Friday, June 19, 2026

योग का प्रकाश

​योग का प्रकाश

​तन-मन को जो करे स्वस्थ, योग वही वरदान है,
सच्ची शांति और खुशी का, यही सही विधान है।

बीमारी को दूर भगाए, नई शक्ति का संचार करे,
जीवन की हर बाधा को, यह सहज ही पार करे।

साँसों की लय में सिमटी, ब्रह्मांड की ये शक्ति है,
स्वयं को खुद से जोड़ने की, अनमोल यह भक्ति है।

आओ सब मिलकर अपनाएं, योग का यह पावन मार्ग,
योग ही तो है स्वस्थ जीवन का, सबसे सुंदर स्वर्ग।
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तन को दे नव स्फूर्ति,मन को दे शांति अपार।
योग ही है जीवन का,सच्चा सुखी आधार।

रोग मिटाए योग हमारा,शक्ति नई जगाता है।
स्वस्थ सुखी जीवन जीने का,राह यही दिखाता है।

सर्वाधिकार सुरक्षित : खेमेश्वर पुरी गोस्वामी 
मुंगेली, छत्तीसगढ़,८१२००३२८३४

Monday, June 15, 2026

॥ श्री हनुमत महात्म्य स्तुति ॥

     ॥ श्री हनुमत महात्म्य स्तुति ॥

अंजना-सुत विख्यातं, वायुपुत्रं महाबलम्।
रामभक्ति-रतं वीरं, नौमि संकट-भंजनम् ॥१॥

बालरूपेण गगनं, सूर्यमिन्दुं च मेनिरे।
फलमद्य विधायाशु, मुनि-शापं दधौ मुदा ॥२॥

वानराणां प्रवीणं तं, सुग्रीव-सचिवं शुभम्।
राम-लक्ष्मण-भक्तं तं, प्रणमामि मुहुर्मुहुः ॥३॥

सागरं लङ्घितं येन, विभीषण-विशारदम्।
लंका-दाहं कृतं येन, सीता-संदेश-हारकम् ॥४॥

संजीवन-धरं धीरं, द्रोण-पर्वत-धारिणम्।
लक्ष्मण-प्राण-दातारं, कालनेमि-विनाशनम् ॥५॥

राम-कार्य-रताकारं, स्वर्ण-कायोपमं प्रभुम्।
रावणस्य भयं येन, कृतं तं वीरमर्चये ॥६॥

सीता-रामाज्ञया नित्यं, राम-नाम-परायणम्।
ब्रह्मचारी महातेजा, सर्व-पाप-विनाशनम् ॥७॥

विश्वरूपं महावीर्यं, रामदूतं मनोहरम्।
सदा भक्ताभयकरं, हनुमन्तं नमाम्यहम् ॥८॥

॥ इति -खेमेश्वर-पुरी-गोस्वामी-विरचिता श्री हनुमत महात्म्य स्तुतिः संपूर्णा ॥

सर्वाधिकार सुरक्षित : खेमेश्वर पुरी गोस्वामी 
मुंगेली, छत्तीसगढ़,८१२००३२८३४

Sunday, June 14, 2026

॥ श्री राम संक्षेप रामायण स्तुति ॥

॥ श्री राम संक्षेप रामायण स्तुति ॥

अयोध्ययां सुजातोऽयं, पुत्रो दशरथस्य च।
विश्वामित्रमुनीन्द्रेण, रक्षितो हि महामखः॥ १॥

सीतास्वयंवरं दृष्ट्वा, भक्त्वा चापं महेश्वरम्।
विवाहं च विधायैव, गतो हि मिथिलां मुदा॥ २॥

कैकेय्या वरयाचेऽथ, वनवासो हि तस्य वै।
लक्ष्मणस्तेन सार्धं तु, जगाम च वनं तदा॥ ३॥

मायामृगवधार्थं तु, सीतापहरणं तदा।
हनुमन्तं समासाद्य, सुग्रीवेण सखा कृतः॥ ४॥

सेतुबन्धनं कृत्वा, लङ्कायां च प्रधर्षितम्।
रावणं सानुजं हत्वा, प्राप राज्यं सुखावहम्॥ ५॥

तमेवं रामचन्द्रं तं, भजामि सुगुणाकरम्।
प्रसन्नो भव मे देव, पाहि मां च जगत्पते॥ ६॥

॥ इति -खेमेश्वर-पुरी-गोस्वामी-विरचिता श्री राम स्तुतिः संपूर्णा ॥



अनुवाद:
अयोध्या में दशरथ के पुत्र के रूप में आपका जन्म हुआ और विश्वामित्र मुनि के यज्ञ की आपने रक्षा की।

आपने शिवजी का धनुष तोड़कर सीताजी से विवाह किया और मिथिला से प्रसन्नतापूर्वक लौटे।

कैकेयी के वरदान के कारण आपको वनवास मिला और लक्ष्मण के साथ आप वन को गए।

मायावी मृग के कारण सीता का अपहरण हुआ, फिर आपने हनुमान जी को प्राप्त किया और सुग्रीव से मित्रता की।

सेतुबंध बनाकर लंका पर विजय प्राप्त की, रावण का वध किया और पुनः अयोध्या आकर सुखद राज्य संभाला।

ऐसे गुणों के भंडार श्री रामचन्द्र जी को मैं भजता हूँ। हे देव! हे जगत्पति! आप मुझ पर प्रसन्न हों और मेरी रक्षा करें।


सर्वाधिकार सुरक्षित : खेमेश्वर पुरी गोस्वामी 
मुंगेली, छत्तीसगढ़,८१२००३२८३४

महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम् (भुजंगप्रयात छंद)

महिषासुरमर्दिनी  स्तोत्रम् (भुजंगप्रयात छंद) 

​१. गिरीशस्य पुत्री गिरीशस्य गेहे, सुमेदा प्रदात्री सुमेदा सदेहे।
विचित्रैव लीला विचित्रा विलासा, नता विष्णुना सा सदा विष्णुपासा॥

​२. सुरैर्वन्दिता चामरैः पूजिता सा, विनाशा विनाशा विनाशोदिता सा।
त्रिलोकी भवा पोषिता विष्णुमाया, दया सिंधु रूपा सदा विश्वजाया॥

​३. दनुर्वैरिणी दैत्यदंभी कृता सा, विनाशा विनाशा विनाशे स्थिता सा।
रमे भद्रकाली महानीलवर्णा, सदा विश्वमाता भवा दु:खहर्णा॥

​४. जगन्मातृका शैलजा शैलपुत्री, सदानन्ददात्री सुहासा सुमित्री।
प्रपन्नाभये शैलजा शैलकान्ता, विनाशा विनाशा सुरेन्द्रस्य हन्ता॥

​५. महाविघ्ननाशा महाशक्तिरूपा, विनाशा विनाशा सदा चारुरूपा।
विनाशा विनाशा विनाशा विनाशा, विनाशा विनाशा विनाशा विनाशा॥ (शत्रु-संहारक भाव)

​६. रणे युद्धमत्ता सुदुर्गा सुवीरा, महाशक्तिरूपा महातेजधीरा।
त्रिलोकी प्रपूज्या सदा विश्वमाता, विनाशा विनाशा विनाशा विनाशा॥

​७. इयं शैलपुत्री सदा विश्वरम्या, सुरैर्वन्दिता सा सदा पुण्यगम्या।
विनाशा विनाशा विनाशा विनाशा, जयं देहि देवि सदा विश्वदासा॥

​८. महाकालरूपा महाकालहन्त्री, विनाशा विनाशा विनाशा प्रदात्री।
सुपुष्पै: सदा पूजिता विश्वमाता, जयं देहि देवि सदा शैलजाता॥

॥ इति -खेमेश्वरपुरी-गोस्वामी-विरचिता महिषासुरमर्दिनी  स्तोत्रम् सम्पूर्णा ॥

भावार्थ
१. गिरीशस्य पुत्री गिरीशस्य गेहे...
जो हिमालय (गिरीश) की पुत्री हैं और हिमालय के ही घर में निवास करती हैं, जो परम बुद्धि (सुमेधा) प्रदान करने वाली हैं और साक्षात देह धारण किए हुए हैं। जिनकी लीलाएँ विचित्र हैं और विलास अद्भुत हैं, जो सदैव भगवान विष्णु द्वारा वंदित हैं और उन्हीं की शक्ति (विष्णुपासा) हैं, मैं उन देवी को प्रणाम करता हूँ।

२. सुरैर्वन्दिता चामरैः पूजिता सा...
देवताओं द्वारा वंदित और चमर से पूजी जाने वाली, दुष्टों का विनाश करने वाली, और विनाश के समय स्वयं प्रलय बनकर खड़ी होने वाली देवी। जो तीनों लोकों का भरण-पोषण करने वाली विष्णुमाया हैं और करुणा का सागर हैं, वही संपूर्ण जगत की जननी हैं।

३. दनुर्वैरिणी दैत्यदंभी कृता सा...
दानवों की शत्रु और दैत्यों का दंभ चूर करने वाली, विनाश के समय विनाश रूप में स्थित रहने वाली। जो लक्ष्मी (रमे) स्वरूपा, भद्रकाली और गहरे नीले रंग वाली हैं, वही विश्व की माता और संसार के दुखों को हरने वाली हैं।

४. जगन्मातृका शैलजा शैलपुत्री...
जगत की माता, पर्वत से उत्पन्न (शैलजा), शैलपुत्री, सदा आनंद देने वाली, सुंदर मुस्कान वाली और सुमित्र (भक्तों की अच्छी मित्र) हैं। जो शरणागत को अभय देने वाली और हिमालय की शोभा हैं, वे दुष्टों का विनाश करने वाली और सुरेन्द्र (इन्द्र) के शत्रुओं को मारने वाली हैं।

५. महाविघ्ननाशा महाशक्तिरूपा...
सभी बड़े विघ्नों का नाश करने वाली, महाशक्ति के रूप में स्थित, सदा सुंदर रूप धारण करने वाली। हे देवी! आप दुष्टों का विनाश करने वाली हैं (यहाँ 'विनाशा' का बार-बार प्रयोग शत्रु-संहार और दुष्ट प्रवृत्तियों के नाश के संकल्प को दर्शाता है)।

६. रणे युद्धमत्ता सुदुर्गा सुवीरा...
रणभूमि में युद्ध के लिए उन्मत्त, परम दुर्गा (जिसे कठिनता से पाया जा सके), महाशक्तिशाली, महातेजस्वी और धैर्यवान। तीनों लोकों द्वारा पूजी जाने वाली और विश्व की माता, आप दुष्टों का संहार करने वाली हैं।

७. इयं शैलपुत्री सदा विश्वरम्या...
यह हिमालय की पुत्री सदैव संपूर्ण विश्व में रमण करने वाली और पुण्य कर्मों से प्राप्त होने वाली हैं। हे देवी! आप दुष्टों का विनाश करें। आप विश्व की दासी (भक्तों) को सदैव विजय प्रदान करें।

८. महाकालरूपा महाकालहन्त्री...
आप महाकाल का स्वरूप हैं और महाकाल (समय/मृत्यु) का भी संहार करने वाली हैं। आप ही विनाशक हैं और आप ही सुख प्रदान करने वाली हैं। सुंदर पुष्पों से सदैव पूजी जाने वाली हे विश्वमाता! हे शैलजा! आप हमें सदैव विजय प्रदान करें।

सर्वाधिकार सुरक्षित :  खेमेश्वर पुरी गोस्वामी 
मुंगेली, छत्तीसगढ़,८१२००३२८३४

॥ श्री शिव स्तुति ॥ शार्दूलविक्रीडित,वसन्ततिलका छंद मिश्रित

​॥ श्री शिव स्तुति ॥

​जटाजालमध्ये वहति सुरनदी फेनधवला,
फणीन्द्रैः कण्ठालङ्कृतमिह विकालं च वपुषम्।
डमरू-ध्वनि-नादैरथ चण्ड-ताण्डव-रतं,
नमामि त्वं साक्षाच्छिवं महाकाल-रूपम् ॥१॥

​जटाजूटे गङ्गा लहरि-लहरी-खेलन-वती,
ललाटे चन्द्रोऽयं मलयज-सुगन्धोऽमृत-करः।
प्रदीप्ताग्नि-ज्वाला दहति मदनं भाल-विवरे,
प्रसीद त्वं देवं मम हृदये ध्यामि सततम ॥२॥

​गिरिराज-सुता-चित्त-रञ्जन-परं, सुखाधार-शिवं,
कृपा-दृष्टि-पातेन हरसि सकलं दुःख-जालम्।
तजित्वैव संसार-भीतिं विहाय, अहमेव सदा,
भजे विश्वनाथं हरं मोक्षदं दिव्य-रूपम् ॥३॥

​स्फुरन्मणिरत्न-प्रभा-रञ्जितं, दिशो वदनं यस्य,
गजाजिन-वस्त्रं तद्द्भुतं रूपमस्य सुशोभितम्।
विभूति-विलेपं धत्ते भूतनाथः स्वयं यः,
अचिन्त्यं सुभावं भजे शङ्करं देव-देवम् ॥४॥

​सुरेन्द्र-मुनीन्द्राः नतं यस्य पादं, धरन्तीह रेणुं,
जटाजूट-धृत्वा शशि-चकोर-कलां मोदमानाः।
भुजङ्गैः सुबद्धोऽथ कण्ठे विराजन्,
भजे तं शिवं शान्त-भावं मनोऽभिष्ट-दं मे ॥५॥

​ललाटे ज्वलन्ती ज्वलज्ज्वालमाला,
महाकाल-तेजः क्षयं कामदेवम्।
सुर-सिद्ध-संघे नतं तं सदा वै,
जटा-गुल्म-धारी हरं नूतनाहम् ॥६॥

​धगद्-धगद्-धगद्-धगद्-ज्वलच्छिखा-भाले,
मदनस्य बाणैः पुनरहुतिं ददाति।
गौरी-कुच-चित्र-लेखन-कुशलोऽसौ,
शिल्पी-वरोऽयं हरः प्राण-रूपः ॥७॥

​नव-मेघ-श्यामं तव कण्ठ-मूलं,
अमावास्या-वत् कान्ति-युक्तं च नित्यम्।
गजासुर-हन्तारं गङ्गा-धरं तं,
जगदाधार-रूपं भजे दुःख-शमनम् ॥८॥

​नीलोत्पल-दल-श्यामं कण्ठमस्य विलोक्यते,
कामस्य त्रिपुरस्यापि विनाशी देव-पूजितः।
दक्ष-यज्ञ-विनाशी च अन्तकस्यापि कालकः,
भजेऽहं भव-भीति-हारिणमखण्डं शिवं सदा ॥९॥

​मङ्गलायाः कलाभिर्युतं भृङ्ग-तुल्यं,
रसज्ञं प्रपन्नं रस-पान-लीनम्।
यमादीन् विजित्य स्थितं तं विभूतिं,
भजेऽन्तकस्याप्यन्तकं देव-नाथम् ॥१०॥

​फणोच्छ्वास-युक्तैः भुजङ्गैः समेतं,
मृदङ्गस्य नादैरथ ताण्डव-मग्नम्।
प्रचण्ड-प्रभावं कपालं धरन्तं,
शिवं मङ्गलं मङ्गलं सर्वदा मे ॥११॥

​सर्प-हार-रत्न-माला स्वर्ण-मृत्तिका-तुल्य-भावः,
शत्रु-मित्र-तुल्य-दृष्टिः सर्वदा समभावा।
सम-दृष्टि-स्थितं देवं चक्रवर्ति-रक्षकं,
भजे सदाशिवं भेद-हीनं च नित्यम् ॥१२॥

​गङ्गा-तटे कुञ्ज-गृहे वसामि,
मन्त्रं जपन् हस्त-युतं च शीर्षणम्।
त्यक्त्वा नयन-चापलं ध्यान-युक्तं,
प्राप्नोमि शिव-पदं सुख-रूपं सदा ॥१३॥

​इदं स्तोत्रं नित्यं पठति नर-देवः सुख-करम्,
विशुद्धः स आत्मा भवति शिव-भक्तिं च लभते।
मोह-जालं छित्वा मुक्तिं ददाति शम्भुः,
शरणं गच्छति तं परम-गतिं लभते नृपः ॥१४॥

​॥ इति -खेमेश्वर-पुरी-गोस्वामी-विरचिता श्री शिव स्तुतिः संपूर्णा ॥

भावार्थ 
 
१. जिनकी जटाओं में फेन जैसी श्वेत गंगा बहती है, जिनका कंठ सर्पों से सुशोभित है और जिनका रूप विकराल है, जो डमरू की ध्वनि के साथ तांडव में लीन रहते हैं, मैं उन महाकाल रूप साक्षात् शिव को प्रणाम करता हूँ।

२. जिनकी जटाओं में गंगा की लहरें क्रीड़ा करती हैं, जिनके मस्तक पर चंद्रमा विराजमान है और जो चंदन की सुगंध से सुवासित हैं। जिनके ललाट की अग्नि ने कामदेव को भस्म कर दिया, मैं उन देव को अपने हृदय में निरंतर धारण करता हूँ।

३. जो गिरिराज-पुत्री पार्वती के चित्त को प्रसन्न करने वाले और सुख के आधार हैं, जो अपनी कृपा दृष्टि से सभी दुखों को हर लेते हैं। मैं संसार के भय को त्यागकर, उन विश्वनाथ, मोक्ष प्रदाता और दिव्य रूप धारी शिव का भजन करता हूँ।

४. जिनके मुख की आभा मणियों और रत्नों की कांति से दिशाओं को प्रकाशित करती है, जो गजचर्म (हाथी की खाल) धारण करते हैं। जिनका शरीर विभूति (भस्म) से लिप्त है, मैं उन अचिंत्य, भूतनाथ शंकर को भजता हूँ।

५. जिनके चरणों को देवता और मुनि नमन करते हैं और जो जटाओं में चंद्रमा की कला को धारण कर प्रसन्न रहते हैं। जिनका कंठ सर्पों से सुशोभित है, मैं उन शांत भाव वाले शिव का भजन करता हूँ, जो मेरे मन की सभी इच्छाएं पूरी करें।

६. जिनके ललाट पर प्रज्वलित अग्नि की ज्वालाएँ कामदेव के विनाश का कारण बनीं, देवताओं और सिद्धों द्वारा पूजित, जटाओं को धारण करने वाले उन हर (शिव) को मैं निरंतर नमन करता हूँ।

७. जिनके ललाट पर 'धगद्-धगद्' शब्द करती हुई अग्नि की शिखाएँ हैं, जो कामदेव को पुन: भस्म कर देते हैं। जो गौरी (पार्वती) के अंगों पर चित्रकारी करने में कुशल हैं, वे शिल्पकार स्वरूप महादेव ही मेरे प्राण हैं।

८. जिनका कंठ नए मेघों के समान श्याम वर्ण का है, जो अमावस्या की भांति नित्य कांतिमान हैं। जो गजासुर का वध करने वाले और गंगा को धारण करने वाले हैं, मैं उन दुःख विनाशक जगत के आधार शिव का भजन करता हूँ।

९. जिनका कंठ नीले कमल के समान श्याम है, जो कामदेव और त्रिपुर के विनाशक हैं। जिन्होंने दक्ष के यज्ञ को नष्ट किया और जो यमराज के लिए भी काल हैं, मैं उन भव-भय से मुक्ति दिलाने वाले अखंड शिव का सदा भजन करता हूँ।

१०. जो कल्याणकारी कलाओं से युक्त, भृंग (भौरे) के समान रसज्ञ और आत्म-लीन हैं। जिन्होंने यम आदि को जीत लिया है और जो काल के भी काल हैं, मैं उन देव-नाथ का भजन करता हूँ।

११. जो सर्पों से युक्त हैं, मृदंग की थाप पर ताण्डव में मग्न हैं और हाथ में कपाल धारण किए हुए प्रचंड प्रभावशाली हैं, वे मंगलकारी शिव सदैव मेरा कल्याण करें।

१२. जो सर्प और रत्नों की माला धारण करते हैं, जिन्हें शत्रु और मित्र में कोई भेद नहीं है। जो सदैव समदर्शी हैं और संसार की रक्षा करने वाले हैं, मैं उन भेद-रहित सदाशिव का नित्य भजन करता हूँ।

१३. मैं गंगा तट के कुंज में निवास कर, शिव मंत्र का जप करते हुए अपने मन को चंचलता से हटाकर ध्यान में लीन रहता हूँ। इस प्रकार मैं उस सुख-स्वरूप शिव पद को प्राप्त करता हूँ।

१४. जो मनुष्य नित्य इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसका अंतःकरण शुद्ध हो जाता है और उसे शिव-भक्ति प्राप्त होती है। शम्भु उसके मोह के जाल को काटकर उसे मुक्ति प्रदान करते हैं और वह परम गति को प्राप्त होता है।

सर्वाधिकार सुरक्षित :  खेमेश्वर पुरी गोस्वामी 
मुंगेली, छत्तीसगढ़,८१२००३२८३४

श्री शिव स्तुति (अनुष्टुप छंद)


॥ श्री शिव स्तुति ॥

जटायां गंग-धारैव, नाग-हारो गले स्थितः।
डमरू-नाद-संयुक्तो, ताण्डवः शिव-शङ्करः ॥१॥

ललाटे चन्द्रमा भाति, गंगा-लहरी-शोभिता।
अग्नि-ज्वाला-जटालोऽयं, महादेवः प्रसीदतु ॥२॥

गिरीश-सुख-दः शम्भुः, कृपया हरते व्यथाम्।
अम्बर-स्थित-विश्वेशो, भव-भीतिं विनाशयेत् ॥३॥

मणि-दीप्तैः फणैः पूर्णः, गज-चर्माम्बरो हरः।
भूतनाथः प्रभुः साक्षाद्, अद्भुतं रूपमास्थितः ॥४॥

देवेन्द्राः नम्र-शीर्षाश्च, पाद-रेणुं प्रपद्यते।
चन्द्र-कला-विराजन्ते, जटा-जूटे च शोभनाः ॥५॥

भाल-पट्ट-स्थित-ज्वालैः, कामदेवो भस्मीकृतः।
मुनि-सिद्ध-गणैर्वन्दितः, जटा-जालो विराजते ॥६॥

अग्नि-ज्वाला-धगधगिता, काम-दहन-तत्परः।
पार्वती-चित्त-हर्ता च, शिवः शोभा-समन्वितः ॥७॥

नीलकण्ठो मेघ-वर्णः, अमावास्या-तमः-प्रभः।
गजासुर-हरः शम्भुः, जगदाधार-रूपकः ॥८॥

नील-पद्म-निभः कण्ठः, त्रिपुरासुर-नाशकः।
दक्ष-यज्ञ-हरः देवो, भव-भय-निवारकः ॥९॥

मंगला-रस-सिक्तश्च, भृङ्गरूपो महेश्वरः।
यम-काल-हरः श्रीमान्, अन्तकस्यापि अन्तकः ॥१०॥

नाग-राज-फुत्कारात्, भाल-अग्नि-प्रदीपनम्।
मृदंग-नाद-तालेन, ताण्डवः शिव-शङ्करः ॥११॥

सर्प-रत्न-समस्तं च, शत्रु-मित्रं समांशतः।
सम-दृष्टिः सदाशिवो, भेद-भाव-विवर्जितः ॥१२॥

गंग-तट-विहारोऽहं, मन्त्रं गास्यामि नित्यशः।
चन्द्र-भालं सदा ध्यात्वा, प्राप्स्यामि शिव-सद्गतिम् ॥१३॥

इदं स्तोत्रं पठेद यस्तु, शुद्ध-बुद्धिः प्रजायते।
मोह-जालं विनिर्मुच्य, शिव-सान्निध्यमाप्नुयात् ॥१४॥

॥ इति -खेमेश्वरपुरी-गोस्वामी-विरचिता श्री शिव-स्तुतिः सम्पूर्णा ॥

भावार्थ
​१. जिनकी जटाओं में गंगाजी विराजमान हैं, गले में नागों का हार सुशोभित है, जिनके डमरू की ध्वनि से संपूर्ण सृष्टि गुंजायमान होती है, वे ताण्डव करते हुए शिव-शङ्कर को मेरा नमन है।

​२. जिनके ललाट पर चंद्रमा चमकता है और गंगा की लहरें सुशोभित होती हैं, जिनकी जटाओं में अग्नि की ज्वालाएं प्रज्वलित रहती हैं, वे महादेव मुझ पर प्रसन्न हों।

​३. पर्वतों के स्वामी, सुख प्रदान करने वाले शम्भु, कृपा करके मेरी व्यथाओं को दूर करें। आकाश में स्थित, विश्व के ईश्वर, संसार के भय को नष्ट करें।

​४. जो मणियों से चमकते फण वाले नागों से सुसज्जित हैं, जिन्होंने गज-चर्म (हाथी की खाल) को वस्त्र के रूप में धारण किया है, वे भूतों के स्वामी प्रभु साक्षात् अद्भुत रूप में स्थित हैं।

​५. इंद्र जैसे देवता भी जिनके चरणों में नतमस्तक होकर चरणों की धूलि लेते हैं, जिनकी जटाओं में चंद्रमा की कलाएं अत्यंत शोभा पाती हैं।

​६. जिनके भाल (मस्तक) पर स्थित ज्वालाओं से कामदेव भस्म हो गए थे, मुनियों और सिद्धों के समूहों द्वारा वंदित, जटाओं के जाल में सुशोभित वे प्रभु को नमन है।

​७. अग्नि की ज्वालाओं से 'धग-धग' शब्द करते हुए, कामदेव का दहन करने के लिए तत्पर, पार्वतीजी के चित्त को हरने वाले, वे शिवजी परम शोभा से युक्त हैं।

​८. जिनका कंठ नील वर्ण का है, जो मेघ के समान गंभीर हैं, जिनका तेज अमावस की रात्रि के अंधकार के समान गहरा है, वे गजासुर का संहार करने वाले और जगत के आधार स्वरूप शम्भु को नमन है।

​९. जिनका कंठ नील कमल के समान है, जो त्रिपुरासुर का नाश करने वाले, दक्ष के यज्ञ को नष्ट करने वाले, और भव (संसार) के भय का निवारण करने वाले देव हैं।

​१०. जो कल्याणकारी रस में सिक्त हैं, भृंगी (शिवभक्त) रूप धारण करने वाले महेश्वर, काल के भी काल और यमराज के भी अंत करने वाले श्रीमान प्रभु को प्रणाम है।

​११. नागराज के फुफकारने से जिनके मस्तक की अग्नि प्रदीप्त होती है, मृदंग के नाद और ताल पर जो ताण्डव करते हैं, वे शिव-शङ्कर हैं।

​१२. जो सांपों के रत्न और अन्य सभी वस्तुओं में, शत्रु और मित्र में समान भाव रखते हैं। वे सदाशिव समदृष्टि हैं और भेद-भाव से रहित हैं।

​१३. मैं गंगा तट पर विहार करते हुए नित्य इस मंत्र का गान करूँगा। चंद्रमा को मस्तक पर धारण करने वाले शिव का ध्यान कर, मैं निश्चित ही शिव-सद्गति को प्राप्त करूँगा।

​१४. जो व्यक्ति शुद्ध बुद्धि के साथ इस स्तोत्र का पाठ करता है, वह मोह-जाल से मुक्त होकर शिव के सान्निध्य (निकटता) को प्राप्त करता है।


सर्वाधिकार सुरक्षित :  खेमेश्वर पुरी गोस्वामी 
मुंगेली, छत्तीसगढ़,८१२००३२८३४

Thursday, June 11, 2026

बरखा आई, मस्ती लाई! बाल कविता


बरखा आई, मस्ती लाई!


तप-तप तपती गरमी भागी,
देखो झूम के बरखा आई।
काले-काले बादल छाए,
अपने संग फुहारें लाए।

छत पर भागे चिंटू-मीना,
अब नहीं भाई घर में जीना!
"अम्मा, जाने दो ना बाहर,
भीगेंगे हम अबकी बार!"

नंगे पैर आँगन में आना,
छप-छप कर के शोर मचाना।
एक-दूजे पर पानी फेंकना,
हंसना और फिर आंखें मीचना।

कागज की एक नाव बनाई,
नीले पानी में तैराई।
"मछली रानी, रास्ता देना,
मेरी नैया पार लगा देना!"

बूँदें गिरतीं टिप-टिप-टिप,
मेंढक कूदें टर-टर-टिप।
भीग गए सब बाल-सखा अब,
खत्म हुई गरमी की रुत सब।


खेमेश्वर पुरी गोस्वामी "गृहावधूत"
मुंगेली छत्तीसगढ़,८१२००३२८३४

Wednesday, June 10, 2026

पिता

पिता को समर्पित एक रचना 

छोड़ दो किताब सारी, देख लो पिता का मुख,
चेहरे की झुर्री बीच, ज्ञान का जहान है।

धूप और छाँव सह, पालते रहे जो हमें,
त्याग और रूप उनका, देव के समान है।

​रिश्तों का विधान सिखा, जीवन सँवार दिया,
शीश जो झुकेगा यहाँ, बढ़ता महन है।

पूँजी है आशीष उनकी, राह जो दिखाते सदा,
तात के चरन बीच, झुकता गगन है।


        © खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
   मुंगेली छत्तीसगढ़ ८१२००३२८३४

Monday, June 8, 2026

कलम की धार और मर्यादा का गलियारा

कलम की धार और मर्यादा का गलियारा

साहित्य हमेशा से समाज का दर्पण रहा है। वह दर्पण, जो कभी मनुष्य के अंतर्मन की गहराइयों को कुरेदता है, तो कभी समाज की कुरीतियों पर प्रहार करता है। कलम के धनी लोग जब अपनी लेखनी उठाते हैं, तो उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे सभ्यता के शिल्पी बनेंगे। लेकिन, आज के दौर में कुछ लेखकों ने अपनी सृजनात्मकता का दायरा संकुचित कर लिया है।
आजकल साहित्यिक मंचों और सोशल मीडिया के पन्नों पर एक नया फैशन-सा चल गया है। कुछ रचनाकार अपनी 'विद्वता' को सिद्ध करने के लिए सनातन धर्म के ग्रंथों, देव-कथाओं और प्रतीकों को व्यंग्य का 'मसाला' बना रहे हैं। यह देखना विडंबनापूर्ण है कि जिस शब्दावली का उपयोग वे किसी समुदाय विशेष की आस्था को नीचा दिखाने या उस पर प्रहार करने के लिए कर रहे हैं, क्या वे वही साहस किसी अन्य संदर्भ में दिखाने का नैतिक बल रखते हैं?

व्यंग्य एक विधा है, जिसका उद्देश्य समाज का परिष्कार करना होता है, न कि किसी की श्रद्धा पर चोट करना। जब कोई लेखक किसी देवी-देवता के नाम या उनके पौराणिक आख्यानों को तोड़-मरोड़कर, उसे व्यंग्य का टाइटल या तुकबंदी का हिस्सा बनाता है, तो वह किसी 'उच्च बौद्धिक स्तर' का प्रमाण नहीं देता, बल्कि अपनी उस रुग्ण मानसिकता को प्रदर्शित करता है, जो संवाद की कला से अनभिज्ञ है।
यह समझना आवश्यक है कि 'धर्मनिरपेक्षता' का अर्थ किसी की आस्था का उपहास करना नहीं है। रचनात्मक स्वतंत्रता का झंडा लेकर चलना और बात है, और उसी झंडे की आड़ में किसी की आराध्य परंपराओं को अपमानित करना दूसरी बात।

महान साहित्य वही है जो जोड़ने का काम करता है। प्रेमचंद का 'ईदगाह' हो या रस्किन बॉन्ड की कहानियां, उनमें जो मानवीय संवेदनाएं हैं, वे किसी धर्म विशेष की सीमाओं में नहीं बँधीं। इसके विपरीत, यदि कोई लेखक अपनी पहचान बनाने के लिए दूसरों की भावनाओं को 'बलि का बकरा' बनाता है, तो वह साहित्यकार कम और विवाद का दलाल अधिक प्रतीत होता है।
साहित्य में तंज के लिए विषयों की कमी नहीं है। भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, सामाजिक विषमता, मानवीय संवेदनाओं का क्षरण—ये वे विषय हैं जिन पर कलम की स्याही भी सार्थक होगी और समाज को दिशा भी मिलेगी। लेकिन जब कलम का रुख किसी समाज की आस्था के केंद्रों की ओर मुड़ जाता है, तो वह साहित्य नहीं, बल्कि 'सांस्कृतिक विद्रूपता' बन जाता है।

लेखक का धर्म 'संवाद' है, 'विवाद' नहीं। यदि साहित्य के गलियारों में सनातनी ग्रंथों या देव-कथाओं का उपयोग केवल 'नीचा दिखाने' या 'सनसनी फैलाने' के लिए किया जा रहा है, तो यह उस लेखक की रचनात्मक निर्धनता का परिचायक है।
एक बेहतर समाज के निर्माण के लिए यह अनिवार्य है कि हम अपनी लेखनी को कुंठा के कीचड़ से बाहर निकालें। कला और साहित्य की सार्थकता इसी में है कि वह आलोचना करे, पर आहत न करे। व्यंग्य का अर्थ खंजर चलाना नहीं, बल्कि दर्पण दिखाना होना चाहिए, ताकि सामने वाला अपनी गलतियों को सुधार सके, न कि आहत होकर खड़ा हो जाए।
आखिरकार, कलम की असली ताकत शब्दों के चयन में ही नहीं, बल्कि उस गरिमा में भी है जिसे वह अपनी रचनाओं के माध्यम से जीवित रखती है।


©खेमेश्वर पुरी गोस्वामी®
मुंगेली छत्तीसगढ़,८१२००३२८३४

Sunday, June 7, 2026

खामोश होती डाल

खामोश होती डाल

मैं हूँ नन्ही चिड़िया, नीला अंबर मेरा घर था,
पंखों की उस उड़ान में, न कोई खौफ, न डर था।
पर अब तो कंक्रीट के जंगल, गगन को छूते जाते हैं,
मेरे उड़ने के रास्तों को, वे पल में ही खाते हैं।

जमाना हो गया मेरी जान का दुश्मन, अब तो ये जानो,
सिर्फ शोर और धुएं के साये में, मुझे न पहचानो।
पेड़ काट कर जो तुमने, अपनी इमारतें सजाई हैं,
उन्हीं ने मेरी चहचहाहट की, रूह तक रुलाई है।

मेरा दर्द किसी को नहीं दिखता, मैं प्यासी लौट आती हूँ,
साफ हवा की तलाश में, मैं दर-दर भटकती जाती हूँ।
इस भीड़-भाड़ की दुनिया में, इंसान कहाँ दिखते हैं,
सच्चे मर्द तो बहुत हैं, पर 'इंसानियत' वाले कहाँ दिखते हैं?
वो जो कभी हरियाली में, मेरे साथ गुनगुनाते थे,
आज शोर में खोकर, वे मुझे भूल ही जाते हैं।
क्या मुझे अब अपना घर, फिर से नसीब हो पाएगा?
या मेरा अस्तित्व, सिर्फ कागजों में सिमट कर रह जाएगा?

© खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
मुंगेली, छत्तीसगढ़ ८१२००३२८३४

Wednesday, June 3, 2026

राहों का सफ़र (बाल कविता)

 राहों का सफ़र

मैं स्कूल पढ़ने जाऊंगी,
खुद को गढ़ने जाऊंगी।
टीचर पाठ पढ़ाएगा,
मुन्ना खेल खिलाएगा।

सज-धज कर मैं जाऊंगी,
नई बातें सब पाऊंगी।
बस्ते में होंगी किताबें,
सुनूँगी ढेर सारी बातें।

पेंसिल से लिखूंगी नाम,
काम करूँगी बड़े तमाम।
क, ख, ग, घ का ज्ञान पाऊं,
ऊँचे सपनों को मैं सजाऊं।

गणित में जोड़-घटाना होगा,
ज्ञान का नया खजाना होगा।
खेल के मैदान में दौड़ूंगी,
जीत की डोरी को मोड़ूंगी।

दोस्त मिलेंगे प्यारे-प्यारे,
चमकेंगे हम सब तारे।
अनुशासन का पाठ पढूँगी,
ऊपर की ओर मैं बढ़ूँगी।

मेहनत करके नाम कमाऊं,
अपनी राह खुद ही बनाऊं।
टीचर का आदर मैं पाऊं,
सफलता की सीढ़ी चढ़ जाऊं।



           © खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
       मुंगेली छत्तीसगढ़,८१२००३२८३४

चलो खेलें खेल निराले (बाल कविता)


चलो खेलें खेल निराले (बाल कविता)

आओ बच्चों, पास में आओ,
खेल पुराने मजे से गाओ।
गली-मोहल्ले, धूल-मिट्टी में,
खुशियां ढूँढें पक्की-पक्की में।

गुल्ली-डंडा ज़ोर से मारें,
आसमान में जीत उतारें।
भंवरा घूमे गोल-मटोल,
बांटी खेले सब अनमोल।

छुपन-छुपाई में छिप जाना,
पीट्टो को फिर से जमाना।
लंगड़ी-टांग उछल कर दौड़ें,
मैदानों के बंधन तोड़ें।

रस्सा-कसी में दम लगाएं,
कुदम कुदाई खेल रचाएं।
पत्ते वाली नाव बनाएं,
बरखा में हम सैर कराएं।

कंचे खेलें, कोड़ा दौड़ें,
हाथों में हम हाथ जोड़ें।
स्क्रीन छोड़ कर बाहर आएं,
आंगन में हम धूम मचाएं।

 फोन-टैबलेट रख दो भैया,
खेलें सब मिल, छोड़ के मैया।
पसीना बहने में है शान,
खेल ही है बचपन की जान!

           © खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
       मुंगेली छत्तीसगढ़,८१२००३२८३४

Friday, May 29, 2026

चोला राष्ट्रभक्ति का ये, जो दिखावे में ओढ़े हैं,

चोला राष्ट्रभक्ति का ये, जो दिखावे में ओढ़े हैं

चोला राष्ट्रभक्ति का ये, जो दिखावे में ओढ़े हैं,
वतन से सारे मतलब तो, ये ही छोड़े हैं।
जुबां पर नाम भारत का, मगर दिल में सरोकार नहीं,
सियाही के सिवा इनके, वतन का कोई त्यौहार नहीं।

ये कागज़ पर खिंची रेखा, सरहद मान बैठे हैं,
तिरंगे को महज अपनी, सनद मान बैठे हैं।
मगर जब बात माटी की, मुसीबत सामने आई,
तो पीछे हट के अपनी, ढाल इन्होंने तोड़े हैं।
चोला राष्ट्रभक्ति का ये, जो दिखावे में ओढ़े हैं।

कोई तो कंकड़ों को भी, हीरा कहके पूजे है,
कोई माटी के मस्तक पर, लहू का टीका गूँथे है।
ये सत्ता की रसाकशी में, वतन को भूल बैठे हैं,
लकीरें खींचने वाले, खुद अपनी राहें मोड़े हैं।
चोला राष्ट्रभक्ति का ये, जो दिखावे में ओढ़े हैं।

जो खुद को मुल्क का रक्षक, बताने का ढोंग करते हैं,
वही असल में इस माटी के, जमीर को सौदा करते हैं।
मगर याद रहे ये इनको, इतिहास का ये पन्ना है,
वतन की फिक्र करने वाले, न कभी पीछे हटे हैं।
वतन के असल वारिस तो, ये दिखावे में नहीं,
खून-पसीने से अपनी, तक़दीर खुद ही गढ़े हैं।

© खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
मुंगेली छत्तीसगढ़,8120032834

Wednesday, May 27, 2026

'दुख' का बाजार और संवेदनाओं के सन्नाटे का 'रेट लिस्ट'

*'दुख' का बाजार और संवेदनाओं के सन्नाटे का 'रेट लिस्ट'*

आलेख : खेमेश्वर पुरी गोस्वामी
मुंगेली, छत्तीसगढ़ ८१२००३२८३४

छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले से सोशल मीडिया के गलियारों तक तैरता एक विज्ञापन इन दिनों विमर्श के केंद्र में है। एक व्यक्ति ने 'दुख सुनने' को बाकायदा एक पेशे का रूप दे दिया है—वह भी बकायदा रेट लिस्ट के साथ। पहली नजर में यह हास्यास्पद लग सकता है, लेकिन यदि संजीदगी से विचार करें, तो यह हमारे उस 'आधुनिक' समाज की सबसे बड़ी त्रासदी है, जहां तकनीक ने दुनिया को मुट्ठी में तो कर दिया, पर दिलों के बीच की दूरियां मीलों लंबी कर दी हैं।

उस विज्ञापन की इबारत गौर करने लायक है—"दुख कोई भी हो, किसी का भी हो, मैं सुनूंगा।" सुनने की इस प्रक्रिया के लिए ₹500 से लेकर ₹12000 तक का शुल्क निर्धारित है। यह विडंबना ही है कि जिस समाज में कभी बड़े-बुजुर्गों की चौपालें और पड़ोसियों का 'कंधा' बिना किसी मोल के उपलब्ध रहता था, वहां अब 'कान' किराए पर लेने पड़ रहे हैं। क्या हम इतने अकेले हो गए हैं कि अपनी पीड़ा साझा करने के लिए हमें सशुल्क श्रोता की आवश्यकता है? यह विज्ञापन उस मानसिक कंगाली का परिचायक है, जहां हमारे पास 'फेसबुक फ्रेंड्स' तो हजारों हैं, लेकिन दुख बांटने के लिए एक भी सच्चा इंसान नहीं।

आज हम सूचना क्रांति के युग में जी रहे हैं। 5जी की रफ्तार वाले इस दौर में सूचनाएं तो तेजी से पहुंच रही हैं, लेकिन भावनाएं बीच रास्ते में ही दम तोड़ रही हैं। महानगरों की बहुमंजिला इमारतों से लेकर छोटे शहरों के ड्राइंग रूम तक, संवादहीनता का एक गहरा सन्नाटा पसरा है। परिवार के सदस्य एक ही छत के नीचे बैठकर एक-दूसरे को देखने के बजाय मोबाइल स्क्रीन पर 'इमोजी' के जरिए भावनाएं व्यक्त कर रहे हैं। जब अपनों के पास सुनने का धैर्य नहीं बचा, तो स्वाभाविक है कि 'दुख सुनने वाले' बाजार में अपनी दुकान सजाएंगे ही।

मार्केटिंग के इस दौर में सब कुछ बिकाऊ है—हंसी भी और आंसू भी। दुर्ग के इस 'दुखियारे के साथी' ने दरअसल उस बाजार को पहचाना है, जिसे हमारी उपेक्षा ने पैदा किया है। इसे केवल एक व्यक्ति की चतुराई कहना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि यह हमारे सामाजिक पतन का अलार्म है। यदि आत्मीयता का स्थान अर्थशास्त्र ले ले, तो समझ लेना चाहिए कि मानवीय संवेदनाएं वेंटिलेटर पर हैं।

यह विज्ञापन एक व्यंग्य है उस व्यवस्था पर, जहां हम भौतिक समृद्धि के शिखर पर तो पहुंच गए, पर भावनात्मक रूप से दरिद्र हो गए। यह हमें आइना दिखाता है कि यदि हमने समय रहते अपनों को 'वक्त' देना शुरू नहीं किया, तो भविष्य में संवेदनाओं की बोली ऐसे ही सरेआम लगती रहेगी। दुख सुनने के लिए किसी को पैसे देना उस 'बीमारी' का इलाज नहीं है, बल्कि उस 'अकेलेपन' की पुष्टि है, जिसे हमने खुद ओढ़ा है।

> *तल्ख हकीकत यह है कि आज इंसान के पास अपनी बात कहने के लिए 'स्टेटस' तो है, पर सुनने के लिए कोई 'रिश्ता' नहीं बचा।*
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'हरी झंडी' का मोह और औचित्य का उपहास : उद्घाटनजीवी राजनीति का एक नया अध्याय

'हरी झंडी' का मोह और औचित्य का उपहास : उद्घाटनजीवी राजनीति का एक नया अध्याय

आलेख : खेमेश्वर पुरी गोस्वामी
सह संपादक - न्यूज़लाइन नेटवर्क, छत्तीसगढ़ 

छत्तीसगढ़ की सड़कों पर हाल ही में 'डायल 112' के रूप में सुरक्षा और आपातकालीन सेवा का एक नया काफिला उतरा। केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने छत्तीसगढ़ आकर जब इन वाहनों को हरी झंडी दिखाई, तो प्रदेश की जनता को लगा कि अब संकट के समय 'मदद' महज एक फोन कॉल की दूरी पर है। लेकिन, इस सरकारी कवायद के महज दो दिनों के भीतर जो दृश्य देखने को मिला, वह जनसेवा से अधिक 'स्व-प्रचार' और 'उद्घाटनजीवी' मानसिकता का एक ऐसा प्रहसन है, जो लोकतंत्र में मितव्ययिता के दावों को आईना दिखाता है।

सवाल यह उठता है कि क्या छत्तीसगढ़ के उन जिला मुख्यालयों में वाहन इसलिए नहीं चल सकते थे क्योंकि वहां के स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने उसे 'पुनः हरी झंडी' नहीं दिखाई थी? क्या दिल्ली से आई हरी झंडी का महत्व स्थानीय स्तर पर तब तक शून्य रहता है, जब तक कि वह किसी स्थानीय मंत्री या विधायक के हाथ से दोबारा न फहराई जाए?

यह स्थिति किसी हास्यास्पद फिल्म के दृश्य जैसी प्रतीत होती है, जहाँ पटकथा में तार्किक चूक हो। ऐसा लगता है कि इन वाहनों के इंजन का 'स्टार्ट बटन' चाबी से नहीं, बल्कि स्थानीय नेताओं के हाथों में थमी उस हरी झंडी से संचालित होता है। यदि व्यवस्था वाकई इतनी ही जटिल है, तो फिर केंद्रीय मंत्री का आगमन मात्र एक औपचारिकता बनकर रह जाता है। यह प्रश्न अनुत्तरित है कि आखिर केंद्रीय मंत्री के आगमन का 'औचित्य' क्या था—क्या वे केवल फोटो खिंचवाने आए थे या सरकारी व्यवस्था को सुदृढ़ करने?


किसी भी सरकारी आयोजन में मंच, बैनर, प्रचार-प्रसार और प्रशासनिक अमले की उपस्थिति के लिए सरकारी खजाने का व्यय होता है। एक बार केंद्रीय गृह मंत्री के हाथों उद्घाटन के बाद, जिलों में वही रस्म फिर से दोहराना न केवल समय की बर्बादी है, बल्कि करदाताओं के धन का खुला दुरुपयोग भी है।
> *संवाद और संवादहीनता के बीच का यह फासला जनता समझ रही है। जब जनप्रतिनिधि जनसेवा से ज्यादा 'रिबन कटिंग' और 'फ्लैग ऑफ' में रुचि दिखाने लगें, तो समझ लेना चाहिए कि वे विकास के बजाय 'दृश्यता' की दौड़ में शामिल हो गए हैं। क्या जनता के पास इन व्यर्थ के आयोजनों का हिसाब मांगने का अधिकार नहीं है?*

क्या यह केंद्रीय नेतृत्व के प्रति एक प्रकार की अरुचि या अनादर का प्रदर्शन है—यह राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय हो सकता है। 
जब केंद्रीय गृह मंत्री की पहल को स्थानीय स्तर पर 'पुनः प्रमाणित' करने की होड़ मचे, तो यह एक प्रकार के 'सत्ता के संघर्ष' या 'क्रेडिट वॉर' को जन्म देता है।
यह व्यवहार केंद्रीय गृह मंत्री की गरिमा को कम करे या न करे, लेकिन यह स्थानीय नेताओं की उस 'आत्ममुग्धता' को जरूर प्रदर्शित करता है जहाँ वे खुद को व्यवस्था का केंद्र मान बैठे हैं। यदि यह महज जनसम्पर्क का एक प्रयास है, तो यह अत्यंत भोंडा है,और यदि यह केंद्रीय नेतृत्व के कद को छोटा दिखाने की कोई सुनियोजित रणनीति है, तो यह राजनीतिक अपरिपक्वता का चरमोत्कर्ष है।

अंततः, छत्तीसगढ़ की सड़कों पर दौड़ने वाली ये गाड़ियाँ जनता के लिए हैं, नेताओं के 'फोटो-ऑप्स' के लिए नहीं। यदि ये वाहन हरी झंडी दिखाए जाने के इंतजार में जिलों में खड़े रहे, तो यह प्रशासनिक विफलता है।
राजनीतिक शुचिता का तकाजा यह है कि नेता अपनी 'विजिबिलिटी' के बजाय 'एक्सेसिबिलिटी' पर ध्यान दें। जनता को हरी झंडी देखने में कोई दिलचस्पी नहीं है, उसे दिलचस्पी है तो इस बात में कि 112 डायल करने पर पुलिस या एम्बुलेंस कितनी जल्दी उसके दरवाजे पर पहुंचती है।
समय आ गया है कि हमारी राजनीति 'हरी झंडी' के प्रतीकों से ऊपर उठकर, जमीन पर उतरने वाले वास्तविक 'कार्यों' पर केंद्रित हो। वरना, जनता भी जल्द ही यह समझ जाएगी कि यह 'डायल 112' की सेवा कम और नेताओं के 'शो' का प्रदर्शन ज्यादा था।

मेधा का सम्मान या सियासत का 'फोटो-ऑप': कहाँ खो जाते हैं हमारे टॉपर?

*मेधा का सम्मान या सियासत का 'फोटो-ऑप': कहाँ खो जाते हैं हमारे टॉपर?*

*आलेख: खेमेश्वर पुरी गोस्वामी*
मुंगेली, छत्तीसगढ़ 


भारत के ग्रामीण अंचलों और मध्यमवर्गीय गलियों से जब कोई बच्चा बोर्ड परीक्षाओं या प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रदेश की मेरिट लिस्ट में स्थान बनाता है, तो वह केवल एक परिवार की सफलता नहीं होती। वह उस पूरे परिवेश की उम्मीदों का सूरज होता है। लेकिन विडंबना देखिए, जिस दिन परिणाम आता है, नेताओं और जन प्रतिनिधियों का तांता उस 'होनहार' के दरवाजे पर लग जाता है। मालाएं पहनाई जाती हैं, मिठाई के डिब्बे खुलते हैं और कैमरों की फ्लैश के बीच बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं।
किंतु, जैसे ही अखबार की सुर्खियां पुरानी पड़ती हैं और सोशल मीडिया की 'रील्स' बदलती हैं, वे वादे और वे नेता दोनों नदारद हो जाते हैं। पीछे छूट जाता है वह मेधावी छात्र, जो अपनी फटी जेब और बड़े सपनों के बीच फिर से अकेला खड़ा होता है।

राजनीतिक गलियारों में 'टॉपर' को एक उत्पाद की तरह इस्तेमाल करने की होड़ मची है। नेता अपनी 'इंसानियत' दिखाने के लिए फोटो तो खिंचवा लेते हैं, लेकिन छात्र की "सतत शैक्षणिक यात्रा" की जिम्मेदारी लेने से बचते हैं।शोध बताते हैं कि भारत में उच्च शिक्षा का खर्च पिछले एक दशक में तेजी से बढ़ा है। एक गरीब मेधावी बच्चा स्कूल तो टॉप कर लेता है, लेकिन मेडिकल, इंजीनियरिंग या शोध , रिसर्च जैसे क्षेत्रों की महंगी फीस उसके भविष्य की दीवार बन जाती है।

इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है जहाँ व्यवस्था की बेरुखी ने प्रतिभाओं का गला घोंटा है। जैसे बिहार के एक जिले के 'स्टेट टॉपर' की कहानी पिछले दिनों चर्चा में रही, जो आर्थिक तंगी के कारण आगे की पढ़ाई छोड़कर मनरेगा में मजदूरी करने पर मजबूर हुआ। उत्तर प्रदेश के एक मेधावी छात्र, जिसने गणित में शत-प्रतिशत अंक प्राप्त किए थे, आज एक ढाबे पर बर्तन धोने को विवश है क्योंकि उसके पास स्नातक की फीस भरने के लिए पैसे नहीं थे।
ये केवल दो नाम नहीं हैं, बल्कि उस तंत्र की विफलता के स्मारक हैं जो 'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ' या 'पढ़ेगा इंडिया तभी बढ़ेगा इंडिया' जैसे नारों के बीच अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेता है।

सवाल यह है कि क्या केवल एक बार का सम्मान और कुछ हजार रुपयों का चेक किसी छात्र के 'करियर' की गारंटी हो सकता है? कतई नहीं।
 सरकारें 'स्कॉलरशिप' की घोषणा तो करती हैं, लेकिन उसकी जटिल प्रक्रिया और भ्रष्टाचार छात्र तक मदद पहुँचने ही नहीं देता। शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी जब नौकरी की बारी आती है, तो सिफारिश और रसूख की राजनीति फिर आड़े आ जाती है।
जन प्रतिनिधियों के लिए ये बच्चे केवल 'वोट बैंक' को लुभाने के साधन बन गए हैं। यदि वे वास्तव में गंभीर होते, तो हर जिले में एक 'एजुकेशन टाॅपर्स फंड' होता जो केवल ऐसे वंचित मेधावियों के लिए आरक्षित रहता।

राजनीति को अपनी चमक बढ़ाने के लिए मासूम सपनों का इस्तेमाल बंद करना होगा। यदि कोई नेता किसी टॉपर के साथ फोटो खिंचवाता है, तो जनता को उससे यह पूछने का हक होना चाहिए कि उस छात्र की डिग्री पूरी होने तक का आर्थिक खाका क्या है?

मेहनत गरीब के बच्चे की होती है, पसीना उसका परिवार बहाता है, और श्रेय की मलाई राजनीति काटती है—यह खेल अब बंद होना चाहिए। प्रतिभाओं को केवल 'सम्मान' नहीं, 'संसाधन' चाहिए। विज्ञापन वाली राजनीति से इतर, जब तक हम इन बच्चों के भविष्य की 'हैंडहोल्डिंग' नहीं करेंगे, तब तक देश की मेधा इसी तरह मजदूरी की भेंट चढ़ती रहेगी।

*समय आ गया है कि नेतागिरी 'फोटोग्राफी' से निकलकर 'परोपकार' और 'नीति-निर्माण' के धरातल पर उतरे। क्योंकि एक मेधावी का टूटना, केवल एक छात्र की हार नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की बौद्धिक संपदा की हत्या है।*

डिजिटल चकाचौंध का मायाजाल और वास्तविकता की अनदेखी

डिजिटल चकाचौंध का मायाजाल और वास्तविकता की अनदेखी

लेखक: खेमेश्वर पुरी गोस्वामी 

आज के दौर में यदि आप सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं, तो अक्सर आपके मन में एक ही सवाल कौंधता होगा—क्या पूरी दुनिया रातों-रात अमीर हो गई है? इंस्टाग्राम की 'रील' और 'एक्स' (पूर्व ट्विटर) की फीड को स्क्रॉल करते ही हमें ऐसे युवा 'एंटरप्रेन्योर' और 'मेंटॉर' नजर आते हैं, जो अपनी उम्र से कहीं ज्यादा का अनुभव और सफलता का दावा करते हैं। लेकिन, स्क्रीन पर चमकती यह तस्वीर क्या वाकई वास्तविक है? या फिर यह एक ऐसा डिजिटल मायाजाल है, जिसमें उलझकर आज की युवा पीढ़ी अपना मानसिक सुकून खो रही है?

सोशल मीडिया की दुनिया में 'दिखावा' ही आज की सबसे बड़ी मुद्रा (करेंसी) बन गई है। रील बनाने के लिए लक्जरी गाड़ियों को किराए पर लेना, आईफोन ईएमआई पर खरीदना और किसी महंगे कैफे में महज एक कॉफी के सहारे घंटों रील शूट करना अब एक सामान्य चलन बन चुका है। यह 'फेक इट टिल यू मेक इट' (जब तक सफल न हो जाओ, तब तक सफलता का नाटक करो) वाली मानसिकता का ही विस्तार है। दुखद यह है कि इस दिखावे के पीछे अक्सर भारी कर्ज और मानसिक तनाव छिपा होता है।


आज इंटरनेट 'ज्ञान' की सबसे बड़ी दुकान बन चुका है। हैरानी की बात यह है कि जो लोग खुद अनुशासन के नाम पर शून्य हैं, वे सोशल मीडिया पर '5 AM Club' और उत्पादकता (प्रोडक्टिविटी) के सूत्र सिखा रहे हैं। बिना किसी जमीनी अनुभव के, चंद दिनों के 'मोटिवेशनल कोट्स' पढ़कर 'लाइफ कोच' बनने का यह धंधा युवाओं को गुमराह कर रहा है। इंटरनेट पर परोसा जा रहा यह सस्ता मोटिवेशन, वास्तविकता से कोसों दूर एक काल्पनिक दुनिया रच रहा है।


सोशल मीडिया पर दिखने वाली 'परफेक्ट' लाइफ, परफेक्ट कपल्स और परफेक्ट रिश्तों के पीछे का सच अक्सर बेहद कड़वा होता है। लाइक्स और व्यूज की भूख में लोग अपनी निजता, प्राइवेसी और मानवीय संबंधों की पवित्रता को दांव पर लगा रहे हैं। कैमरा बंद होते ही जो रिश्ते बिखरने लगते हैं, वे कैमरे के सामने 'मेड फॉर ईच अदर' का मुखौटा पहनकर सोशल मीडिया पर वाहवाही लूट रहे हैं। यह स्थिति समाज में एक ऐसे 'कृत्रिम व्यवहार' को जन्म दे रही है, जहाँ लोग अपनी वास्तविकता को स्वीकार करने में शर्मिंदगी महसूस करने लगे हैं।

इस पूरी कवायद का सबसे भयावह पहलू यह है कि इसका शिकार एक सामान्य मध्यमवर्गीय युवा हो रहा है। दिन के 10-12 घंटे मेहनत करने वाला एक ईमानदार युवक जब अपनी स्क्रीन पर दूसरों की 'सजावटी सफलता' देखता है, तो वह अनजाने में खुद को कमतर समझने लगता है। यही हीन भावना धीरे-धीरे अवसाद (डिप्रेशन) का रूप ले लेती है। उसे लगने लगता है कि वह जिंदगी की दौड़ में पीछे छूट गया है, जबकि वह यह भूल जाता है कि उसने जो देखा, वह केवल एक 'एडिटेड' और 'फिल्टर्ड' वर्जन था, न कि पूरी सच्चाई।

डिजिटल दुनिया के इस दौर में हमें यह समझने की आवश्यकता है कि सोशल मीडिया पर जो कुछ भी दिख रहा है, वह जीवन का केवल एक छोटा सा हिस्सा हो सकता है, अक्सर वह हिस्सा जो बहुत अधिक 'मैनीपुलेटेड' होता है। वास्तविक सफलता का पैमाना ईएमआई पर खरीदी गई गाड़ियां या रील के व्यूज नहीं हैं, बल्कि वास्तविक जीवन में हमारा काम, हमारा अनुशासन और हमारे अपनों के साथ हमारे रिश्ते हैं।
युवाओं को यह समझना होगा कि 'दिखावे की दौड़' में शामिल होने से बेहतर है 'स्वयं की उन्नति' पर ध्यान देना। रील के शोर में अपनी 'रीयल' दुनिया की शांति को खोना समझदारी नहीं है। अंततः, सफलता कोई ओवरनाइट शॉट नहीं, बल्कि धैर्य और निरंतरता की लंबी तपस्या है, जिसे रील्स के जरिए नहीं, बल्कि कड़ी मेहनत से अर्जित किया जाता है।

परीक्षाओं का 'महाकुंभ' और भविष्य का 'मृगतृष्णा'

परीक्षाओं का 'महाकुंभ' और भविष्य का 'मृगतृष्णा'


आलेख : खेमेश्वर पुरी गोस्वामी 
मुंगेली,छत्तीसगढ़ 8120032834


भारतीय युवा की नियति अब एक अजीबोगरीब चक्रव्यूह में फँस गई है। यदि महाभारत में अर्जुन के पास लक्ष्य भेदने का कौशल था, तो आज के युवा के पास केवल 'प्रवेश पत्र' है—एक ऐसा कागज, जो इस बात की गारंटी तो नहीं देता कि परीक्षा होगी, लेकिन इस बात का पक्का सबूत जरूर देता है कि वह फिर से छले जाने वाला है।
पिछले कुछ समय से देश में परीक्षाओं के आयोजन का अर्थ 'मेधा की परख' नहीं, बल्कि 'धैर्य की परीक्षा' रह गया है। NEET जैसी प्रतिष्ठित प्रवेश परीक्षा से लेकर SSC GD जैसी सरकारी नौकरियों की सीढ़ियों तक, पेपर लीक का जो दौर चला है, उसने एक नया 'नेशनल रिकॉर्ड' बना दिया है। ऐसा प्रतीत होता है कि अब सरकार की प्राथमिकता रोजगार सृजन नहीं, बल्कि 'परीक्षा प्रबंधन' है। पहले परीक्षा का आयोजन होता है, फिर प्रश्नपत्र बाजार में 'नीलामी' के लिए उपलब्ध होता है, और अंत में सरकार 'पवित्रता' बनाए रखने के नाम पर परीक्षा रद्द कर देती है।
यह एक ऐसा 'रद्द-चक्र' है, जहाँ युवा अपनी ऊर्जा, पैसा और जवानी झोंक देते हैं, और बदले में उन्हें मिलता है—फिर से आवेदन करने का 'सुनहरा अवसर'।
विडंबना देखिए, जिस उम्र में युवाओं को राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान देना चाहिए, वे सड़कों पर उतरकर 'न्याय' की मांग कर रहे हैं। सरकार के गलियारों में इसे 'अव्यवस्था' नहीं, शायद 'प्रशासनिक सतर्कता' कहा जाता होगा। जब पेपर लीक होता है, तो सिस्टम अपनी पीठ थपथपाता है कि "हमने समय रहते इसे पकड़ लिया"। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे कोई डॉक्टर ऑपरेशन थिएटर में मरीज को मारने के बाद कहे कि "सर्जरी तो सफल रही, बस मरीज मर गया।"
सरकारी आंकड़ों में रिक्तियों की संख्या जितनी तेजी से नहीं बढ़ती, उससे कहीं अधिक तेजी से 'रद्द की गई परीक्षाओं' की सूची लंबी हो रही है। ऐसा लगता है कि अब 'परीक्षा रद्द करना' ही सबसे बड़ा रोजगार बन गया है। इसमें पूरी मशीनरी व्यस्त है—प्रश्नपत्र बनाने से लेकर, उसे लीक करने, फिर रद्द करने और अंत में दोबारा परीक्षा की तारीख तय करने तक।
क्या यह देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं है? जब शिक्षा और रोजगार की प्रक्रिया ही 'अविश्वसनीयता' के बोझ तले दब जाए, तो राष्ट्र की प्रगति का पहिया भला कैसे घूमेगा? युवाओं के आक्रोश को केवल 'सड़कों पर प्रदर्शन' मानकर खारिज कर देना सरकार की बड़ी भूल होगी। उन्हें सड़कों पर उतरना नहीं, बल्कि पुस्तकालयों में बैठकर अपनी मेधा निखारनी चाहिए थी। लेकिन आज का तंत्र उन्हें 'छात्र' से 'प्रदर्शनकारी' बनने पर मजबूर कर रहा है।
समय आ गया है कि सरकार इस 'लीक संस्कृति' के रसूखदारों पर लगाम कसे। परीक्षा की शुचिता केवल कागजों पर या मंत्रियों के बयानों में नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर दिखनी चाहिए। यदि तंत्र अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा सका, तो आने वाला इतिहास इस दौर को 'सुनहरा काल' नहीं, बल्कि 'डिग्री-धारियों की बेरोजगारी और भविष्य के अपहरण का काल' कहकर याद रखेगा।
युवाओं का धैर्य अब उस कगार पर है जहाँ से आक्रोश की ज्वाला निकलती है। सरकार को यह समझना होगा कि एक पीढ़ी का भविष्य 'रद्द' करके, किसी भी राष्ट्र की नियति कभी 'पास' नहीं की जा सकती।

Sunday, February 22, 2026

सरस्वती वंदना

॥ भगवती सरस्वती वंदना ॥
श्वेत पदमासना माँ, ज्ञान की प्रकाश पुंज,
वीणा कर सोहै शुभ, रागिनी रसाल है।
हंस की सवारी साजे, मंद-मंद मुसक्याँहि,
वाणी की विधात्री मात, रूप विमलाल है॥
अंग आभा कुंद जैसी, शरद् मयंक मुख,
विद्या की प्रदात्री तू ही, काटती जंजाल है।
वेद औ’ पुराण गावें, महिमा अपार तेरी,
जड़ता विनाशिनी माँ, मति की मशाल है॥
ब्रह्म-मुख-वासिनी जो, सुरों की है प्राण-शक्ति,
शब्द-ब्रह्म रूप धरे, मेटती कु-चाल है।
मुनि-जन ध्यावें तोहे, शारदे कृपालु मात,
भक्तन के हेत सदा, रहती दयाल है॥
पंकज समान कर, पुस्तक विराजै सोहै,
अक्षर की जननी माँ, तू ही आदि-काल है।
'शून्य' को विस्तार देवे, बुद्धि की प्रदाता देवि,
तव शरण आए ताहि, होत निहाल है॥

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॥ शारदा स्तुति ॥
कुंद इंदु सम देह, श्वेत धारैं परिधान,
वीणा की झंकार माहिं, अमृत की धार है।
हंस पै विराजैं मातु, मन्द मुसकानि मन्द,
कंठ की मधुरता में, बसत संसार है॥
शुभ्र कर सोहैं जप-माला औ’ किताब नीकी,
अज्ञान की कालिमा को, करती संहार है।
अक्षर के दीप बारि, चित्त को उजास देति,
बुद्धि की अधिष्ठात्री, तू ही आधार है॥
राग रागिनी की सृष्टि, ताल छंद लय माहिं,
शब्द के श्रृंगार में, तिहारो उपकार है।
वाक-शक्ति दैके माँ, मौन को भी मुखर कीन्हों,
जाके शीश हाथ धरौ, बेड़ा वही पार है॥
शारदे भवानी तोहिं, शीश निवावौं बार-बार,
भक्तन की विनती ये, सुनौ माँ पुकार है।
ज्ञान के प्रकाश सों, हरो तुम मोह-तम,
मेटौ सब जड़ता को, विनती हमार है॥

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॥ कवि मंच वंदना: सरस्वती आह्वान ॥
शब्द के श्रृंगार सों, सजाऊँ माँ की आरती मैं,
कंठ में विराजिए, जो धारती सँवार है।
अक्षर के अर्क सों, मिटाइये अमावस को,
ज्ञान के प्रकाश को, मनावौं त्यौहार है॥
जड़ता की बेड़ियाँ, तड़ा-तड़ टूटि जावें,
वाणी में पियूष धार, बहैं अपरम्पार है।
कलम को धार दैके, सत्य को पुकार देहु,
काव्य के निकुंज में, तिहारो जय-जयकार है॥
तर्क की कसौटी पै, जो खरो-खरो उतरी है,
बुद्धि की अधिष्ठात्री, तू ही सूत्रधार है।
शून्य को अनंत करि, छंद की उमंग भरि,
सोती जो चेतना, जगावत झंकार है॥
हंस की सवारी साजे, मंद-मंद मुसक्याँहि,
कवि-कुल-मंडनी, तू ही माँ आधार है।
हाथ जोड़ि शीश नाय, विनती करत भक्त,
खोलि देहु ज्ञान-कोष, विनती हमार है॥
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॥ सरस्वती वंदना ॥
(मुखड़ा)
हे शारदे माँ! अज्ञानता का, घोर तम हर लीजिये,
सत्यम्-शिवम्-सुन्दरम से, कंठ को भर दीजिये।
हे शारदे माँ! अज्ञानता का, घोर तम हर लीजिये॥
(अंतरा - 1)
वीणा की झंकार से, सोई चेतना को जगा,
शब्दाक्षरों की जोत से, सोये हुए भाग्यो को जगा।
अमृतमयी माँ! ज्ञान की, अविरल धारा कर दीजिये,
हे शारदे माँ! अज्ञानता का, घोर तम हर लीजिये॥
(अंतरा - 2)
साहित्य के इस मंच पर, सुर-ताल का वरदान दे,
हर लेखनी को ओज दे, हर शब्द को सम्मान दे।
जड़ बुद्धि को चैतन्य कर, माँ! दिव्य दृष्टि दीजिये,
हे शारदे माँ! अज्ञानता का, घोर तम हर लीजिये॥
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"शब्द-ब्रह्म की साधना, सिद्ध करौ माँ आय।
कवि के कोमल हृदय में, बसौ शारदे माय॥"



"अंधेरे दिल के कोनों में, उजाला आप भर देना,
मरी जो भावनाएं हैं, उन्हें जीवित ही कर देना।
खड़ा हूँ द्वार पर माँ! हाथ में कागज कलम लेकर,
अधूरी रह न जाए बात, पूरी आप कर देना॥"

अँधेरे मन के कोनों में, उजाला भर दिया जाए,
जड़त की शुष्क धारा को, रसीला कर दिया जाए।
खड़ा हूँ द्वार पर माँ! रिक्त अंजलि ले के श्रद्धा की,
मेरे शब्दों के प्याले को, अमृत से भर दिया जाए॥

कलम की धार को माँ! सत्य की तलवार कर देना,
जगत के हर अँधेरे पर, कड़ा प्रहार कर देना।
झुकी जो गर्दनें अन्याय के आगे, उन्हें बल दे,
मेरी हर एक रचना को, सु-संस्कार कर देना॥

सृजन की इस इबादत को, मुकम्मल मोड़ दे देना,
मेरे बिखरे हुए लफ़्ज़ों को, डोरी जोड़ दे देना।
न झुकने पाए ये गर्दन, किसी भी स्वार्थ के आगे,
मेरी इस लेखनी को माँ! गजब का मरोड़ दे देना॥

मिले जो शब्द माँ! तुझसे, वो अनमोल रत्न हो जाएँ,
कि अज्ञानी जनों के चित्त भी, चैतन्य हो जाएँ।
बहे रसधार ऐसी मंच पर, तेरी कृपा से माँ,
कि सुनने वाले सारे लोग भी, धन्य हो जाएँ॥

सत्य की मशाल को, माँ! प्रज्ज्वलित कर दीजिये,
मेरी हर एक पंक्ति को, माँ! कल्पतरु कर दीजिये।
न लिखूँ मैं कभी भी, चाटुकारी का कोई शब्द,
मेरी इस लेखनी को, माँ! अडिग कर दीजिये॥

कंठ में विराजिए माँ! रागिनी बन जाइये,
शब्द की साधना में माँ! मोहिनी बन जाइये।
झूम उठे ये सदन, सुन के कवि की वेदना,
मेरे गीतों के सुरों की, स्वामिनी बन जाइये॥

"अंधेरों से लड़ने का, हुनर माँ से मिला है,
ये जो महक रहा है चमन, दुआ माँ से मिला है।
मैं जो कुछ भी कहूँगा, वो शब्द माँ के होंगे,
मुझे जो कुछ भी मिला है, वो माँ से मिला है॥"

न गीदड़ की भभकियों से, ये शेर कभी डरते हैं,
न संकट के पहाड़ों से, कदम पीछे को धरते हैं।
लिखी जाती है गाथाएँ, सदा बलिदान की स्याही,
वही तो शूरमा हैं जो, वतन की आन पे मरते हैं॥

धमनियों में रक्त नहीं, माँ का प्यार बहता है,
हृदय में बस वतन का, एक विचार रहता है।
मिटा देंगे धरा से हम, अधर्मों की हर एक छाया,
कि हर इक भारतीय में, अब साक्षात काल रहता है॥

1. शत्रुओं का संहार और कलम की शक्ति:
सिंह की दहाड़ जैसी, वाणी में हुंकार देहु,
दुष्टों के दलन हेतु, चण्डिका की धार है।
अक्षरों के बाण छूटें, तर्क के कमान सों माँ,
कायरों की भीड़ माँहि, मची हाहाकार है॥
काट दे अधर्म शीश, सत्य की कृपाण धरि,
राष्ट्र के कपूतन को, दीजै तू दुलार है।
लिखूँ जो लहू सों गाथा, अमर शहीद की मैं,
गूँज उठै दशों डगर, ऐसी ललकार है॥
2. राष्ट्र-भक्ति का शंखनाद:
मस्तक पै भाल सोहै, देश की मशाल हाथ,
लेखनी सों क्रांति ज्वाला, बारती अपार है।
सोती जो जवानी ओहि, झिंझोड़ि जगाय देहु,
रण के नगाड़ों जैसी, गूँजती पुकार है॥
काँप उठैं थर-थर, पापी औ’ अधर्मी सब,
शारदे भवानी! तेरे, शब्दों की ये मार है।
वीर-रस-धार बहै, रग-रग माँहिं आज,
मातृ-भूमि हेतु देह, करूँ मैं निसार है॥

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1. सौंदर्य और माधुर्य का चित्रण:
कुंद के सुमन जैसे, कोमल कपोल सोहैं,
अंग-अंग आभा मानों, बिजुरी की धार है।
चाँदनी की ओढ़नी माँ, धवल धारैं देह पर,
मंद-मंद हास माहिं, बसत बहार है॥
मृग नैनी शारदे माँ! मोहनी मूरत तोरी,
प्रेम की पीयूष-वृष्टि, करत उद्धार है।
शून्य मन-उपवन, महक उठै पुष्प सम,
पावन सुवास सों माँ! महकत संसार है॥
2. रस, ताल और संगीत का संगम:
वीणा की तरंगन में, सात सुर जागत हैं,
ताल और छंद माहिं, प्रेम को अभिसार है।
कोकिला की कूक जैसी, मिठास घोलि देहु माँ,
गीत-काव्य-कुंज माँहि, सुरीली झंकार है॥
भीगे हुए भाव जगें, हृदय की पीर मिटै,
शब्द के श्रृंगार सों माँ! कीन्हों श्रृंगार है।
रस के कलश ढोरि, सींचि देहु प्राण मेरे,
तव रूप देखि-देखि, भयो बेड़ा पार है॥

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कलम को तलवार बनाने का संकल्प:
नमन है शारदे तुमको, हृदय में जोश भर देना,
मेरी हर एक पंक्ति को, माँ! अंगारा कर देना।
लिखूँ मैं जब वतन की आन पर कोई भी कविता तो,
बुजदिल के भी हाथों में, माँ! तलवार धर देना॥
2. राष्ट्र के प्रति समर्पण:
भले ही प्राण जाएँ पर, न झुकने पाए ये मस्तक,
मेरे शब्दों की गूँजें माँ! गगन के पार हों दस्तक।
जगा दूँ सोई सोई चेतना, इस देश की पूरी,
बना देना मुझे माँ! राष्ट्र-वेदी का अमर रक्षक॥

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1. प्रेम और सौंदर्य का वरदान:
हृदय के सूने आँगन में, माँ! चंदन घोल देना तुम,
मेरे शब्दों की वाणी में, शहद भी घोल देना तुम।
मिले जब दृष्टि तो माँ! हर तरफ बस प्यार ही दिखे,
जहाँ नफरत की दीवारें, वो जड़ से छील देना तुम॥
2. रस और माधुर्य की याचना:
विराजो कंठ में आकर, मधुर झंकार बन करके,
बरस जाओ धरा पर माँ! प्रेम की धार बन करके।
सजे यह मंच गीतों से, सजे यह काव्य रश्मि से,
मेरे हर शब्द को माँ! रूप का श्रृंगार देना तुम॥

Saturday, February 14, 2026

शिव वंदना

         ॥ शिव-स्तुति ॥

जटाजूट सघन में, सोहै गंगधार शुभ,
गले बिराजै भुजंग, हार जो विकराल है

डम-डम डमरू की, गूँज उठै दशों दिश,
ताण्डव रचत शिव, नाम महाकाल है॥

भाल बाल-चन्द्र सोहै, मन्द-मन्द मुसक्याँहि,
तीजी आँख बीच जागै, अग्नि की कराल है।

लहरें अपार उठैं, पावन सुरसरी बीच,
काटत हैं काल शिव, रूप अ्ति-विशाल है॥

हिमालय-लाड़ली को, मन जो सदैव मोहैं,
करुणा की धार बहै, मेटैं पीर-जाल है।

सोहैं दिगम्बर वेश, ओढ़ें गज-खाल भारी,
भजौं भव्-भीरु भंजन, नटराज-हाल है॥

नीलकण्ठ विषधारी, कामदेव के विनाशी,
त्रिपुर के नाशक जो, जग के अधार है।

धूल और रत्न माहिं, राखत जो सम-दृष्टि,
मुक्ति के प्रदाता शिव, करत उद्धार है॥

          © खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
      मुंगेली छत्तीसगढ़,८१२००३२८३४

योग का प्रकाश

​योग का प्रकाश ​तन-मन को जो करे स्वस्थ, योग वही वरदान है, सच्ची शांति और खुशी का, यही सही विधान है। बीमारी को दूर भगाए, नई शक्ति का संचार कर...