*गुरु-भक्ति और शिकागो का दिग्विजय*
तर्क की कसौटी पर जिसने, गुरु को भी था तौला,
पर स्पर्श मात्र से खुल गया, हृदय का हर एक झरोखा।
छोड़ मोह संसार का, गुरु चरणों में शीश झुकाया,
रामकृष्ण की ज्योति ने, नरेंद्र को 'विवेकानंद' बनाया॥
नरेंद्र की हर जिज्ञासा को, मिला परमहंस का उत्तर,
शून्य से जो निकला पथ, पहुँच गया वो शिव के घर।
गुरु की व्याधि को जिसने, अपनी देह पर झेला था,
वही शिष्य तो जगत-गुरु, बनकर अकेला निकला था॥
तंग गलियों से निकलकर, सागर पार वो वीर गया,
हाथों में उपनिषद लिए, भारत का वो धीर गया।
बिना विशेषण, बिना परिचय, बस गेरुआ एक चोला था,
पर जब वो बोला मंच से, जैसे साक्षात् ब्रह्म बोला था॥
"भाइयों और बहनों" कहकर, उसने ऐसा जादू फेरा,
मानो सदियों से बिछड़े, अपनों का हुआ हो बसेरा।
शून्य पर जब उसने बोला, सारा विश्व निहाल हुआ,
भारत की प्राचीन विधा का, फिर से नया कमाल हुआ॥
उसने कहा—"न दुर्बल बनो, न कायरता को पालो,"
भीतर के उस सोये हुए, सिंह को अब तुम जगा लो।
धर्म वही जो मानवता की, आँखों के आँसू पोंछ सके,
वही बड़ा जो दीन-दुखी के, हित के बारे में सोच सके॥
__________________________________________
*हुंकार विवेकानंद की (वीर रस)*
गरजा वह वन-सिंह सरीखा, सागर पार शिकागो में,
दहल उठे सब दिग्गज ज्ञानी, उस युवक के नारों में।
नहीं हाथ में अस्त्र-शस्त्र थे, न सेना का घेरा था,
पर उस गेरुए के भीतर, सूरज का सा सवेरा था॥
जब गूँजी वह कड़क स्वरूपी, "भाइयों और बहनों" की वाणी,
थम गई विश्व की धड़कन सारी, जैसे थम जाता तूफ़ानी।
हिला दिया पाश्चात्य दंभ को, पल भर की हुंकार में,
हिंदू धर्म का ध्वज गाड़ दिया, सात समंदर पार में॥
"कायरता ही मृत्यु है" - उसने रणभेरी फूँकी थी,
सोए हुए इस आर्यावर्त की, तकदीर उसने लिखी थी।
दुर्बलता को त्याग बना दो, वज्र जैसी अपनी देह,
शक्ति ही है धर्म जगत में, शक्ति ही है पुण्य-गेह॥
बाधाओं के पर्वत को जिसने, चरणों से कुचल दिया,
युगों-युगों की जड़ता को, पुरुषार्थ में बदल दिया।
वह सन्यासी नहीं मात्र, वह तो क्रांति का शोला था,
दहक उठा जो राष्ट्र-प्रेम में, साक्षात् महाकाल बोला था॥
उठो जवानों! गुरु-मंत्र यह, रगो-रगों में भर लो तुम,
विवेकानंद की ज्वाला बनकर, विश्व-विजय अब कर लो तुम।
मृत्यु डरे जिस वीर पुरुष से, वैसा तुम अवतार बनो,
भारत माता की रक्षा को, तुम तीखी तलवार बनो॥
__________________________________________
*क्रांति-सूर्य: विवेकानंद*
रक्त में जिसके उबाल था, वह नमन योग्य सन्यासी था,
मृगछाला वाला वह योगी, साक्षात् पूर्ण अविनाशी था।
ठोकर से जिसने पर्वत तोड़े, मिट्टी से वीर बनाए थे,
जिसकी एक हुंकार मात्र से, सोया पौरुष मुस्काए थे॥
वह बोला— "मृत्यु को सम्मुख देख, कभी तुम मत भागो,
कायरता के खोल को छोड़ो, सिंहों की भाँति अब जागो।"
शून्य को जिसने शिखर बना कर, अम्बर को झुकवा दिया,
भारत के स्वाभिमान को, पूरी दुनिया में चमका दिया॥
तर्क-बुद्धि की ढाल हाथ में, ज्ञान की नंगी तलवार थी,
काट दिया अज्ञान का तमस, ऐसी उसकी धार थी।
नहीं थका वह, नहीं झुका वह, बढ़ता गया तूफ़ानों में,
अग्नि-बीज वह बोकर आया, पश्चिम के मैदानों में॥
"उठो ओ भारत के पुत्रों!" वह स्वर आज भी गूँजता है,
जो कर्मवीर बन बढ़ता है, उसको ही जग पूजता है।
हृदय में जिसके आग लगी हो, और माथे पर चंदन हो,
वही शिष्य विवेकानंद का, जिसका राष्ट्र ही वंदन हो॥
वह गेरुआ नहीं वस्त्र मात्र, वह धधकती एक ज्वाला थी,
पराधीन भारत के गले में, वह क्रांति की माला थी।
वह मरकर भी अमर हो गया, हममें प्राण फूँककर,
शीश नवाता है जग सारा, उसके चरणों में झुककर॥
_______________________________________
*युगपुरुष विवेकानंद: चेतना का शंखनाद*
नरेंद्र से जो बना विवेकानंद, वो ज्ञान का सागर था,
हृदय में जिसके करुणा थी, और भुजाओं में बल प्रखर था।
भटक रहा था जो सत्य की खोज में, व्याकुल होकर दर-दर,
रामकृष्ण के चरणों में मिला उसे, साक्षात् ईश्वर का घर॥
शिकागो की उस सभा में, जब गूँजा 'भाइयों और बहनों',
स्तब्ध रह गया विश्व देख, भारत के ज्ञान के गहनों।
खंडित थे जो विचार, उन्हें एकात्म भाव से जोड़ा,
भ्रम और पाखंड के हर मिथक को, पल भर में तोड़ा॥
"उठो, जागो और लक्ष्य की प्राप्ति तक रुको नहीं,"
यह मंत्र दिया उस वीर ने, जो थका कभी झुका नहीं।
दरिद्र-नारायण की सेवा को ही, परम धर्म बतलाया,
सोए हुए इस राष्ट्र को, पौरुष का पाठ पढ़ाया॥
तर्क और विज्ञान का, अध्यात्म से मेल कराया,
पश्चिम की चकाचौंध को, पूर्व का दर्पण दिखलाया।
वह अल्पायु का संत, जो अमर कहानी लिख गया,
भारत की सोई आत्मा में, स्वाभिमान भर गया॥
खेमेश्वर पुरी गोस्वामी
गृहावधूत ,छत्तीसगढ़
मो. 8120032834