Tuesday, January 13, 2026

नव-चेतना का महापर्व : मकर संक्रांति


तिल-गुड़ की खुशबू महक उठी, नभ में उल्लास का डेरा है,
मिटा कुहासा जड़ता का, अब हुआ नया सवेरा है।
मकर राशि में सूर्य पधारे, किरणों ने ली अंगड़ाई,
अंधकार की हार हुई, और प्रकाश की जोत सवाई।

जैसे गरजे थे विवेकानंद, बन ज्ञान का दिव्य प्रकाश,
वैसे ही तपन बढ़ाकर सूर्य, भेद रहे अब नील आकाश।
उत्तरायण की यह पावन बेला, पुरुषार्थ का संदेश सुनाती,
कायरता को त्याग वीर, अब विजय-पथ पर कदम बढ़ाती।

तिल-गुड़ मिल जैसे एकाकार हुए हैं,
वैसे ही जन-जन के मन में, प्रेम-भाव संचार हुए हैं।
पतंगों सी ऊँची उड़ान हो, लक्ष्यों का संधान रहे,
धरा से जुड़े हों पाँव हमारे, पर छूना आसमान रहे।

काँप उठे सब शत्रु-भाव, जब सौहार्द की गंगा बहती,
दान-पुण्य और सेवा की यह, रीत सनातन हमसे कहती।
उठो युवा! तुम बनो सूर्य-सम, तपकर जग को राह दिखाओ,
भारत माँ के गौरव को तुम, फिर से शिखर पर पहुँचाओ।


           © खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
     मुंगेली, छत्तीसगढ़,8120032834

शुभ मकर संक्रांति! यह पर्व आपके जीवन में सूर्य जैसी प्रखरता और तिल जैसी मिठास लेकर आए।

Monday, January 12, 2026

अद्भुत रहस्यों से भरा मंदिर

भारत का एकलौता - अनोखा शिव मंदिर जहां रखवाली करते हैं प्रजापति दक्ष ,हाथ में लाठी लिए बने हैं द्वारपाल

राजा बलि करते हैं सिरदान तो वहीं मंदिर के गर्भगृह में नृत्य करते हैं भस्मासुर, योगियों को मिलती है दिव्य पुंज 

योग,ध्यान, तपस्या व विभिन्न पौराणिक कथाओं को परिलक्षित करती प्रतिमाएं व विभिन्न पशु-पक्षियों,जलचर-नभचरों की मुर्तियां मन मोह लेती हैं 


प्रस्तुति - न्यूज़लाइन नेटवर्क ,नई दिल्ली,भारत 

आलेख - खेमेश्वर पुरी गोस्वामी (धार्मिक प्रवक्ता/खोजी पत्रकार)

भारतवर्ष की संस्कृति व सभ्यता की विश्व पटल पर एक अलग व अनूठा स्थान है, वहीं पुरातत्व, प्राचीन मंदिरों व विभिन्न देवी देवताओं की मुर्तियों तथा इनके पीछे जुड़े इतिहास व पौराणिक कथाओं की प्रमाणिकता की रोमांचकता अपने आप में अद्वितीय है।

ठीक इसी तरह एक मंदिर है छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में। जिस स्थान पर यह मंदिर स्थित है वह इतिहास में कभी संगम ग्राम के नाम से जाना जाता था,व इसके नाम के पीछे कारण था छत्तीसगढ़ की महत्वपूर्ण नदी शिवनाथ व सहायक नदी मनियारी का संगम होना।
पर हम बात करते हैं वर्तमान नाम का तो इस स्थल को ताला के नाम से जाना जाता है जिसका अर्थ होता है नगर जहां कभी राजाओं का राजवाड़ा हुआ करता था।
यह ताला नामक स्थान अमेरी कापा गांव का ही हिस्सा है जहां विश्व प्रसिद्ध व भारत की सबसे प्राचीन मंदिरों में से ही दो मंदिर देवरानी - जेठानी मंदिर के लिए जाना जाता है।
देवरानी जेठानी मंदिर शिव को समर्पित मंदिर है। जहां शिव सती विवाह, रूद्रशिव,कई पौराणिक पात्र देवी देवताओं,नदी देवियां, पशु-पक्षियां, भूत-पिशाच व शिवगणों के साथ ऊंची मुर्तियां संजोए रखने में देश भर में अपना अलग स्थान बनाए हुए है।

यहां कई मुर्तियां ऐसी है जो विश्व भर में अपना अलग व अनूठा होने का प्रमाण देती है।कई मुर्तियां देश के विभिन्न मंदिरों में पाए गए मुर्तियों की तरह ही तो कई अद्वितीय व अद्भुत रहस्यों से भरे हुए हैं, जिनमें अभी तक सिर्फ रूद्रशिव की मुर्ति को जाना जाता रहा है।


पर हम आज बात करते हैं यहां सबसे विशेष जो मुर्ति है और सतयुग तथा शिवपुराण की एक वृहद व रोमांचित कर देने वाली कथा से जुड़ी है जो इस मंदिर को बनवाने वाले के शिव के प्रति प्रेम व भक्ति की समर्पण को पुरे विश्व में एक अनूठा पहचान देता है।

और वह अनुठा पहचान है कि, भगवान शिव के सबसे बड़े विरोध व शिव को शत्रु मानने वाले राजा दक्ष प्रजापति की मुर्ति को भगवान शिव के मंदिर में द्वारपाल बनाकर रखने को लेकर है।
जी हां यहां शिव पुराण में वर्णित राजा दक्ष प्रजापति को शिव मंदिर में द्वारपाल के रूप विराजित किया गया है जो शिव भक्ति को समर्पित मंदिर निर्माणकर्ता के भक्ति को परिभाषित करता है।

विश्व में व भारत में अनेकानेक शिव मंदिर है लेकिन ऐसा एक भी मंदिर नही जहां राजा दक्ष प्रजापति चौकीदारी करते हों मंदिर की रखवाली करते हों, कहीं न कहीं यह दक्ष के द्वारा सतयुग में शिव को अपमानित करने के कुत्सित प्रयास का बदला लेते हुए दक्ष को शिव के आगे उनका स्थान बताने का प्रयास किया गया है।
और इसकी प्रमाणिकता देती है राजा दक्ष प्रजापति की वह मुर्ति जो शिव पुराण के एक कथा के अनुसार राजा दक्ष प्रजापति को शिव जी ने बकरे का सिर लगाकर पुनर्जीवित किया था। और ताला के देवरानी शिव मंदिर में ठीक उसी रूप में बकरे के सिर रूपी राजा दक्ष प्रजापति को मंदिर की चौकीदारी सौंपी गई है। जिससे यह अद्वितीय व अद्भुत मंदिर पुरे देश भर में अपना एक अनूठा पहचान रखता है।

यदि शिवभक्त इस विचित्र व अद्भुत तथा अद्वितीय मंदिर का दर्शन करना चाहते हैं तो एक बार ताला का देवरानी जेठानी मंदिर अवश्य आना चाहिए शिव के भक्ति के इस अनूठे उदाहरण रूपी मंदिर का दर्शन अवश्य करना चाहिए।

आइए जानते हैं कि भगवान शिव ने राजा दक्ष को क्यों लगाया था बकरे का सिर? 

माता सती और उनके पिता राजा दक्ष प्रजापति को आप लोग जानते ही होंगे. इसके अलावा आप लोगों ने माता सती कथा भी सुनी होगी. लेकिन क्या आप जानते हैं कि भगवान शिव में क्रोध में आकर राजा दक्ष का सिर काटकर उन्हें बकरे का सिर लगा दिया था.

उत्तरखंड के हरिद्वार में कनखल गांव में दक्षेश्वर महादेव मंदिर स्थित है. ये वहीं मंदिर है जहां राजा दक्ष ने एक भव्य यज्ञ का आयोजन किया था, जिसमें सभी देवी-देवताओं, ऋषियों और संतों को तो आमंत्रित किया गया था, परंतु भगवान शंकर को आमंत्रित नहीं किया गया था. राजा दक्ष द्वारा शिव का अपमान माता सती सहन नहीं कर पाई और यज्ञ की अग्नि में कूद कर अपने प्राण त्याग दिए थे. जब ये बात महादेव को पता लगी तो उन्होंने गुस्से में दक्ष का सिर काट दिया था. देवताओं के अनुरोध पर भगवान शिव ने राजा दक्ष को जीवनदान दिया और उस पर बकरे का सिर लगा दिया.

इसके बाद जब राजा दक्ष को अपनी गलतियों का एहसास हुआ और उन्होंने भगवान शिव से क्षमा मांगी. तब भगवान शिव ने घोषणा की कि वे अपने हृदय से शत्रुता का भाव‌ त्याग करें व सेवा में लगे।

शायद इसी कथा से अभिप्रेरित होकर ताला के इस शिव मन्दिर में राजा दक्ष प्रजापति को चौकीदारी दी गई या यूं कहें कि द्वारपाल के रूप में सेवादार बना कर शिश सेवक के रूप में दर्शाया गया है।

अब आपके मन में जरुर एक बार इस मंदिर में जाकर दर्शन लाभ लेने का विचार आ रहा होगा तो आइए जानते हैं ताला के इस मंदिर का पुरातत्विक इतिहास व सनातन धर्म में इस मंदिर की महत्ता क्या रही है।

ताला छत्तीसगढ़ राज्य का एक गाँव है। जहाँ तक मूर्तिकला पर्यटन और पुरातात्विक महत्व का सवाल है, ताला की मूर्तिकला कला सर्वोत्कृष्ट है। इसकी बेजोड़ सुंदरता कई पर्यटकों को छत्तीसगढ़ की ओर आकर्षित करती है।
ताला अपने दो मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है जिन्हें देवरानी और जेठानी कहा जाता है। यह बिलासपुर से लगभग 29 किलोमीटर दक्षिण में है। भारतीय मूर्तिकला और कला का एक उत्कृष्ट उदाहरण, ये मंदिर एक ही परिसर में स्थित हैं और एक-दूसरे के बगल में स्थित हैं, इनका नाम उनके आयामों के कारण पड़ा है। बड़े वाले को ग्रामीणों ने जेठानी (बड़ी भाभी) नाम दिया जबकि छोटे वाले को देवरानी या छोटी भाभी कहा जाने लगा। इस प्रकार, मंदिरों का नामकरण अपने आप में अनूठा है। शिव मंदिर के रूप में प्रसिद्ध ये मंदिर मनियारी नदी के तट पर स्थित हैं।
पुरातत्वविदों के अनुसार जेठानी और देवरानी मंदिर का निर्माण पांचवीं शताब्दी में हुआ था।

1984 में सरकार द्वारा संरक्षित स्मारक घोषित देवरानी मंदिर में वर्ष 1987-88 के दौरान की गई खुदाई में भगवान शिव की एक अत्यंत अनोखी मूर्ति सामने आई है।

आज जेठानी मंदिर जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है और मंदिर की केवल उत्कृष्ट रूप से गढ़ी गई मूर्तियाँ ही बची हैं। देवरानी मंदिर बेहतर तरीके से संरक्षित है, भारत की समृद्ध धार्मिक परंपराओं के उदाहरण के रूप में सीधा और ऊँचा खड़ा है। इन मंदिरों में हिंदू देवताओं के विभिन्न देवी-देवताओं, अर्ध देवताओं, जानवरों, पौराणिक आकृतियों, पुष्प चित्रण और विभिन्न ज्यामितीय और गैर ज्यामितीय रूपांकनों सहित विभिन्न प्रकार की मूर्तियाँ हैं।

जेठानी मंदिर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बना है। हालांकि, आंशिक रूप से उजागर होने के बावजूद, मंदिर की भूतल योजना स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। जेठानी मंदिर के आधार पर प्रवेश द्वार पर एक सुंदर चंद्रशिला है। मंदिर में गर्भगृह, अर्ध मंडप और अंतराल शामिल हैं। इसका प्रवेश द्वार तीन तरफ से है, यानी दक्षिण, पूर्व और पश्चिम। मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार तक सीढ़ियों की एक विस्तृत उड़ान के माध्यम से पहुंचा जा सकता है। मंदिर का निर्माण परतदार लाल-बलुआ पत्थर से किया गया है।

मंदिर की ओर जाने वाली सीढ़ियों पर सजावटी खंभे हैं। भगवान शिव के यक्षगान और भारवाहक गणों की आकृतियाँ उन पर उकेरी गई हैं। खंभे के आधार भाग को कुंभों से डिज़ाइन किया गया है जबकि स्तंभ के शीर्ष पर अमलका एक कलश पर टिका हुआ है। विशाल हाथी की मूर्तियाँ आंतरिक कक्षों के किनारों की रक्षा करती हैं, जो रहस्यमय माहौल में और अधिक राजसीपन जोड़ती हैं।

देवरानी मंदिर पूर्व दिशा की ओर मुख किए हुए है, मंदिर में कोई महत्वपूर्ण शिलालेख नहीं है।पहले चरण पर उत्कीर्ण हैं और द्वारपाल की छवि ।

देवरानी मंदिर में गर्भगृह, अंतराल, मुखमंडप और खुला स्थान है, जहां सीढ़ियों के माध्यम से पहुंचा जा सकता है तथा एक बड़ी चंद्र शिला है।

मुखमंडप में एक सुंदर द्वार है, जिस पर नदी देवी की छवि बनी हुई है। मंदिर के अंदर जाने वाले द्वार में पाँच जटिल पैटर्न वाली आयताकार सीमाएँ हैं। आंतरिक कक्ष के दरवाजों पर कलात्मक रूप से फूलदार लताएँ उकेरी गई हैं। यहाँ शिव और पार्वती की कई मूर्तियाँ हैं जो कई भागों में टूटी हुई हैं। गर्भगृह का हिस्सा बहुत क्षतिग्रस्त है।

इस परिसर में रुद्र शिव की एक विशाल मूर्ति है। यह खड़ी मुद्रा में 2.70 मीटर ऊंची एक अखंड विशाल मूर्ति है। इसमें असामान्य प्रतीकात्मक विशेषताएं हैं जो शरीर के अंगों के रूप में मानव और शेर के सिर के साथ-साथ विभिन्न जानवरों को दर्शाती हैं। एक पगड़ी सांपों की जोड़ी से बनी है। मूर्ति को सांप की आकृति से सजाया गया है। अन्य जानवरों में मोर को कानों की सजावट के रूप में दर्शाया गया है। भौंहें और नाक छिपकलियों से बनी हैं। ठोड़ी केकड़े के आकार की है। दोनों कंधों पर मगरमच्छों का चित्रण है। शरीर के विभिन्न हिस्सों में सात देव मानव सिर उकेरे गए हैं। ऊपर वर्णित असामान्य चित्रण के कारण, इस मूर्ति की पहचान अभी भी विद्वानों के बीच विवाद का विषय है।

इस मुर्ति के बारे आप इतना तो जानते हैं या कभी आए होंगे तो मंदिर प्रांगण में लगे पुरातत्व विभाग द्वारा प्रदर्शित इतिहास जरूर पढ़े होंगे पर इनका वर्णन करने वाले पुरातत्वविदों या विभागीय अधिकारियों से कुछ हिस्सा छुट गया है जो आज आपको हम बताने वाले हैं जिनमें हैं मुर्ति में बना शिश्न का स्वरूप जो लम्बे शिर वाले बाघ के रूप में है व वहीं अण्डाशय दो कछुओं के रूप में दिखाई देता है तो वहीं मुर्ति में बने मानवीय मुछ मानवीय न होकर दो मीन, अर्थात दो मछलियों से मूछ बनाई गई हैं। वहीं भुजा में बाल हाथी का सुंड का आकार है तो मकर की आंखें शंख के रूप में बनाया गया है,तो वहीं जटाएं विभिन्न सर्प जाल सा प्रतीत होता है।

उक्त रूद्रशिव की मुर्ति भले ही पुरातत्व वेत्ताओं में विवादों का विषय हो परंतु छत्तीसगढ़ी भाषा में जस गीत में वर्षों से उक्त मुर्ति की विशेषता से जुड़ी शिव जी भक्ति गीत गाई जाती है जिसमें नाग का माला बिच्छू का कुण्डल, पिरपिटिया सर्प का जटा सहित विभिन्न पशु-पक्षियों व जन्तुओं को शिव के आभूषण के रूप में वर्णित किया गया है जिससे यह मुर्ति छत्तीसगढ़ में शिव जी का ही माना जाता है।

यह भी जानें 

ताला मंदिर प्रांगण में कई ऐसी मुर्तियां व चित्र उकेरे गए हैं जिनका सीधा संबंध पौराणिक कथाओं से है, इसमें विभिन्न मुद्राओं में योग करते हुए चित्र तो वहीं दूसरी ओर तपस्या की साधना से अमरत्व के समान दिव्य पुंज प्राप्त करते हुए योगियों की मुर्तियां भी दिखाई देती है जो अपने आप में अद्भुत रहस्यों से परिपूर्ण है व कहीं न कहीं यहां के शिव मंदिर पूर्ण रूप से शिवपुराण कथा के अनुसार ही बनाई गई परिलक्षित होती है।

तो वहीं एक खण्डित मुर्ति इस तरह दिखाई देती है मानो राजा बली वामनावतार को अपना सिर दान कर रहे हैं और भगवान विष्णु वामनावतार में उनके सिर पर पैर रखे हुए हैं,बलि के मुर्ति के सिर के बराबर पूरा एक पैर चित्रित किया गया है।

ताला एक ऐसी भूमि है, जो अतीत की खूबसूरत मूर्तियों से समृद्ध है, जो रहस्य में दबी हुई हैं। धरती माता के गर्भ से उत्खनन करके, ताला में ऐसी कई प्रसिद्ध मूर्तियाँ संरक्षित की गई हैं। उनमें से एक है श्री चतुर्भुज कार्तिकेय की विश्व प्रसिद्ध मूर्ति, जो मयूरासन की मुद्रा में तारकासुर का वध करते हैं। भगवान गणेश की एक शानदार ढंग से गढ़ी गई मूर्ति, जो शांत चंद्रमा की ओर निडर होकर आकाश में उड़ रही है, भी यहाँ देखी जा सकती है। द्विमुखी भगवान गणेश अपने दाँत पकड़े हुए हैं और अपार शक्ति और गर्व का अनुभव कर रहे हैं। अर्धनारीश्वर, उमा-महेश, नागपुरुष और अन्य यक्ष मूर्तियों की मूर्तियाँ एक सुंदर, ऐतिहासिक रूप से समृद्ध भूमि की महान किंवदंतियों और कहानियों को बताती हैं। शालभंजिका की एक दुर्लभ पत्थर की मूर्ति और कई अन्य मूर्तियाँ पूरे मंदिर में बिखरी हुई हैं। मंदिर के गर्भगृह में नृत्य करते हुए भस्मासुर,तो वहीं विभिन्न शिलाखंडों में शिव सती विवाह के चित्र उकेरे हुए हैं।
 वैज्ञानिकों और पुरातत्वविदों ने विभिन्न जटिल मूर्तियों पर लंबे समय तक विचार किया है और फिर भी, उनकी उत्पत्ति रहस्य में डूबी हुई लगती है।
अक्सर मेकला के पांडुवंशियों के अभिलेखों में उल्लिखित संगमग्राम के रूप में पहचाने जाने वाले ताला शिवनाथ और मनियारी नदी के संगम पर स्थित है। देवरानी-जेठानी मंदिरों के लिए सबसे प्रसिद्ध, ताला की खोज जेडी वेल्गर ने की थी, जो 1873-74 में प्रसिद्ध पुरातत्वविद् अलेक्जेंडर कनिंघम के सहायक थे। इतिहासकारों ने दावा किया है कि ताला गांव 7-8वीं शताब्दी ईस्वी पूर्व का है।
ताला के पास स्थित सरगांव गांव है जो धूम नाथ मंदिर का दावा करता है। इस मंदिर में भगवान किरारी के शिव स्मारक हैं पुरातत्ववेत्ता और इतिहासकार जटिल रूप से तैयार की गई पत्थर की नक्काशी को देखकर मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। गांव में देवरानी जेठानी मंदिर परिसर का एक मंदिर परिसर है जो आधे खंडहर अवस्था में है। ऐसा माना जाता है कि इसे शरभपुरिया राजवंश के शासक राजप्रसाद की दो रानियों ने बनवाया था। पुरातत्वविदों का मानना है कि यह 5वीं या 6वीं शताब्दी का है। देवरानी मंदिर लाल बलुआ पत्थर से बना है जो मुख्य रूप से गुप्तकालीन पुरातात्विक शैली का है। जबकि जेठानी मंदिर कुषाण शैली का है। हालाँकि, प्राप्त विभिन्न उत्खनन खंडहर और मूर्तिकला-शैली हमें बताती है कि ताला में शासन करने वाले विभिन्न राजवंश भगवान शिव के भक्त और शिव धर्म के प्रचारक थे। शायद इसीलिए आज भी शिव भक्त विभिन्न अनुष्ठान करने और पवित्र महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने के लिए यहाँ मंदिरों में आते हैं। भगवान शिव के भक्त यहाँ अपनी प्रार्थना करते हैं और अन्य उत्खनन स्थलों को देखना भी पसंद करते हैं।

Sunday, January 11, 2026

हुंकार विवेकानंद की : खेमेश्वर पुरी कृत



गरजा वह वन-सिंह सरीखा, सागर पार शिकागो में,
दहल उठे सब दिग्गज ज्ञानी, उस युवक के नारों में।
नहीं हाथ में अस्त्र-शस्त्र थे, न सेना का घेरा था,
पर उस गेरुए के भीतर, सूरज का सा सवेरा था॥


जब गूँजी वह कड़क स्वरूपी, "भाइयों और बहनों" की वाणी,
थम गई विश्व की धड़कन सारी, जैसे थम जाता तूफ़ानी।
हिला दिया पाश्चात्य दंभ को, पल भर की हुंकार में,
हिंदू धर्म का ध्वज गाड़ दिया, सात समंदर पार में॥


"कायरता ही मृत्यु है" - उसने रणभेरी फूँकी थी,
सोए हुए इस आर्यावर्त की, तकदीर उसने लिखी थी।
दुर्बलता को त्याग बना दो, वज्र जैसी अपनी देह,
शक्ति ही है धर्म जगत में, शक्ति ही है पुण्य-गेह॥


बाधाओं के पर्वत को जिसने, चरणों से कुचल दिया,
युगों-युगों की जड़ता को, पुरुषार्थ में बदल दिया।
वह सन्यासी नहीं मात्र, वह तो क्रांति का शोला था,
दहक उठा जो राष्ट्र-प्रेम में, साक्षात् महाकाल बोला था॥

उठो जवानों! गुरु-मंत्र यह, रगो-रगों में भर लो तुम,
विवेकानंद की ज्वाला बनकर, विश्व-विजय अब कर लो तुम।
मृत्यु डरे जिस वीर पुरुष से, वैसा तुम अवतार बनो,
भारत माता की रक्षा को, तुम तीखी तलवार बनो॥

।। स्वामी विवेकानंद पुरी जी महाराज की जय ।।

© खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
     गृहावधुत छत्तीसगढ़ 
     मो. 8120032834

स्वामी विवेकानंद

*गुरु-भक्ति और शिकागो का दिग्विजय*


तर्क की कसौटी पर जिसने, गुरु को भी था तौला,
पर स्पर्श मात्र से खुल गया, हृदय का हर एक झरोखा।
छोड़ मोह संसार का, गुरु चरणों में शीश झुकाया,
रामकृष्ण की ज्योति ने, नरेंद्र को 'विवेकानंद' बनाया॥
नरेंद्र की हर जिज्ञासा को, मिला परमहंस का उत्तर,
शून्य से जो निकला पथ, पहुँच गया वो शिव के घर।
गुरु की व्याधि को जिसने, अपनी देह पर झेला था,
वही शिष्य तो जगत-गुरु, बनकर अकेला निकला था॥


तंग गलियों से निकलकर, सागर पार वो वीर गया,
हाथों में उपनिषद लिए, भारत का वो धीर गया।
बिना विशेषण, बिना परिचय, बस गेरुआ एक चोला था,
पर जब वो बोला मंच से, जैसे साक्षात् ब्रह्म बोला था॥
"भाइयों और बहनों" कहकर, उसने ऐसा जादू फेरा,
मानो सदियों से बिछड़े, अपनों का हुआ हो बसेरा।
शून्य पर जब उसने बोला, सारा विश्व निहाल हुआ,
भारत की प्राचीन विधा का, फिर से नया कमाल हुआ॥


उसने कहा—"न दुर्बल बनो, न कायरता को पालो,"
भीतर के उस सोये हुए, सिंह को अब तुम जगा लो।
धर्म वही जो मानवता की, आँखों के आँसू पोंछ सके,
वही बड़ा जो दीन-दुखी के, हित के बारे में सोच सके॥


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*हुंकार विवेकानंद की (वीर रस)*

गरजा वह वन-सिंह सरीखा, सागर पार शिकागो में,
दहल उठे सब दिग्गज ज्ञानी, उस युवक के नारों में।
नहीं हाथ में अस्त्र-शस्त्र थे, न सेना का घेरा था,
पर उस गेरुए के भीतर, सूरज का सा सवेरा था॥


जब गूँजी वह कड़क स्वरूपी, "भाइयों और बहनों" की वाणी,
थम गई विश्व की धड़कन सारी, जैसे थम जाता तूफ़ानी।
हिला दिया पाश्चात्य दंभ को, पल भर की हुंकार में,
हिंदू धर्म का ध्वज गाड़ दिया, सात समंदर पार में॥


"कायरता ही मृत्यु है" - उसने रणभेरी फूँकी थी,
सोए हुए इस आर्यावर्त की, तकदीर उसने लिखी थी।
दुर्बलता को त्याग बना दो, वज्र जैसी अपनी देह,
शक्ति ही है धर्म जगत में, शक्ति ही है पुण्य-गेह॥


बाधाओं के पर्वत को जिसने, चरणों से कुचल दिया,
युगों-युगों की जड़ता को, पुरुषार्थ में बदल दिया।
वह सन्यासी नहीं मात्र, वह तो क्रांति का शोला था,
दहक उठा जो राष्ट्र-प्रेम में, साक्षात् महाकाल बोला था॥

उठो जवानों! गुरु-मंत्र यह, रगो-रगों में भर लो तुम,
विवेकानंद की ज्वाला बनकर, विश्व-विजय अब कर लो तुम।
मृत्यु डरे जिस वीर पुरुष से, वैसा तुम अवतार बनो,
भारत माता की रक्षा को, तुम तीखी तलवार बनो॥

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*क्रांति-सूर्य: विवेकानंद*

रक्त में जिसके उबाल था, वह नमन योग्य सन्यासी था,
मृगछाला वाला वह योगी, साक्षात् पूर्ण अविनाशी था।
ठोकर से जिसने पर्वत तोड़े, मिट्टी से वीर बनाए थे,
जिसकी एक हुंकार मात्र से, सोया पौरुष मुस्काए थे॥


वह बोला— "मृत्यु को सम्मुख देख, कभी तुम मत भागो,
कायरता के खोल को छोड़ो, सिंहों की भाँति अब जागो।"
शून्य को जिसने शिखर बना कर, अम्बर को झुकवा दिया,
भारत के स्वाभिमान को, पूरी दुनिया में चमका दिया॥


तर्क-बुद्धि की ढाल हाथ में, ज्ञान की नंगी तलवार थी,
काट दिया अज्ञान का तमस, ऐसी उसकी धार थी।
नहीं थका वह, नहीं झुका वह, बढ़ता गया तूफ़ानों में,
अग्नि-बीज वह बोकर आया, पश्चिम के मैदानों में॥


"उठो ओ भारत के पुत्रों!" वह स्वर आज भी गूँजता है,
जो कर्मवीर बन बढ़ता है, उसको ही जग पूजता है।
हृदय में जिसके आग लगी हो, और माथे पर चंदन हो,
वही शिष्य विवेकानंद का, जिसका राष्ट्र ही वंदन हो॥

वह गेरुआ नहीं वस्त्र मात्र, वह धधकती एक ज्वाला थी,
पराधीन भारत के गले में, वह क्रांति की माला थी।
वह मरकर भी अमर हो गया, हममें प्राण फूँककर,
शीश नवाता है जग सारा, उसके चरणों में झुककर॥

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*युगपुरुष विवेकानंद: चेतना का शंखनाद*

नरेंद्र से जो बना विवेकानंद, वो ज्ञान का सागर था,
हृदय में जिसके करुणा थी, और भुजाओं में बल प्रखर था।
भटक रहा था जो सत्य की खोज में, व्याकुल होकर दर-दर,
रामकृष्ण के चरणों में मिला उसे, साक्षात् ईश्वर का घर॥


शिकागो की उस सभा में, जब गूँजा 'भाइयों और बहनों',
स्तब्ध रह गया विश्व देख, भारत के ज्ञान के गहनों।
खंडित थे जो विचार, उन्हें एकात्म भाव से जोड़ा,
भ्रम और पाखंड के हर मिथक को, पल भर में तोड़ा॥


"उठो, जागो और लक्ष्य की प्राप्ति तक रुको नहीं,"
यह मंत्र दिया उस वीर ने, जो थका कभी झुका नहीं।
दरिद्र-नारायण की सेवा को ही, परम धर्म बतलाया,
सोए हुए इस राष्ट्र को, पौरुष का पाठ पढ़ाया॥


तर्क और विज्ञान का, अध्यात्म से मेल कराया,
पश्चिम की चकाचौंध को, पूर्व का दर्पण दिखलाया।
वह अल्पायु का संत, जो अमर कहानी लिख गया,
भारत की सोई आत्मा में, स्वाभिमान भर गया॥


 खेमेश्वर पुरी गोस्वामी 
  गृहावधूत ,छत्तीसगढ़
  मो. 8120032834

Saturday, January 3, 2026

छेरछेरा मया कोठी

🌾 छेरछेरा: माई कोठी 🌾
पुन्नी के चंदा हासय, अगास मा छाय हे उँजियारी,
कोठी मा धान भरे हे, मगन हे किसान खेमेश्वर भारी।
नवा फसल के नवा खुसी, नवा उमंग के दिन आए,
छेरछेरा के पुन्नी हा, सब बर सुग्घर संदेश लाए।
छेरछेरा... छेरछेरा! अउ कोनो झन राहय घेरा-बेरा,
निकालव धान ला माई कोठी से, अउ झारव अपन मया के डेरा!

लइका मन के सोर सुंनौ, बाजत हे डंडा अउ डफली,
गली-गली मा गूँजत हे, ए मधुर धुन ह कतकी सुघरी।
कोनो बन गे हे जोकर, कोनो धरे हे झोला हाथ मा,
खुसी के परब मनावत हन, हम सब झन आज साथ मा।
अन्न के दान ह सबले बड़े, इही हमर छत्तीसगढ़ी पहिचान,
जेकर मन मा दया बसे, ओही ह सही मा इनसान।
बड़-छोट के भेद मिटावन, सब ला गले लगावन गा,
ए छेरछेरा के तिहार मा, दान के गंगा बहावन गा।
छेरछेरा... छेरछेरा! अउ कोनो झन राहय घेरा-बेरा,
निकालव धान ला माई कोठी से, अउ झारव अपन मया के डेरा!

© खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
छत्तीसगढ़िया पत्रकार, छत्तीसगढ़ 
मो. - 8120032834

बलिदानी वीर नारायण सिंह : समर्पित कविता

सोनाखान का शेर : वीर नारायण सिंह


महानदी की लहरों सा, जिसका पावन स्वाभिमान था,
सोनाखान की माटी का, जो बेटा बड़ा महान था,
दुर्भिक्ष पड़ा जब धरती पर, वह संकट का संबल बना,
गरीबों की भूख मिटाने को, जो काल का भी काल बना।

संपूर्ण क्रांति का छत्तीसगढ़ में, सच्चा स्वर गुंजार नहीं होगा ॥
जब तक इस धरती पर पैदा, फिर से नारायण नहीं होगा ॥१॥

बिंझवारों का गौरव था, वह शोषण का संहारक था,
अत्याचारी फिरंगियों का, वह वीर बड़ा विदारक था,
जनता के हित खातिर जिसने, अन्न के ताले तोड़ दिए,
सोने की चिड़िया के खातिर, सुख के बंधन छोड़ दिए।

शोषक उन गोरे अंग्रेजों का, अंत कभी स्वीकार नहीं होगा ॥
जब तक इस धरती पर पैदा, फिर से नारायण नहीं होगा ॥२॥

अग्नि स्तंभ सा खड़ा रहा, वह मौत से कभी डरा नहीं,
जो देश हेतु मर मिटता है, वह वीर कभी भी मरा नहीं,
फांसी का फंदा चूम लिया, भारत माता की जय कहकर,
चमक उठा वह बलिदान का, एक अमिट सितारा बनकर।

बलिदानों की इस गाथा का, कोई विकल्प तैयार नहीं होगा ॥
जब तक इस धरती पर पैदा, फिर से नारायण नहीं होगा ॥३॥

स्वाभिमान की रक्षा हित, जिसने दे दी अपनी कुर्बानी,
छत्तीसगढ़ की माटी गाती, आज भी उसकी अमर कहानी,
मुक्त हृदय से हम सब उसका, आओ अभिनंदन कर लें,
सोनाखान के उस बेटे को, हम शत-शत वंदन कर लें।

यह राष्ट्र-तिरंगा भारत का, तब तक आबाद नहीं होगा ॥
जब तक इस धरती पर पैदा, फिर से नारायण नहीं होगा ॥४॥

                ©पं.खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
                   छत्तीसगढ़िया, छत्तीसगढ़
                     मो. 8120032834

Tuesday, December 30, 2025

नव वर्ष का स्वागत

सुनहरी धूप का आँचल, नया आकाश आया है,
पुरानी याद को तज कर, नया विश्वास आया है।
मिले खुशियाँ नए पथ पर, मिटे सब द्वेष के साये,
सफलता चूम ले माथा, हृदय में हर्ष भर जाए।
दुआ है हर कदम पर अब, नवल मुस्कान खिलती हो,
मिले जो लक्ष्य आँखों में, वही मंजिल भी मिलती हो।
समय की रश्मियों से हम, नया इतिहास लिखेंगे,
उमंगों के नए रंग अब, चहुँ ओर ही दिखेंगे।


© खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®

कानून बनाने वाले : बस शोर ही मचाते हैं

सेल्फी खिंचवाते रहे, रिबन कटवाते रहे, मुख्य अतिथि बन, मंच चमकाते हैं। क्षेत्र में न दिखें कभी, दिल्ली में विलासी बनें, जनता की भीड़ देख, हाथ ...