस्या की समाप्ति और सावन के सभी शनिवार को पीपल की विधि पूर्वक पूजा करके इसके नीचे भगवान हनुमान जी की पूजा अर्चना / आराधना करने से घोर से घोर संकट भी दूर हो जाते है।

यदि पीपल के वृक्ष के नीचे बैठकर रविवार को छोड़कर नित्य हनुमान चालीसा का पाठ किया जाए तो यह चमत्कारी फल प्रदान करने वाला उपाय है।

पीपल के नीचे बैठकर पीपल के 11 पत्ते तोड़ें और उन पर चन्दन से भगवान श्रीराम का नाम लिखें। फिर इन पत्तों की माला बनाकर उसे प्रभु हनुमानजी को अर्पित करें, सारे संकटो से रक्षा होगी।

पीपल के चमत्कारी उपाय

शास्त्रानुसार प्रत्येक पूर्णिमा पर प्रातः 10 बजे पीपल वृक्ष पर मां लक्ष्मी का फेरा लगता है। इसलिए जो व्यक्ति आर्थिक रूप से मजबूत होना चाहते है वो इस समय पीपल के वृक्ष पर फल, फूल, मिष्ठान चढ़ाते हुए धूप अगरबती जलाकर मां लक्ष्मी की उपासना करें, और माता लक्ष्मी के किसी भी मंत्र की एक माला भी जपे । इससे जातक को अपने किये गए कार्यों के सर्वश्रेष्ठ फल मिलते है और वह धीरे धीरे आर्थिक रूप से सक्षम हो जाता है ।

पीपल को विष्णु भगवान से वरदान प्राप्त है कि जो व्यक्ति शनिवार को पीपल की पूजा करेगा, उस पर लक्ष्मी की अपार कृपा रहेगी और उसके घर का ऐश्वर्य कभी नष्ट नहीं होगा। 

व्यापार में वृद्धि हेतु प्रत्येक शनिवार को एक पीपल का पत्ता लेकर उस पर चन्दन से स्वस्तिक बना कर उसे अपने व्यापारिक स्थल की अपनी गद्दी / बैठने के स्थान के नीचे रखे । इसे हर शनिवार को बदल कर अलग रखते रहे । ऐसा 7 शनिवार तक लगातार करें फिर 8वें शनिवार को इन सभी पत्तों को किसी सुनसान जगह पर डाल दें और मन ही मन अपनी आर्थिक समृद्धि के लिए प्रार्थना करते रहे, शीघ्र पीपल की कृपा से आपके व्यापार में बरकत होनी शुरू हो जाएगी ।

जो मनुष्य पीपल के वृक्ष को देखकर प्रणाम करता है, उसकी आयु बढ़ती है 
जो इसके नीचे बैठकर धर्म-कर्म करता है, उसका कार्य पूर्ण हो जाता है।

पीपल के वृक्ष को काटना 

जो मूर्ख मनुष्य पीपल के वृक्ष को काटता है, उसे इससे होने वाले पाप से छूटने का कोई उपाय नहीं है। (पद्म पुराण, खंड 7 अ 12)

हर रविवार पीपल के नीचे देवताओं का वास न होकर दरिद्रा का वास होता है। अत: इस दिन पीपल की पूजा वर्जित मानी जाती है
यदि पीपल के वृक्ष को काटना बहुत जरूरी हो तो उसे रविवार को ही काटा जा सकता है।

शनि दोष में पीपल 

शनि की साढ़ेसाती और ढय्या के बुरे प्रभावों को दूर कर,शुभ प्रभावों को प्राप्त करने के लिए हर जातक को प्रति शनिवार को पीपल की पूजा करना श्रेष्ठ उपाय है। 

यदि रोज (रविवार को छोड़कर) पीपल पर पश्चिममुखी होकर जल चढ़ाया जाए तो शनि दोष की शांति होती है l

शनिवार की सुबह गुड़, मिश्रित जल चढ़ाकर, धूप अगरबत्ती जलाकर उसकी सात परिक्रमा करनी चाहिए, एवं संध्या के समय पीपल के वृक्ष के नीचे कड़वे तेल का दीपक भी अवश्य ही जलाना चाहिए। इस नियम का पालन करने से पीपल की अदृश्य शक्तियां उस जातक की सदैव मदद करती है।

ब्रह्म पुराण' के 118 वें अध्याय में शनिदेव कहते हैं- 'मेरे दिन अर्थात् शनिवार को जो मनुष्य नियमित रूप से पीपल के वृक्ष का स्पर्श करेंगे, उनके सब कार्य सिद्ध होंगे तथा  उन्हें ग्रहजन्य पीड़ा नहीं होगी।'

शनिवार के दिन पीपल के वृक्ष का दोनों हाथों से स्पर्श करते हुए 'ॐ नमः शिवाय।' का 108 बार जप करने से दुःख, कठिनाई एवं ग्रहदोषों का प्रभाव शांत हो जाता है।

हर शनिवार को पीपल की जड़ में जल चढ़ाने और दीपक जलाने से अनेक प्रकार के कष्टों का निवारण होता है ।

 ग्रहों के दोषों में पीपल

ज्योतिष शास्त्र में पीपल से जुड़े हुए कई आसान किन्तु अचूक उपाय बताए गए हैं, जो हमारे समस्त ग्रहों के दोषों को दूर करते हैं। जो किसी भी राशि के लोग आसानी से कर सकते हैं। इन उपायों को करने के लिए हमको अपनी किसी ज्योतिष से कुंडली का अध्ययन करवाने की भी आवश्यकता नहीं है।

पीपल का पेड़ रोपने और उसकी सेवा करने से पितृ दोष में कमी होती है । शास्त्रों के अनुसार पीपल के पेड़ की सेवा मात्र से ही न केवल पितृ दोष वरन जीवन के सभी परेशानियाँ स्वत: कम होती जाती है

पीपल में प्रतिदिन (रविवार को छोड़कर) जल अर्पित करने से कुंडली के समस्त अशुभ ग्रह योगों का प्रभाव समाप्त हो जाता है। पीपल की परिक्रमा से कालसर्प जैसे ग्रह योग के बुरे प्रभावों से भी छुटकारा मिल जाता है। (पद्म पुराण)

असाध्य रोगो में पीपल

पीपल की सेवा से असाध्य से असाध्य रोगो में भी चमत्कारी लाभ होता देखा गया है ।
 
यदि कोई व्यक्ति किसी भी रोग से ग्रसित है
 वह नित्य पीपल की सेवा करके अपने बाएं हाथ से उसकी जड़ छूकर उनसे अपने रोगो को दूर करने की प्रार्थना करें तो जातक के रोग शीघ्र ही दूर होते है। उस पर दवाइयों का जल्दी / तेज असर होता है । 

यदि किसी बीमार व्यक्ति का रोग ठीक ना हो रहा हो तो उसके तकिये के नीचे पीपल की जड़ रखने से बीमारी जल्दी ठीक होती है ।

निसंतान दंपती संतान प्राप्ति हेतु पीपल के एक पत्ते को प्रतिदिन सुबह लगभग एक घंटे पानी में रखे, बाद में उस पत्ते को पानी से निकालकर किसी पेड़ के नीचे रख दें और पति पत्नी उस जल का सेवन करें तो शीघ्र संतान प्राप्त होती है । ऐसा लगभग 2-3 माह तक लगातार करना चाहिए ।

पं.खेमेश्वर पुरी गोस्वामी
धार्मिक प्रवक्ता ओज कवि
राष्ट्रीय प्रवक्ता
राष्ट्र भाषा प्रचार मंच-भारत
डिंडोरी मुंगेली छत्तीसगढ़

नव वर्ष का स्वागत

सुनहरी धूप का आँचल, नया आकाश आया है, पुरानी याद को तज कर, नया विश्वास आया है। मिले खुशियाँ नए पथ पर, मिटे सब द्वेष के साये, सफलता चूम ले माथ...