महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम् (भुजंगप्रयात छंद)
१. गिरीशस्य पुत्री गिरीशस्य गेहे, सुमेदा प्रदात्री सुमेदा सदेहे।
विचित्रैव लीला विचित्रा विलासा, नता विष्णुना सा सदा विष्णुपासा॥
२. सुरैर्वन्दिता चामरैः पूजिता सा, विनाशा विनाशा विनाशोदिता सा।
त्रिलोकी भवा पोषिता विष्णुमाया, दया सिंधु रूपा सदा विश्वजाया॥
३. दनुर्वैरिणी दैत्यदंभी कृता सा, विनाशा विनाशा विनाशे स्थिता सा।
रमे भद्रकाली महानीलवर्णा, सदा विश्वमाता भवा दु:खहर्णा॥
४. जगन्मातृका शैलजा शैलपुत्री, सदानन्ददात्री सुहासा सुमित्री।
प्रपन्नाभये शैलजा शैलकान्ता, विनाशा विनाशा सुरेन्द्रस्य हन्ता॥
५. महाविघ्ननाशा महाशक्तिरूपा, विनाशा विनाशा सदा चारुरूपा।
विनाशा विनाशा विनाशा विनाशा, विनाशा विनाशा विनाशा विनाशा॥ (शत्रु-संहारक भाव)
६. रणे युद्धमत्ता सुदुर्गा सुवीरा, महाशक्तिरूपा महातेजधीरा।
त्रिलोकी प्रपूज्या सदा विश्वमाता, विनाशा विनाशा विनाशा विनाशा॥
७. इयं शैलपुत्री सदा विश्वरम्या, सुरैर्वन्दिता सा सदा पुण्यगम्या।
विनाशा विनाशा विनाशा विनाशा, जयं देहि देवि सदा विश्वदासा॥
८. महाकालरूपा महाकालहन्त्री, विनाशा विनाशा विनाशा प्रदात्री।
सुपुष्पै: सदा पूजिता विश्वमाता, जयं देहि देवि सदा शैलजाता॥
॥ इति -खेमेश्वरपुरी-गोस्वामी-विरचिता महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम् सम्पूर्णा ॥
भावार्थ
१. गिरीशस्य पुत्री गिरीशस्य गेहे...
जो हिमालय (गिरीश) की पुत्री हैं और हिमालय के ही घर में निवास करती हैं, जो परम बुद्धि (सुमेधा) प्रदान करने वाली हैं और साक्षात देह धारण किए हुए हैं। जिनकी लीलाएँ विचित्र हैं और विलास अद्भुत हैं, जो सदैव भगवान विष्णु द्वारा वंदित हैं और उन्हीं की शक्ति (विष्णुपासा) हैं, मैं उन देवी को प्रणाम करता हूँ।
२. सुरैर्वन्दिता चामरैः पूजिता सा...
देवताओं द्वारा वंदित और चमर से पूजी जाने वाली, दुष्टों का विनाश करने वाली, और विनाश के समय स्वयं प्रलय बनकर खड़ी होने वाली देवी। जो तीनों लोकों का भरण-पोषण करने वाली विष्णुमाया हैं और करुणा का सागर हैं, वही संपूर्ण जगत की जननी हैं।
३. दनुर्वैरिणी दैत्यदंभी कृता सा...
दानवों की शत्रु और दैत्यों का दंभ चूर करने वाली, विनाश के समय विनाश रूप में स्थित रहने वाली। जो लक्ष्मी (रमे) स्वरूपा, भद्रकाली और गहरे नीले रंग वाली हैं, वही विश्व की माता और संसार के दुखों को हरने वाली हैं।
४. जगन्मातृका शैलजा शैलपुत्री...
जगत की माता, पर्वत से उत्पन्न (शैलजा), शैलपुत्री, सदा आनंद देने वाली, सुंदर मुस्कान वाली और सुमित्र (भक्तों की अच्छी मित्र) हैं। जो शरणागत को अभय देने वाली और हिमालय की शोभा हैं, वे दुष्टों का विनाश करने वाली और सुरेन्द्र (इन्द्र) के शत्रुओं को मारने वाली हैं।
५. महाविघ्ननाशा महाशक्तिरूपा...
सभी बड़े विघ्नों का नाश करने वाली, महाशक्ति के रूप में स्थित, सदा सुंदर रूप धारण करने वाली। हे देवी! आप दुष्टों का विनाश करने वाली हैं (यहाँ 'विनाशा' का बार-बार प्रयोग शत्रु-संहार और दुष्ट प्रवृत्तियों के नाश के संकल्प को दर्शाता है)।
६. रणे युद्धमत्ता सुदुर्गा सुवीरा...
रणभूमि में युद्ध के लिए उन्मत्त, परम दुर्गा (जिसे कठिनता से पाया जा सके), महाशक्तिशाली, महातेजस्वी और धैर्यवान। तीनों लोकों द्वारा पूजी जाने वाली और विश्व की माता, आप दुष्टों का संहार करने वाली हैं।
७. इयं शैलपुत्री सदा विश्वरम्या...
यह हिमालय की पुत्री सदैव संपूर्ण विश्व में रमण करने वाली और पुण्य कर्मों से प्राप्त होने वाली हैं। हे देवी! आप दुष्टों का विनाश करें। आप विश्व की दासी (भक्तों) को सदैव विजय प्रदान करें।
८. महाकालरूपा महाकालहन्त्री...
आप महाकाल का स्वरूप हैं और महाकाल (समय/मृत्यु) का भी संहार करने वाली हैं। आप ही विनाशक हैं और आप ही सुख प्रदान करने वाली हैं। सुंदर पुष्पों से सदैव पूजी जाने वाली हे विश्वमाता! हे शैलजा! आप हमें सदैव विजय प्रदान करें।
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