Thursday, July 30, 2026

अंगूठाछाप जो बने हैं, राष्ट्र के विधाता आज

अंगूठाछाप जो बने हैं, राष्ट्र के विधाता आज

कुर्सी पर ऐंठ बैठे, एक ना अक्षर जाने,
कलम न पकड़ी जो, नियम बनाते हैं।
संसद की सभा बीच, जमाकर पाँव बैठे,
विद्या की किताब छोड़, दाँव ही चलाते हैं।
ज्ञान का न लेश मात्र, बनते महान फिर,
देश के नसीब पर, अंगूठा लगाते हैं।
वीर जो ज्ञानी थे वे, मौन साधे खड़े आज,
मूर्ख जन देश के ही, भाग्य को चलाते हैं।

पीएचडी की उपाधि को, हाथ में उठाये घूमें,
कागज़ के टुकड़ों पे, धूल ही जमाते हैं।
योग्य सब नौजवान, दर-दर भटकते हैं,
सूखी एक रोटी को भी, तरस ही जाते हैं।
प्रतिभा का जहाँ कभी, मान-सम्मान होता,
आज वहाँ चाटुकार, बाज़ी मार जाते हैं।
कलम की धार छोड़, माँगते हैं न्याय आज,
देश के ही कर्णधार, आँसू हैं बहाते हैं।

शास्त्रों को पढ़के भी जो, आस लगा बैठे थे जी,
काम नहीं मिलता तो, धैर्य टूट जाता है।
भूख की बुझाने आग, क्या ही उपाय करें,
न्याय जब रूठ जाता, पाप ही सुहाता है।
बाहुबल-छल को ही, राह मान लेते युवा,
अपराध-मार्ग पर, पाँव बढ़ जाता है।
ज्ञान का प्रकाश जहाँ, जगमग होना था जी,
अंधकार का ही राज, वहाँ छा ही जाता है।

जागो हे गुणी जन अब, नींद को त्याग दो सब,
अज्ञानी की सत्ता को, उखाड़ के फेंकिए।
कलम की शक्ति को ही, सिंह-सी दहाड़ बना,
विद्या की विजय ध्वजा, देश में दिखाइए।
अंगूठाछाप जो बने हैं, राष्ट्र के विधाता आज,
ज्ञान के सिंहासन पे, ज्ञानी को बिठाइए।
युवाओं की शक्ति से ही, बदलेगी भाग्य-रेखा,
न्याय का नया ही एक, सूर्य चमकाइए।


सर्वाधिकार सुरक्षित 
खेमेश्वर पुरी गोस्वामी (गृहावधूत)
मुंगेली छत्तीसगढ़,८१२००३२८३४

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