Sunday, February 22, 2026

सरस्वती वंदना

॥ भगवती सरस्वती वंदना ॥
श्वेत पदमासना माँ, ज्ञान की प्रकाश पुंज,
वीणा कर सोहै शुभ, रागिनी रसाल है।
हंस की सवारी साजे, मंद-मंद मुसक्याँहि,
वाणी की विधात्री मात, रूप विमलाल है॥
अंग आभा कुंद जैसी, शरद् मयंक मुख,
विद्या की प्रदात्री तू ही, काटती जंजाल है।
वेद औ’ पुराण गावें, महिमा अपार तेरी,
जड़ता विनाशिनी माँ, मति की मशाल है॥
ब्रह्म-मुख-वासिनी जो, सुरों की है प्राण-शक्ति,
शब्द-ब्रह्म रूप धरे, मेटती कु-चाल है।
मुनि-जन ध्यावें तोहे, शारदे कृपालु मात,
भक्तन के हेत सदा, रहती दयाल है॥
पंकज समान कर, पुस्तक विराजै सोहै,
अक्षर की जननी माँ, तू ही आदि-काल है।
'शून्य' को विस्तार देवे, बुद्धि की प्रदाता देवि,
तव शरण आए ताहि, होत निहाल है॥

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॥ शारदा स्तुति ॥
कुंद इंदु सम देह, श्वेत धारैं परिधान,
वीणा की झंकार माहिं, अमृत की धार है।
हंस पै विराजैं मातु, मन्द मुसकानि मन्द,
कंठ की मधुरता में, बसत संसार है॥
शुभ्र कर सोहैं जप-माला औ’ किताब नीकी,
अज्ञान की कालिमा को, करती संहार है।
अक्षर के दीप बारि, चित्त को उजास देति,
बुद्धि की अधिष्ठात्री, तू ही आधार है॥
राग रागिनी की सृष्टि, ताल छंद लय माहिं,
शब्द के श्रृंगार में, तिहारो उपकार है।
वाक-शक्ति दैके माँ, मौन को भी मुखर कीन्हों,
जाके शीश हाथ धरौ, बेड़ा वही पार है॥
शारदे भवानी तोहिं, शीश निवावौं बार-बार,
भक्तन की विनती ये, सुनौ माँ पुकार है।
ज्ञान के प्रकाश सों, हरो तुम मोह-तम,
मेटौ सब जड़ता को, विनती हमार है॥

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॥ कवि मंच वंदना: सरस्वती आह्वान ॥
शब्द के श्रृंगार सों, सजाऊँ माँ की आरती मैं,
कंठ में विराजिए, जो धारती सँवार है।
अक्षर के अर्क सों, मिटाइये अमावस को,
ज्ञान के प्रकाश को, मनावौं त्यौहार है॥
जड़ता की बेड़ियाँ, तड़ा-तड़ टूटि जावें,
वाणी में पियूष धार, बहैं अपरम्पार है।
कलम को धार दैके, सत्य को पुकार देहु,
काव्य के निकुंज में, तिहारो जय-जयकार है॥
तर्क की कसौटी पै, जो खरो-खरो उतरी है,
बुद्धि की अधिष्ठात्री, तू ही सूत्रधार है।
शून्य को अनंत करि, छंद की उमंग भरि,
सोती जो चेतना, जगावत झंकार है॥
हंस की सवारी साजे, मंद-मंद मुसक्याँहि,
कवि-कुल-मंडनी, तू ही माँ आधार है।
हाथ जोड़ि शीश नाय, विनती करत भक्त,
खोलि देहु ज्ञान-कोष, विनती हमार है॥
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॥ सरस्वती वंदना ॥
(मुखड़ा)
हे शारदे माँ! अज्ञानता का, घोर तम हर लीजिये,
सत्यम्-शिवम्-सुन्दरम से, कंठ को भर दीजिये।
हे शारदे माँ! अज्ञानता का, घोर तम हर लीजिये॥
(अंतरा - 1)
वीणा की झंकार से, सोई चेतना को जगा,
शब्दाक्षरों की जोत से, सोये हुए भाग्यो को जगा।
अमृतमयी माँ! ज्ञान की, अविरल धारा कर दीजिये,
हे शारदे माँ! अज्ञानता का, घोर तम हर लीजिये॥
(अंतरा - 2)
साहित्य के इस मंच पर, सुर-ताल का वरदान दे,
हर लेखनी को ओज दे, हर शब्द को सम्मान दे।
जड़ बुद्धि को चैतन्य कर, माँ! दिव्य दृष्टि दीजिये,
हे शारदे माँ! अज्ञानता का, घोर तम हर लीजिये॥
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"शब्द-ब्रह्म की साधना, सिद्ध करौ माँ आय।
कवि के कोमल हृदय में, बसौ शारदे माय॥"



"अंधेरे दिल के कोनों में, उजाला आप भर देना,
मरी जो भावनाएं हैं, उन्हें जीवित ही कर देना।
खड़ा हूँ द्वार पर माँ! हाथ में कागज कलम लेकर,
अधूरी रह न जाए बात, पूरी आप कर देना॥"

अँधेरे मन के कोनों में, उजाला भर दिया जाए,
जड़त की शुष्क धारा को, रसीला कर दिया जाए।
खड़ा हूँ द्वार पर माँ! रिक्त अंजलि ले के श्रद्धा की,
मेरे शब्दों के प्याले को, अमृत से भर दिया जाए॥

कलम की धार को माँ! सत्य की तलवार कर देना,
जगत के हर अँधेरे पर, कड़ा प्रहार कर देना।
झुकी जो गर्दनें अन्याय के आगे, उन्हें बल दे,
मेरी हर एक रचना को, सु-संस्कार कर देना॥

सृजन की इस इबादत को, मुकम्मल मोड़ दे देना,
मेरे बिखरे हुए लफ़्ज़ों को, डोरी जोड़ दे देना।
न झुकने पाए ये गर्दन, किसी भी स्वार्थ के आगे,
मेरी इस लेखनी को माँ! गजब का मरोड़ दे देना॥

मिले जो शब्द माँ! तुझसे, वो अनमोल रत्न हो जाएँ,
कि अज्ञानी जनों के चित्त भी, चैतन्य हो जाएँ।
बहे रसधार ऐसी मंच पर, तेरी कृपा से माँ,
कि सुनने वाले सारे लोग भी, धन्य हो जाएँ॥

सत्य की मशाल को, माँ! प्रज्ज्वलित कर दीजिये,
मेरी हर एक पंक्ति को, माँ! कल्पतरु कर दीजिये।
न लिखूँ मैं कभी भी, चाटुकारी का कोई शब्द,
मेरी इस लेखनी को, माँ! अडिग कर दीजिये॥

कंठ में विराजिए माँ! रागिनी बन जाइये,
शब्द की साधना में माँ! मोहिनी बन जाइये।
झूम उठे ये सदन, सुन के कवि की वेदना,
मेरे गीतों के सुरों की, स्वामिनी बन जाइये॥

"अंधेरों से लड़ने का, हुनर माँ से मिला है,
ये जो महक रहा है चमन, दुआ माँ से मिला है।
मैं जो कुछ भी कहूँगा, वो शब्द माँ के होंगे,
मुझे जो कुछ भी मिला है, वो माँ से मिला है॥"

न गीदड़ की भभकियों से, ये शेर कभी डरते हैं,
न संकट के पहाड़ों से, कदम पीछे को धरते हैं।
लिखी जाती है गाथाएँ, सदा बलिदान की स्याही,
वही तो शूरमा हैं जो, वतन की आन पे मरते हैं॥

धमनियों में रक्त नहीं, माँ का प्यार बहता है,
हृदय में बस वतन का, एक विचार रहता है।
मिटा देंगे धरा से हम, अधर्मों की हर एक छाया,
कि हर इक भारतीय में, अब साक्षात काल रहता है॥

1. शत्रुओं का संहार और कलम की शक्ति:
सिंह की दहाड़ जैसी, वाणी में हुंकार देहु,
दुष्टों के दलन हेतु, चण्डिका की धार है।
अक्षरों के बाण छूटें, तर्क के कमान सों माँ,
कायरों की भीड़ माँहि, मची हाहाकार है॥
काट दे अधर्म शीश, सत्य की कृपाण धरि,
राष्ट्र के कपूतन को, दीजै तू दुलार है।
लिखूँ जो लहू सों गाथा, अमर शहीद की मैं,
गूँज उठै दशों डगर, ऐसी ललकार है॥
2. राष्ट्र-भक्ति का शंखनाद:
मस्तक पै भाल सोहै, देश की मशाल हाथ,
लेखनी सों क्रांति ज्वाला, बारती अपार है।
सोती जो जवानी ओहि, झिंझोड़ि जगाय देहु,
रण के नगाड़ों जैसी, गूँजती पुकार है॥
काँप उठैं थर-थर, पापी औ’ अधर्मी सब,
शारदे भवानी! तेरे, शब्दों की ये मार है।
वीर-रस-धार बहै, रग-रग माँहिं आज,
मातृ-भूमि हेतु देह, करूँ मैं निसार है॥

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1. सौंदर्य और माधुर्य का चित्रण:
कुंद के सुमन जैसे, कोमल कपोल सोहैं,
अंग-अंग आभा मानों, बिजुरी की धार है।
चाँदनी की ओढ़नी माँ, धवल धारैं देह पर,
मंद-मंद हास माहिं, बसत बहार है॥
मृग नैनी शारदे माँ! मोहनी मूरत तोरी,
प्रेम की पीयूष-वृष्टि, करत उद्धार है।
शून्य मन-उपवन, महक उठै पुष्प सम,
पावन सुवास सों माँ! महकत संसार है॥
2. रस, ताल और संगीत का संगम:
वीणा की तरंगन में, सात सुर जागत हैं,
ताल और छंद माहिं, प्रेम को अभिसार है।
कोकिला की कूक जैसी, मिठास घोलि देहु माँ,
गीत-काव्य-कुंज माँहि, सुरीली झंकार है॥
भीगे हुए भाव जगें, हृदय की पीर मिटै,
शब्द के श्रृंगार सों माँ! कीन्हों श्रृंगार है।
रस के कलश ढोरि, सींचि देहु प्राण मेरे,
तव रूप देखि-देखि, भयो बेड़ा पार है॥

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कलम को तलवार बनाने का संकल्प:
नमन है शारदे तुमको, हृदय में जोश भर देना,
मेरी हर एक पंक्ति को, माँ! अंगारा कर देना।
लिखूँ मैं जब वतन की आन पर कोई भी कविता तो,
बुजदिल के भी हाथों में, माँ! तलवार धर देना॥
2. राष्ट्र के प्रति समर्पण:
भले ही प्राण जाएँ पर, न झुकने पाए ये मस्तक,
मेरे शब्दों की गूँजें माँ! गगन के पार हों दस्तक।
जगा दूँ सोई सोई चेतना, इस देश की पूरी,
बना देना मुझे माँ! राष्ट्र-वेदी का अमर रक्षक॥

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1. प्रेम और सौंदर्य का वरदान:
हृदय के सूने आँगन में, माँ! चंदन घोल देना तुम,
मेरे शब्दों की वाणी में, शहद भी घोल देना तुम।
मिले जब दृष्टि तो माँ! हर तरफ बस प्यार ही दिखे,
जहाँ नफरत की दीवारें, वो जड़ से छील देना तुम॥
2. रस और माधुर्य की याचना:
विराजो कंठ में आकर, मधुर झंकार बन करके,
बरस जाओ धरा पर माँ! प्रेम की धार बन करके।
सजे यह मंच गीतों से, सजे यह काव्य रश्मि से,
मेरे हर शब्द को माँ! रूप का श्रृंगार देना तुम॥

Saturday, February 14, 2026

शिव वंदना

         ॥ शिव-स्तुति ॥

जटाजूट सघन में, सोहै गंगधार शुभ,
गले बिराजै भुजंग, हार जो विकराल है

डम-डम डमरू की, गूँज उठै दशों दिश,
ताण्डव रचत शिव, नाम महाकाल है॥

भाल बाल-चन्द्र सोहै, मन्द-मन्द मुसक्याँहि,
तीजी आँख बीच जागै, अग्नि की कराल है।

लहरें अपार उठैं, पावन सुरसरी बीच,
काटत हैं काल शिव, रूप अ्ति-विशाल है॥

हिमालय-लाड़ली को, मन जो सदैव मोहैं,
करुणा की धार बहै, मेटैं पीर-जाल है।

सोहैं दिगम्बर वेश, ओढ़ें गज-खाल भारी,
भजौं भव्-भीरु भंजन, नटराज-हाल है॥

नीलकण्ठ विषधारी, कामदेव के विनाशी,
त्रिपुर के नाशक जो, जग के अधार है।

धूल और रत्न माहिं, राखत जो सम-दृष्टि,
मुक्ति के प्रदाता शिव, करत उद्धार है॥

          © खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
      मुंगेली छत्तीसगढ़,८१२००३२८३४

शिव तांडव - शिव स्तुति : अनुवादित रचना - गृहावधूत खेमेश्वर पुरी

॥॥ श्री शिव स्तुति : अनुवादित रचना॥॥
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जटा-जाल बीच खेलैं, देवनदी गंग-धार,
गले बीच सोहै हार, नाग विकराल है।

डम-डम डम-डम, डमरू की गूँज उठै,
चण्ड ताण्डव को ठानैं, शिव महाकाल है ॥१॥


जटा के कटाह बीच, गंगा लहरैयाँ लेत,
मस्तक पै चन्द्र सोहै, मन्द मुसकाय है।

धक्-धक् धक्-धक्, अग्नि भाल बीच जरै,
ऐसो रूप महादेव, मन को लुभाय है ॥२॥

गिरिराज-नन्दिनी के, सुख के निधान शिव,
कृपा की कटाक्ष-धार, मेटैं सब पीर को।

अम्बर ही चीर निज, मन में प्रमोद भरैं,
भजौं विश्वनाथ देव, तजौं भव-भीर को ॥३॥

फण की मणिन आभा, दिशा-मुख लाल करें,
कुंकुम की धार जैसे, अंग पै अनूप है।

गज-चर्म ओढ़ैं प्रभु, मद से भरे जो सदा,
भूतनाथ शिव जी को, अचरज रूप है ॥४॥

इन्द्र आदि देव-वृन्द, झुकावें जो शीश सदा,
चरणों की धूलि पावन, मस्तक पे सोहती।

नागराज हार बाँधे, जटा-जूट पे बिराजैं,
चन्द्र की चकोर-कला, सबके मन मोहती ॥५॥

भाल-पट्ट बीच जरै, अग्नि की प्रचण्ड धार,
काम-देव भस्म कियो, जाकी तेज-जाल ने।

इन्द्र हूँ नमावैं शीश, सिद्ध मुनि नमन करें,
सुधा-धार धारी शीश, जटा के गुलाल ने ॥६॥

धग-धग धग-धग, अग्नि भाल पे धधकै,
आहुति बनी है काम, मदन के बाण की।

पार्वती के कुच-अग्र, चित्र-कला रचने में,
कुशल जो शिल्पी शिव, शोभा उन प्राण की ॥७॥

नवीन जो मेघ-माला, श्याम कण्ठ बीच बसै,
अमावस रात जैसी, काली छटा छाई है।

गंगा-धर गजासुर, मारि के जो शान्त भये,
जग के अधार शिव, शोभा सुखदाई है ॥८॥

नील-पद्म पुंज सम, कण्ठ की सु-आभा फैलै,
काम और त्रिपुरा के, जो विनाशी देव हैं।

दक्ष-यज्ञ नाश कियो, अन्तक को मारि दीन्हो,
भजौं भव-भय-हारी, जो अखण्ड देव हैं ॥९॥

मंगला की सर्व-कला, मंजरी के रस-सिक्त,
भँवरे समान शिव, रस-पान ठाने हैं।

यमराज-काल और, काम-देव-हारी विभु,
अन्तक के अन्तक को, जग ने बखाने हैं ॥१०॥

फुँकारत नाग-राज, भाल-अग्नि को जगावैं,
धीमि-धीमि मृदंग की, बाज रही ताल है।

प्रचण्ड जो ताण्डव को, करत जो शम्भु आज,
मंगल ही मंगल को, करत कपाल है ॥११॥

सर्प-हार रत्न-माला, मिट्टी और स्वर्ण-टूक,
शत्रु-मित्र तृण-चक्षु, एक सम मानहीं।

प्रजा और चक्रवर्ती, सम-दृष्टि राखें सदा,
कदा भजौं सदाशिव, जो भेद न जानहीं ॥१२॥

गंग-तट कुंज-बीच, वास मैं करूँगो कब,
हाथ जोड़ि शीश-पर, मन्त्र शिव गावहूँ।

चंचल जो नैन त्यागि, भाल-चन्द्र ध्यान धरि,
परम सुखी मैं होइ, शिव-पद पावहूँ ॥१३॥

नित्य जो पढे़गा नर, स्तोत्र सुख-कारी यह,
शुद्धि पावै तन-मन, शिव-भक्ति पायगा।

मोह-जाल काटि प्रभु, मुक्ति के प्रदाता सदा,
शम्भु की शरण जाइ, परम गति पायगा ॥॥


           © खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
      मुंगेली, छत्तीसगढ़ - ८१२००३२८३४


महाशिवरात्रि महापर्व पर विशेष हार्दिक शुभकामनाएं,सादर ॐ नमो नारायण 🚩हर हर महादेव,जय सनातन 🚩

Friday, February 13, 2026

अमर बलिदान को नमन

॥ अमर बलिदान को नमन ॥

मातृ-सेवा हित जिये, राष्ट्र-प्रेम रंग रँगे,
प्राणों की समिधा देके, अमर वो हो गए।

वीरता की गाथा लिख, गगन को चूम लिया,
भारत के मान हेतु, चंदन से सो गए।।

पर्वत सा साहस था, सिंधु सा विशाल हृदय,
कर्तव्य की राह पर, पुष्प बन खो गए।

याद रखेगा जहाँ, उनकी शहादत को,
अमर तिरंगे बीच, ज्योति बन बो गए।।

          © खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
    मुंगेली, छत्तीसगढ़ ८१२००३२८३४

Monday, February 9, 2026

वर्तमान का कर्ण : युवा पीढ़ी

॥ वर्तमान का कर्ण : युवा पीढ़ी ॥

डिग्रियां हाथ लिए, द्वारे-द्वारे भटकता,
योग्यताओं का पिटारा, मौन खड़ा आज है।

पूँजीवाद चकाचौंध, घेरे खड़ी चारों ओर,
व्यथा वीर प्रतिभा की, सुनता समाज है॥

आरक्षण भँवर में, फँसा आज का ये कर्ण,
राजनीति की मार से, घायल ये मन है।

आँखों में सजे हैं स्वप्न, सेज संघर्षों की सजी,
तपते हुए पथों पे, झुलसता तन है॥

कुसंगति हाथ थाम, दुर्योधन मोह फँसे,
खोया निज मान-ज्ञान, कैसा ये विन्यास है।

नशे की हैं बेड़ियाँ ये, जकड़े हैं हाथ-पाँव,
मरे अरमान आज, बुझती सी प्यास है॥

उठो आधुनिक कर्ण, त्यागो मोह-जाल सब,
श्रम का चढ़ाओ चाप, भाग्य खुद गढ़ना।

बाधा छल-तंत्र वाली, रोक न सकेगी राह,
धर्म रूपी कर्म पथ, निरंतर बढ़ना॥

हृदय दुर्बलता को, त्याग कर आज खड़ा,
आत्म-बोध की मशाल, हाथ में जलाए जा।

अंगराज का साहस, रगों में प्रवाहित हो,
बाधाओं के पर्वतों को, धूल में मिलाए जा॥

कवच है तेरा श्रम, कुंडल आत्मविश्वास,
लक्ष्य की ही आँख देख, बाण को चलाए जा।

हार को स्वीकार नहीं, वीर है तू रण का रे,
विजय की गाथा यहाँ, जग को सुनाए जा॥


       © खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
   मुंगेली, छत्तीसगढ़ ८१२००३२८३४

Friday, February 6, 2026

सच्चे पत्रकार वही, लोकतंत्र की बाड़ हैं

जो सच को बेचकर के, मखमली बिस्तर बनाते हैं,
वो सत्ता के गलियारों में, जी-हुज़ूरी गुनगुनाते हैं।
कलम को गिरवी रख जो, नोट के तलवे चाटते हैं,
वो पत्रकार नहीं साहब, बस जूठन पे मुस्कुराते हैं।।

कलम को बेच खाया, ईमान को गँवा दिया,
सिक्कों की खनक पे जो, कमर मटकाते हैं।

अत्याचार देख जो तो, पट्टी बाँध आँखों बीच,
सत्ता की हवेली जाके, सोहर सुनाते हैं।।

चीखें अनसुनी करें, चाशनी में डूबे रहें,
झूठ के ही जाल बुन, जाल फैलाते हैं।

जनता की पीर तज, तलवे जो चाट रहे,
कलम के नाम पे वे, कलंक कहलाते हैं।।

सत्य की मशाल ले के, जुल्म से जो भिड़ जाते,
कायर न होते वे तो, शेर की दहाड़ हैं।

सत्ता के गलियारों में, शीश न झुकाते कभी,
दुखियों के दर्द वाली, ऊँची सी पुकार हैं।।

चाटुकार जो बने हैं, सिक्कों पे जो नाचते हैं,
कलम की साख पे वे, लगा रहे राड़ हैं।

बिकती न रूह जिनकी, झुकती न देह कभी,
सच्चे पत्रकार वही, लोकतंत्र की बाड़ हैं।।


           © खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
         मुंगेली,छ.ग. - 8120032834

Monday, February 2, 2026

कानून बनाने वाले : बस शोर ही मचाते हैं

सेल्फी खिंचवाते रहे, रिबन कटवाते रहे,
मुख्य अतिथि बन, मंच चमकाते हैं।

क्षेत्र में न दिखें कभी, दिल्ली में विलासी बनें,
जनता की भीड़ देख, हाथ को हिलाते हैं।।

लव और जिहाद रुका, न ही धर्मांतरण,
गौ-रक्षा हेतु मौन, शब्द न उगाते हैं।

मेज़ थपथपाने वाले, कानून बनाने वाले,
कानून न बना के, बस शोर ही मचाते हैं।।


            © खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
        मुंगेली, छत्तीसगढ़,8120032834

Sunday, February 1, 2026

बिरसा के वंशज उठो अब, गौरव गान सुनाना है।

मुक्तक : धरा की आन बचाने को, नया इतिहास लिखा था,
मिटाने दमन के साये, लहू से खास लिखा था।
जिन्हें 'धरती पिता' कहकर, ज़माना आज पूजता है,
उसी बिरसा ने जंगल में, विजय-विश्वास लिखा था।

चारों ओर कुहासा छाया, छद्म वेश का डेरा है,
भोली-भाली पावन धरती, को लालच ने घेरा है।
कोई बांटे नोट, कोई बस धर्म बदलने आया है,
अपनी ही जड़ों को काटने, ज़हरीला भ्रम छाया है।
पुरखों की मर्यादा का नित, हरण दिखाई देता है,
अपनों के ही हाथों अपना, मरण दिखाई देता है।
मौनव्रती बनकर रहने से, अधिकार नहीं मिल सकता,
झूठे वादों के पीछे अब, उजियार नहीं मिल सकता।

आत्मबोध की अलख जगाकर, नया सवेरा लाना है,
बिरसा के वंशज उठो अब, गौरव गान सुनाना है। (1)

मुक्तक : हुकूमत काँप उठती थी, गरजती जब कमानें थीं,
वो रॉबिनहुड था माटी का, जिसे रटती ज़बानें थीं।
नमन टंट्या को जो भूखों, की ख़ातिर लड़ गया सबसे,
उसी के शौर्य की गवाह, निमाड़ की सब ढलानें थीं।

सीधी-सादी बातों में अब, तुम मत फँसना भाइयों,
तोड़ रहे जो मेल-जोल, उन पर मत हँसना भाइयों।
नेता आते पाँच साल में, झूठे वादे करते हैं,
मंचों पर वो ऊँची-ऊँची, फर्जी बातें करते हैं।
मजहब के जो ठेकेदार हैं, घर में आग लगाते हैं,
संस्कृति को मिटाने खातिर, नया पाठ पढ़ाते हैं।
घात लगाये बैठे तुम पर, चौकन्ने मक्कार सभी,
अभी नहीं यदि जागे तुम तो, खो दोगे अधिकार सभी।

सत्य मार्ग को चुनकर तुमको, नई इबारत लिखना है,
टंट्या के वंशज उठो अब, जग को राह दिखाना है। (2)

मुक्तक : प्रथम हुंकार माटी की, उसी के तीर से निकली,
अटल आज़ादी की ज्वाला, उसी के वीर से निकली।
गिराया क्लीवलैंड को, झुकाया ज़ुल्म का परचम,
वो बाबा तिलका की हस्ती, बड़ी तक़दीर से निकली।


जल-जंगल-ज़मीन तुम्हारी, पुरखों की थाती है,
इस मिट्टी की रक्षा करना, जिम्मेदारी आती है।
केवल तीर-कमान नहीं, अब कलम भी उठाना सीखो तुम,
दुनिया की चालाकी को अब, पढ़ना-लिखना सीखो तुम।
बनो शांति के पथगामी, पर क्रांति पुत्र भी बने रहो,
अनाचार के सम्मुख हर क्षण, सीना ताने तने रहो।
शिक्षा के उजियारे से ही, स्वाभिमान बच पाएगा,
वैचारिक संग्राम लड़ोगे, तभी मान बच पाएगा।

ज्ञान-शक्ति को पाकर तुमको, अपना भाग्य बनाना है,
तिलका के वंशज उठो अब, स्वाभिमान चमकाना है। (3)

उठाकर 'हूल' का नारा, फिरंगियों को हिला डाला,
वो दो भाई जिन्होंने, सुलगता इक दिया पाला।
लड़े सिद्धू और कान्हू, कि अपना राज कायम हो,
मिटाया अपनी हिम्मत से, गुलामी का वो हर जाला।

मत भूलो तुम मान-मर्यादा, और अपनी पहचान को,
मत बदलो तुम स्वार्थ में आकर, पूर्वज के सम्मान को।
शोषण का प्रतिकार करो तुम, कर्म से अपने मत भागो,
आलस की चादर को त्यागो, कल्पित निद्रा से जागो।
अधिकार छीनना सीखो अब तुम, भीख किसी से मत माँगो,
वक्त आ गया है अब वीरों, धर्म-युद्ध में तुम जागो।
सत्य मार्ग पर चल कर अपनी, मंज़िल पाना सीखो तुम,
अधर्म की हर साज़िश को अब, धूल चटाना सीखो तुम।

शौर्य-बीज बोकर मिट्टी में, नन्दन वन मुस्काना है,
सिद्धू-कान्हू के वंशज उठो अब, नव-इतिहास रचाना है। (4)

Tuesday, January 27, 2026

छद्म सेवक

कुर्सी की हवस पाल, सेवक कहावत हैं,
भीतर कसाई रूप, बाहर सुजान हैं।

देश बेंच खात आज, गोदी में उघोगपति,
कर्ज के कुचक्र माहि, फँसा हिन्दुस्तान है।।

बिकती दवाइयाँ हैं, बिकती पढ़ाई यहाँ,
लूट के बाजार बीच, आम इंसान है।

महल चुनावी खड़े, नोटों की चिनाई होय,
झोपड़ी के भाग माहि, सूना खलिहान है।।

डिग्री की गठरी ले, डोलत सड़न माँहि,
मॉकरी करत नेता, डंडा ही विधान है।

संसद में गाली-गलौज, भ्रष्टाचार की मौज,
कैसा यह लोकतंत्र, कैसा संविधान है?

        © खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
        मुंगेली, छत्तीसगढ़, भारतवर्ष
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प्राण हो शरीर में तो, स्वाभिमान पुष्ट रखो

न झुक कर तुम कभी जीना, विजय का गान होने दो,
अँधेरों के विरुद्ध अब फिर, प्रखर उत्थान होने दो।
न बहना धार के संग तुम, नियति यह है नहीं अपनी,
लहर के बीच पौरुष का, सदा सम्मान होने दो।।

कायर जो होते वही, धारा संग बहते हैं,
मरी मछली की भाँति, नियति को सहते।

पौरुष न जिनमें है, मौन मुख धारण कर,
अन्याय की मार को भी, अपना ही कहते।।
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वीर वो कहाते जग, साहस दिखाते जो ही,
विपरीत लहरों में, जो कि सदा रहते।

सत्य की मशाल ले के, पथ पर बढ़ते सदा,
पाप के पहाड़ देख, कभी ना जो ढहते।।
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जीवित हो अगर तुम, चेतना जगाओ अब,
गलत का विरोध करो, वीर भाव गहते।

मौन जो रहेगा आज, काल उसे खाएगा ही,
क्रांति के स्वर ही यहाँ, युगों-युगों बहते।।
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बाधाओं को चीर कर, मार्ग जो बनाते वीर,
शौर्य की कहानी वही, दुनिया को कहते।

सोए हुए सोयेंगे ही, भाग्य के भरोसे बैठ,
जागे हुए योद्धा सदा, समर में दहते।।
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प्राण हो शरीर में तो, स्वाभिमान पुष्ट रखो,
जुल्म के आगे जो कभी, घुटने न टेकते।

जीवित की संज्ञा वही, पाता है जहाँ में यहाँ,
अन्याय के विरुद्ध जो ही, ज्वाला बन बहते।।
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Sunday, January 25, 2026

वंदे मातरम् बोल : खोल दे प्रगति द्वार - खेमेश्वर पुरी गोस्वामी

खेमेश्वर पुरी गोस्वामी विरचित काव्य संग्रह : गीत वंदे मातरम् 

> नसों में देश-भक्ति का, प्रबल तूफान पल जाए,
कदम जो बढ़ चलें आगे, हिमालय भी पिघल जाए।
धरा की अस्मिता पर जो, कभी भी आँख उठाएगा,
उसे अपनी ही ज्वाला में, जलाकर राख कर आएँ।।<


काल का कपाल चीरे, शत्रुओं का सत्व धीरे,
रण में जो वीर धीर, हुंकारे दहाड़ के।

अग्नि की लपट जैसे, इंकलाब जागे तैसे,
अस्मिता की रक्षा हेतु, बढ़े गिरि फाड़ के।।

वंदे मातरम् गूँजे, दनुज दल जो पूँजे,
रक्त से तिलक करें, काल चक्र मोड़ के।

शीश की चढ़ा के भेंट, गुलामी की जाल मेट,
सिंह से सपूत जागे, बेड़ियाँ ये तोड़ के।।
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शौर्य का प्रतीक बना, बिजली सा वेग बना,
काँप उठी राजधानी, नारों के मरोड़ से।

सुजलां सुफलां माता, शक्ति स्वरूपा यहाँ,
अमृत की धार बही, क्रांति के निचोड़ से।।

वंदे मातरम् मंत्र, फूँके तंत्र-मंत्र यंत्र,
वैरी सब थर्राए, प्राणों के ही छोड़ से।

राजेंद्र ने मान दिया, राष्ट्र को विधान दिया,
गूँजता है गान अब, अंबर के छोर से।।

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<चढ़ाएँ शीश चरणों में, यही अरमान रहता है,
हृदय के हर एक कोने में, हिंदुस्तान रहता है।
मिटा दें हम गुलामी के, बचे जो चिह्न बाकी हैं,
जुबां पर हर घड़ी वंदे, मातरम् गान रहता है।।>


कोटि-कोटि बाहु जागे, कायरता दूर भागे,
प्रलय का रूप जागे, राष्ट्र की पुकार पे।

मातृभूमि की वेदी पे, शीश चढ़े हँस-हँस,
अमिय की वर्षा हुई, खड्ग की ही धार पे।।

वंदे मातरम् गान, शत्रुओं का करे पान,
अंकुश है काल का ये, दुष्ट के प्रहार पे।

बलिदानी परम्परा, शौर्य से भरी ये धरा,
लिखी है विजय-गाथा, लहू की बौछार पे।।
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आँखों में अंगार भरे, सीने में हुंकार भरे,
वीर जो हुंकार भरे, मौत के भी द्वार पे।

झुके नहीं, रुके नहीं, काल से भी थके नहीं,
शक्ति का प्रचंड रूप, चंडी की कटार पे।।

वंदे मातरम् बोल, खोल दे विजय द्वार,
गूँजे यह मंत्र अब, अंबर के पार पे।

अखंड है प्रचंड है, भारती का चण्ड है,
नमन है कोटि बार, माँ के दरबार पे।।
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>उठो हे भारती पुत्रो, नया इतिहास गढ़ना है,
कठिन हो राह तो क्या है, सतत आगे ही बढ़ना है।
बनो तुम काल के सम्मुख, अडिग सा एक पर्वत अब,
विजई ध्वज विश्व-अंबर के, शिखर पर जा के जड़ना है।।<

उठो ओ जवान अब, थामो तुम कमान अब,
राष्ट्र का विधान अब, हाथ में तुम्हारे है।

छोड़ो तुम आलस को, तोड़ो अब जंजालों को,
सत्य के प्रकाश हेतु, पंथ ये पुकारे है।।

वंदे मातरम् गाओ, सोई है शक्ति जगाओ,
अग्रिम कतार बनो, संकट के द्वारे है।

ज्ञान की मशाल थाम, कर्म का तू कर काम,
भारत की शान तुझे, चोटी पे संवारे है।।
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बुद्धि बलवान रहे, ध्येय का ही ध्यान रहे,
ऊँचा यह निशान रहे, युगों के उजियारे में।

त्याग और तप सीख, माँगना न कोई भीख,
पुरुषार्थ को तू लिख, कर्म गलियारे में।।

वंदे मातरम् बोल, खोल दे प्रगति द्वार,
मंजिल पुकारती है, जीत के ही नारे में।

युवा है तू देश का रे, प्राण है तू भेष का रे,
चमक तू ध्रुव जैसा, अंबर के तारे में।।

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           © खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
           मुंगेली, छत्तीसगढ़, भारतवर्ष
            मोबाइल - ८१२००३२८३४

गणतंत्र दिवस 2026

*॥ गणतंत्र-महिमा ॥*

पूर्ण हुआ स्वप्न वहीं, शौर्य की वो गाथा बनी,
सत्ता अब हाथ जन-गण के सुहाती है।

पंद्रह अगस्त मिली, मुक्ति गोरे शासन से,
छब्बीस की सुुुबह, स्व-तन्त्र को जगाती है॥

लाहौर के तट लगा, गूँजने स्वराज मंत्र,
नेहरू की टेक आज, लक्ष्य को दिलाती है।

दो साल और ग्यारह, मास अठारह दिन,
संविधान-शक्ति जग, शीश को झुकाती है॥

भगत-आजाद-बोस, लहू से लिखी है नींव,
वीर बलिदानियों की, याद अकुलाती है।

कर्तव्य की राह चली, झाँकियाँ अनेक सजी,
भारत की एकता ही, विश्व को लुभाती है॥

मिटे भेद-भाव सारे, समता का दीप जले,
न्याय की मशाल सदा, राह को दिखाती है।

सीमा पे जवान डटे, देश की सुरक्षा हेतु,
तिरंगे की आन हमें, जीना ये सिखाती है॥

*🇮🇳शुभ गणतंत्र दिवस🇮🇳*

   © खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
   मुंगेली, छत्तीसगढ़,भारतवर्ष

Thursday, January 22, 2026

बसंत पंचमी 2026 काव्य - मुक्तक


🌸 सरस्वती वंदना एवं बसंत स्वागत 🌸

वीणा की झंकार से, गूँज उठा संसार,
ब्रह्मा की उस सृष्टि को, मिला दिव्य उपहार।
अज्ञान का तिमिर मिटे, ज्ञान ज्योति जल जाए,
शारदे माँ की कृपा से, सुधरे जीवन का सार।

सरसों की उन बालियों में, सोना सा मुस्काया है,
आमों की उस मौर ने, मादक राग सुनाया है।
पीले अम्बर, पीले केसर, पीली छटा चहुँ ओर,
ऋतुराज बसंत ने देखो, अपना कदम बढ़ाया है।

शिव-परिधि का योग बना, रवि किरणों की लाली है,
ज्ञान और विवेक की माँ, जगत की रखवाली है।
अबूझ मुहूर्त शुभ घड़ी, कर लो मंगल का श्रीगणेश,
सरस्वती की भक्ति से ही, आती खुशहाली है।

कलियों पर भँवरे मँडराए, कोयल कूक सुनाती है,
शुष्क पड़े उन हृदय-वनों में, नव-ऊर्जा भर जाती है।
बागीश्वरी माँ चरणों में, शीश झुकाए सारा जग,
बसंत की ये पंचमी, नव-बोध हमें कराती है।

बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं 💐 💐 

          © खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
         मुंगेली - छत्तीसगढ़, भारतवर्ष 
              मो.- ८१२००३२८३४

Tuesday, January 13, 2026

नव-चेतना का महापर्व : मकर संक्रांति


तिल-गुड़ की खुशबू महक उठी, नभ में उल्लास का डेरा है,
मिटा कुहासा जड़ता का, अब हुआ नया सवेरा है।
मकर राशि में सूर्य पधारे, किरणों ने ली अंगड़ाई,
अंधकार की हार हुई, और प्रकाश की जोत सवाई।

जैसे गरजे थे विवेकानंद, बन ज्ञान का दिव्य प्रकाश,
वैसे ही तपन बढ़ाकर सूर्य, भेद रहे अब नील आकाश।
उत्तरायण की यह पावन बेला, पुरुषार्थ का संदेश सुनाती,
कायरता को त्याग वीर, अब विजय-पथ पर कदम बढ़ाती।

तिल-गुड़ मिल जैसे एकाकार हुए हैं,
वैसे ही जन-जन के मन में, प्रेम-भाव संचार हुए हैं।
पतंगों सी ऊँची उड़ान हो, लक्ष्यों का संधान रहे,
धरा से जुड़े हों पाँव हमारे, पर छूना आसमान रहे।

काँप उठे सब शत्रु-भाव, जब सौहार्द की गंगा बहती,
दान-पुण्य और सेवा की यह, रीत सनातन हमसे कहती।
उठो युवा! तुम बनो सूर्य-सम, तपकर जग को राह दिखाओ,
भारत माँ के गौरव को तुम, फिर से शिखर पर पहुँचाओ।


           © खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
     मुंगेली, छत्तीसगढ़,8120032834

शुभ मकर संक्रांति! यह पर्व आपके जीवन में सूर्य जैसी प्रखरता और तिल जैसी मिठास लेकर आए।

Monday, January 12, 2026

अद्भुत रहस्यों से भरा मंदिर

भारत का एकलौता - अनोखा शिव मंदिर जहां रखवाली करते हैं प्रजापति दक्ष ,हाथ में लाठी लिए बने हैं द्वारपाल

राजा बलि करते हैं सिरदान तो वहीं मंदिर के गर्भगृह में नृत्य करते हैं भस्मासुर, योगियों को मिलती है दिव्य पुंज 

योग,ध्यान, तपस्या व विभिन्न पौराणिक कथाओं को परिलक्षित करती प्रतिमाएं व विभिन्न पशु-पक्षियों,जलचर-नभचरों की मुर्तियां मन मोह लेती हैं 


प्रस्तुति - न्यूज़लाइन नेटवर्क ,नई दिल्ली,भारत 

आलेख - खेमेश्वर पुरी गोस्वामी (धार्मिक प्रवक्ता/खोजी पत्रकार)

भारतवर्ष की संस्कृति व सभ्यता की विश्व पटल पर एक अलग व अनूठा स्थान है, वहीं पुरातत्व, प्राचीन मंदिरों व विभिन्न देवी देवताओं की मुर्तियों तथा इनके पीछे जुड़े इतिहास व पौराणिक कथाओं की प्रमाणिकता की रोमांचकता अपने आप में अद्वितीय है।

ठीक इसी तरह एक मंदिर है छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में। जिस स्थान पर यह मंदिर स्थित है वह इतिहास में कभी संगम ग्राम के नाम से जाना जाता था,व इसके नाम के पीछे कारण था छत्तीसगढ़ की महत्वपूर्ण नदी शिवनाथ व सहायक नदी मनियारी का संगम होना।
पर हम बात करते हैं वर्तमान नाम का तो इस स्थल को ताला के नाम से जाना जाता है जिसका अर्थ होता है नगर जहां कभी राजाओं का राजवाड़ा हुआ करता था।
यह ताला नामक स्थान अमेरी कापा गांव का ही हिस्सा है जहां विश्व प्रसिद्ध व भारत की सबसे प्राचीन मंदिरों में से ही दो मंदिर देवरानी - जेठानी मंदिर के लिए जाना जाता है।
देवरानी जेठानी मंदिर शिव को समर्पित मंदिर है। जहां शिव सती विवाह, रूद्रशिव,कई पौराणिक पात्र देवी देवताओं,नदी देवियां, पशु-पक्षियां, भूत-पिशाच व शिवगणों के साथ ऊंची मुर्तियां संजोए रखने में देश भर में अपना अलग स्थान बनाए हुए है।

यहां कई मुर्तियां ऐसी है जो विश्व भर में अपना अलग व अनूठा होने का प्रमाण देती है।कई मुर्तियां देश के विभिन्न मंदिरों में पाए गए मुर्तियों की तरह ही तो कई अद्वितीय व अद्भुत रहस्यों से भरे हुए हैं, जिनमें अभी तक सिर्फ रूद्रशिव की मुर्ति को जाना जाता रहा है।


पर हम आज बात करते हैं यहां सबसे विशेष जो मुर्ति है और सतयुग तथा शिवपुराण की एक वृहद व रोमांचित कर देने वाली कथा से जुड़ी है जो इस मंदिर को बनवाने वाले के शिव के प्रति प्रेम व भक्ति की समर्पण को पुरे विश्व में एक अनूठा पहचान देता है।

और वह अनुठा पहचान है कि, भगवान शिव के सबसे बड़े विरोध व शिव को शत्रु मानने वाले राजा दक्ष प्रजापति की मुर्ति को भगवान शिव के मंदिर में द्वारपाल बनाकर रखने को लेकर है।
जी हां यहां शिव पुराण में वर्णित राजा दक्ष प्रजापति को शिव मंदिर में द्वारपाल के रूप विराजित किया गया है जो शिव भक्ति को समर्पित मंदिर निर्माणकर्ता के भक्ति को परिभाषित करता है।

विश्व में व भारत में अनेकानेक शिव मंदिर है लेकिन ऐसा एक भी मंदिर नही जहां राजा दक्ष प्रजापति चौकीदारी करते हों मंदिर की रखवाली करते हों, कहीं न कहीं यह दक्ष के द्वारा सतयुग में शिव को अपमानित करने के कुत्सित प्रयास का बदला लेते हुए दक्ष को शिव के आगे उनका स्थान बताने का प्रयास किया गया है।
और इसकी प्रमाणिकता देती है राजा दक्ष प्रजापति की वह मुर्ति जो शिव पुराण के एक कथा के अनुसार राजा दक्ष प्रजापति को शिव जी ने बकरे का सिर लगाकर पुनर्जीवित किया था। और ताला के देवरानी शिव मंदिर में ठीक उसी रूप में बकरे के सिर रूपी राजा दक्ष प्रजापति को मंदिर की चौकीदारी सौंपी गई है। जिससे यह अद्वितीय व अद्भुत मंदिर पुरे देश भर में अपना एक अनूठा पहचान रखता है।

यदि शिवभक्त इस विचित्र व अद्भुत तथा अद्वितीय मंदिर का दर्शन करना चाहते हैं तो एक बार ताला का देवरानी जेठानी मंदिर अवश्य आना चाहिए शिव के भक्ति के इस अनूठे उदाहरण रूपी मंदिर का दर्शन अवश्य करना चाहिए।

आइए जानते हैं कि भगवान शिव ने राजा दक्ष को क्यों लगाया था बकरे का सिर? 

माता सती और उनके पिता राजा दक्ष प्रजापति को आप लोग जानते ही होंगे. इसके अलावा आप लोगों ने माता सती कथा भी सुनी होगी. लेकिन क्या आप जानते हैं कि भगवान शिव में क्रोध में आकर राजा दक्ष का सिर काटकर उन्हें बकरे का सिर लगा दिया था.

उत्तरखंड के हरिद्वार में कनखल गांव में दक्षेश्वर महादेव मंदिर स्थित है. ये वहीं मंदिर है जहां राजा दक्ष ने एक भव्य यज्ञ का आयोजन किया था, जिसमें सभी देवी-देवताओं, ऋषियों और संतों को तो आमंत्रित किया गया था, परंतु भगवान शंकर को आमंत्रित नहीं किया गया था. राजा दक्ष द्वारा शिव का अपमान माता सती सहन नहीं कर पाई और यज्ञ की अग्नि में कूद कर अपने प्राण त्याग दिए थे. जब ये बात महादेव को पता लगी तो उन्होंने गुस्से में दक्ष का सिर काट दिया था. देवताओं के अनुरोध पर भगवान शिव ने राजा दक्ष को जीवनदान दिया और उस पर बकरे का सिर लगा दिया.

इसके बाद जब राजा दक्ष को अपनी गलतियों का एहसास हुआ और उन्होंने भगवान शिव से क्षमा मांगी. तब भगवान शिव ने घोषणा की कि वे अपने हृदय से शत्रुता का भाव‌ त्याग करें व सेवा में लगे।

शायद इसी कथा से अभिप्रेरित होकर ताला के इस शिव मन्दिर में राजा दक्ष प्रजापति को चौकीदारी दी गई या यूं कहें कि द्वारपाल के रूप में सेवादार बना कर शिश सेवक के रूप में दर्शाया गया है।

अब आपके मन में जरुर एक बार इस मंदिर में जाकर दर्शन लाभ लेने का विचार आ रहा होगा तो आइए जानते हैं ताला के इस मंदिर का पुरातत्विक इतिहास व सनातन धर्म में इस मंदिर की महत्ता क्या रही है।

ताला छत्तीसगढ़ राज्य का एक गाँव है। जहाँ तक मूर्तिकला पर्यटन और पुरातात्विक महत्व का सवाल है, ताला की मूर्तिकला कला सर्वोत्कृष्ट है। इसकी बेजोड़ सुंदरता कई पर्यटकों को छत्तीसगढ़ की ओर आकर्षित करती है।
ताला अपने दो मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है जिन्हें देवरानी और जेठानी कहा जाता है। यह बिलासपुर से लगभग 29 किलोमीटर दक्षिण में है। भारतीय मूर्तिकला और कला का एक उत्कृष्ट उदाहरण, ये मंदिर एक ही परिसर में स्थित हैं और एक-दूसरे के बगल में स्थित हैं, इनका नाम उनके आयामों के कारण पड़ा है। बड़े वाले को ग्रामीणों ने जेठानी (बड़ी भाभी) नाम दिया जबकि छोटे वाले को देवरानी या छोटी भाभी कहा जाने लगा। इस प्रकार, मंदिरों का नामकरण अपने आप में अनूठा है। शिव मंदिर के रूप में प्रसिद्ध ये मंदिर मनियारी नदी के तट पर स्थित हैं।
पुरातत्वविदों के अनुसार जेठानी और देवरानी मंदिर का निर्माण पांचवीं शताब्दी में हुआ था।

1984 में सरकार द्वारा संरक्षित स्मारक घोषित देवरानी मंदिर में वर्ष 1987-88 के दौरान की गई खुदाई में भगवान शिव की एक अत्यंत अनोखी मूर्ति सामने आई है।

आज जेठानी मंदिर जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है और मंदिर की केवल उत्कृष्ट रूप से गढ़ी गई मूर्तियाँ ही बची हैं। देवरानी मंदिर बेहतर तरीके से संरक्षित है, भारत की समृद्ध धार्मिक परंपराओं के उदाहरण के रूप में सीधा और ऊँचा खड़ा है। इन मंदिरों में हिंदू देवताओं के विभिन्न देवी-देवताओं, अर्ध देवताओं, जानवरों, पौराणिक आकृतियों, पुष्प चित्रण और विभिन्न ज्यामितीय और गैर ज्यामितीय रूपांकनों सहित विभिन्न प्रकार की मूर्तियाँ हैं।

जेठानी मंदिर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बना है। हालांकि, आंशिक रूप से उजागर होने के बावजूद, मंदिर की भूतल योजना स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। जेठानी मंदिर के आधार पर प्रवेश द्वार पर एक सुंदर चंद्रशिला है। मंदिर में गर्भगृह, अर्ध मंडप और अंतराल शामिल हैं। इसका प्रवेश द्वार तीन तरफ से है, यानी दक्षिण, पूर्व और पश्चिम। मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार तक सीढ़ियों की एक विस्तृत उड़ान के माध्यम से पहुंचा जा सकता है। मंदिर का निर्माण परतदार लाल-बलुआ पत्थर से किया गया है।

मंदिर की ओर जाने वाली सीढ़ियों पर सजावटी खंभे हैं। भगवान शिव के यक्षगान और भारवाहक गणों की आकृतियाँ उन पर उकेरी गई हैं। खंभे के आधार भाग को कुंभों से डिज़ाइन किया गया है जबकि स्तंभ के शीर्ष पर अमलका एक कलश पर टिका हुआ है। विशाल हाथी की मूर्तियाँ आंतरिक कक्षों के किनारों की रक्षा करती हैं, जो रहस्यमय माहौल में और अधिक राजसीपन जोड़ती हैं।

देवरानी मंदिर पूर्व दिशा की ओर मुख किए हुए है, मंदिर में कोई महत्वपूर्ण शिलालेख नहीं है।पहले चरण पर उत्कीर्ण हैं और द्वारपाल की छवि ।

देवरानी मंदिर में गर्भगृह, अंतराल, मुखमंडप और खुला स्थान है, जहां सीढ़ियों के माध्यम से पहुंचा जा सकता है तथा एक बड़ी चंद्र शिला है।

मुखमंडप में एक सुंदर द्वार है, जिस पर नदी देवी की छवि बनी हुई है। मंदिर के अंदर जाने वाले द्वार में पाँच जटिल पैटर्न वाली आयताकार सीमाएँ हैं। आंतरिक कक्ष के दरवाजों पर कलात्मक रूप से फूलदार लताएँ उकेरी गई हैं। यहाँ शिव और पार्वती की कई मूर्तियाँ हैं जो कई भागों में टूटी हुई हैं। गर्भगृह का हिस्सा बहुत क्षतिग्रस्त है।

इस परिसर में रुद्र शिव की एक विशाल मूर्ति है। यह खड़ी मुद्रा में 2.70 मीटर ऊंची एक अखंड विशाल मूर्ति है। इसमें असामान्य प्रतीकात्मक विशेषताएं हैं जो शरीर के अंगों के रूप में मानव और शेर के सिर के साथ-साथ विभिन्न जानवरों को दर्शाती हैं। एक पगड़ी सांपों की जोड़ी से बनी है। मूर्ति को सांप की आकृति से सजाया गया है। अन्य जानवरों में मोर को कानों की सजावट के रूप में दर्शाया गया है। भौंहें और नाक छिपकलियों से बनी हैं। ठोड़ी केकड़े के आकार की है। दोनों कंधों पर मगरमच्छों का चित्रण है। शरीर के विभिन्न हिस्सों में सात देव मानव सिर उकेरे गए हैं। ऊपर वर्णित असामान्य चित्रण के कारण, इस मूर्ति की पहचान अभी भी विद्वानों के बीच विवाद का विषय है।

इस मुर्ति के बारे आप इतना तो जानते हैं या कभी आए होंगे तो मंदिर प्रांगण में लगे पुरातत्व विभाग द्वारा प्रदर्शित इतिहास जरूर पढ़े होंगे पर इनका वर्णन करने वाले पुरातत्वविदों या विभागीय अधिकारियों से कुछ हिस्सा छुट गया है जो आज आपको हम बताने वाले हैं जिनमें हैं मुर्ति में बना शिश्न का स्वरूप जो लम्बे शिर वाले बाघ के रूप में है व वहीं अण्डाशय दो कछुओं के रूप में दिखाई देता है तो वहीं मुर्ति में बने मानवीय मुछ मानवीय न होकर दो मीन, अर्थात दो मछलियों से मूछ बनाई गई हैं। वहीं भुजा में बाल हाथी का सुंड का आकार है तो मकर की आंखें शंख के रूप में बनाया गया है,तो वहीं जटाएं विभिन्न सर्प जाल सा प्रतीत होता है।

उक्त रूद्रशिव की मुर्ति भले ही पुरातत्व वेत्ताओं में विवादों का विषय हो परंतु छत्तीसगढ़ी भाषा में जस गीत में वर्षों से उक्त मुर्ति की विशेषता से जुड़ी शिव जी भक्ति गीत गाई जाती है जिसमें नाग का माला बिच्छू का कुण्डल, पिरपिटिया सर्प का जटा सहित विभिन्न पशु-पक्षियों व जन्तुओं को शिव के आभूषण के रूप में वर्णित किया गया है जिससे यह मुर्ति छत्तीसगढ़ में शिव जी का ही माना जाता है।

यह भी जानें 

ताला मंदिर प्रांगण में कई ऐसी मुर्तियां व चित्र उकेरे गए हैं जिनका सीधा संबंध पौराणिक कथाओं से है, इसमें विभिन्न मुद्राओं में योग करते हुए चित्र तो वहीं दूसरी ओर तपस्या की साधना से अमरत्व के समान दिव्य पुंज प्राप्त करते हुए योगियों की मुर्तियां भी दिखाई देती है जो अपने आप में अद्भुत रहस्यों से परिपूर्ण है व कहीं न कहीं यहां के शिव मंदिर पूर्ण रूप से शिवपुराण कथा के अनुसार ही बनाई गई परिलक्षित होती है।

तो वहीं एक खण्डित मुर्ति इस तरह दिखाई देती है मानो राजा बली वामनावतार को अपना सिर दान कर रहे हैं और भगवान विष्णु वामनावतार में उनके सिर पर पैर रखे हुए हैं,बलि के मुर्ति के सिर के बराबर पूरा एक पैर चित्रित किया गया है।

ताला एक ऐसी भूमि है, जो अतीत की खूबसूरत मूर्तियों से समृद्ध है, जो रहस्य में दबी हुई हैं। धरती माता के गर्भ से उत्खनन करके, ताला में ऐसी कई प्रसिद्ध मूर्तियाँ संरक्षित की गई हैं। उनमें से एक है श्री चतुर्भुज कार्तिकेय की विश्व प्रसिद्ध मूर्ति, जो मयूरासन की मुद्रा में तारकासुर का वध करते हैं। भगवान गणेश की एक शानदार ढंग से गढ़ी गई मूर्ति, जो शांत चंद्रमा की ओर निडर होकर आकाश में उड़ रही है, भी यहाँ देखी जा सकती है। द्विमुखी भगवान गणेश अपने दाँत पकड़े हुए हैं और अपार शक्ति और गर्व का अनुभव कर रहे हैं। अर्धनारीश्वर, उमा-महेश, नागपुरुष और अन्य यक्ष मूर्तियों की मूर्तियाँ एक सुंदर, ऐतिहासिक रूप से समृद्ध भूमि की महान किंवदंतियों और कहानियों को बताती हैं। शालभंजिका की एक दुर्लभ पत्थर की मूर्ति और कई अन्य मूर्तियाँ पूरे मंदिर में बिखरी हुई हैं। मंदिर के गर्भगृह में नृत्य करते हुए भस्मासुर,तो वहीं विभिन्न शिलाखंडों में शिव सती विवाह के चित्र उकेरे हुए हैं।
 वैज्ञानिकों और पुरातत्वविदों ने विभिन्न जटिल मूर्तियों पर लंबे समय तक विचार किया है और फिर भी, उनकी उत्पत्ति रहस्य में डूबी हुई लगती है।
अक्सर मेकला के पांडुवंशियों के अभिलेखों में उल्लिखित संगमग्राम के रूप में पहचाने जाने वाले ताला शिवनाथ और मनियारी नदी के संगम पर स्थित है। देवरानी-जेठानी मंदिरों के लिए सबसे प्रसिद्ध, ताला की खोज जेडी वेल्गर ने की थी, जो 1873-74 में प्रसिद्ध पुरातत्वविद् अलेक्जेंडर कनिंघम के सहायक थे। इतिहासकारों ने दावा किया है कि ताला गांव 7-8वीं शताब्दी ईस्वी पूर्व का है।
ताला के पास स्थित सरगांव गांव है जो धूम नाथ मंदिर का दावा करता है। इस मंदिर में भगवान किरारी के शिव स्मारक हैं पुरातत्ववेत्ता और इतिहासकार जटिल रूप से तैयार की गई पत्थर की नक्काशी को देखकर मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। गांव में देवरानी जेठानी मंदिर परिसर का एक मंदिर परिसर है जो आधे खंडहर अवस्था में है। ऐसा माना जाता है कि इसे शरभपुरिया राजवंश के शासक राजप्रसाद की दो रानियों ने बनवाया था। पुरातत्वविदों का मानना है कि यह 5वीं या 6वीं शताब्दी का है। देवरानी मंदिर लाल बलुआ पत्थर से बना है जो मुख्य रूप से गुप्तकालीन पुरातात्विक शैली का है। जबकि जेठानी मंदिर कुषाण शैली का है। हालाँकि, प्राप्त विभिन्न उत्खनन खंडहर और मूर्तिकला-शैली हमें बताती है कि ताला में शासन करने वाले विभिन्न राजवंश भगवान शिव के भक्त और शिव धर्म के प्रचारक थे। शायद इसीलिए आज भी शिव भक्त विभिन्न अनुष्ठान करने और पवित्र महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने के लिए यहाँ मंदिरों में आते हैं। भगवान शिव के भक्त यहाँ अपनी प्रार्थना करते हैं और अन्य उत्खनन स्थलों को देखना भी पसंद करते हैं।

Sunday, January 11, 2026

हुंकार विवेकानंद की : खेमेश्वर पुरी कृत

जगाया सुप्त गौरव को, निराला वो सन्यासी था,
हृदय में देश की धड़कन, रगों में तेज राशि था।
शिकागो की सभा में जब, गूँजी वाणी विवेकानंद
लगा सबको कि सदियों से, थमा जो वह प्रबासी था॥

गरजा वह वन-सिंह सरीखा, सागर पार शिकागो में,
दहल उठे सब दिग्गज ज्ञानी, उस युवक के नारों में।
नहीं हाथ में अस्त्र-शस्त्र थे, न सेना का घेरा था,
पर उस गेरुए के भीतर, सूरज का सा सवेरा था॥


जब गूँजी वह कड़क स्वरूपी, "भाइयों और बहनों" की वाणी,
थम गई विश्व की धड़कन सारी, जैसे थम जाता तूफ़ानी।
हिला दिया पाश्चात्य दंभ को, पल भर की हुंकार में,
हिंदू धर्म का ध्वज गाड़ दिया, सात समंदर पार में॥


"कायरता ही मृत्यु है" - उसने रणभेरी फूँकी थी,
सोए हुए इस आर्यावर्त की, तकदीर उसने लिखी थी।
दुर्बलता को त्याग बना दो, वज्र जैसी अपनी देह,
शक्ति ही है धर्म जगत में, शक्ति ही है पुण्य-गेह॥


बाधाओं के पर्वत को जिसने, चरणों से कुचल दिया,
युगों-युगों की जड़ता को, पुरुषार्थ में बदल दिया।
वह सन्यासी नहीं मात्र, वह तो क्रांति का शोला था,
दहक उठा जो राष्ट्र-प्रेम में, साक्षात् महाकाल बोला था॥

उठो जवानों! गुरु-मंत्र यह, रगो-रगों में भर लो तुम,
विवेकानंद की ज्वाला बनकर, विश्व-विजय अब कर लो तुम।
मृत्यु डरे जिस वीर पुरुष से, वैसा तुम अवतार बनो,
भारत माता की रक्षा को, तुम तीखी तलवार बनो॥

।। स्वामी विवेकानंद पुरी जी महाराज की जय ।।

© खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
     गृहावधुत छत्तीसगढ़ 
     मो. 8120032834

स्वामी विवेकानंद

*गुरु-भक्ति और शिकागो का दिग्विजय*


तर्क की कसौटी पर जिसने, गुरु को भी था तौला,
पर स्पर्श मात्र से खुल गया, हृदय का हर एक झरोखा।
छोड़ मोह संसार का, गुरु चरणों में शीश झुकाया,
रामकृष्ण की ज्योति ने, नरेंद्र को 'विवेकानंद' बनाया॥
नरेंद्र की हर जिज्ञासा को, मिला परमहंस का उत्तर,
शून्य से जो निकला पथ, पहुँच गया वो शिव के घर।
गुरु की व्याधि को जिसने, अपनी देह पर झेला था,
वही शिष्य तो जगत-गुरु, बनकर अकेला निकला था॥


तंग गलियों से निकलकर, सागर पार वो वीर गया,
हाथों में उपनिषद लिए, भारत का वो धीर गया।
बिना विशेषण, बिना परिचय, बस गेरुआ एक चोला था,
पर जब वो बोला मंच से, जैसे साक्षात् ब्रह्म बोला था॥
"भाइयों और बहनों" कहकर, उसने ऐसा जादू फेरा,
मानो सदियों से बिछड़े, अपनों का हुआ हो बसेरा।
शून्य पर जब उसने बोला, सारा विश्व निहाल हुआ,
भारत की प्राचीन विधा का, फिर से नया कमाल हुआ॥


उसने कहा—"न दुर्बल बनो, न कायरता को पालो,"
भीतर के उस सोये हुए, सिंह को अब तुम जगा लो।
धर्म वही जो मानवता की, आँखों के आँसू पोंछ सके,
वही बड़ा जो दीन-दुखी के, हित के बारे में सोच सके॥


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*हुंकार विवेकानंद की (वीर रस)*

गरजा वह वन-सिंह सरीखा, सागर पार शिकागो में,
दहल उठे सब दिग्गज ज्ञानी, उस युवक के नारों में।
नहीं हाथ में अस्त्र-शस्त्र थे, न सेना का घेरा था,
पर उस गेरुए के भीतर, सूरज का सा सवेरा था॥


जब गूँजी वह कड़क स्वरूपी, "भाइयों और बहनों" की वाणी,
थम गई विश्व की धड़कन सारी, जैसे थम जाता तूफ़ानी।
हिला दिया पाश्चात्य दंभ को, पल भर की हुंकार में,
हिंदू धर्म का ध्वज गाड़ दिया, सात समंदर पार में॥


"कायरता ही मृत्यु है" - उसने रणभेरी फूँकी थी,
सोए हुए इस आर्यावर्त की, तकदीर उसने लिखी थी।
दुर्बलता को त्याग बना दो, वज्र जैसी अपनी देह,
शक्ति ही है धर्म जगत में, शक्ति ही है पुण्य-गेह॥


बाधाओं के पर्वत को जिसने, चरणों से कुचल दिया,
युगों-युगों की जड़ता को, पुरुषार्थ में बदल दिया।
वह सन्यासी नहीं मात्र, वह तो क्रांति का शोला था,
दहक उठा जो राष्ट्र-प्रेम में, साक्षात् महाकाल बोला था॥

उठो जवानों! गुरु-मंत्र यह, रगो-रगों में भर लो तुम,
विवेकानंद की ज्वाला बनकर, विश्व-विजय अब कर लो तुम।
मृत्यु डरे जिस वीर पुरुष से, वैसा तुम अवतार बनो,
भारत माता की रक्षा को, तुम तीखी तलवार बनो॥

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*क्रांति-सूर्य: विवेकानंद*

रक्त में जिसके उबाल था, वह नमन योग्य सन्यासी था,
मृगछाला वाला वह योगी, साक्षात् पूर्ण अविनाशी था।
ठोकर से जिसने पर्वत तोड़े, मिट्टी से वीर बनाए थे,
जिसकी एक हुंकार मात्र से, सोया पौरुष मुस्काए थे॥


वह बोला— "मृत्यु को सम्मुख देख, कभी तुम मत भागो,
कायरता के खोल को छोड़ो, सिंहों की भाँति अब जागो।"
शून्य को जिसने शिखर बना कर, अम्बर को झुकवा दिया,
भारत के स्वाभिमान को, पूरी दुनिया में चमका दिया॥


तर्क-बुद्धि की ढाल हाथ में, ज्ञान की नंगी तलवार थी,
काट दिया अज्ञान का तमस, ऐसी उसकी धार थी।
नहीं थका वह, नहीं झुका वह, बढ़ता गया तूफ़ानों में,
अग्नि-बीज वह बोकर आया, पश्चिम के मैदानों में॥


"उठो ओ भारत के पुत्रों!" वह स्वर आज भी गूँजता है,
जो कर्मवीर बन बढ़ता है, उसको ही जग पूजता है।
हृदय में जिसके आग लगी हो, और माथे पर चंदन हो,
वही शिष्य विवेकानंद का, जिसका राष्ट्र ही वंदन हो॥

वह गेरुआ नहीं वस्त्र मात्र, वह धधकती एक ज्वाला थी,
पराधीन भारत के गले में, वह क्रांति की माला थी।
वह मरकर भी अमर हो गया, हममें प्राण फूँककर,
शीश नवाता है जग सारा, उसके चरणों में झुककर॥

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*युगपुरुष विवेकानंद: चेतना का शंखनाद*

नरेंद्र से जो बना विवेकानंद, वो ज्ञान का सागर था,
हृदय में जिसके करुणा थी, और भुजाओं में बल प्रखर था।
भटक रहा था जो सत्य की खोज में, व्याकुल होकर दर-दर,
रामकृष्ण के चरणों में मिला उसे, साक्षात् ईश्वर का घर॥


शिकागो की उस सभा में, जब गूँजा 'भाइयों और बहनों',
स्तब्ध रह गया विश्व देख, भारत के ज्ञान के गहनों।
खंडित थे जो विचार, उन्हें एकात्म भाव से जोड़ा,
भ्रम और पाखंड के हर मिथक को, पल भर में तोड़ा॥


"उठो, जागो और लक्ष्य की प्राप्ति तक रुको नहीं,"
यह मंत्र दिया उस वीर ने, जो थका कभी झुका नहीं।
दरिद्र-नारायण की सेवा को ही, परम धर्म बतलाया,
सोए हुए इस राष्ट्र को, पौरुष का पाठ पढ़ाया॥


तर्क और विज्ञान का, अध्यात्म से मेल कराया,
पश्चिम की चकाचौंध को, पूर्व का दर्पण दिखलाया।
वह अल्पायु का संत, जो अमर कहानी लिख गया,
भारत की सोई आत्मा में, स्वाभिमान भर गया॥


 खेमेश्वर पुरी गोस्वामी 
  गृहावधूत ,छत्तीसगढ़
  मो. 8120032834

Saturday, January 3, 2026

छेरछेरा मया कोठी

🌾 छेरछेरा: माई कोठी 🌾
पुन्नी के चंदा हासय, अगास मा छाय हे उँजियारी,
कोठी मा धान भरे हे, मगन हे किसान खेमेश्वर भारी।
नवा फसल के नवा खुसी, नवा उमंग के दिन आए,
छेरछेरा के पुन्नी हा, सब बर सुग्घर संदेश लाए।
छेरछेरा... छेरछेरा! अउ कोनो झन राहय घेरा-बेरा,
निकालव धान ला माई कोठी से, अउ झारव अपन मया के डेरा!

लइका मन के सोर सुंनौ, बाजत हे डंडा अउ डफली,
गली-गली मा गूँजत हे, ए मधुर धुन ह कतकी सुघरी।
कोनो बन गे हे जोकर, कोनो धरे हे झोला हाथ मा,
खुसी के परब मनावत हन, हम सब झन आज साथ मा।
अन्न के दान ह सबले बड़े, इही हमर छत्तीसगढ़ी पहिचान,
जेकर मन मा दया बसे, ओही ह सही मा इनसान।
बड़-छोट के भेद मिटावन, सब ला गले लगावन गा,
ए छेरछेरा के तिहार मा, दान के गंगा बहावन गा।
छेरछेरा... छेरछेरा! अउ कोनो झन राहय घेरा-बेरा,
निकालव धान ला माई कोठी से, अउ झारव अपन मया के डेरा!

© खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
छत्तीसगढ़िया पत्रकार, छत्तीसगढ़ 
मो. - 8120032834

बलिदानी वीर नारायण सिंह : समर्पित कविता

सोनाखान का शेर : वीर नारायण सिंह


महानदी की लहरों सा, जिसका पावन स्वाभिमान था,
सोनाखान की माटी का, जो बेटा बड़ा महान था,
दुर्भिक्ष पड़ा जब धरती पर, वह संकट का संबल बना,
गरीबों की भूख मिटाने को, जो काल का भी काल बना।

संपूर्ण क्रांति का छत्तीसगढ़ में, सच्चा स्वर गुंजार नहीं होगा ॥
जब तक इस धरती पर पैदा, फिर से नारायण नहीं होगा ॥१॥

बिंझवारों का गौरव था, वह शोषण का संहारक था,
अत्याचारी फिरंगियों का, वह वीर बड़ा विदारक था,
जनता के हित खातिर जिसने, अन्न के ताले तोड़ दिए,
सोने की चिड़िया के खातिर, सुख के बंधन छोड़ दिए।

शोषक उन गोरे अंग्रेजों का, अंत कभी स्वीकार नहीं होगा ॥
जब तक इस धरती पर पैदा, फिर से नारायण नहीं होगा ॥२॥

अग्नि स्तंभ सा खड़ा रहा, वह मौत से कभी डरा नहीं,
जो देश हेतु मर मिटता है, वह वीर कभी भी मरा नहीं,
फांसी का फंदा चूम लिया, भारत माता की जय कहकर,
चमक उठा वह बलिदान का, एक अमिट सितारा बनकर।

बलिदानों की इस गाथा का, कोई विकल्प तैयार नहीं होगा ॥
जब तक इस धरती पर पैदा, फिर से नारायण नहीं होगा ॥३॥

स्वाभिमान की रक्षा हित, जिसने दे दी अपनी कुर्बानी,
छत्तीसगढ़ की माटी गाती, आज भी उसकी अमर कहानी,
मुक्त हृदय से हम सब उसका, आओ अभिनंदन कर लें,
सोनाखान के उस बेटे को, हम शत-शत वंदन कर लें।

यह राष्ट्र-तिरंगा भारत का, तब तक आबाद नहीं होगा ॥
जब तक इस धरती पर पैदा, फिर से नारायण नहीं होगा ॥४॥

                ©पं.खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®
                   छत्तीसगढ़िया, छत्तीसगढ़
                     मो. 8120032834

Tuesday, December 30, 2025

नव वर्ष का स्वागत

सुनहरी धूप का आँचल, नया आकाश आया है,
पुरानी याद को तज कर, नया विश्वास आया है।
मिले खुशियाँ नए पथ पर, मिटे सब द्वेष के साये,
सफलता चूम ले माथा, हृदय में हर्ष भर जाए।
दुआ है हर कदम पर अब, नवल मुस्कान खिलती हो,
मिले जो लक्ष्य आँखों में, वही मंजिल भी मिलती हो।
समय की रश्मियों से हम, नया इतिहास लिखेंगे,
उमंगों के नए रंग अब, चहुँ ओर ही दिखेंगे।


© खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ®

सरस्वती वंदना

॥ भगवती सरस्वती वंदना ॥ श्वेत पदमासना माँ, ज्ञान की प्रकाश पुंज, वीणा कर सोहै शुभ, रागिनी रसाल है। हंस की सवारी साजे, मंद-मंद मुसक्याँहि, वा...