वो अब नावों में चढ़कर, जल-भराव देखने आते हैं
यहाँ कंक्रीट के जंगल खड़े हर मोड़ पर कर दिए,
जो कुदरती थे बहने के, वो सारे रास्ते भर दिए।
दिखाकर 'स्मार्ट सिटी' का हसीं ख़्वाब इस ज़माने को,
हमारे तैरते शहरों को, बस तालाब कर दिए।
करोड़ों रुपए नालों की सफाई में बहाते हैं,
नतीजा 'ढाक के तीन पात' ही हर बार लाते हैं।
ये प्रशासनिक विफलता है कि पानी थम नहीं पाता,
मगर वो आपदा कह कर, ज़िम्मेदारी छुपाते हैं।
तराशा है शहर ऐसा कि मिट्टी अब बची ही नहीं,
जल संचयन और सीवरेज की सुध किसी ने ली नहीं।
बनाए फ्लाईओवर और इमारत तो ऊँची की,
मगर बुनियादी ढाँचे की, कभी चिंता कोई की नहीं।
वो वादे खोखले करके, हमें हर बार छलते हैं,
जलमग्न इन गलियों में, हमारे ख़्वाब गलते हैं।
बदलते मौसमों को दोष देकर बच निकलते हैं,
मगर हम हर बरस इस त्रासदी की आग में जलते हैं।
बना कर योजना काग़ज़ पे, वो अक्सर मुस्कुराते हैं,
मगर पहली ही बारिश में, सभी वादे बह जाते हैं।
जो कहते थे कि हम शहर को पेरिस बना देंगे,
वो अब नावों में चढ़कर, जल-भराव देखने आते हैं।
सर्वाधिकार सुरक्षित
खेमेश्वर पुरी गोस्वामी
मुंगेली छ.ग. ८१२००३२८३४
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