Sunday, January 11, 2026

स्वामी विवेकानंद

*गुरु-भक्ति और शिकागो का दिग्विजय*


तर्क की कसौटी पर जिसने, गुरु को भी था तौला,
पर स्पर्श मात्र से खुल गया, हृदय का हर एक झरोखा।
छोड़ मोह संसार का, गुरु चरणों में शीश झुकाया,
रामकृष्ण की ज्योति ने, नरेंद्र को 'विवेकानंद' बनाया॥
नरेंद्र की हर जिज्ञासा को, मिला परमहंस का उत्तर,
शून्य से जो निकला पथ, पहुँच गया वो शिव के घर।
गुरु की व्याधि को जिसने, अपनी देह पर झेला था,
वही शिष्य तो जगत-गुरु, बनकर अकेला निकला था॥


तंग गलियों से निकलकर, सागर पार वो वीर गया,
हाथों में उपनिषद लिए, भारत का वो धीर गया।
बिना विशेषण, बिना परिचय, बस गेरुआ एक चोला था,
पर जब वो बोला मंच से, जैसे साक्षात् ब्रह्म बोला था॥
"भाइयों और बहनों" कहकर, उसने ऐसा जादू फेरा,
मानो सदियों से बिछड़े, अपनों का हुआ हो बसेरा।
शून्य पर जब उसने बोला, सारा विश्व निहाल हुआ,
भारत की प्राचीन विधा का, फिर से नया कमाल हुआ॥


उसने कहा—"न दुर्बल बनो, न कायरता को पालो,"
भीतर के उस सोये हुए, सिंह को अब तुम जगा लो।
धर्म वही जो मानवता की, आँखों के आँसू पोंछ सके,
वही बड़ा जो दीन-दुखी के, हित के बारे में सोच सके॥


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*हुंकार विवेकानंद की (वीर रस)*

गरजा वह वन-सिंह सरीखा, सागर पार शिकागो में,
दहल उठे सब दिग्गज ज्ञानी, उस युवक के नारों में।
नहीं हाथ में अस्त्र-शस्त्र थे, न सेना का घेरा था,
पर उस गेरुए के भीतर, सूरज का सा सवेरा था॥


जब गूँजी वह कड़क स्वरूपी, "भाइयों और बहनों" की वाणी,
थम गई विश्व की धड़कन सारी, जैसे थम जाता तूफ़ानी।
हिला दिया पाश्चात्य दंभ को, पल भर की हुंकार में,
हिंदू धर्म का ध्वज गाड़ दिया, सात समंदर पार में॥


"कायरता ही मृत्यु है" - उसने रणभेरी फूँकी थी,
सोए हुए इस आर्यावर्त की, तकदीर उसने लिखी थी।
दुर्बलता को त्याग बना दो, वज्र जैसी अपनी देह,
शक्ति ही है धर्म जगत में, शक्ति ही है पुण्य-गेह॥


बाधाओं के पर्वत को जिसने, चरणों से कुचल दिया,
युगों-युगों की जड़ता को, पुरुषार्थ में बदल दिया।
वह सन्यासी नहीं मात्र, वह तो क्रांति का शोला था,
दहक उठा जो राष्ट्र-प्रेम में, साक्षात् महाकाल बोला था॥

उठो जवानों! गुरु-मंत्र यह, रगो-रगों में भर लो तुम,
विवेकानंद की ज्वाला बनकर, विश्व-विजय अब कर लो तुम।
मृत्यु डरे जिस वीर पुरुष से, वैसा तुम अवतार बनो,
भारत माता की रक्षा को, तुम तीखी तलवार बनो॥

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*क्रांति-सूर्य: विवेकानंद*

रक्त में जिसके उबाल था, वह नमन योग्य सन्यासी था,
मृगछाला वाला वह योगी, साक्षात् पूर्ण अविनाशी था।
ठोकर से जिसने पर्वत तोड़े, मिट्टी से वीर बनाए थे,
जिसकी एक हुंकार मात्र से, सोया पौरुष मुस्काए थे॥


वह बोला— "मृत्यु को सम्मुख देख, कभी तुम मत भागो,
कायरता के खोल को छोड़ो, सिंहों की भाँति अब जागो।"
शून्य को जिसने शिखर बना कर, अम्बर को झुकवा दिया,
भारत के स्वाभिमान को, पूरी दुनिया में चमका दिया॥


तर्क-बुद्धि की ढाल हाथ में, ज्ञान की नंगी तलवार थी,
काट दिया अज्ञान का तमस, ऐसी उसकी धार थी।
नहीं थका वह, नहीं झुका वह, बढ़ता गया तूफ़ानों में,
अग्नि-बीज वह बोकर आया, पश्चिम के मैदानों में॥


"उठो ओ भारत के पुत्रों!" वह स्वर आज भी गूँजता है,
जो कर्मवीर बन बढ़ता है, उसको ही जग पूजता है।
हृदय में जिसके आग लगी हो, और माथे पर चंदन हो,
वही शिष्य विवेकानंद का, जिसका राष्ट्र ही वंदन हो॥

वह गेरुआ नहीं वस्त्र मात्र, वह धधकती एक ज्वाला थी,
पराधीन भारत के गले में, वह क्रांति की माला थी।
वह मरकर भी अमर हो गया, हममें प्राण फूँककर,
शीश नवाता है जग सारा, उसके चरणों में झुककर॥

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*युगपुरुष विवेकानंद: चेतना का शंखनाद*

नरेंद्र से जो बना विवेकानंद, वो ज्ञान का सागर था,
हृदय में जिसके करुणा थी, और भुजाओं में बल प्रखर था।
भटक रहा था जो सत्य की खोज में, व्याकुल होकर दर-दर,
रामकृष्ण के चरणों में मिला उसे, साक्षात् ईश्वर का घर॥


शिकागो की उस सभा में, जब गूँजा 'भाइयों और बहनों',
स्तब्ध रह गया विश्व देख, भारत के ज्ञान के गहनों।
खंडित थे जो विचार, उन्हें एकात्म भाव से जोड़ा,
भ्रम और पाखंड के हर मिथक को, पल भर में तोड़ा॥


"उठो, जागो और लक्ष्य की प्राप्ति तक रुको नहीं,"
यह मंत्र दिया उस वीर ने, जो थका कभी झुका नहीं।
दरिद्र-नारायण की सेवा को ही, परम धर्म बतलाया,
सोए हुए इस राष्ट्र को, पौरुष का पाठ पढ़ाया॥


तर्क और विज्ञान का, अध्यात्म से मेल कराया,
पश्चिम की चकाचौंध को, पूर्व का दर्पण दिखलाया।
वह अल्पायु का संत, जो अमर कहानी लिख गया,
भारत की सोई आत्मा में, स्वाभिमान भर गया॥


 खेमेश्वर पुरी गोस्वामी 
  गृहावधूत ,छत्तीसगढ़
  मो. 8120032834

Saturday, January 3, 2026

छेरछेरा मया कोठी

🌾 छेरछेरा: माई कोठी 🌾
पुन्नी के चंदा हासय, अगास मा छाय हे उँजियारी,
कोठी मा धान भरे हे, मगन हे किसान खेमेश्वर भारी।
नवा फसल के नवा खुसी, नवा उमंग के दिन आए,
छेरछेरा के पुन्नी हा, सब बर सुग्घर संदेश लाए।
छेरछेरा... छेरछेरा! अउ कोनो झन राहय घेरा-बेरा,
निकालव धान ला माई कोठी से, अउ झारव अपन मया के डेरा!

लइका मन के सोर सुंनौ, बाजत हे डंडा अउ डफली,
गली-गली मा गूँजत हे, ए मधुर धुन ह कतकी सुघरी।
कोनो बन गे हे जोकर, कोनो धरे हे झोला हाथ मा,
खुसी के परब मनावत हन, हम सब झन आज साथ मा।
अन्न के दान ह सबले बड़े, इही हमर छत्तीसगढ़ी पहिचान,
जेकर मन मा दया बसे, ओही ह सही मा इनसान।
बड़-छोट के भेद मिटावन, सब ला गले लगावन गा,
ए छेरछेरा के तिहार मा, दान के गंगा बहावन गा।
छेरछेरा... छेरछेरा! अउ कोनो झन राहय घेरा-बेरा,
निकालव धान ला माई कोठी से, अउ झारव अपन मया के डेरा!

© खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
छत्तीसगढ़िया पत्रकार, छत्तीसगढ़ 
मो. - 8120032834

बलिदानी वीर नारायण सिंह : समर्पित कविता

सोनाखान का शेर : वीर नारायण सिंह


महानदी की लहरों सा, जिसका पावन स्वाभिमान था,
सोनाखान की माटी का, जो बेटा बड़ा महान था,
दुर्भिक्ष पड़ा जब धरती पर, वह संकट का संबल बना,
गरीबों की भूख मिटाने को, जो काल का भी काल बना।

संपूर्ण क्रांति का छत्तीसगढ़ में, सच्चा स्वर गुंजार नहीं होगा ॥
जब तक इस धरती पर पैदा, फिर से नारायण नहीं होगा ॥१॥

बिंझवारों का गौरव था, वह शोषण का संहारक था,
अत्याचारी फिरंगियों का, वह वीर बड़ा विदारक था,
जनता के हित खातिर जिसने, अन्न के ताले तोड़ दिए,
सोने की चिड़िया के खातिर, सुख के बंधन छोड़ दिए।

शोषक उन गोरे अंग्रेजों का, अंत कभी स्वीकार नहीं होगा ॥
जब तक इस धरती पर पैदा, फिर से नारायण नहीं होगा ॥२॥

अग्नि स्तंभ सा खड़ा रहा, वह मौत से कभी डरा नहीं,
जो देश हेतु मर मिटता है, वह वीर कभी भी मरा नहीं,
फांसी का फंदा चूम लिया, भारत माता की जय कहकर,
चमक उठा वह बलिदान का, एक अमिट सितारा बनकर।

बलिदानों की इस गाथा का, कोई विकल्प तैयार नहीं होगा ॥
जब तक इस धरती पर पैदा, फिर से नारायण नहीं होगा ॥३॥

स्वाभिमान की रक्षा हित, जिसने दे दी अपनी कुर्बानी,
छत्तीसगढ़ की माटी गाती, आज भी उसकी अमर कहानी,
मुक्त हृदय से हम सब उसका, आओ अभिनंदन कर लें,
सोनाखान के उस बेटे को, हम शत-शत वंदन कर लें।

यह राष्ट्र-तिरंगा भारत का, तब तक आबाद नहीं होगा ॥
जब तक इस धरती पर पैदा, फिर से नारायण नहीं होगा ॥४॥

                ©पं.खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
                   छत्तीसगढ़िया, छत्तीसगढ़
                     मो. 8120032834

Tuesday, December 30, 2025

नव वर्ष का स्वागत

सुनहरी धूप का आँचल, नया आकाश आया है,
पुरानी याद को तज कर, नया विश्वास आया है।
मिले खुशियाँ नए पथ पर, मिटे सब द्वेष के साये,
सफलता चूम ले माथा, हृदय में हर्ष भर जाए।
दुआ है हर कदम पर अब, नवल मुस्कान खिलती हो,
मिले जो लक्ष्य आँखों में, वही मंजिल भी मिलती हो।
समय की रश्मियों से हम, नया इतिहास लिखेंगे,
उमंगों के नए रंग अब, चहुँ ओर ही दिखेंगे।


© खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®

Friday, November 28, 2025

naxal hidma

जंगल, ज़मीन, और गुमशुदा 'हीरो' : क्या हिडमा सिर्फ एक नक्सली था,या व्यवस्था का आईना?


बीते दिनों जब एक कथित नक्सली कमांडर हिडमा के नाम की चर्चा ने ज़ोर पकड़ा,तो इसके साथ ही एक ऐसी बहस ने भी सिर उठाया,जो केवल सुरक्षा बलों की कार्रवाई या नक्सलवाद के आंकड़ों तक सीमित नहीं है। अगर हिडमा वाकई खूंखार नक्सली था,तो निसंदेह हममें से हर राष्ट्रप्रेमी नागरिक इस देश के ख़िलाफ़ होने वाली हर हिंसा का कड़ा विरोध करता है। लेकिन सवाल तब गहरा हो जाता है जब तथाकथित 'आतंक' के इस चेहरे को उसके अंतिम समय में आदिवासियों के एक बड़े तबके ने 'हीरो' जैसा सम्मान दिया और उसके इर्द-गिर्द भीड़ उमड़ी।
यह भीड़, यह सम्मान, और यह 'हीरो-पूजा' किसी भी कीमत पर नक्सलवाद का समर्थन नहीं हो सकती,बल्कि यह व्यवस्था के कान खोलने वाला एक ज़बरदस्त सवाल है। यह हमें सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर क्यों एक विद्रोही, जिसे राज्य दुश्मन मानता है, अपनी ही धरती के बेटों के बीच इतना स्वीकार्य बन जाता है?

*आदिवासी: प्रकृति के संरक्षक, अन्याय के विरोधी*

हमारा विश्वास है कि सच्चा आदिवासी—जो जंगल, नदी, पहाड़ और प्रकृति के हर कण का रक्षक है—वह कभी भी क्रूरता या गलत का अंधसमर्थन नहीं करता। उनकी खुद्दारी, उनका आत्मसम्मान और उनका अस्तित्व, उनके लिए किसी भी राजनीतिक या हिंसक विचारधारा से बड़ा है।
जब ये लोग किसी हिडमा जैसे व्यक्ति के साथ खड़े होते हैं, तो इसका अर्थ यह नहीं कि वे नक्सली विचारधारा के साथ हैं। इसका सीधा अर्थ यह है कि उन्हें अपनी जल-जंगल-ज़मीन पर, अपने अधिकारों पर और अपने अस्तित्व पर संकट दिख रहा है। जब उन्हें लगता है कि उनकी बात सुनी नहीं जा रही, जब उन्हें विस्थापन और दमन का सामना करना पड़ता है, तब मजबूरी उन्हें विरोध के ऐसे रास्तों की ओर धकेलती है। और अगर हालात सच में बदतर हो जाएं, तो वही आदिवासी सच के साथ खड़े होने के लिए हथियार उठाने को भी मजबूर हो जाते हैं—चाहे वह विरोध सरकार का हो या फिर हिडमा जैसे किसी नक्सली का, जिसने उनके नाम पर हिंसा की हो।

*आंकड़ों में गुम होता बेगुनाह आदिवासी*

यहाँ मुद्दा केवल एक हिडमा का नहीं है। मुद्दा उन अनगिनत बेगुनाह आदिवासियों का है, जो इन सालों के संघर्ष में अनावश्यक रूप से मारे गए हैं। वे, जिन्हें जबरन नक्सली का ठप्पा लगाकर ख़त्म कर दिया जाता है, जिनकी आवाज़ पुलिसिया या नक्सली हिंसा की गोलियों की आवाज़ में हमेशा के लिए दब जाती है।
कितनी ही रिपोर्टें हैं, जिनमें निर्दोष आदिवासियों की मौत को मात्र 'एनकाउंटर' या 'क्रॉस-फायर' का आंकड़ा बताकर निपटा दिया गया। उनका दर्द किसी अख़बार की हेडलाइन नहीं बना, उनकी कहानी किसी मानवाधिकार रिपोर्ट में जगह नहीं पा सकी। वे सिर्फ इसलिए मारे गए, क्योंकि उनके हिस्से का जंगल, उनकी पुश्तैनी ज़मीन, और उनके संवैधानिक अधिकार किसी कॉरपोरेट या सत्ता प्रतिष्ठान की नज़र में आ गए थे।
हिडमा का 'हीरो' बनना व्यवस्था की विफलता का प्रतीक है। यह बताता है कि जब न्याय की प्रक्रिया विफल होती है, जब प्रशासन आदिवासियों के संरक्षक की जगह उनके दमनकर्ता के रूप में खड़ा होता है, तो निराशा की ख़ाली जगह को भरने के लिए कोई भी विद्रोही चेहरा 'हीरो' बन सकता है।

*न्याय की मांग: बंदूक नहीं, संवाद*

अब समय आ गया है कि इस पूरे संघर्ष को केवल 'कानून व्यवस्था' की समस्या मानकर देखना बंद किया जाए। यह अधिकारों, पहचान और न्याय का सवाल है।
हम सरकार और व्यवस्था से आग्रह करते हैं कि बंदूक की भाषा छोड़कर संवाद का रास्ता अपनाया जाए। हर उस बेगुनाह आदिवासी की मौत की निष्पक्ष और समयबद्ध जांच हो, जिसे 'नक्सली' बताकर मार दिया गया।

जंगल, जल और ज़मीन पर आदिवासियों के पेसा (Panchayats Extension to Scheduled Areas Act) और वन अधिकार अधिनियम (Forest Rights Act) को केवल कागज़ पर नहीं, बल्कि ईमानदारी से ज़मीन पर उतारा जाए।

आदिवासियों को विकास के नाम पर विस्थापित करने की नीतियों पर तुरंत रोक लगे और उनकी संस्कृति तथा पर्यावरण की रक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।
जब तक आदिवासियों को यह विश्वास नहीं होगा कि न्याय उनके साथ है, तब तक ऐसे 'हीरो' पैदा होते रहेंगे। हमें एक ऐसा भारत बनाना है, जहाँ जंगल का हर निवासी सुरक्षित महसूस करे, जहाँ उसकी ज़मीन उसकी हो, और जहाँ न्याय का दीपक हर झोंपड़ी में रोशनी दे। तभी नक्सलवाद की जड़ पर वार होगा और तभी हिडमा जैसे नाम अतीत बनेंगे।


आलेख : खेमेश्वर पुरी गोस्वामी 
सह संपादक : न्यूज़लाइन नेटवर्क 
रायपुर, छत्तीसगढ़ 8120032834

छत्तीसगढ़ : 25 वर्षों की विकास गाथा और रजत जयंती का संकल्प

*छत्तीसगढ़ : 25 वर्षों की विकास गाथा और रजत जयंती का संकल्प*



 25 वर्षों का गौरव और पहचान.
1 नवंबर, 2000 को 'दक्षिण कोसल' की प्राचीन पहचान को एक आधुनिक राज्य 'छत्तीसगढ़' के रूप में नया जन्म मिला। अपनी रजत जयंती के उपलक्ष्य में, यह राज्य 25 वर्षों की उस संघर्षपूर्ण और गौरवशाली विकास यात्रा का अवलोकन कर रहा है, जिसने इसे प्राकृतिक संपदा के भंडार से एक आत्म-निर्भर और सांस्कृतिक रूप से जागरूक इकाई में बदल दिया है।
1 नवंबर, 2000 को छत्तीसगढ़ राज्य का गठन भारतीय इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना थी। यह केवल प्रशासनिक सीमाओं का पुनर्गठन नहीं था, बल्कि यहाँ की विशिष्ट आदिवासी संस्कृति, समृद्ध प्राकृतिक संसाधनों और दशकों पुरानी पृथक राज्य की माँग का साकार होना था। राज्य निर्माण के बाद, नवगठित सरकारों के समक्ष एक दोहरी चुनौती थी: पिछड़ापन दूर कर तीव्र विकास करना और साथ ही ‘गढ़ों’ की इस भूमि की सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक समरसता को अक्षुण्ण बनाए रखना। पिछले ढाई दशकों में, विभिन्न सरकारों ने अपने-अपने दृष्टिकोण से इस विकास यात्रा को दिशा दी है।

*1. इतिहास, राजवंश और पुरातात्विक विरासत*
छत्तीसगढ़ का इतिहास अत्यंत प्राचीन है, जो इसे भारत के समृद्ध सांस्कृतिक मानचित्र पर एक विशिष्ट स्थान दिलाता है।
• पौराणिक पृष्ठभूमि: यह क्षेत्र रामायण काल में 'दक्षिण कोसल' के नाम से जाना जाता था और यहाँ की राजधानी श्रावस्ती थी। पौराणिक मान्यता के अनुसार, भगवान राम की माता कौशल्या इसी क्षेत्र की थीं।
• प्रमुख राजवंश: शरभपुरीय एवं नल वंश: आरंभिक काल में, बस्तर क्षेत्र पर नल वंश और मैदानी भागों में शरभपुरीय राजवंशों का शासन रहा, जिनके सिक्कों और अभिलेखों से क्षेत्र की प्राचीन समृद्धि का पता चलता है। कलचुरी राजवंश: लगभग 10वीं शताब्दी से लेकर 18वीं शताब्दी तक, कलचुरी वंश ने रतनपुर को अपनी राजधानी बनाकर पूरे छत्तीसगढ़ पर शासन किया। उन्होंने ही 'छत्तीसगढ़' नाम को लोकप्रिय बनाया। कलचुरियों के शासनकाल को कला, संस्कृति और प्रशासनिक स्थिरता का स्वर्ण युग माना जाता है।
• पुरातात्विक स्थल: राज्य में सिरपुर (बौद्ध, शैव और वैष्णव धर्मों का संगम स्थल), मल्हार, ताला , भोरमदेव, रतनपुर,खरौद और बारसूर जैसे महत्वपूर्ण पुरातात्विक केंद्र हैं, जो यह दर्शाते हैं कि यह क्षेत्र प्राचीन काल से ही ज्ञान और कला का केंद्र रहा है।
*2. समृद्ध संपदा: अर्थव्यवस्था का आधार*
छत्तीसगढ़ भारत के उन कुछ राज्यों में से है जिनकी पहचान ही उसकी प्राकृतिक संपदा से है।
• खनिज शक्ति का विस्तार: यह राज्य कोयला, लौह अयस्क (बैलाडीला की उच्च गुणवत्ता का लौह अयस्क), बॉक्साइट और टिन का प्रमुख उत्पादक है। 25 वर्षों में, राज्य ने अपनी खनिज रॉयल्टी और राजस्व संग्रहण को सुदृढ़ किया है। यह राजस्व, जो कभी केंद्र पर निर्भरता का कारण था, अब राज्य की जनकल्याणकारी योजनाओं और औद्योगिक विकास की रीढ़ बन गया है। छत्तीसगढ़ को देश का 'स्टील हब' और 'पावर हब' कहा जाता है।
• वनोपज आधारित आजीविका: राज्य का लगभग 44% भूभाग वनाच्छादित है। यहाँ तेंदूपत्ता, साल और सागौन जैसी मूल्यवान वनोपज मिलती है। राज्य ने लघु वनोपज (Minor Forest Produce) की खरीद और प्रसंस्करण को संस्थागत रूप दिया है। न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर 60 से अधिक वनोपज खरीदने वाला यह देश का अग्रणी राज्य है, जिसने वनवासी समुदायों की आय और आत्मनिर्भरता में क्रांति ला दी है।
*3. कृषि: 'धान का कटोरा' से मिलेट क्रांति तक*
छत्तीसगढ़ की आत्मा कृषि में बसती है, और इसकी पहचान 'धान का कटोरा' है।
• जल संसाधन विकास: राज्य निर्माण के बाद सिंचाई सुविधाओं के विस्तार पर जोर दिया गया, जिससे धान की पैदावार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। किसान-केंद्रित नीतियों, विशेष रूप से धान पर दिए जाने वाले समर्थन मूल्य और बोनस ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को अभूतपूर्व मजबूती दी है।
• कृषि विविधीकरण की गहराई: पिछले कुछ वर्षों में, धान की एकल फसल पर निर्भरता कम करने के लिए कृषि विविधीकरण को एक मिशन के रूप में लिया गया है। 'मिलेट मिशन' के तहत कोदो, कुटकी, रागी जैसे पारंपरिक और पौष्टिक अनाजों के उत्पादन, प्रसंस्करण और विपणन को बढ़ावा दिया गया है। यह पहल न केवल किसानों की आय बढ़ा रही है, बल्कि राज्य को पोषण सुरक्षा के क्षेत्र में भी एक मॉडल बना रही है।
*4.   विकास बनाम चुनौती*
राज्य की 25 वर्ष की यात्रा में कानून व्यवस्था का सबसे जटिल पहलू नक्सलवाद (माओवाद) की चुनौती रही है, जिस पर एक बहुआयामी रणनीति अपनाई गई है।
• समन्वित रणनीति (सुरक्षा-विकास समन्वय): राज्य ने केवल सैन्य समाधान पर निर्भर न रहते हुए, विकास, सुरक्षा और पुनर्वास की समन्वित रणनीति अपनाई। दुर्गम क्षेत्रों में फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस (FOBs) स्थापित किए गए, जिससे सुरक्षा बलों की उपस्थिति कोर क्षेत्रों तक बढ़ी। इन कैंपों के माध्यम से सड़कों, पुलिया, स्कूल और संचार नेटवर्क (मोबाइल टावर) जैसे विकास कार्य सुनिश्चित किए गए।
• नक्सल उन्मूलन की प्रगति: विगत वर्षों में, नक्सल प्रभावित क्षेत्रों का भौगोलिक दायरा काफी सीमित हुआ है। प्रमुख सफलता यह रही है कि कई अति-संवेदनशील इलाकों में पहली बार प्रशासनिक और पुलिस नियंत्रण स्थापित हुआ है। आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति को मजबूत किया गया है ताकि भटके हुए युवा मुख्यधारा में लौट सकें, जिससे सामाजिक शांति की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया गया है।
• सामान्य क्षेत्रों में पुलिसिंग: सामान्य क्षेत्रों में त्वरित न्याय और अपराध नियंत्रण के लिए सामुदायिक पुलिसिंग और तकनीक (जैसे सीसीटीवी निगरानी और साइबर सेल) का उपयोग बढ़ाया गया है।
*5. आर्थिक नियोजन और अधोसंरचना: बजट और सड़कों का जाल*
छत्तीसगढ़ ने 25 वर्षों में अपनी आर्थिक नींव को मजबूत किया है और तेजी से इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास किया है।
• राज्य बजट की प्राथमिकताएँ: गठन के बाद, राज्य को राजस्व घाटे की चुनौती का सामना करना पड़ा, लेकिन खनिज राजस्व के कुशल प्रबंधन और राजकोषीय अनुशासन से राज्य की वित्तीय स्थिति मजबूत हुई। राज्य के बजट की मुख्य प्राथमिकता मानव विकास सूचकांक (HDI) में सुधार रही है, जिसमें स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा पर उच्च व्यय शामिल है। कल्याणकारी योजनाओं और कृषि ऋण माफी जैसी पहलों के माध्यम से ग्रामीण क्रय शक्ति को बढ़ावा दिया गया है।
• फैली सड़कों का जाल (कनेक्टिविटी क्रांति): राज्य के विकास की गति को सड़कों के जाल ने अभूतपूर्व बल दिया है। ग्रामीण सड़कें: प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) और मुख्यमंत्री ग्राम सड़क योजना (CMGSY) के तहत वनांचल क्षेत्रों तक सड़कों की पहुंच सुनिश्चित की गई है, जिससे किसानों को अपनी उपज मंडियों तक ले जाने में आसानी हुई है। राष्ट्रीय राजमार्ग और आर्थिक गलियारे: राज्य से गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्गों का चौड़ीकरण और नए आर्थिक गलियारों (Economic Corridors) का विकास औद्योगिक गतिविधियों को बढ़ावा दे रहा है। बस्तर कनेक्टिविटी: बस्तर जैसे अति-दुर्गम क्षेत्रों में सड़कों और पुलों का निर्माण, नक्सल चुनौती के बावजूद, स्थानीय लोगों को प्रशासनिक और स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ने का सबसे बड़ा माध्यम बना है।
*6. राजनीतिक एवं प्रशासनिक पुनर्गठन: लोकतंत्र की नई पहचान*
बीते 25 वर्षों में, छत्तीसगढ़ ने अपने शासन और प्रशासन की संरचना को मजबूत करने के लिए कई दूरगामी कदम उठाए हैं।
•  छत्तीसगढ़ का शासन प्रणाली सुशासन (Good Governance), सामाजिक न्याय और हाशिए पर पड़े समुदायों (विशेषकर अनुसूचित जनजाति) के सशक्तीकरण पर केंद्रित रही है। राज्य ने अपनी पहचान एक स्थिर राजनीतिक इकाई के रूप में बनाई है, जहाँ लोक कल्याण और समावेशी विकास मुख्य प्राथमिकता है।
• नए विधानसभा भवन का महत्व: रायपुर के नया रायपुर क्षेत्र में एक नए और आधुनिक विधानसभा भवन का निर्माण राज्य के लोकतांत्रिक मूल्यों की मजबूती और भविष्य की आकांक्षाओं का प्रतीक है। यह भवन न केवल राज्य के शासन केंद्र के रूप में कार्य करेगा, बल्कि छत्तीसगढ़ की कला, संस्कृति और स्थापत्य कला को भी प्रदर्शित करेगा।
• नए जिलों का निर्माण: सुदूर और दुर्गम क्षेत्रों तक प्रशासनिक पहुंच और विकास की गति तेज करने के लिए, राज्य ने पिछले कुछ वर्षों में कई नए जिलों और तहसीलों का निर्माण किया है। छोटे प्रशासनिक इकाइयों का गठन नागरिकों के लिए सरकारी सेवाओं को सुलभ बनाता है, जिससे विकेंद्रीकरण (Decentralization) और त्वरित विकास सुनिश्चित होता है।
*7. शिक्षा में क्रांति: ज्ञान की नई रौशनी*
राज्य निर्माण के समय आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा का बुनियादी ढांचा बेहद कमजोर था। पिछले 25 वर्षों में शिक्षा के क्षेत्र में क्रन्तिकारी बदलाव आए हैं।
• स्वामी आत्मानंद स्कूल योजना: यह राज्य में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की दिशा में सबसे बड़ा कदम है। सरकारी स्कूलों को उच्च मानकों के साथ हिंदी और अंग्रेजी दोनों माध्यमों में उत्कृष्ट शिक्षा केंद्रों के रूप में विकसित किया गया है।
• उच्च शिक्षा का विस्तार: रायपुर में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) और राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (NIT) की स्थापना के साथ-साथ कई नए मेडिकल कॉलेज और विश्वविद्यालय खोले गए हैं। इससे स्थानीय छात्रों को राज्य के भीतर ही गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिला है।
• डिजिटल पहल: दूरस्थ और वनांचल क्षेत्रों में ई-कंटेंट, वर्चुअल क्लासरूम और शिक्षा सारथी जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से शिक्षा की पहुंच सुनिश्चित की जा रही है, जिससे 'ज्ञान की खाई' को पाटने में मदद मिली है।
*8. चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवाओं में कायापलट*
स्वास्थ्य सुविधाएँ, विशेष रूप से आदिवासी बहुल क्षेत्रों में, हमेशा एक चुनौती रही हैं। 25 वर्षों में, राज्य ने इस क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है।
• सार्वभौमिक स्वास्थ्य सुरक्षा: डॉ. खूबचंद बघेल स्वास्थ्य सहायता योजना जैसी राज्य-विशिष्ट योजनाओं ने गरीब और मध्यम वर्ग के परिवारों को मुफ्त और गुणवत्तापूर्ण इलाज तक पहुंच सुनिश्चित की है, जो स्वास्थ्य को एक अधिकार के रूप में स्थापित करती है।
• अंतिम छोर तक पहुंच: मोबाइल मेडिकल यूनिट (MMUs) और शहरी क्षेत्रों में दाई-दीदी क्लीनिक जैसी पहल प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को दूर-दराज के और झुग्गी-झोपड़ी वाले क्षेत्रों तक पहुंचा रही हैं।
• शिशु एवं मातृ मृत्यु दर में कमी: संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देने और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHCs) के सुदृढ़ीकरण से शिशु मृत्यु दर (IMR) और मातृ मृत्यु दर (MMR) में उल्लेखनीय कमी आई है, जो राज्य की सबसे बड़ी सामाजिक उपलब्धियों में से एक है।
*9. रोजगार और स्वरोजगार: युवा सशक्तीकरण*
राज्य की युवा शक्ति को दिशा देने और पलायन रोकने के लिए रोजगार एवं स्वरोजगार को मुख्य एजेंडा बनाया गया है।
• सरकारी नौकरियों में स्थानीय प्राथमिकता: राज्य बनने के बाद से ही स्थानीय निवासियों को सरकारी नौकरियों में प्राथमिकता देने की नीति से युवाओं को अपने गृह राज्य में ही काम करने के अवसर मिले हैं।
• कौशल विकास पहल: मुख्यमंत्री कौशल विकास योजना जैसी पहलों के माध्यम से युवाओं को उद्योग-उन्मुख ट्रेडों में प्रशिक्षित किया गया है। विशेष रूप से औद्योगिक क्षेत्रों (जैसे भिलाई, रायगढ़) के आसपास कौशल विकास केंद्रों की स्थापना की गई है।
• स्वरोजगार को बढ़ावा: गौठान और रूरल इंडस्ट्रियल पार्क (RIPA): ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के लिए गौठानों को आजीविका केंद्र और RIPA के रूप में विकसित किया गया है। ये केंद्र महिलाओं और युवाओं को छोटे-छोटे उद्योग (जैसे वर्मी कंपोस्ट निर्माण, हस्तकला, खाद्य प्रसंस्करण) स्थापित करने का मंच प्रदान करते हैं, जिससे वे उद्यमशील बन सकें। स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र: आईटी और सेवा क्षेत्रों में स्वरोजगार को बढ़ावा देने के लिए, स्टार्टअप को प्रोत्साहन और वित्तीय सहायता प्रदान की जा रही है।
*10. भाषा एवं बोलियां: मौखिक विरासत का संरक्षण*
छत्तीसगढ़ की भाषाई विविधता इसकी सांस्कृतिक समृद्धि का एक और प्रमाण है, जो इसकी मौखिक विरासत को सदियों से पोषित करती आई है।
• छत्तीसगढ़ी भाषा: यह राज्य की राजभाषा और संपर्क भाषा है। इसे अक्सर पूर्वी हिंदी की एक बोली माना जाता है, लेकिन इसका अपना व्याकरण, साहित्य और लोकगीतों की समृद्ध परंपरा है। राज्य ने छत्तीसगढ़ी को पहचान दिलाने और इसे शिक्षा तथा प्रशासन में बढ़ावा देने के लिए छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के माध्यम से कदम उठाए हैं।
• जनजातीय बोलियाँ: राज्य के वनांचल क्षेत्रों में गोंडी, हल्बी, कुड़ुख (उरांव), सरगुजिया और भतरी जैसी कई महत्वपूर्ण जनजातीय बोलियां बोली जाती हैं। हल्बी को बस्तर क्षेत्र में एक संपर्क भाषा (Lingua Franca) का दर्जा प्राप्त है।
• भाषाई संरक्षण: राज्य सरकार इन जनजातीय भाषाओं और बोलियों के संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध है। इसके लिए जनजातीय भाषाओं के शब्दकोशों का निर्माण किया जा रहा है और प्राथमिक शिक्षा में मातृभाषा-आधारित शिक्षा (Mother Tongue Based Education) को प्रोत्साहित किया जा रहा है ताकि बच्चों को अपनी जड़ों से जोड़कर शिक्षा दी जा सके।
*11. सांस्कृतिक परंपरा, व्यंजन और विविधता का संरक्षण*
छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान इसकी विविधता, सादगी और परंपराओं के संरक्षण में निहित है।
• लोक कला और विश्व मंच: पंडवानी, राउत नाचा और पंथी नृत्य जैसी कलाओं को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंच पर पहचान मिली है। पंडवानी गायिका तीजन बाई ने राज्य की लोक कथाओं को जीवंत बनाए रखा है।
• पर्व और परंपराएं: बस्तर दशहरा का 75-दिवसीय आयोजन, राजिम कुंभ/माघी पुन्नी मेला, और हरेली (कृषि पर्व) राज्य की सांस्कृतिक एकता के प्रतीक हैं। राज्य ने इन परंपराओं को संरक्षित करने और उन्हें पर्यटन से जोड़ने का सफल प्रयास किया है।
• रहन-सहन और व्यंजन: यहाँ का रहन-सहन प्रकृति के साथ तालमेल बिठाता है। खान-पान में चावल आधारित व्यंजन जैसे फरा, चीला, मुठिया और पौष्टिक बासी शामिल हैं। यह सादगीपूर्ण जीवनशैली और जैविक कृषि पर आधारित खान-पान, आधुनिक 'वेलनेस' संस्कृति के लिए एक प्रेरणा है।

*12. छत्तीसगढ़ में विकास की भुमिका*
छत्तीसगढ़ में अब तक मुख्य रूप से दो प्रमुख राजनीतिक दलों ने शासन किया है, और दोनों के कार्यकाल में विकास के अलग-अलग आयामों पर ध्यान केंद्रित किया गया।
1. बुनियादी ढाँचे और सामाजिक सुरक्षा पर जोर (मुख्यतः 2003-2018)
इस अवधि में, सरकार का प्रमुख ध्यान बुनियादी ढाँचे को मजबूत करने और लक्षित सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करने पर रहा:
सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) सुधार: छत्तीसगढ़ ने अपनी सार्वजनिक वितरण प्रणाली को देश के एक मॉडल के रूप में स्थापित किया। चावल वितरण के लिए विशेष कानून बनाए गए, जिससे भ्रष्टाचार में कमी आई और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित हुई।
बिजली और सड़क नेटवर्क: राज्य में बिजली उत्पादन और वितरण क्षमता में वृद्धि की गई, और दूर-दराज के क्षेत्रों को जोड़ने के लिए सड़क नेटवर्क का विस्तार किया गया।
शिक्षा और स्वास्थ्य: दूरस्थ क्षेत्रों में स्कूलों और स्वास्थ्य केंद्रों की पहुँच बढ़ाने पर काम हुआ।
वनोपज आधारित नीतियाँ: तेंदूपत्ता संग्राहकों को बोनस वितरण जैसी योजनाओं के माध्यम से वन आधारित अर्थव्यवस्था से जुड़े लोगों को आर्थिक संबल प्रदान किया गया।
इस दौर की उपलब्धियों ने राज्य में एक मजबूत भौतिक और सामाजिक सुरक्षा का आधार तैयार किया।
2. कृषि, न्याय और सांस्कृतिक पुनरुत्थान पर जोर (मुख्यतः 2000-2003 और 2018 के बाद)
इस अवधि की सरकारों ने कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था और सामाजिक-आर्थिक न्याय के सिद्धांतों को प्राथमिकता दी:
कृषि ऋण माफी और आय सहायता: किसानों के लिए कृषि ऋण माफी योजनाएँ लागू की गईं। राजीव गांधी किसान न्याय योजना (RGKNY) के माध्यम से धान उत्पादकों को इनपुट सहायता दी गई, जिसने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सीधा लाभ पहुँचाया।
गोबर खरीद पहल (गोबर धन न्याय योजना): यह योजना नवाचार का एक अनूठा उदाहरण है, जिसने पर्यावरण संरक्षण और पशुधन के आर्थिक मूल्य को बढ़ाकर ग्रामीण आजीविका को सशक्त किया।
सांस्कृतिक संरक्षण और पर्यटन: सरकार ने छत्तीसगढ़ी अस्मिता को मजबूत करने पर बल दिया। राम वन गमन पथ का विकास, कौशल्या माता मंदिर (चंदखुरी) का जीर्णोद्धार और पारंपरिक तीज-त्योहारों को सार्वजनिक अवकाश का दर्जा देकर सांस्कृतिक गौरव को बढ़ावा दिया गया।
प्रशासनिक विकेंद्रीकरण: प्रशासन को नागरिकों के करीब लाने के लिए नए जिलों का गठन किया गया, जिससे स्थानीय विकास योजनाओं को गति मिली।


*13. रजत जयंती का संकल्प : गढ़बो नवा छत्तीसगढ़*
25 वर्षों की यह यात्रा दृढ़ संकल्प और प्रगति की गाथा है। रजत जयंती वर्ष के अवसर पर, छत्तीसगढ़ अब भविष्य की ओर देख रहा है:
• सतत विकास: अपनी खनिज संपदा का उपयोग करते हुए पर्यावरण संतुलन बनाए रखना।
• सामाजिक समरसता: जनजातीय और गैर-जनजातीय समाजों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना।
• युवा शक्ति: शिक्षा और कौशल विकास के माध्यम से युवाओं को रोजगार के लिए तैयार करना।
छत्तीसगढ़ अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ, लेकिन भविष्य की ओर उन्मुख, एक ऐसे 'नवा छत्तीसगढ़' के निर्माण के लिए प्रतिबद्ध है जो भारत के विकास में एक मजबूत और गौरवशाली भागीदार होगा।
छत्तीसगढ़ का विकास किसी एक सरकार की उपलब्धि नहीं, बल्कि एक निरंतर प्रक्रिया का परिणाम है। एक तरफ जहाँ कुछ सरकारों ने बुनियादी ढाँचे, खाद्य सुरक्षा और PDS के मॉडल पर काम किया, वहीं दूसरी ओर कृषि, सामाजिक न्याय और सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने पर जोर दिया गया।
इन राजनीतिक प्रयासों के मूल में शहीद वीर नारायण सिंह के बलिदान, गुरु घासीदास के सामाजिक समरसता के संदेश और डॉ. खूबचंद बघेल के भाषाई और सांस्कृतिक आंदोलन की नींव है। छत्तीसगढ़ की भविष्य की राह इन दोनों स्तंभों—मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति और विरासत में मिली सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना—पर निर्भर करती है। राज्य का भविष्य तभी उज्ज्वल होगा जब उसकी विकास की परिभाषा में आर्थिक समृद्धि के साथ-साथ यहाँ की विशिष्ट संस्कृति और ‘गढ़बो नवा छत्तीसगढ़’ का संकल्प भी शामिल हो।

आलेख - खेमेश्वर पुरी गोस्वामी
मुंगेली, छत्तीसगढ़ 8120032834
              

chhattisgarhi

*छत्तीसगढ़ में राजभाषा छत्तीसगढ़ी और स्थानीय भाषाओं की उपेक्षा - एक गंभीर चिंतन*

*राजभाषा की घोषणा, कागजों तक सीमित! छत्तीसगढ़ी अस्मिता पर संकट*

छत्तीसगढ़ राज्य के गठन का एक प्रमुख आधार यहाँ की छत्तीसगढ़ी भाषा और उसकी विशिष्ट संस्कृति थी। राज्य बनने के बाद, 28 नवंबर 2007 को छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का दर्जा मिला, और इसके विकास व शासकीय उपयोग हेतु छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग की स्थापना भी की गई। यह कदम राज्य की अस्मिता को सम्मान देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल थी।
हालांकि, राजभाषा घोषित होने के वर्षों बाद भी, जमीनी हकीकत निराशाजनक है। छत्तीसगढ़ी आज भी सरकारी दफ्तरों से लेकर शिक्षा तक में विशेष महत्व प्राप्त नहीं कर पाई है। यह केवल कागजों तक सिमटकर रह गई है। इसके समानांतर, प्रदेश की अन्य स्थानीय बोलियाँ और आदिवासी भाषाएँ - जैसे गोंडी, हल्बी, कुड़ुख, सरगुजिया आदि - तो और भी अधिक उपेक्षा की शिकार हैं। इस उपेक्षा के सामाजिक, राजनैतिक, प्रशासनिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गंभीर चिंतन की आवश्यकता है।

*प्रशासनिक उदासीनता: राजकाज की भाषा कब बनेगी छत्तीसगढ़ी?*
छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का दर्जा तो मिला, लेकिन सरकारी कामकाज में इसका उपयोग न के बराबर है।

*हिंदी का वर्चस्व:* सरकारी कार्यालयों में राजकाज की भाषा आज भी प्रमुख रूप से हिंदी है। प्रशासनिक पत्र-व्यवहार, न्यायिक प्रक्रिया और अधिसूचनाएँ अधिकांशतः हिंदी में ही होती हैं।

*कर्मचारियों में अनिच्छा:* अधिकारियों और कर्मचारियों में छत्तीसगढ़ी में काम करने की अनिच्छा या प्रशिक्षण का अभाव एक बड़ी बाधा है।

*राजभाषा आयोग की सीमित शक्ति:* राजभाषा आयोग का गठन तो हुआ है, लेकिन इसे पर्याप्त वित्तीय और कानूनी शक्तियाँ प्राप्त नहीं हैं, जिसके कारण यह भाषा के प्रचार-प्रसार और प्रशासनिक उपयोग को अनिवार्य बनाने में कमजोर साबित हो रहा है।

*शिक्षा में उपेक्षा:* प्राथमिक शिक्षा में भी छत्तीसगढ़ी को अनिवार्य विषय के रूप में शामिल करने की माँग लंबे समय से है, लेकिन यह माँग पूरी नहीं हुई है। नतीजतन, नई पीढ़ी अपनी मातृभाषा से दूर होती जा रही है।

*.सामाजिक और सांस्कृतिक क्षति:* पहचान का संकट
भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि किसी भी समाज की संस्कृति और पहचान की वाहक होती है। छत्तीसगढ़ी और स्थानीय भाषाओं की उपेक्षा का सामाजिक और सांस्कृतिक ताने-बाने पर गहरा नकारात्मक असर पड़ रहा है।

*शहरीकरण और हीनता बोध:* शहरों में, खासकर शिक्षित वर्ग में, छत्तीसगढ़ी बोलने को हीनता की भावना से जोड़ा जाता है। हिंदी और अंग्रेजी का बोलबाला, खासकर बच्चों की शिक्षा और बोलचाल में, उनकी जड़ों से उन्हें काट रहा है।

*लोक-साहित्य का क्षरण:* छत्तीसगढ़ी का अपना समृद्ध लोक-साहित्य, लोकगीत, पंडवानी, ददरिया और लोकोक्तियाँ हैं। भाषा के प्रचलन में कमी आने से यह समृद्ध मौखिक परंपरा लुप्त होने के कगार पर है।

*मातृभाषा का महत्व:* ग्रामीण क्षेत्रों की 82% से अधिक आबादी की संपर्क भाषा छत्तीसगढ़ी ही है। जब शिक्षा और प्रशासन की भाषा उनकी मातृभाषा नहीं होती, तो वे विकास की दौड़ में पीछे छूट जाते हैं, और उनके लिए सरकारी योजनाओं को समझना भी मुश्किल हो जाता है।

*राजनैतिक इच्छाशक्ति का अभाव: केवल ब्रांडिंग का विषय*
छत्तीसगढ़ी भाषा को लेकर राजनेताओं के बयान और घोषणाएँ तो खूब आती हैं, लेकिन ठोस कार्यान्वयन की कमी साफ दिखती है।

*वोट बैंक की राजनीति:* चुनावों के दौरान छत्तीसगढ़ी अस्मिता की बात होती है, लेकिन सत्ता में आने के बाद यह केवल ब्रांडिंग या प्रतीकात्मक आयोजनों तक सीमित रह जाती है।

*आठवीं अनुसूची की माँग:* छत्तीसगढ़ी को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की माँग लंबे समय से लंबित है। राजनैतिक दल इस दिशा में अपेक्षित दबाव बनाने में विफल रहे हैं, जिससे भाषा को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता नहीं मिल पा रही है।

*हिंदी बनाम छत्तीसगढ़ी:* कुछ हिंदी-समर्थक समूहों का यह तर्क भी है कि छत्तीसगढ़ी को बढ़ावा देने से हिंदी को क्षति होगी, जो कि एक भ्रामक धारणा है। भाषाविदों के अनुसार, छत्तीसगढ़ी,अवधी और बघेली की सहोदरा है, और इसका समृद्ध साहित्य हिंदी को और विविधता प्रदान करता है।

*.आगे की राह: सशक्तिकरण और स्वीकार्यता.*

छत्तीसगढ़ी और स्थानीय भाषाओं को उपेक्षा के इस चक्र से बाहर निकालने के लिए जनता, सरकार और बुद्धिजीवियों सभी को मिलकर प्रयास करने होंगे।
शिक्षा में अनिवार्यता: प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक छत्तीसगढ़ी को अनिवार्य और महत्वपूर्ण विषय के रूप में शामिल किया जाए।

*प्रशासनिक उपयोग:* सरकारी दफ्तरों में छत्तीसगढ़ी का उपयोग अनिवार्य किया जाए, और इसके लिए कर्मचारियों को प्रशिक्षण दिया जाए।
स्थानीय भाषाओं का संरक्षण: गोंडी और अन्य आदिवासी भाषाओं के लिए विशेष अकादमी और कोश (डिक्शनरी) का निर्माण किया जाए, ताकि उनकी लिपि और साहित्य का संरक्षण हो सके।
जन-जागरण: समाज में छत्तीसगढ़ी बोलने के प्रति गौरव की भावना पैदा करने के लिए व्यापक जन-जागरण अभियान चलाया जाए।

*सरकारी योजनाएँ और पहल: केवल नाम की संजीवनी*

छत्तीसगढ़ी भाषा के हित में सरकार द्वारा कुछ योजनाएँ और पहल की गई हैं, लेकिन उनका कार्यान्वयन और प्रभाव अभी भी अपेक्षानुरूप नहीं है।

*छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग:* इसकी स्थापना का उद्देश्य भाषा का प्रचार-प्रसार, साहित्य सृजन और राजकीय उपयोग सुनिश्चित करना था। आयोग ने कई महत्वपूर्ण सेमिनार आयोजित किए हैं और शब्दकोश निर्माण की दिशा में कार्य किया है। हालांकि, इसे प्रशासनिक बाध्यता लागू करने की शक्ति नहीं मिली है, जिससे इसका प्रभाव सलाहकार तक सीमित रह जाता है।

*लोक-कला और साहित्य प्रोत्साहन:* राज्य अलंकरणों में छत्तीसगढ़ी साहित्यकारों और लोक कलाकारों को सम्मानित करना, राज्योत्सव जैसे आयोजनों में छत्तीसगढ़ी संस्कृति का प्रदर्शन करना। ये पहलें भाषा के प्रति गौरव जगाती हैं, लेकिन भाषा को जीविकोपार्जन और शिक्षा से नहीं जोड़ पाती हैं।

*मातृभाषा दिवस/राजभाषा दिवस:* प्रतिवर्ष 28 नवंबर को छत्तीसगढ़ी राजभाषा दिवस मनाना एक प्रतीकात्मक कदम है।
असर: ये पहलें आवश्यक तो हैं, लेकिन ये भाषा को सरकारी सिस्टम और रोजगार की मुख्यधारा से जोड़ने में नाकाफी साबित हुई हैं। भाषा के विकास के लिए योजनाओं का क्रियान्वयन केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि व्यावहारिक और बाध्यकारी होना चाहिए।

*छत्तीसगढ़ी के हित में सरकार से प्रमुख अपेक्षाएँ*

छत्तीसगढ़ी को उसकी उपेक्षा के चक्र से निकालने और उसे उसका वास्तविक स्थान दिलाने के लिए सरकार से निम्नलिखित ठोस अपेक्षाएँ हैं:
 *संवैधानिक और कानूनी अनिवार्यता*
आठवीं अनुसूची में शामिल करना: केंद्र सरकार पर प्रबल राजनैतिक दबाव बनाया जाए ताकि छत्तीसगढ़ी को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया जा सके। यह इसे राष्ट्रीय मान्यता और विकास के लिए केंद्र से वित्तीय सहायता का पात्र बनाएगा।
राजभाषा कानून का कड़ा क्रियान्वयन: राजभाषा आयोग को विधिक शक्ति प्रदान की जाए, ताकि वह प्रशासनिक कार्यालयों में छत्तीसगढ़ी के उपयोग को अनिवार्य कर सके और उल्लंघन पर दंडात्मक प्रावधान लागू हो सकें।

*शिक्षा और रोजगार में समावेशन*
 
*प्राथमिक शिक्षा का माध्यम:* प्रदेश के सभी ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक स्तर (कक्षा 1 से 5) पर शिक्षा का माध्यम (मीडियम) अनिवार्य रूप से छत्तीसगढ़ी या संबंधित स्थानीय बोली (जैसे गोंडी, हल्बी) को बनाया जाए।

*व्यावसायिक पाठ्यक्रम:* छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य को राज्य की उच्च शिक्षा में, खासकर पत्रकारिता, जनसंपर्क, और लोक प्रशासन के पाठ्यक्रमों में एक अनिवार्य विषय/विकल्प के रूप में जोड़ा जाए।

*रोजगार में प्राथमिकता:* राज्य सरकार की तृतीय और चतुर्थ श्रेणी की नौकरियों में छत्तीसगढ़ी भाषा के ज्ञान को अनिवार्य किया जाए और लिखित परीक्षा में इसे योग्यता का मापदंड बनाया जाए।

*आदिवासी भाषाओं का संरक्षण*
भाषा अकादमी: गोंडी, हल्बी, कुड़ुख, और सरगुजिया जैसी प्रमुख आदिवासी भाषाओं के लिए अलग-अलग अकादमियों की स्थापना की जाए।

*शिक्षक भर्ती:* इन भाषाओं के शिक्षक विशेष रूप से भर्ती किए जाएँ ताकि उन क्षेत्रों में मातृभाषा में शिक्षा दी जा सके, जहाँ ये बोलियाँ बोली जाती हैं।

*न्यायिक और प्रशासनिक सरलीकरण :*
*न्यायिक उपयोग:* निचले स्तर के न्यायालयों (जैसे व्यवहार न्यायालय) में पक्षकारों को छत्तीसगढ़ी में अपने बयान दर्ज कराने और कानूनी दस्तावेज तैयार करने की सुविधा दी जाए।
*सरल छत्तीसगढ़ी:* प्रशासनिक छत्तीसगढ़ी की एक मानकीकृत शब्दावली का निर्माण किया जाए, जो हिंदी से मिलती-जुलती हो,ताकि प्रशासनिक कार्यों में इसे आसानी से अपनाया जा सके।
सरकार से यह अपेक्षा है कि वह छत्तीसगढ़ी को वोट बटोरने के साधन से ऊपर उठकर, राज्य की आत्मा और जनता की आवाज के रूप में देखे, और इसके व्यावहारिक विकास के लिए एक स्पष्ट और समयबद्ध रोडमैप तैयार करे।

छत्तीसगढ़ी भाषा 2 करोड़ से अधिक लोगों की भावनाओं, संस्कृति और ज्ञान का भंडार है यह राज्य की अस्मिता का प्रतीक है। यह सरकार का नैतिक और संवैधानिक दायित्व है कि वह इस भाषा को केवल एक सरकारी घोषणा तक सीमित न रखे, बल्कि इसे शक्ति, सम्मान और उपयोग का माध्यम बनाए। इंतजार अब खत्म होना चाहिए।

कानून बनाने वाले : बस शोर ही मचाते हैं

सेल्फी खिंचवाते रहे, रिबन कटवाते रहे, मुख्य अतिथि बन, मंच चमकाते हैं। क्षेत्र में न दिखें कभी, दिल्ली में विलासी बनें, जनता की भीड़ देख, हाथ ...