Sunday, August 2, 2026

श्रावण मास महात्म्य स्तोत्रम (खेमेश्वर पुरी कृत)

 श्रावणमासमाहात्म्यस्तोत्रम् (खेमेश्वर पुरी कृत)

नमस्तस्मै महेशाय भक्तानां वरदायिने।
श्रावणस्य च मासानामधिपाय कपर्दिने॥

श्रावणो मङ्गलो मासः सर्वपापप्रणाशनः।
शिवपूजा-रतानां च सर्वसिद्धि-प्रदायकः॥

मासानां प्रवरो मासः शंभोः प्रियतमो मतः।
अत्र पूजा महेशस्य सर्वकामप्रदा नृणाम्॥

सोमवारेषु यः कुर्याच्छिवव्रतमखण्डितम्।
तस्य तुष्यति देवेशो ददाति विपुलं सुखम्॥

गङ्गाजलेन यो लिङ्गं सेचयेच्छ्रावणे मुदा।
तस्य नश्यन्ति पापानि जन्मकोटिसमुद्भवाः॥

बिल्वपत्रैः सुपुष्पैश्च त्रिदलैः कोमलैः शुभैः।
पूजयित्वा महादेवं सर्वपापैः प्रमुच्यते॥

चन्दनं कुङ्कुमं चैव अक्षतान् धूप-दीपकौ।
समर्प्य पार्वतीशाय लभते परमां गतिम्॥

पञ्चामृतैश्च यो लिङ्गं स्नापयेत् भक्तिभावतः।
तस्य गेहे स्थिरा लक्ष्मीः वर्धते च प्रजासुखम्॥

महामृत्युञ्जयं मन्त्रं यो जपत्यत्र भक्तितः।
तस्य मृत्युभयं नास्ति नीरोगः स च जीवति॥

रुद्राष्टाध्यायिनो मन्त्राः पद्यन्ते श्रावणे तु यैः।
तेषां गृहे सदा वासो भवानी-शङ्करोः ध्रुवम्॥

मङ्गलागौरी-व्रतं कुर्यू नारीणां सौभाग्यवर्धकम्।
अखण्डमङ्गलं तासां पुत्र-पौत्रादि-सम्पदः॥

नागपञ्चमी-दिने यो वै नागानां पूजनं चरेत्।
नागभीतिः न तस्यास्ति कुले तस्य सुखं भवेत्॥

पौर्णमास्यां तु यो धीमान् धारयेत् सूत्रमुत्तमम्।
रक्षासूत्रस्य माहात्म्यात् सर्वबाधा विनश्यति॥

कज्जली-तीज-पूजां च या करोति च कामिनी।
पतिव्रता-गुणाढ्या सा शिवलोकमवाप्नुयात्॥

अन्नदानं जलस्यापि दानं यः कुरुते शशी।
तस्य पुण्यमसंख्यातं लभते नात्र संशयः॥

विषं पीत्वा महादेवे जगद् रक्षितवान् पुरा।
श्रावणे तस्य पूजा हि सन्तापं हरति ध्रुवम्॥

नारायणोऽपि लोकेशः शेते नारायणो हरौ।
शिवः करोति जगतां पालनं श्रावणे विभुः॥

व्रतेनानेन लभ्यन्ते धर्म-कामाः सुखादयः।
अन्ते च लभते मुक्तिं शिवलोके महीयते॥

य इदं पठति स्तोत्रं श्रावणे नियमव्रती।
सर्वान् कामानवाप्नोति शिवभक्तिं च विन्दति॥

श्रावणस्य महात्म्यं तु शंभुना भाषितं पुरा।
इति स्तोत्रं समाप्तं हि शङ्करस्य प्रसाद्जम्॥

सर्वाधिकार सुरक्षित 
खेमेश्वर पुरी गोस्वामी (गृहावधूत)
मुंगेली छत्तीसगढ़,८१२००३२८३४

 सरल हिन्दी अर्थ

श्लोक १: उन भगवान् महेश को नमस्कार है जो भक्तों को वरदान देने वाले हैं, जटाधारी हैं और श्रावण मास के अधिपति देव हैं।
श्लोक २: श्रावण मास अति मङ्गलकारी और समस्त पापों का विनाश करने वाला है। जो इस मास में शिवजी की पूजा में लीन रहते हैं, यह मास उन्हें समस्त सिद्धियाँ प्रदान करता है।
श्लोक ३: श्रावण सभी महीनों में श्रेष्ठ और भगवान् शम्भु का सबसे प्रिय महीना माना गया है। इसमें महेश की पूजा मनुष्यों की सभी मनोकामनाओं को पूरा करती है।
श्लोक ४: जो व्यक्ति श्रावण के सोमवारों में अखण्ड (नियमपूर्वक) शिव व्रत करता है, उससे देवाधिदेव शिव प्रसन्न होकर उसे अपार सुख प्रदान करते हैं।
श्लोक ५: जो श्रावण मास में प्रसन्नतापूर्वक गङ्गाजल से शिवलिङ्ग का अभिषेक करता है, उसके करोडों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक ६: जो सुन्दर, कोमल और तीन पत्तों वाले शुभ बिल्वपत्रों तथा उत्तम पुष्पों से महादेव की पूजा करता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक ७: जो चन्दन, कुङ्कुम, अक्षत (चावल), धूप और दीप अर्पित करके पार्वतीपति शिव की उपासना करता है, वह परम गति (मोक्ष) को प्राप्त करता है।
श्लोक ८: जो भक्तिभाव से पञ्चामृत से शिवलिङ्ग को स्नान कराता है, उसके घर में लक्ष्मी का स्थिर वास होता है और वंश व सन्तान का सुख बढ़ता है।
श्लोक ९: जो इस महीने में भक्तिपूर्वक महामृत्युञ्जय मन्त्र का जप करता है, उसे मृत्यु का भय नहीं रहता और वह निरोगी होकर जीवन जीता है।
श्लोक १०: श्रावण में जिनके द्वारा रुद्राष्टाध्यायी के मन्त्रों का पाठ किया जाता है, उनके घर में भवानी और शङ्कर का सदैव वास रहता है, यह निश्चित है।
श्लोक ११: इस मास में स्त्रियाँ जो मङ्गलागौरी का व्रत करती हैं, वह उनके सौभाग्य को बढ़ाता है। उन्हें अखण्ड सौभाग्य, पुत्र और पौत्र आदि सम्पदाएँ प्राप्त होती हैं।
श्लोक १२: नागपञ्चमी के दिन जो मनुष्य नागों की पूजा करता है, उसे नागभय (सर्पभय) नहीं रहता और उसके कुल में सदा सुख रहता है।
श्लोक १३: श्रावण पूर्णिमा के दिन जो बुद्धिमान मनुष्य उत्तम रक्षासूत्र (रक्षाबन्धन) धारण करता है, उस रक्षासूत्र के प्रभाव से उसकी सभी बाधाएँ दूर हो जाती हैं।
श्लोक १४: जो स्त्री कज्जली तीज की पूजा करती है, वह पतिव्रता गुणों से युक्त होकर अन्त में शिवलोक को प्राप्त करती है।
श्लोक १५: जो मनुष्य इस मास में अन्नदान और जलदान करता है, उसे अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है, इसमें कोई सन्देह नहीं है।
श्लोक १६: प्राचीन काल में महादेव ने विषपान करके सम्पूर्ण संसार की रक्षा की थी; अतः श्रावण में उनकी पूजा करने से हृदय का समस्त सन्ताप दूर हो जाता है।
श्लोक १७: श्रावण के महीने में जब जगत्पति श्रीहरि विष्णु योगनिद्रा में होते हैं, तब सम्पूर्ण जगत् के पालन का दायित्व स्वयं सर्वव्यापी भगवान् शिव सँभालते हैं।
श्लोक १८: श्रावण के इस पवित्र व्रत से धर्म, काम और सुख आदि प्राप्त होते हैं तथा अन्त काल में प्राणी मुक्ति पाकर शिवलोक में पूजित होता है।
श्लोक १९: जो व्यक्ति श्रावण मास में नियम-व्रत का पालन करते हुए इस स्तोत्र का पाठ करता है, वह अपनी सभी मनोकामनाएँ पूरी करता है और शिवभक्ति प्राप्त करता है।
श्लोक २०: श्रावण मास का यह माहात्म्य स्वयं भगवान् शम्भु द्वारा पूर्वकाल में कहा गया था। भगवान् शङ्कर की कृपा से रचित यह स्तोत्र यहाँ पूर्ण होता है।

Friday, July 31, 2026

कागज़ की ही पटरियों पर यह रेल दौड़ती रही

कागज़ की ही पटरियों पर यह रेल दौड़ती रही

कागज़ की ही पटरियों पर यह रेल दौड़ती रही,
पुरानी उस बात को नए लिफाफे में मोड़ती रही।
सात सालों में काम का कोई अता-पता न था,
राजनीति मगर क्रेडिट के तार जोड़ती रही॥
​फीता वही, कैंची वही, बस नए मंच सजा दिए,
शहर-शहर में ढोल के बाजे फिर से बजा दिए।
जनता समझ रही है इस सियासत की चाल को,
झूठे-सच्चे वादों के जलवे फिर से दिखा दिए॥
​जिस बात का कलश सात साल पहले चढ़ाया गया,
उसी पुरानी बात पर फिर से फूल बरसाया गया।
ज़मीन पर एक ईंट भी आज तक न लग सकी,
मगर मंच से अपनी पीठ को फिर थपथपाया गया॥

              सर्वाधिकार सुरक्षित 
          ©खेमेश्वर पुरी गोस्वामी®
     मुंगेली, छत्तीसगढ़,८१२००३२८३४

Thursday, July 30, 2026

अंगूठाछाप जो बने हैं, राष्ट्र के विधाता आज

अंगूठाछाप जो बने हैं, राष्ट्र के विधाता आज

कुर्सी पर ऐंठ बैठे, एक ना अक्षर जाने,
कलम न पकड़ी जो, नियम बनाते हैं।
संसद की सभा बीच, जमाकर पाँव बैठे,
विद्या की किताब छोड़, दाँव ही चलाते हैं।
ज्ञान का न लेश मात्र, बनते महान फिर,
देश के नसीब पर, अंगूठा लगाते हैं।
वीर जो ज्ञानी थे वे, मौन साधे खड़े आज,
मूर्ख जन देश के ही, भाग्य को चलाते हैं।

पीएचडी की उपाधि को, हाथ में उठाये घूमें,
कागज़ के टुकड़ों पे, धूल ही जमाते हैं।
योग्य सब नौजवान, दर-दर भटकते हैं,
सूखी एक रोटी को भी, तरस ही जाते हैं।
प्रतिभा का जहाँ कभी, मान-सम्मान होता,
आज वहाँ चाटुकार, बाज़ी मार जाते हैं।
कलम की धार छोड़, माँगते हैं न्याय आज,
देश के ही कर्णधार, आँसू हैं बहाते हैं।

शास्त्रों को पढ़के भी जो, आस लगा बैठे थे जी,
काम नहीं मिलता तो, धैर्य टूट जाता है।
भूख की बुझाने आग, क्या ही उपाय करें,
न्याय जब रूठ जाता, पाप ही सुहाता है।
बाहुबल-छल को ही, राह मान लेते युवा,
अपराध-मार्ग पर, पाँव बढ़ जाता है।
ज्ञान का प्रकाश जहाँ, जगमग होना था जी,
अंधकार का ही राज, वहाँ छा ही जाता है।

जागो हे गुणी जन अब, नींद को त्याग दो सब,
अज्ञानी की सत्ता को, उखाड़ के फेंकिए।
कलम की शक्ति को ही, सिंह-सी दहाड़ बना,
विद्या की विजय ध्वजा, देश में दिखाइए।
अंगूठाछाप जो बने हैं, राष्ट्र के विधाता आज,
ज्ञान के सिंहासन पे, ज्ञानी को बिठाइए।
युवाओं की शक्ति से ही, बदलेगी भाग्य-रेखा,
न्याय का नया ही एक, सूर्य चमकाइए।


सर्वाधिकार सुरक्षित 
खेमेश्वर पुरी गोस्वामी (गृहावधूत)
मुंगेली छत्तीसगढ़,८१२००३२८३४

Monday, July 20, 2026

नया मंदिर स्टोरी ताला

भारत का एकलौता - अनोखा शिव मंदिर जहां रखवाली करते हैं प्रजापति दक्ष ,हाथ में लाठी लिए बने हैं द्वारपाल

राजा बलि करते हैं सिरदान तो वहीं मंदिर के गर्भगृह में नृत्य करते हैं भस्मासुर, योगियों को मिलती है दिव्य पुंज 

योग,ध्यान, तपस्या व विभिन्न पौराणिक कथाओं को परिलक्षित करती प्रतिमाएं व विभिन्न पशु-पक्षियों,जलचर-नभचरों की मुर्तियां मन मोह लेती हैं 


प्रस्तुति - न्यूज़लाइन नेटवर्क ,नई दिल्ली,भारत 

आलेख - खेमेश्वर पुरी गोस्वामी (धार्मिक प्रवक्ता/खोजी पत्रकार)

भारतवर्ष की संस्कृति व सभ्यता की विश्व पटल पर एक अलग व अनूठा स्थान है, वहीं पुरातत्व, प्राचीन मंदिरों व विभिन्न देवी देवताओं की मुर्तियों तथा इनके पीछे जुड़े इतिहास व पौराणिक कथाओं की प्रमाणिकता की रोमांचकता अपने आप में अद्वितीय है।

ठीक इसी तरह एक मंदिर है छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में। जिस स्थान पर यह मंदिर स्थित है वह इतिहास में कभी संगम ग्राम के नाम से जाना जाता था,व इसके नाम के पीछे कारण था छत्तीसगढ़ की महत्वपूर्ण नदी शिवनाथ व सहायक नदी मनियारी का संगम होना।
पर हम बात करते हैं वर्तमान नाम का तो इस स्थल को ताला के नाम से जाना जाता है जिसका अर्थ होता है नगर जहां कभी राजाओं का राजवाड़ा हुआ करता था।
यह ताला नामक स्थान अमेरी कापा गांव का ही हिस्सा है जहां विश्व प्रसिद्ध व भारत की सबसे प्राचीन मंदिरों में से ही दो मंदिर देवरानी - जेठानी मंदिर के लिए जाना जाता है।
देवरानी जेठानी मंदिर शिव को समर्पित मंदिर है। जहां शिव सती विवाह, रूद्रशिव,कई पौराणिक पात्र देवी देवताओं,नदी देवियां, पशु-पक्षियां, भूत-पिशाच व शिवगणों के साथ ऊंची मुर्तियां संजोए रखने में देश भर में अपना अलग स्थान बनाए हुए है।

यहां कई मुर्तियां ऐसी है जो विश्व भर में अपना अलग व अनूठा होने का प्रमाण देती है।कई मुर्तियां देश के विभिन्न मंदिरों में पाए गए मुर्तियों की तरह ही तो कई अद्वितीय व अद्भुत रहस्यों से भरे हुए हैं, जिनमें अभी तक सिर्फ रूद्रशिव की मुर्ति को जाना जाता रहा है।


पर हम आज बात करते हैं यहां सबसे विशेष जो मुर्ति है और सतयुग तथा शिवपुराण की एक वृहद व रोमांचित कर देने वाली कथा से जुड़ी है जो इस मंदिर को बनवाने वाले के शिव के प्रति प्रेम व भक्ति की समर्पण को पुरे विश्व में एक अनूठा पहचान देता है।

और वह अनुठा पहचान है कि, भगवान शिव के सबसे बड़े विरोध व शिव को शत्रु मानने वाले राजा दक्ष प्रजापति की मुर्ति को भगवान शिव के मंदिर में द्वारपाल बनाकर रखने को लेकर है।
जी हां यहां शिव पुराण में वर्णित राजा दक्ष प्रजापति को शिव मंदिर में द्वारपाल के रूप विराजित किया गया है जो शिव भक्ति को समर्पित मंदिर निर्माणकर्ता के भक्ति को परिभाषित करता है।

विश्व में व भारत में अनेकानेक शिव मंदिर है लेकिन ऐसा एक भी मंदिर नही जहां राजा दक्ष प्रजापति चौकीदारी करते हों मंदिर की रखवाली करते हों, कहीं न कहीं यह दक्ष के द्वारा सतयुग में शिव को अपमानित करने के कुत्सित प्रयास का बदला लेते हुए दक्ष को शिव के आगे उनका स्थान बताने का प्रयास किया गया है।
और इसकी प्रमाणिकता देती है राजा दक्ष प्रजापति की वह मुर्ति जो शिव पुराण के एक कथा के अनुसार राजा दक्ष प्रजापति को शिव जी ने बकरे का सिर लगाकर पुनर्जीवित किया था। और ताला के देवरानी शिव मंदिर में ठीक उसी रूप में बकरे के सिर रूपी राजा दक्ष प्रजापति को मंदिर की चौकीदारी सौंपी गई है। जिससे यह अद्वितीय व अद्भुत मंदिर पुरे देश भर में अपना एक अनूठा  पहचान रखता है।

यदि शिवभक्त इस विचित्र व अद्भुत तथा अद्वितीय मंदिर का दर्शन करना चाहते हैं तो एक बार ताला का देवरानी जेठानी मंदिर अवश्य आना चाहिए शिव के भक्ति के इस अनूठे उदाहरण रूपी मंदिर का दर्शन अवश्य करना चाहिए।

आइए जानते हैं कि भगवान शिव ने राजा दक्ष को क्यों लगाया था बकरे का सिर? 

माता सती और उनके पिता राजा दक्ष प्रजापति को आप लोग जानते ही होंगे. इसके अलावा आप लोगों ने माता सती कथा भी सुनी होगी. लेकिन क्या आप जानते हैं कि भगवान शिव में क्रोध में आकर राजा दक्ष का सिर काटकर उन्हें बकरे का सिर लगा दिया था.

उत्तरखंड के हरिद्वार में कनखल गांव में दक्षेश्वर महादेव मंदिर स्थित है. ये वहीं मंदिर है जहां राजा दक्ष ने एक भव्य यज्ञ का आयोजन किया था, जिसमें सभी देवी-देवताओं, ऋषियों और संतों को तो आमंत्रित किया गया था, परंतु भगवान शंकर को आमंत्रित नहीं किया गया था. राजा दक्ष द्वारा शिव का अपमान माता सती सहन नहीं कर पाई और यज्ञ की अग्नि में कूद कर अपने प्राण त्याग दिए थे. जब ये बात महादेव को पता लगी तो उन्होंने गुस्से में दक्ष का सिर काट दिया था. देवताओं के अनुरोध पर भगवान शिव ने राजा दक्ष को जीवनदान दिया और उस पर बकरे का सिर लगा दिया.

इसके बाद जब राजा दक्ष को अपनी गलतियों का एहसास हुआ और उन्होंने भगवान शिव से क्षमा मांगी. तब भगवान शिव ने घोषणा की कि वे अपने हृदय से शत्रुता का भाव‌ त्याग करें व सेवा में लगे।

शायद इसी कथा से अभिप्रेरित होकर ताला के इस शिव मन्दिर में राजा दक्ष प्रजापति को चौकीदारी दी गई या यूं कहें कि द्वारपाल के रूप में सेवादार बना कर शिश सेवक के रूप में दर्शाया गया है।

अब आपके मन में जरुर एक बार इस मंदिर में जाकर दर्शन लाभ लेने का विचार आ रहा होगा तो आइए जानते हैं ताला के इस मंदिर का पुरातत्विक इतिहास व सनातन धर्म में इस मंदिर की महत्ता क्या रही है।

ताला छत्तीसगढ़ राज्य का एक गाँव है। जहाँ तक मूर्तिकला पर्यटन और पुरातात्विक महत्व का सवाल है, ताला की मूर्तिकला कला सर्वोत्कृष्ट है। इसकी बेजोड़ सुंदरता कई पर्यटकों को छत्तीसगढ़ की ओर आकर्षित करती है।
ताला अपने दो मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है जिन्हें देवरानी और जेठानी कहा जाता है। यह बिलासपुर से लगभग 29 किलोमीटर दक्षिण में है। भारतीय मूर्तिकला और कला का एक उत्कृष्ट उदाहरण, ये मंदिर एक ही परिसर में स्थित हैं और एक-दूसरे के बगल में स्थित हैं, इनका नाम उनके आयामों के कारण पड़ा है। बड़े वाले को ग्रामीणों ने जेठानी (बड़ी भाभी) नाम दिया जबकि छोटे वाले को देवरानी या छोटी भाभी कहा जाने लगा। इस प्रकार, मंदिरों का नामकरण अपने आप में अनूठा है। शिव मंदिर के रूप में प्रसिद्ध ये मंदिर मनियारी नदी के तट पर स्थित हैं।
पुरातत्वविदों के अनुसार जेठानी और देवरानी मंदिर का निर्माण पांचवीं शताब्दी में हुआ था।

1984 में सरकार द्वारा संरक्षित स्मारक घोषित देवरानी मंदिर में वर्ष 1987-88 के दौरान की गई खुदाई में भगवान शिव की एक अत्यंत अनोखी मूर्ति सामने आई है।

आज जेठानी मंदिर जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है और मंदिर की केवल उत्कृष्ट रूप से गढ़ी गई मूर्तियाँ ही बची हैं। देवरानी मंदिर बेहतर तरीके से संरक्षित है, भारत की समृद्ध धार्मिक परंपराओं के उदाहरण के रूप में सीधा और ऊँचा खड़ा है। इन मंदिरों में हिंदू देवताओं के विभिन्न देवी-देवताओं, अर्ध देवताओं, जानवरों, पौराणिक आकृतियों, पुष्प चित्रण और विभिन्न ज्यामितीय और गैर ज्यामितीय रूपांकनों सहित विभिन्न प्रकार की मूर्तियाँ हैं।

जेठानी मंदिर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बना है। हालांकि, आंशिक रूप से उजागर होने के बावजूद, मंदिर की भूतल योजना स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। जेठानी मंदिर के आधार पर प्रवेश द्वार पर एक सुंदर चंद्रशिला है। मंदिर में गर्भगृह, अर्ध मंडप और अंतराल शामिल हैं। इसका प्रवेश द्वार तीन तरफ से है, यानी दक्षिण, पूर्व और पश्चिम। मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार तक सीढ़ियों की एक विस्तृत उड़ान के माध्यम से पहुंचा जा सकता है। मंदिर का निर्माण परतदार लाल-बलुआ पत्थर से किया गया है।

मंदिर की ओर जाने वाली सीढ़ियों पर सजावटी खंभे हैं। भगवान शिव के यक्षगान और भारवाहक गणों की आकृतियाँ उन पर उकेरी गई हैं। खंभे के आधार भाग को कुंभों से डिज़ाइन किया गया है जबकि स्तंभ के शीर्ष पर अमलका एक कलश पर टिका हुआ है। विशाल हाथी की मूर्तियाँ आंतरिक कक्षों के किनारों की रक्षा करती हैं, जो रहस्यमय माहौल में और अधिक राजसीपन जोड़ती हैं।

देवरानी मंदिर पूर्व दिशा की ओर मुख किए हुए है, मंदिर में कोई महत्वपूर्ण शिलालेख नहीं है।पहले चरण पर उत्कीर्ण हैं और द्वारपाल की छवि ।

देवरानी मंदिर में गर्भगृह, अंतराल, मुखमंडप और खुला स्थान है, जहां सीढ़ियों के माध्यम से पहुंचा जा सकता है तथा एक बड़ी चंद्र शिला है।

मुखमंडप में एक सुंदर द्वार है, जिस पर नदी देवी की छवि बनी हुई है। मंदिर के अंदर जाने वाले द्वार में पाँच जटिल पैटर्न वाली आयताकार सीमाएँ हैं। आंतरिक कक्ष के दरवाजों पर कलात्मक रूप से फूलदार लताएँ उकेरी गई हैं। यहाँ शिव और पार्वती की कई मूर्तियाँ हैं जो कई भागों में टूटी हुई हैं। गर्भगृह का हिस्सा बहुत क्षतिग्रस्त है।

इस परिसर में रुद्र शिव की एक विशाल मूर्ति है। यह खड़ी मुद्रा में 2.70 मीटर ऊंची एक अखंड विशाल मूर्ति है। इसमें असामान्य प्रतीकात्मक विशेषताएं हैं जो शरीर के अंगों के रूप में मानव और शेर के सिर के साथ-साथ विभिन्न जानवरों को दर्शाती हैं। एक पगड़ी सांपों की जोड़ी से बनी है। मूर्ति को सांप की आकृति से सजाया गया है। अन्य जानवरों में मोर को कानों की सजावट के रूप में दर्शाया गया है। भौंहें और नाक छिपकलियों से बनी हैं। ठोड़ी केकड़े के आकार की है। दोनों कंधों पर मगरमच्छों का चित्रण है। शरीर के विभिन्न हिस्सों में सात देव मानव सिर उकेरे गए हैं। ऊपर वर्णित असामान्य चित्रण के कारण, इस मूर्ति की पहचान अभी भी विद्वानों के बीच विवाद का विषय है।

इस मुर्ति के बारे आप इतना तो जानते हैं या कभी आए होंगे तो मंदिर प्रांगण में लगे पुरातत्व विभाग द्वारा प्रदर्शित इतिहास जरूर पढ़े होंगे पर इनका वर्णन करने वाले पुरातत्वविदों या  विभागीय अधिकारियों से कुछ हिस्सा छुट गया है जो आज आपको हम बताने वाले हैं जिनमें हैं मुर्ति में बना शिश्न का स्वरूप जो लम्बे शिर वाले बाघ के रूप में है व वहीं अण्डाशय दो कछुओं के रूप में दिखाई देता है तो वहीं मुर्ति में बने मानवीय मुछ मानवीय न होकर दो मीन, अर्थात दो मछलियों से मूछ बनाई गई हैं। वहीं भुजा में बाल हाथी का सुंड का आकार है तो मकर की आंखें शंख के रूप में बनाया गया है,तो वहीं जटाएं विभिन्न सर्प जाल सा प्रतीत होता है।

उक्त रूद्रशिव की  मुर्ति भले ही पुरातत्व वेत्ताओं में विवादों का विषय हो परंतु छत्तीसगढ़ी भाषा में जस गीत में वर्षों से उक्त मुर्ति की विशेषता से जुड़ी शिव जी भक्ति गीत गाई जाती है जिसमें नाग का माला बिच्छू का कुण्डल, पिरपिटिया सर्प का जटा सहित विभिन्न पशु-पक्षियों व जन्तुओं को शिव के आभूषण के रूप में वर्णित किया गया है जिससे यह मुर्ति छत्तीसगढ़ में शिव जी का ही माना जाता है।

यह भी जानें 

ताला मंदिर प्रांगण में कई ऐसी मुर्तियां व चित्र उकेरे गए हैं जिनका सीधा संबंध पौराणिक कथाओं से है, इसमें विभिन्न मुद्राओं में योग करते हुए चित्र तो वहीं दूसरी ओर तपस्या की साधना से अमरत्व के समान दिव्य पुंज प्राप्त करते हुए योगियों की मुर्तियां भी दिखाई देती है जो अपने आप में अद्भुत रहस्यों से परिपूर्ण है व कहीं न कहीं यहां के शिव मंदिर पूर्ण रूप से शिवपुराण कथा के अनुसार ही बनाई गई परिलक्षित होती है।

तो वहीं एक खण्डित मुर्ति इस तरह दिखाई देती है मानो राजा बली वामनावतार को अपना सिर दान कर रहे हैं और भगवान विष्णु वामनावतार में उनके सिर पर पैर रखे हुए हैं,बलि के मुर्ति के सिर के बराबर पूरा एक पैर चित्रित किया गया है।

ताला एक ऐसी भूमि है, जो अतीत की खूबसूरत मूर्तियों से समृद्ध है, जो रहस्य में दबी हुई हैं। धरती माता के गर्भ से उत्खनन करके, ताला में ऐसी कई प्रसिद्ध मूर्तियाँ संरक्षित की गई हैं। उनमें से एक है श्री चतुर्भुज कार्तिकेय की विश्व प्रसिद्ध मूर्ति, जो मयूरासन की मुद्रा में तारकासुर का वध करते हैं। भगवान गणेश की एक शानदार ढंग से गढ़ी गई मूर्ति, जो शांत चंद्रमा की ओर निडर होकर आकाश में उड़ रही है, भी यहाँ देखी जा सकती है। द्विमुखी भगवान गणेश अपने दाँत पकड़े हुए हैं और अपार शक्ति और गर्व का अनुभव कर रहे हैं। अर्धनारीश्वर, उमा-महेश, नागपुरुष और अन्य यक्ष मूर्तियों की मूर्तियाँ एक सुंदर, ऐतिहासिक रूप से समृद्ध भूमि की महान किंवदंतियों और कहानियों को बताती हैं। शालभंजिका की एक दुर्लभ पत्थर की मूर्ति और कई अन्य मूर्तियाँ पूरे मंदिर में बिखरी हुई हैं। मंदिर के गर्भगृह में नृत्य करते हुए भस्मासुर,तो वहीं विभिन्न शिलाखंडों में शिव सती विवाह के चित्र उकेरे हुए हैं।
 वैज्ञानिकों और पुरातत्वविदों ने विभिन्न जटिल मूर्तियों पर लंबे समय तक विचार किया है और फिर भी, उनकी उत्पत्ति रहस्य में डूबी हुई लगती है।
अक्सर मेकला के पांडुवंशियों के अभिलेखों में उल्लिखित संगमग्राम के रूप में पहचाने जाने वाले ताला शिवनाथ और मनियारी नदी के संगम पर स्थित है। देवरानी-जेठानी मंदिरों के लिए सबसे प्रसिद्ध, ताला की खोज जेडी वेल्गर ने की थी, जो 1873-74 में प्रसिद्ध पुरातत्वविद् अलेक्जेंडर कनिंघम के सहायक थे। इतिहासकारों ने दावा किया है कि ताला गांव 7-8वीं शताब्दी ईस्वी पूर्व का है।
ताला के पास स्थित सरगांव गांव है जो धूम नाथ मंदिर का दावा करता है। इस मंदिर में भगवान किरारी के शिव स्मारक हैं पुरातत्ववेत्ता और इतिहासकार जटिल रूप से तैयार की गई पत्थर की नक्काशी को देखकर मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। गांव में देवरानी जेठानी मंदिर परिसर का एक मंदिर परिसर है जो आधे खंडहर अवस्था में है। ऐसा माना जाता है कि इसे शरभपुरिया राजवंश के शासक राजप्रसाद की दो रानियों ने बनवाया था। पुरातत्वविदों का मानना है कि यह 5वीं या 6वीं शताब्दी का है। देवरानी मंदिर लाल बलुआ पत्थर से बना है जो मुख्य रूप से गुप्तकालीन पुरातात्विक शैली का है। जबकि जेठानी मंदिर कुषाण शैली का है। हालाँकि, प्राप्त विभिन्न उत्खनन खंडहर और मूर्तिकला-शैली हमें बताती है कि ताला में शासन करने वाले विभिन्न राजवंश भगवान शिव के भक्त और शिव धर्म के प्रचारक थे। शायद इसीलिए आज भी शिव भक्त विभिन्न अनुष्ठान करने और पवित्र महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने के लिए यहाँ मंदिरों में आते हैं। भगवान शिव के भक्त यहाँ अपनी प्रार्थना करते हैं और अन्य उत्खनन स्थलों को देखना भी पसंद करते हैं।

Sunday, July 19, 2026

चातुर्मास महात्म्यम्

चातुर्मास महात्म्यम्

सुप्ते देवे जगन्नाथे, आषाढ़े हरिवासरै।
चातुर्मास्यव्रतं कुर्यात्, सर्वपापप्रणाशनम् ॥१

हरौ शयानं देवेशे, यः करोति व्रतं नरः।
तस्य तुष्टो भवेद्विष्णुः, ददाति परमं पदम् ॥२॥

वेदेषु च पुराणेषु, शास्त्राणामवलोकने।
चातुर्मास्यसमो नास्ति, पावनो भुवि कश्चन ॥३॥

आहारं मैथुनं निद्रां, रागद्वेषमथापि च।
यः संयच्छति वर्षासु, स योगी नात्र संशयः ॥४॥

सात्त्विकं भोजनं कुर्यात्, अल्पं च वरवर्णिनि।
तामसं वर्जयेत्सर्वं, व्रती भूत्वा समाहितः ॥५॥

श्रावणे वर्जयेच्छाकं, दधि भाद्रपदे तथा।
दुग्धं च आश्विने मासि, कार्त्तिके द्विदलं त्यजेत् ॥६॥

भूमौ शयनं कुर्वीत, ब्रह्मचर्यपरायणः।
अक्षय्यं लभते पुण्यं, विष्णुलोकं स गच्छति ॥७॥

असत्यं न वदेत्क्वापि, क्रूरवादं च वर्जयेत्।
मौनव्रतं विशेषेण, कीर्तितं सर्वसिद्धिदम् ॥८॥

अहिंसा परमं धर्मं, मनसा वचसा गिरा।
पालयेत्सततं धीमान्, सर्वभूतहिते रतः ॥९॥

नित्यं स्नानं प्रकुर्वीत, प्रात:काले विशुद्धधीः।
गायत्रीं च जपेद्भक्त्या, संध्यावन्दनतत्परः ॥१०॥

दीपदानं प्रकुर्वीत, हरये चक्रपाणये।
अंधकारक्षयो यद्वत्, ज्ञानदीपस्तथा भवेत् ॥११॥

तुलसीं पूजयेन्नित्यं, प्रदक्षिणामथापि च।
यः करोति नरो भक्त्या, तस्य नश्यति पातकम् ॥१२॥

परनिन्दां न कुर्वीत, परवादं च वर्जयेत्।
आत्मवत्सर्वभूतेषु, पश्येन्नारायणं प्रभुम् ॥१३॥

अन्नदानं जलं दानं, वस्त्रदानं च कार्त्तिके।
यद्दत्तं चातुर्मास्येषु, तदक्षय्यं भवेद्भुवि ॥१४॥

विष्णुकीर्तनसक्तो यः, पुराणाश्रवणे रतः।
तस्य तिष्ठति गोविन्दः, हृदये नात्र संशयः ॥१५॥

एकभक्तेन नक्त वा, यः करोति व्रतं मुदा।
आरोग्यं लभते नित्यं, धनधान्यं च वर्धते ॥१६॥

कांस्यपात्रं त्यजेन्नित्यं, पलाशपत्रभोजनम्।
सर्वकामप्रदं प्रोक्तं, ऋषिसंघैः पुरातनैः ॥१७॥

कामं क्रोधं च लोभं च, मोहमदं तथापि च।
त्यक्त्वा भजति यः कृष्णं, स जीवन्मुक्त उच्यते ॥१८॥

प्रबोधिन्यां प्रबुद्धे तु, वासुदेवे जगद्गुरौ।
व्रतप्रतिष्ठां कुर्वीत, विप्रान्नारायणं स्मरन् ॥१९॥

एवं यः कुरुते भक्त्या, चातुर्मास्यव्रतं शुभम्।
इहामुत्र च सौख्यं च, लब्ध्वा याति हरेः पदम् ॥२०॥

॥ इति श्री गृहावधूत खेमेश्वर पुरी जी महाराज विरचितं चातुर्मास्य महात्म्य स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥


Saturday, July 18, 2026

वो अब नावों में चढ़कर, जल-भराव देखने आते हैं

वो अब नावों में चढ़कर, जल-भराव देखने आते हैं


यहाँ कंक्रीट के जंगल खड़े हर मोड़ पर कर दिए,
जो कुदरती थे बहने के, वो सारे रास्ते भर दिए।
दिखाकर 'स्मार्ट सिटी' का हसीं ख़्वाब इस ज़माने को,
हमारे तैरते शहरों को, बस तालाब कर दिए।

करोड़ों रुपए नालों की सफाई में बहाते हैं,
नतीजा 'ढाक के तीन पात' ही हर बार लाते हैं।
ये प्रशासनिक विफलता है कि पानी थम नहीं पाता,
मगर वो आपदा कह कर, ज़िम्मेदारी छुपाते हैं।

तराशा है शहर ऐसा कि मिट्टी अब बची ही नहीं,
जल संचयन और सीवरेज की सुध किसी ने ली नहीं।
बनाए फ्लाईओवर और इमारत तो ऊँची की,
मगर बुनियादी ढाँचे की, कभी चिंता कोई की नहीं।

वो वादे खोखले करके, हमें हर बार छलते हैं,
जलमग्न इन गलियों में, हमारे ख़्वाब गलते हैं।
बदलते मौसमों को दोष देकर बच निकलते हैं,
मगर हम हर बरस इस त्रासदी की आग में जलते हैं।

बना कर योजना काग़ज़ पे, वो अक्सर मुस्कुराते हैं,
मगर पहली ही बारिश में, सभी वादे बह जाते हैं।
जो कहते थे कि हम शहर को पेरिस बना देंगे,
वो अब नावों में चढ़कर, जल-भराव देखने आते हैं।

सर्वाधिकार सुरक्षित 
खेमेश्वर पुरी गोस्वामी 
मुंगेली छ.ग. ८१२००३२८३४

Friday, July 10, 2026

शहर या तालाब? बेतरतीब शहरीकरण और जल निकासी की विफलता

शहर या तालाब? बेतरतीब शहरीकरण और जल निकासी की विफलता

​लेखक: खेमेश्वर पुरी गोस्वामी 
मुंगेली छत्तीसगढ़ 8120032834

​मानसून की पहली कुछ बौछारें अक्सर मन को राहत देने वाली होती हैं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में भारतीय शहरों के लिए ये बौछारें 'आफत की बारिश' बनकर आ रही हैं। दिल्ली की पॉश कॉलोनियों से लेकर मुंबई की सड़कों तक और रायपुर के निचले इलाकों से लेकर बेंगलुरु के आईटी हब तक, हर शहर की कहानी एक जैसी है—आधे घंटे की मूसलाधार बारिश और सड़कें किसी विशाल तालाब में तब्दील। प्रश्न यह है कि क्या हमारा शहरी नियोजन (Urban Planning) प्रकृति की चुनौतियों के सामने घुटने टेक चुका है, या फिर यह 'विकास' की अंधी दौड़ में हमने अपनी ही कब्र खुद खोदी है?
आज हमारे शहर 'स्मार्ट' होने का दावा तो करते हैं, लेकिन उनकी धमनियां यानी जल निकासी व्यवस्था पूरी तरह 'मृत' हो चुकी हैं। हमने कंक्रीट के जंगल खड़े करने के लिए प्राकृतिक ढलानों को पाट दिया, जलभराव वाले तालाबों को मिट्टी से भरकर वहां बहुमंजिला इमारतें खड़ी कर दीं और शहरी विस्तार के नाम पर कुदरती जल निकासी के रास्तों को अवरुद्ध कर दिया। जब पृथ्वी की सतह को कंक्रीट की चादर से ढक दिया जाएगा, तो बारिश का पानी आखिर कहाँ जाएगा? धरती तो अब पानी सोखने के लिए बची ही नहीं है।
भारतीय शहरों का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि यहाँ 'विकास' का मतलब सिर्फ फ्लाईओवर और ऊंची इमारतें हो गई हैं, जबकि जल संचयन, सीवरेज नेटवर्क और स्टॉर्म वॉटर ड्रेनेज जैसी बुनियादी चीजों को हमेशा हाशिए पर रखा गया। दशकों पुराने ड्रेनेज सिस्टम पर आज की आबादी का भार है। नगर निगमों की सुस्ती का आलम यह है कि हर साल मानसून से पहले नालों की सफाई के नाम पर करोड़ों रुपये पानी में बहा दिए जाते हैं, लेकिन परिणाम वही 'ढाक के तीन पात'। अर्बन फ्लडिंग अब केवल प्रकृति का प्रकोप नहीं है, यह प्रशासनिक विफलता का जीता-जागता प्रमाण है।
जलवायु परिवर्तन ने मानसून के मिजाज को पूरी तरह बदल दिया है। 'कम समय में अत्यधिक बारिश' की घटनाएं अब आम हो गई हैं। हमारे पुराने शहर इस नई जलवायु वास्तविकता के लिए तैयार नहीं हैं। जब तक हम 'स्पंज सिटी' की अवधारणा—जहाँ शहर खुद पानी को सोखने और उसे संचित करने की क्षमता रखे—को नहीं अपनाएंगे, तब तक हर साल हम यही त्रासदी झेलने के लिए अभिशप्त रहेंगे।
शहरों को तालाब बनने से बचाने के लिए अब केवल खोखले वादों से काम नहीं चलेगा। पहली जरूरत है—शहरों के मास्टर प्लान का पुनर्निरीक्षण, जिसमें 'नेचर-बेस्ड सॉल्यूशंस' को प्राथमिकता दी जाए। वेटलैंड्स (आर्द्रभूमि) का संरक्षण अनिवार्य है, क्योंकि ये शहर के 'फेफड़े' और 'किडनी' दोनों का काम करते हैं। साथ ही, अतिक्रमण मुक्त ड्रेनेज और वर्षा जल संचयन को अनिवार्य रूप से लागू करना होगा।
शहरों का जलमग्न होना इस बात का अलार्म है कि हम प्रकृति के साथ संतुलन बनाने में बुरी तरह विफल रहे हैं। यदि समय रहते हमने जल निकासी की बुनियादी संरचना में सुधार नहीं किया, तो आने वाले समय में हमारे शहर रहने योग्य नहीं, बल्कि डूबने योग्य रह जाएंगे। विकास की चमक-धमक के नीचे दबी इस 'जल-त्रासदी' को अनदेखा करना अब आने वाली पीढ़ियों के प्रति एक बड़ा अपराध होगा। क्या हम अभी भी नहीं जागेंगे?

व्यवस्था और आम आदमी

व्यवस्था और आम आदमी

दफ्तर की धूल भरी फाइलें तो मौन खड़ी,
काम के बहाने हमें रोज दौड़ाते हैं।

टेबल के नीचे और बाबू की निगाहों में,
उम्मीदों के दीप यहाँ रोज बुझ जाते हैं॥

सफेद लिबास में हैं बैठे जो हुक्मरान,
आम आदमी की वे तो पीड़ा न बताते हैं।

फाइल के कागज़ों में दम तोड़ती है आस,
सिस्टम के चक्र में हम पिसते ही जाते हैं॥

सर्वाधिकार सुरक्षित 
खेमेश्वर पुरी गोस्वामी 
मुंगेली, छत्तीसगढ़ ८१२००३२८३४

Friday, June 26, 2026

कबीरदास जी को समर्पित

सत्य की राह दिखाई,
अज्ञान की रात मिटाई।

कबीर वाणी में है सार,
प्रेम का किया प्रसार।

छुआछूत का भेद तोड़ा,
राम नाम से नाता जोड़ा।

ऐसे संत कबीर महान,
कोटि नमन मेरा प्रणाम।

सर्वाधिकार सुरक्षित : खेमेश्वर पुरी गोस्वामी 
मुंगेली, छत्तीसगढ़,८१२००३२८३४

Monday, June 22, 2026

।। भारतवर्ष महात्म्य स्तोत्रम ।।

॥ भारतवर्ष महात्म्य स्तोत्रम् ॥

हिमालयोत्तमा यस्य शिरोदेशे विराजते।
सागरो यत्पदाम्भोजौ प्रक्षालयति नित्यशः ॥ १ ॥

पुण्यभूमिः सुविस्तारा भारतं नाम विश्रुतम्।
सर्वधर्मसमन्विता वसुधा रत्नगर्भिणी ॥ २ ॥

गङ्गा यमुना सिन्धुश्च पावनाः सरितो यतः।
पवित्रयन्ति च महीं स्वजलैः पुण्यदायिभिः ॥ ३ ॥

ऋषिभिर्ज्ञानिभिः पूर्णं तपोभूमिर्मनोहरा।
यत्र वेदोच्चरैर्दिव्यं वातावरणं वर्धते ॥ ४ ॥

पुण्यक्षेत्राणि यत्रैव काशी काञ्ची च पुष्करम्।
हरिद्वारं प्रयागं च मुक्तिं यच्छन्ति भूरिशः ॥ ५ ॥

ज्ञानस्य दीपका यत्र वेदान्तेषु प्रतिष्ठिताः।
सत्यं शिवं सुन्दरं च यत्र धर्मः प्रवर्तते ॥ ६ ॥

अहिंसा परमो धर्म इति यस्य च शासनम्।
वसुधैव कुटुम्बकमिदं राष्ट्रं वदत्यलम् ॥ ७ ॥

वीराः प्रसूयन्ते यत्र त्यागीनां भूमिरीदृशी।
देशभक्त्या समायुक्ताः प्राणान् त्यक्तुं च सन्नद्धः ॥ ८ ॥

प्राचीनसंस्कृतेर्धारा अविरलप्रवाहिनी।
परम्पराऽनुसारेण यत्र सदा प्रवर्धते ॥ ९ ॥

शौर्यं धैर्यं च शौचं च यत्र नित्यं विराजते।
विद्याविनयसम्पन्नाः सन्तो यत्र वसन्ति च ॥ १० ॥

ऋतूनां च समाहारः प्राकृतिकसौन्दर्यभूषितम्।
निखिलैर्गुणसम्पन्नं भारतं मे प्रियं सदा ॥ ११ ॥

रामस्य चरितं यत्र कृष्णस्य योगदर्शनम्।
बुद्धस्य करुणा यत्र महावीरस्य संयमः ॥ १२ ॥

अनेकताऽपि यत्रैव एकतायाः प्रकीर्तनम्।
विविधैः सम्प्रदायैस्तु संयतं देशगौरवम् ॥ १३ ॥

वेदपुराणशास्त्राणां उत्पत्तिस्थानमुत्तमम्।
सभ्यतायाश्च केन्द्रं वै भारतं विश्वमङ्गलम् ॥ १४ ॥

यत्र सन्ति गिरि श्रेष्ठाः काननानि च कुत्रचित्।
यत्र नद्यः प्रवहन्ति नन्दनं भारतं ततः ॥ १५ ॥

पुण्यं यशः च कीर्तिं च यदवाप्य नरा जनाः।
स्वर्गं विहाय इच्छन्ति भारतं भुवि मङ्गलम् ॥ १६ ॥

सर्वे भवन्तु सुखिनः प्रार्थना यत्र गीयते।
सर्वकल्याणकारिण्यां भुवि श्रेष्ठं च भारतम् ॥ १७ ॥

इतिहासस्य साक्षी वै सनातनी च संस्कृतिः।
यत्रैव जीवति सदा यस्याः कोऽपि न वारकः ॥ १८ ॥

अभिवाद्य महात्मानं भारतं पितृरूपिणम्।
प्रणमामि मुदा नित्यं धन्योऽहं भारतोद्भवः ॥ १९ ॥

इति भारतमाहात्म्यं पठतां भक्तिपूर्वकम्।
देशप्रेमं च वर्धेत सुखं चैव च वर्धते ॥ २० ॥

॥ इति श्री खेमेश्वर पुरी गोस्वामी विरचित भारतवर्षमहात्म्य स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
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॥ भारतवर्ष महात्म्य स्तोत्र: भावार्थ ॥

१. जिसके सिर (उत्तर) पर हिमालय पर्वत विराजमान है और जिसके चरणों को सागर नित्य धोता है, ऐसा यह भारतवर्ष है।

२. यह पुण्यभूमि भारत के नाम से विख्यात है, जो अत्यंत विस्तृत, सभी धर्मों को समाहित करने वाली और रत्नों की खान है।

३. जहाँ गंगा, यमुना और सिंधु जैसी पावन नदियाँ अपने पवित्र जल से इस धरती को सदा पुनीत करती हैं।

४. यह ऋषियों और ज्ञानियों से पूर्ण तपोभूमि है, जहाँ वेदों के उच्चार से दिव्य वातावरण सदैव बना रहता है।

५. जहाँ काशी, कांची, पुष्कर, हरिद्वार और प्रयाग जैसे पवित्र क्षेत्र हैं, जो मोक्ष प्रदान करने वाले हैं।

६. जहाँ वेदांतों में प्रतिष्ठित ज्ञान के दीपक जलते हैं और जहाँ 'सत्यं शिवं सुन्दरं' का धर्म मार्ग प्रशस्त है।

७. 'अहिंसा ही परम धर्म है'—यह जिसका शासन (नियम) है, और जो पूरे विश्व को ही 'वसुधैव कुटुम्बकम्' (एक परिवार) मानता है।

८. जहाँ वीर उत्पन्न होते हैं, यह त्यागियों की भूमि है, जहाँ के निवासी देशभक्ति के लिए प्राण देने को सदा तत्पर रहते हैं।

९. यहाँ की प्राचीन संस्कृति की धारा अविरल प्रवाहित है, जो परंपरा के अनुसार निरंतर आगे बढ़ रही है।

१०. जहाँ शौर्य, धैर्य और पवित्रता नित्य विराजते हैं, और जहाँ विद्या और विनय से युक्त संत निवास करते हैं।

११. जहाँ सभी ऋतुओं का संगम है, जो प्राकृतिक सौंदर्य से सुसज्जित है, ऐसा गुणों से संपन्न भारत मुझे सदैव प्रिय है।

१२. जहाँ राम का चरित्र है, कृष्ण का योग दर्शन है, बुद्ध की करुणा है और महावीर का संयम है।

१३. जहाँ अनेकता में भी एकता का गान होता है, और विभिन्न संप्रदायों के होते हुए भी देश का गौरव संयमित (जुड़ा हुआ) है।

१४. यह वेद, पुराण और शास्त्रों का उत्तम उत्पत्ति स्थान है, सभ्यता का केंद्र और विश्व का कल्याण करने वाला भारत है।

१५. जहाँ कहीं ऊंचे पर्वत हैं तो कहीं घने वन, और जहाँ नदियाँ बहती हैं; इसलिए यह भारत धरती का नंदनवन (स्वर्ग) है।

१६. यहाँ के पुण्य, यश और कीर्ति को प्राप्त करके मनुष्य स्वर्ग को छोड़कर इस मंगलकारी भारत में रहना चाहते हैं।

१७. जहाँ 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' (सभी सुखी हों) की प्रार्थना गाई जाती है, ऐसे सबका कल्याण करने वाले संसार में भारत श्रेष्ठ है।

१८. यह इतिहास का साक्षी है और इसकी सनातनी संस्कृति सदैव जीवित रहती है, जिसे कोई रोक नहीं सकता।

१९. पिता के स्वरूप वाले इस महान भारत को प्रणाम करके, मैं सदा आनंदपूर्वक नमन करता हूँ। मैं धन्य हूँ कि मेरा जन्म भारत में हुआ है।

२०. इस भारत महात्म्य को जो भक्तिपूर्वक पढ़ते हैं, उनका देशप्रेम बढ़ता है और जीवन में सुख की वृद्धि होती है।

।।श्री खेमेश्वर पुरी गोस्वामी कृत भारतवर्ष महात्म्य स्तोत्र सम्पूर्ण हुआ।।

मैं बनूँगा शिवाजी, मैं बनूँगा राणा सा

मैं बनूँगा शिवाजी, मैं बनूँगा राणा सा,

मैं बनूँगा शिवाजी, मैं बनूँगा राणा सा,
चंद्र बोस और भगत, बनूँ मैं बाबा सा।
सीने में हो आग तिरंगे की शान की,
सुनता रहूँ सदा गाथाएँ हिंदुस्तान की।

झाँसी वाली रानी बनूँ, मैं लडूंगी रण में,
मातृभूमि की सेवा हो, हर एक मेरे कण में।
सरोजिनी की वाणी जैसी शक्ति मैं पाऊँगी,
भारत माँ के गौरव को दुनिया को बताऊँगी।

महाराणा की तलवार बनूँ, मैं वीर अडिग रहूँ,
देश की रक्षा के खातिर, हर मुश्किल को सहूँ।
अशफ़ाक और बिस्मिल जैसा,बलिदान मैं जाऊँ,
स्वतंत्रता के इस दीप को, सदा जलाती जाऊँ।

आजाद की आज़ादी का, मैं मान बढ़ाऊँगा,
कलाम जैसा सपना, सच कर दिखाऊँगा।
वीरों की इस मिट्टी का, मैं कर्ज चुकाऊँगा,
भारत के इस गौरव को,विश्व में फैलाऊँगा।

तात्या की रण-नीति,मन में आज बसाएँगे,
मंगल की ललकार से,सोया देश जगाएँगे।
सुभाष 'आजाद हिंद', गौरव गान करेंगे हम,
भारत की हर ज़मीन का, मान बढ़ाएंगे हम।

पन्ना का त्याग महान, सदा याद रखेंगे,
वीरांगना अवंतीबाई सा,साहस साथ रखेंगे।
लाला के प्राणों की, आहुति याद दिलाती है,
हर भारतीय दिल में, एक क्रांति जगाती है।

मातृभूमि के चरणों में, हम शीश झुकाएंगे,
वीर सपूतों के पद-चिन्हों पर, आगे बढ़ जाएंगे।


सर्वाधिकार सुरक्षित : खेमेश्वर पुरी गोस्वामी 
मुंगेली, छत्तीसगढ़,८१२००३२८३४

Friday, June 19, 2026

योग का प्रकाश

​योग का प्रकाश

​तन-मन को जो करे स्वस्थ, योग वही वरदान है,
सच्ची शांति और खुशी का, यही सही विधान है।

बीमारी को दूर भगाए, नई शक्ति का संचार करे,
जीवन की हर बाधा को, यह सहज ही पार करे।

साँसों की लय में सिमटी, ब्रह्मांड की ये शक्ति है,
स्वयं को खुद से जोड़ने की, अनमोल यह भक्ति है।

आओ सब मिलकर अपनाएं, योग का यह पावन मार्ग,
योग ही तो है स्वस्थ जीवन का, सबसे सुंदर स्वर्ग।
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तन को दे नव स्फूर्ति,मन को दे शांति अपार।
योग ही है जीवन का,सच्चा सुखी आधार।

रोग मिटाए योग हमारा,शक्ति नई जगाता है।
स्वस्थ सुखी जीवन जीने का,राह यही दिखाता है।

सर्वाधिकार सुरक्षित : खेमेश्वर पुरी गोस्वामी 
मुंगेली, छत्तीसगढ़,८१२००३२८३४

Monday, June 15, 2026

॥ श्री हनुमत महात्म्य स्तुति ॥

     ॥ श्री हनुमत महात्म्य स्तुति ॥

अंजना-सुत विख्यातं, वायुपुत्रं महाबलम्।
रामभक्ति-रतं वीरं, नौमि संकट-भंजनम् ॥१॥

बालरूपेण गगनं, सूर्यमिन्दुं च मेनिरे।
फलमद्य विधायाशु, मुनि-शापं दधौ मुदा ॥२॥

वानराणां प्रवीणं तं, सुग्रीव-सचिवं शुभम्।
राम-लक्ष्मण-भक्तं तं, प्रणमामि मुहुर्मुहुः ॥३॥

सागरं लङ्घितं येन, विभीषण-विशारदम्।
लंका-दाहं कृतं येन, सीता-संदेश-हारकम् ॥४॥

संजीवन-धरं धीरं, द्रोण-पर्वत-धारिणम्।
लक्ष्मण-प्राण-दातारं, कालनेमि-विनाशनम् ॥५॥

राम-कार्य-रताकारं, स्वर्ण-कायोपमं प्रभुम्।
रावणस्य भयं येन, कृतं तं वीरमर्चये ॥६॥

सीता-रामाज्ञया नित्यं, राम-नाम-परायणम्।
ब्रह्मचारी महातेजा, सर्व-पाप-विनाशनम् ॥७॥

विश्वरूपं महावीर्यं, रामदूतं मनोहरम्।
सदा भक्ताभयकरं, हनुमन्तं नमाम्यहम् ॥८॥

॥ इति -खेमेश्वर-पुरी-गोस्वामी-विरचिता श्री हनुमत महात्म्य स्तुतिः संपूर्णा ॥

सर्वाधिकार सुरक्षित : खेमेश्वर पुरी गोस्वामी 
मुंगेली, छत्तीसगढ़,८१२००३२८३४

Sunday, June 14, 2026

॥ श्री राम संक्षेप रामायण स्तुति ॥

॥ श्री राम संक्षेप रामायण स्तुति ॥

अयोध्ययां सुजातोऽयं, पुत्रो दशरथस्य च।
विश्वामित्रमुनीन्द्रेण, रक्षितो हि महामखः॥ १॥

सीतास्वयंवरं दृष्ट्वा, भक्त्वा चापं महेश्वरम्।
विवाहं च विधायैव, गतो हि मिथिलां मुदा॥ २॥

कैकेय्या वरयाचेऽथ, वनवासो हि तस्य वै।
लक्ष्मणस्तेन सार्धं तु, जगाम च वनं तदा॥ ३॥

मायामृगवधार्थं तु, सीतापहरणं तदा।
हनुमन्तं समासाद्य, सुग्रीवेण सखा कृतः॥ ४॥

सेतुबन्धनं कृत्वा, लङ्कायां च प्रधर्षितम्।
रावणं सानुजं हत्वा, प्राप राज्यं सुखावहम्॥ ५॥

तमेवं रामचन्द्रं तं, भजामि सुगुणाकरम्।
प्रसन्नो भव मे देव, पाहि मां च जगत्पते॥ ६॥

॥ इति -खेमेश्वर-पुरी-गोस्वामी-विरचिता श्री राम स्तुतिः संपूर्णा ॥



अनुवाद:
अयोध्या में दशरथ के पुत्र के रूप में आपका जन्म हुआ और विश्वामित्र मुनि के यज्ञ की आपने रक्षा की।

आपने शिवजी का धनुष तोड़कर सीताजी से विवाह किया और मिथिला से प्रसन्नतापूर्वक लौटे।

कैकेयी के वरदान के कारण आपको वनवास मिला और लक्ष्मण के साथ आप वन को गए।

मायावी मृग के कारण सीता का अपहरण हुआ, फिर आपने हनुमान जी को प्राप्त किया और सुग्रीव से मित्रता की।

सेतुबंध बनाकर लंका पर विजय प्राप्त की, रावण का वध किया और पुनः अयोध्या आकर सुखद राज्य संभाला।

ऐसे गुणों के भंडार श्री रामचन्द्र जी को मैं भजता हूँ। हे देव! हे जगत्पति! आप मुझ पर प्रसन्न हों और मेरी रक्षा करें।


सर्वाधिकार सुरक्षित : खेमेश्वर पुरी गोस्वामी 
मुंगेली, छत्तीसगढ़,८१२००३२८३४

महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम् (भुजंगप्रयात छंद)

महिषासुरमर्दिनी  स्तोत्रम् (भुजंगप्रयात छंद) 

​१. गिरीशस्य पुत्री गिरीशस्य गेहे, सुमेदा प्रदात्री सुमेदा सदेहे।
विचित्रैव लीला विचित्रा विलासा, नता विष्णुना सा सदा विष्णुपासा॥

​२. सुरैर्वन्दिता चामरैः पूजिता सा, विनाशा विनाशा विनाशोदिता सा।
त्रिलोकी भवा पोषिता विष्णुमाया, दया सिंधु रूपा सदा विश्वजाया॥

​३. दनुर्वैरिणी दैत्यदंभी कृता सा, विनाशा विनाशा विनाशे स्थिता सा।
रमे भद्रकाली महानीलवर्णा, सदा विश्वमाता भवा दु:खहर्णा॥

​४. जगन्मातृका शैलजा शैलपुत्री, सदानन्ददात्री सुहासा सुमित्री।
प्रपन्नाभये शैलजा शैलकान्ता, विनाशा विनाशा सुरेन्द्रस्य हन्ता॥

​५. महाविघ्ननाशा महाशक्तिरूपा, विनाशा विनाशा सदा चारुरूपा।
विनाशा विनाशा विनाशा विनाशा, विनाशा विनाशा विनाशा विनाशा॥ (शत्रु-संहारक भाव)

​६. रणे युद्धमत्ता सुदुर्गा सुवीरा, महाशक्तिरूपा महातेजधीरा।
त्रिलोकी प्रपूज्या सदा विश्वमाता, विनाशा विनाशा विनाशा विनाशा॥

​७. इयं शैलपुत्री सदा विश्वरम्या, सुरैर्वन्दिता सा सदा पुण्यगम्या।
विनाशा विनाशा विनाशा विनाशा, जयं देहि देवि सदा विश्वदासा॥

​८. महाकालरूपा महाकालहन्त्री, विनाशा विनाशा विनाशा प्रदात्री।
सुपुष्पै: सदा पूजिता विश्वमाता, जयं देहि देवि सदा शैलजाता॥

॥ इति -खेमेश्वरपुरी-गोस्वामी-विरचिता महिषासुरमर्दिनी  स्तोत्रम् सम्पूर्णा ॥

भावार्थ
१. गिरीशस्य पुत्री गिरीशस्य गेहे...
जो हिमालय (गिरीश) की पुत्री हैं और हिमालय के ही घर में निवास करती हैं, जो परम बुद्धि (सुमेधा) प्रदान करने वाली हैं और साक्षात देह धारण किए हुए हैं। जिनकी लीलाएँ विचित्र हैं और विलास अद्भुत हैं, जो सदैव भगवान विष्णु द्वारा वंदित हैं और उन्हीं की शक्ति (विष्णुपासा) हैं, मैं उन देवी को प्रणाम करता हूँ।

२. सुरैर्वन्दिता चामरैः पूजिता सा...
देवताओं द्वारा वंदित और चमर से पूजी जाने वाली, दुष्टों का विनाश करने वाली, और विनाश के समय स्वयं प्रलय बनकर खड़ी होने वाली देवी। जो तीनों लोकों का भरण-पोषण करने वाली विष्णुमाया हैं और करुणा का सागर हैं, वही संपूर्ण जगत की जननी हैं।

३. दनुर्वैरिणी दैत्यदंभी कृता सा...
दानवों की शत्रु और दैत्यों का दंभ चूर करने वाली, विनाश के समय विनाश रूप में स्थित रहने वाली। जो लक्ष्मी (रमे) स्वरूपा, भद्रकाली और गहरे नीले रंग वाली हैं, वही विश्व की माता और संसार के दुखों को हरने वाली हैं।

४. जगन्मातृका शैलजा शैलपुत्री...
जगत की माता, पर्वत से उत्पन्न (शैलजा), शैलपुत्री, सदा आनंद देने वाली, सुंदर मुस्कान वाली और सुमित्र (भक्तों की अच्छी मित्र) हैं। जो शरणागत को अभय देने वाली और हिमालय की शोभा हैं, वे दुष्टों का विनाश करने वाली और सुरेन्द्र (इन्द्र) के शत्रुओं को मारने वाली हैं।

५. महाविघ्ननाशा महाशक्तिरूपा...
सभी बड़े विघ्नों का नाश करने वाली, महाशक्ति के रूप में स्थित, सदा सुंदर रूप धारण करने वाली। हे देवी! आप दुष्टों का विनाश करने वाली हैं (यहाँ 'विनाशा' का बार-बार प्रयोग शत्रु-संहार और दुष्ट प्रवृत्तियों के नाश के संकल्प को दर्शाता है)।

६. रणे युद्धमत्ता सुदुर्गा सुवीरा...
रणभूमि में युद्ध के लिए उन्मत्त, परम दुर्गा (जिसे कठिनता से पाया जा सके), महाशक्तिशाली, महातेजस्वी और धैर्यवान। तीनों लोकों द्वारा पूजी जाने वाली और विश्व की माता, आप दुष्टों का संहार करने वाली हैं।

७. इयं शैलपुत्री सदा विश्वरम्या...
यह हिमालय की पुत्री सदैव संपूर्ण विश्व में रमण करने वाली और पुण्य कर्मों से प्राप्त होने वाली हैं। हे देवी! आप दुष्टों का विनाश करें। आप विश्व की दासी (भक्तों) को सदैव विजय प्रदान करें।

८. महाकालरूपा महाकालहन्त्री...
आप महाकाल का स्वरूप हैं और महाकाल (समय/मृत्यु) का भी संहार करने वाली हैं। आप ही विनाशक हैं और आप ही सुख प्रदान करने वाली हैं। सुंदर पुष्पों से सदैव पूजी जाने वाली हे विश्वमाता! हे शैलजा! आप हमें सदैव विजय प्रदान करें।

सर्वाधिकार सुरक्षित :  खेमेश्वर पुरी गोस्वामी 
मुंगेली, छत्तीसगढ़,८१२००३२८३४

॥ श्री शिव स्तुति ॥ शार्दूलविक्रीडित,वसन्ततिलका छंद मिश्रित

​॥ श्री शिव स्तुति ॥

​जटाजालमध्ये वहति सुरनदी फेनधवला,
फणीन्द्रैः कण्ठालङ्कृतमिह विकालं च वपुषम्।
डमरू-ध्वनि-नादैरथ चण्ड-ताण्डव-रतं,
नमामि त्वं साक्षाच्छिवं महाकाल-रूपम् ॥१॥

​जटाजूटे गङ्गा लहरि-लहरी-खेलन-वती,
ललाटे चन्द्रोऽयं मलयज-सुगन्धोऽमृत-करः।
प्रदीप्ताग्नि-ज्वाला दहति मदनं भाल-विवरे,
प्रसीद त्वं देवं मम हृदये ध्यामि सततम ॥२॥

​गिरिराज-सुता-चित्त-रञ्जन-परं, सुखाधार-शिवं,
कृपा-दृष्टि-पातेन हरसि सकलं दुःख-जालम्।
तजित्वैव संसार-भीतिं विहाय, अहमेव सदा,
भजे विश्वनाथं हरं मोक्षदं दिव्य-रूपम् ॥३॥

​स्फुरन्मणिरत्न-प्रभा-रञ्जितं, दिशो वदनं यस्य,
गजाजिन-वस्त्रं तद्द्भुतं रूपमस्य सुशोभितम्।
विभूति-विलेपं धत्ते भूतनाथः स्वयं यः,
अचिन्त्यं सुभावं भजे शङ्करं देव-देवम् ॥४॥

​सुरेन्द्र-मुनीन्द्राः नतं यस्य पादं, धरन्तीह रेणुं,
जटाजूट-धृत्वा शशि-चकोर-कलां मोदमानाः।
भुजङ्गैः सुबद्धोऽथ कण्ठे विराजन्,
भजे तं शिवं शान्त-भावं मनोऽभिष्ट-दं मे ॥५॥

​ललाटे ज्वलन्ती ज्वलज्ज्वालमाला,
महाकाल-तेजः क्षयं कामदेवम्।
सुर-सिद्ध-संघे नतं तं सदा वै,
जटा-गुल्म-धारी हरं नूतनाहम् ॥६॥

​धगद्-धगद्-धगद्-धगद्-ज्वलच्छिखा-भाले,
मदनस्य बाणैः पुनरहुतिं ददाति।
गौरी-कुच-चित्र-लेखन-कुशलोऽसौ,
शिल्पी-वरोऽयं हरः प्राण-रूपः ॥७॥

​नव-मेघ-श्यामं तव कण्ठ-मूलं,
अमावास्या-वत् कान्ति-युक्तं च नित्यम्।
गजासुर-हन्तारं गङ्गा-धरं तं,
जगदाधार-रूपं भजे दुःख-शमनम् ॥८॥

​नीलोत्पल-दल-श्यामं कण्ठमस्य विलोक्यते,
कामस्य त्रिपुरस्यापि विनाशी देव-पूजितः।
दक्ष-यज्ञ-विनाशी च अन्तकस्यापि कालकः,
भजेऽहं भव-भीति-हारिणमखण्डं शिवं सदा ॥९॥

​मङ्गलायाः कलाभिर्युतं भृङ्ग-तुल्यं,
रसज्ञं प्रपन्नं रस-पान-लीनम्।
यमादीन् विजित्य स्थितं तं विभूतिं,
भजेऽन्तकस्याप्यन्तकं देव-नाथम् ॥१०॥

​फणोच्छ्वास-युक्तैः भुजङ्गैः समेतं,
मृदङ्गस्य नादैरथ ताण्डव-मग्नम्।
प्रचण्ड-प्रभावं कपालं धरन्तं,
शिवं मङ्गलं मङ्गलं सर्वदा मे ॥११॥

​सर्प-हार-रत्न-माला स्वर्ण-मृत्तिका-तुल्य-भावः,
शत्रु-मित्र-तुल्य-दृष्टिः सर्वदा समभावा।
सम-दृष्टि-स्थितं देवं चक्रवर्ति-रक्षकं,
भजे सदाशिवं भेद-हीनं च नित्यम् ॥१२॥

​गङ्गा-तटे कुञ्ज-गृहे वसामि,
मन्त्रं जपन् हस्त-युतं च शीर्षणम्।
त्यक्त्वा नयन-चापलं ध्यान-युक्तं,
प्राप्नोमि शिव-पदं सुख-रूपं सदा ॥१३॥

​इदं स्तोत्रं नित्यं पठति नर-देवः सुख-करम्,
विशुद्धः स आत्मा भवति शिव-भक्तिं च लभते।
मोह-जालं छित्वा मुक्तिं ददाति शम्भुः,
शरणं गच्छति तं परम-गतिं लभते नृपः ॥१४॥

​॥ इति -खेमेश्वर-पुरी-गोस्वामी-विरचिता श्री शिव स्तुतिः संपूर्णा ॥

भावार्थ 
 
१. जिनकी जटाओं में फेन जैसी श्वेत गंगा बहती है, जिनका कंठ सर्पों से सुशोभित है और जिनका रूप विकराल है, जो डमरू की ध्वनि के साथ तांडव में लीन रहते हैं, मैं उन महाकाल रूप साक्षात् शिव को प्रणाम करता हूँ।

२. जिनकी जटाओं में गंगा की लहरें क्रीड़ा करती हैं, जिनके मस्तक पर चंद्रमा विराजमान है और जो चंदन की सुगंध से सुवासित हैं। जिनके ललाट की अग्नि ने कामदेव को भस्म कर दिया, मैं उन देव को अपने हृदय में निरंतर धारण करता हूँ।

३. जो गिरिराज-पुत्री पार्वती के चित्त को प्रसन्न करने वाले और सुख के आधार हैं, जो अपनी कृपा दृष्टि से सभी दुखों को हर लेते हैं। मैं संसार के भय को त्यागकर, उन विश्वनाथ, मोक्ष प्रदाता और दिव्य रूप धारी शिव का भजन करता हूँ।

४. जिनके मुख की आभा मणियों और रत्नों की कांति से दिशाओं को प्रकाशित करती है, जो गजचर्म (हाथी की खाल) धारण करते हैं। जिनका शरीर विभूति (भस्म) से लिप्त है, मैं उन अचिंत्य, भूतनाथ शंकर को भजता हूँ।

५. जिनके चरणों को देवता और मुनि नमन करते हैं और जो जटाओं में चंद्रमा की कला को धारण कर प्रसन्न रहते हैं। जिनका कंठ सर्पों से सुशोभित है, मैं उन शांत भाव वाले शिव का भजन करता हूँ, जो मेरे मन की सभी इच्छाएं पूरी करें।

६. जिनके ललाट पर प्रज्वलित अग्नि की ज्वालाएँ कामदेव के विनाश का कारण बनीं, देवताओं और सिद्धों द्वारा पूजित, जटाओं को धारण करने वाले उन हर (शिव) को मैं निरंतर नमन करता हूँ।

७. जिनके ललाट पर 'धगद्-धगद्' शब्द करती हुई अग्नि की शिखाएँ हैं, जो कामदेव को पुन: भस्म कर देते हैं। जो गौरी (पार्वती) के अंगों पर चित्रकारी करने में कुशल हैं, वे शिल्पकार स्वरूप महादेव ही मेरे प्राण हैं।

८. जिनका कंठ नए मेघों के समान श्याम वर्ण का है, जो अमावस्या की भांति नित्य कांतिमान हैं। जो गजासुर का वध करने वाले और गंगा को धारण करने वाले हैं, मैं उन दुःख विनाशक जगत के आधार शिव का भजन करता हूँ।

९. जिनका कंठ नीले कमल के समान श्याम है, जो कामदेव और त्रिपुर के विनाशक हैं। जिन्होंने दक्ष के यज्ञ को नष्ट किया और जो यमराज के लिए भी काल हैं, मैं उन भव-भय से मुक्ति दिलाने वाले अखंड शिव का सदा भजन करता हूँ।

१०. जो कल्याणकारी कलाओं से युक्त, भृंग (भौरे) के समान रसज्ञ और आत्म-लीन हैं। जिन्होंने यम आदि को जीत लिया है और जो काल के भी काल हैं, मैं उन देव-नाथ का भजन करता हूँ।

११. जो सर्पों से युक्त हैं, मृदंग की थाप पर ताण्डव में मग्न हैं और हाथ में कपाल धारण किए हुए प्रचंड प्रभावशाली हैं, वे मंगलकारी शिव सदैव मेरा कल्याण करें।

१२. जो सर्प और रत्नों की माला धारण करते हैं, जिन्हें शत्रु और मित्र में कोई भेद नहीं है। जो सदैव समदर्शी हैं और संसार की रक्षा करने वाले हैं, मैं उन भेद-रहित सदाशिव का नित्य भजन करता हूँ।

१३. मैं गंगा तट के कुंज में निवास कर, शिव मंत्र का जप करते हुए अपने मन को चंचलता से हटाकर ध्यान में लीन रहता हूँ। इस प्रकार मैं उस सुख-स्वरूप शिव पद को प्राप्त करता हूँ।

१४. जो मनुष्य नित्य इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसका अंतःकरण शुद्ध हो जाता है और उसे शिव-भक्ति प्राप्त होती है। शम्भु उसके मोह के जाल को काटकर उसे मुक्ति प्रदान करते हैं और वह परम गति को प्राप्त होता है।

सर्वाधिकार सुरक्षित :  खेमेश्वर पुरी गोस्वामी 
मुंगेली, छत्तीसगढ़,८१२००३२८३४

श्री शिव स्तुति (अनुष्टुप छंद)


॥ श्री शिव स्तुति ॥

जटायां गंग-धारैव, नाग-हारो गले स्थितः।
डमरू-नाद-संयुक्तो, ताण्डवः शिव-शङ्करः ॥१॥

ललाटे चन्द्रमा भाति, गंगा-लहरी-शोभिता।
अग्नि-ज्वाला-जटालोऽयं, महादेवः प्रसीदतु ॥२॥

गिरीश-सुख-दः शम्भुः, कृपया हरते व्यथाम्।
अम्बर-स्थित-विश्वेशो, भव-भीतिं विनाशयेत् ॥३॥

मणि-दीप्तैः फणैः पूर्णः, गज-चर्माम्बरो हरः।
भूतनाथः प्रभुः साक्षाद्, अद्भुतं रूपमास्थितः ॥४॥

देवेन्द्राः नम्र-शीर्षाश्च, पाद-रेणुं प्रपद्यते।
चन्द्र-कला-विराजन्ते, जटा-जूटे च शोभनाः ॥५॥

भाल-पट्ट-स्थित-ज्वालैः, कामदेवो भस्मीकृतः।
मुनि-सिद्ध-गणैर्वन्दितः, जटा-जालो विराजते ॥६॥

अग्नि-ज्वाला-धगधगिता, काम-दहन-तत्परः।
पार्वती-चित्त-हर्ता च, शिवः शोभा-समन्वितः ॥७॥

नीलकण्ठो मेघ-वर्णः, अमावास्या-तमः-प्रभः।
गजासुर-हरः शम्भुः, जगदाधार-रूपकः ॥८॥

नील-पद्म-निभः कण्ठः, त्रिपुरासुर-नाशकः।
दक्ष-यज्ञ-हरः देवो, भव-भय-निवारकः ॥९॥

मंगला-रस-सिक्तश्च, भृङ्गरूपो महेश्वरः।
यम-काल-हरः श्रीमान्, अन्तकस्यापि अन्तकः ॥१०॥

नाग-राज-फुत्कारात्, भाल-अग्नि-प्रदीपनम्।
मृदंग-नाद-तालेन, ताण्डवः शिव-शङ्करः ॥११॥

सर्प-रत्न-समस्तं च, शत्रु-मित्रं समांशतः।
सम-दृष्टिः सदाशिवो, भेद-भाव-विवर्जितः ॥१२॥

गंग-तट-विहारोऽहं, मन्त्रं गास्यामि नित्यशः।
चन्द्र-भालं सदा ध्यात्वा, प्राप्स्यामि शिव-सद्गतिम् ॥१३॥

इदं स्तोत्रं पठेद यस्तु, शुद्ध-बुद्धिः प्रजायते।
मोह-जालं विनिर्मुच्य, शिव-सान्निध्यमाप्नुयात् ॥१४॥

॥ इति -खेमेश्वरपुरी-गोस्वामी-विरचिता श्री शिव-स्तुतिः सम्पूर्णा ॥

भावार्थ
​१. जिनकी जटाओं में गंगाजी विराजमान हैं, गले में नागों का हार सुशोभित है, जिनके डमरू की ध्वनि से संपूर्ण सृष्टि गुंजायमान होती है, वे ताण्डव करते हुए शिव-शङ्कर को मेरा नमन है।

​२. जिनके ललाट पर चंद्रमा चमकता है और गंगा की लहरें सुशोभित होती हैं, जिनकी जटाओं में अग्नि की ज्वालाएं प्रज्वलित रहती हैं, वे महादेव मुझ पर प्रसन्न हों।

​३. पर्वतों के स्वामी, सुख प्रदान करने वाले शम्भु, कृपा करके मेरी व्यथाओं को दूर करें। आकाश में स्थित, विश्व के ईश्वर, संसार के भय को नष्ट करें।

​४. जो मणियों से चमकते फण वाले नागों से सुसज्जित हैं, जिन्होंने गज-चर्म (हाथी की खाल) को वस्त्र के रूप में धारण किया है, वे भूतों के स्वामी प्रभु साक्षात् अद्भुत रूप में स्थित हैं।

​५. इंद्र जैसे देवता भी जिनके चरणों में नतमस्तक होकर चरणों की धूलि लेते हैं, जिनकी जटाओं में चंद्रमा की कलाएं अत्यंत शोभा पाती हैं।

​६. जिनके भाल (मस्तक) पर स्थित ज्वालाओं से कामदेव भस्म हो गए थे, मुनियों और सिद्धों के समूहों द्वारा वंदित, जटाओं के जाल में सुशोभित वे प्रभु को नमन है।

​७. अग्नि की ज्वालाओं से 'धग-धग' शब्द करते हुए, कामदेव का दहन करने के लिए तत्पर, पार्वतीजी के चित्त को हरने वाले, वे शिवजी परम शोभा से युक्त हैं।

​८. जिनका कंठ नील वर्ण का है, जो मेघ के समान गंभीर हैं, जिनका तेज अमावस की रात्रि के अंधकार के समान गहरा है, वे गजासुर का संहार करने वाले और जगत के आधार स्वरूप शम्भु को नमन है।

​९. जिनका कंठ नील कमल के समान है, जो त्रिपुरासुर का नाश करने वाले, दक्ष के यज्ञ को नष्ट करने वाले, और भव (संसार) के भय का निवारण करने वाले देव हैं।

​१०. जो कल्याणकारी रस में सिक्त हैं, भृंगी (शिवभक्त) रूप धारण करने वाले महेश्वर, काल के भी काल और यमराज के भी अंत करने वाले श्रीमान प्रभु को प्रणाम है।

​११. नागराज के फुफकारने से जिनके मस्तक की अग्नि प्रदीप्त होती है, मृदंग के नाद और ताल पर जो ताण्डव करते हैं, वे शिव-शङ्कर हैं।

​१२. जो सांपों के रत्न और अन्य सभी वस्तुओं में, शत्रु और मित्र में समान भाव रखते हैं। वे सदाशिव समदृष्टि हैं और भेद-भाव से रहित हैं।

​१३. मैं गंगा तट पर विहार करते हुए नित्य इस मंत्र का गान करूँगा। चंद्रमा को मस्तक पर धारण करने वाले शिव का ध्यान कर, मैं निश्चित ही शिव-सद्गति को प्राप्त करूँगा।

​१४. जो व्यक्ति शुद्ध बुद्धि के साथ इस स्तोत्र का पाठ करता है, वह मोह-जाल से मुक्त होकर शिव के सान्निध्य (निकटता) को प्राप्त करता है।


सर्वाधिकार सुरक्षित :  खेमेश्वर पुरी गोस्वामी 
मुंगेली, छत्तीसगढ़,८१२००३२८३४

Thursday, June 11, 2026

बरखा आई, मस्ती लाई! बाल कविता


बरखा आई, मस्ती लाई!


तप-तप तपती गरमी भागी,
देखो झूम के बरखा आई।
काले-काले बादल छाए,
अपने संग फुहारें लाए।

छत पर भागे चिंटू-मीना,
अब नहीं भाई घर में जीना!
"अम्मा, जाने दो ना बाहर,
भीगेंगे हम अबकी बार!"

नंगे पैर आँगन में आना,
छप-छप कर के शोर मचाना।
एक-दूजे पर पानी फेंकना,
हंसना और फिर आंखें मीचना।

कागज की एक नाव बनाई,
नीले पानी में तैराई।
"मछली रानी, रास्ता देना,
मेरी नैया पार लगा देना!"

बूँदें गिरतीं टिप-टिप-टिप,
मेंढक कूदें टर-टर-टिप।
भीग गए सब बाल-सखा अब,
खत्म हुई गरमी की रुत सब।


खेमेश्वर पुरी गोस्वामी "गृहावधूत"
मुंगेली छत्तीसगढ़,८१२००३२८३४

Wednesday, June 10, 2026

पिता

पिता को समर्पित एक रचना 

छोड़ दो किताब सारी, देख लो पिता का मुख,
चेहरे की झुर्री बीच, ज्ञान का जहान है।

धूप और छाँव सह, पालते रहे जो हमें,
त्याग और रूप उनका, देव के समान है।

​रिश्तों का विधान सिखा, जीवन सँवार दिया,
शीश जो झुकेगा यहाँ, बढ़ता महन है।

पूँजी है आशीष उनकी, राह जो दिखाते सदा,
तात के चरन बीच, झुकता गगन है।


        © खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
   मुंगेली छत्तीसगढ़ ८१२००३२८३४

Monday, June 8, 2026

कलम की धार और मर्यादा का गलियारा

कलम की धार और मर्यादा का गलियारा

साहित्य हमेशा से समाज का दर्पण रहा है। वह दर्पण, जो कभी मनुष्य के अंतर्मन की गहराइयों को कुरेदता है, तो कभी समाज की कुरीतियों पर प्रहार करता है। कलम के धनी लोग जब अपनी लेखनी उठाते हैं, तो उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे सभ्यता के शिल्पी बनेंगे। लेकिन, आज के दौर में कुछ लेखकों ने अपनी सृजनात्मकता का दायरा संकुचित कर लिया है।
आजकल साहित्यिक मंचों और सोशल मीडिया के पन्नों पर एक नया फैशन-सा चल गया है। कुछ रचनाकार अपनी 'विद्वता' को सिद्ध करने के लिए सनातन धर्म के ग्रंथों, देव-कथाओं और प्रतीकों को व्यंग्य का 'मसाला' बना रहे हैं। यह देखना विडंबनापूर्ण है कि जिस शब्दावली का उपयोग वे किसी समुदाय विशेष की आस्था को नीचा दिखाने या उस पर प्रहार करने के लिए कर रहे हैं, क्या वे वही साहस किसी अन्य संदर्भ में दिखाने का नैतिक बल रखते हैं?

व्यंग्य एक विधा है, जिसका उद्देश्य समाज का परिष्कार करना होता है, न कि किसी की श्रद्धा पर चोट करना। जब कोई लेखक किसी देवी-देवता के नाम या उनके पौराणिक आख्यानों को तोड़-मरोड़कर, उसे व्यंग्य का टाइटल या तुकबंदी का हिस्सा बनाता है, तो वह किसी 'उच्च बौद्धिक स्तर' का प्रमाण नहीं देता, बल्कि अपनी उस रुग्ण मानसिकता को प्रदर्शित करता है, जो संवाद की कला से अनभिज्ञ है।
यह समझना आवश्यक है कि 'धर्मनिरपेक्षता' का अर्थ किसी की आस्था का उपहास करना नहीं है। रचनात्मक स्वतंत्रता का झंडा लेकर चलना और बात है, और उसी झंडे की आड़ में किसी की आराध्य परंपराओं को अपमानित करना दूसरी बात।

महान साहित्य वही है जो जोड़ने का काम करता है। प्रेमचंद का 'ईदगाह' हो या रस्किन बॉन्ड की कहानियां, उनमें जो मानवीय संवेदनाएं हैं, वे किसी धर्म विशेष की सीमाओं में नहीं बँधीं। इसके विपरीत, यदि कोई लेखक अपनी पहचान बनाने के लिए दूसरों की भावनाओं को 'बलि का बकरा' बनाता है, तो वह साहित्यकार कम और विवाद का दलाल अधिक प्रतीत होता है।
साहित्य में तंज के लिए विषयों की कमी नहीं है। भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, सामाजिक विषमता, मानवीय संवेदनाओं का क्षरण—ये वे विषय हैं जिन पर कलम की स्याही भी सार्थक होगी और समाज को दिशा भी मिलेगी। लेकिन जब कलम का रुख किसी समाज की आस्था के केंद्रों की ओर मुड़ जाता है, तो वह साहित्य नहीं, बल्कि 'सांस्कृतिक विद्रूपता' बन जाता है।

लेखक का धर्म 'संवाद' है, 'विवाद' नहीं। यदि साहित्य के गलियारों में सनातनी ग्रंथों या देव-कथाओं का उपयोग केवल 'नीचा दिखाने' या 'सनसनी फैलाने' के लिए किया जा रहा है, तो यह उस लेखक की रचनात्मक निर्धनता का परिचायक है।
एक बेहतर समाज के निर्माण के लिए यह अनिवार्य है कि हम अपनी लेखनी को कुंठा के कीचड़ से बाहर निकालें। कला और साहित्य की सार्थकता इसी में है कि वह आलोचना करे, पर आहत न करे। व्यंग्य का अर्थ खंजर चलाना नहीं, बल्कि दर्पण दिखाना होना चाहिए, ताकि सामने वाला अपनी गलतियों को सुधार सके, न कि आहत होकर खड़ा हो जाए।
आखिरकार, कलम की असली ताकत शब्दों के चयन में ही नहीं, बल्कि उस गरिमा में भी है जिसे वह अपनी रचनाओं के माध्यम से जीवित रखती है।


©खेमेश्वर पुरी गोस्वामी®
मुंगेली छत्तीसगढ़,८१२००३२८३४

श्रावण मास महात्म्य स्तोत्रम (खेमेश्वर पुरी कृत)

  श्रावणमासमाहात्म्यस्तोत्रम् (खेमेश्वर पुरी कृत) नमस्तस्मै महेशाय भक्तानां वरदायिने। श्रावणस्य च मासानामधिपाय कपर्दिने॥ श्रावणो मङ्गलो मासः...